फॉरवर्ड थिंकिंग, जनवरी 2014

वाकई यह दु:ख की बात है कि ऐसी दुर्लभ फुले-आंबेडकरवादी फेमिनिस्ट जिसने ‘सवर्णिकृत’ भारतीय स्त्री विमर्श में जाति की बात उठाई अब हमारे बीच नहीं हैं। जो श्रद्धांजलि मैंने इस अंक में इकठ्ठा की है, इस क्रांतिज्योति को मेरी व्‍यक्तिगत श्रद्धांजलि है, जो समय से पहले ही बुझ गईं

फॉरवर्ड  प्रेस के नियमित पाठक जानते हैं कि प्रत्येक जनवरी में हम के जीवन और धरोहर पर फोकस करते हैं। पिछले कुछ सालों से हम यह अभियान भी चला रहे हैं कि उनकी जयंती 3 जनवरी को सर्वशिक्षा दिवस घोषित किया जाए। इस बार की हमारी आवरण कथा की लेखिका दलित कवयित्री एवं कार्यक्रम अनिता भारती एफपी के पाठकों के लिए कोई नया नाम नहीं। कुछ सालों से वह स्वयं एक अभियान की अगुवाई कर रही हैं कि 1 जनवरी को शिक्षा दिवस और 3 जनवरी को शिक्षक दिवस के रूप में स्थापित किया जाए। हम मिलकर यह आशा करते हैं कि देर से ही सही ब्राह्मणवादी शैक्षिक सत्ता आधुनिक भारत की शैक्षिक बराबरी में सावित्रीबाई फुले के योगदान के ऐतिहासिक महत्व को सम्मानित करे, खासतौर पर अतिवंचित स्त्री, अतिशूद्र और शूद्र के लिए।

पिछले साल मैंने पुणे विश्वविद्यालय स्थित क्रांतिज्योति सावित्रीबाई फुले विमन्स स्टडी सेंटर की निदेशक समाजशास्त्री शर्मिला रेगे से संपर्क साधा कि वे हमारी सावित्रीबाई पर केंद्रित आवरण कथा लिखें। लेकिन पहले से ही व्यस्त होने के कारण वह हमारे लिए नहीं लिख पाईं। उन्होंने मदद करने का आश्वासन करते हुए कहा कि वह फिर कभी लिखेंगी। उस समय मैंने उनसे एक ही बार फोन पर बात की थी और दो-एक ईमेल लिखी थीं। इस साल जुलाई में उनकी मौत की खबर से मुझे गहरा आघात लगा। बावजूद इसके कि मैं उनसे कभी नहीं मिला, उनके बारे में जो थोड़ा-बहुत मैंने जाना उसके कारण मैं उनका बहुत आदर करने लगा था। मैंने 2012 में पहली बार उन्हें ईमेल लिखते हुए कहा था :

एफपी दलित-बहुजन से सरोकार रखने वाले अधिकांश मुद्दों को फुले-आंबेडकर के दृष्टिकोण से देखती है। मैं आपको मुख्य रूप से आपके शानदार लेख के कारण जानता हूँ जो जरनल ऑफ इंडियन एजुकेशन में ‘एजुकेशन एज तृतीय रत्न : टूवर्ड्स फुले-आंबेडकराइट फेमिनिस्ट पेडागॉजिकल प्रेक्टिस’ शीर्षक से छपा था।

वाकई यह दु:ख की बात है कि ऐसी दुर्लभ फुले-आंबेडकरवादी फेमिनिस्ट जिसने ‘सवर्णिकृत’ भारतीय स्त्री विमर्श में जाति की बात उठाई अब हमारे बीच नहीं हैं। जो श्रद्धांजलि मैंने इस अंक में इकठ्ठा की है, इस क्रांतिज्योति को मेरी व्‍यक्तिगत श्रद्धांजलि है, जो समय से पहले ही बुझ गईं।

कोई यह नहीं कह सकता कि नेल्सन मंडेला समय से पहले चले गए। ‘आजादी की ओर अपनी लंबी पदयात्रा’ को पूरा करते हुए वह 95 वर्ष के हो चुके थे। लेकिन यह पदयात्रा या जीवन अकेलेपन में व्यतीत नहीं किया गया था। वे अपने दूसरे एएनसी कॉमरेडों के साथ कैद थे, और सब के सब अपने लोगों को नस्लभेदी सरकार से छुटकारा दिलाने में अगुवाई प्रदान कर रहे थे। जेल के उनके एक साथी अहमद कथरादा ने मंडेला के अंतिम संस्कार में बहुत ही जोशीला भाषण दिया। उनके जैसे तेज-तर्रार कॉमरेड ने भी माना कि ने मंडेला ने ‘माफ करना और भूल जाना’ की नीति का अनुसरण करना चुना और केवल इसी कारण  दक्षिण अफ्रीका में बहुनस्लीय शासन आ पाया। हालांकि विद्याभूषण रावत इस परिघटना को इस नजरिए से नहीं देखते, हमने मंडेला के प्रति उनकी श्रद्धांजलि को संक्षिप्त रूप में लिया है, क्योंकि उन्होंने आंबेडकर के साथ कुछ बातों को बहुत दिलचस्प ढंग से जोड़ा है।

इसी तरह, हालांकि हम हालिया राज्य विधानसभा चुनावों पर प्रेमकुमार मणि के विश्लेषण के हर पहलू से सहमत नहीं हैं, एफपी इसे इसलिए छाप रहा है क्योंकि उनके विरोधात्मक दृष्टिकोण अकसर दूरदर्शिता से भरपूर होते हैं। आपको उन्हें इस बात का श्रेय देना होगा कि एक राजनैतिक दल के पदाधिकारी होते हुए भी वह पूरी ईमानदारी से सोचते और लिखते हैं। हमारी राजनीति में प्रचलित ‘सेकुलरिज्म’ की उनकी आलोचना अभी-अभी जेल से बाहर आए उनकी पार्टी के नेता लालू प्रसाद यादव के इस बयान के खिलाफ जाती लगती है कि अब वह सांप्रदायिक ताकतों, खासतौर पर मोदी, से दो-दो हाथ करेंगे। साल 2014 के लोकसभा चुनावों के बारे में कोई भी भविष्यवाणी करने का समय शायद अभी नहीं है लेकिन मणि जैसे लेखकों के बारे में ही कहा जाता है कि वे जनता की आँख और कान होते हैं।

अगले महीने तक … सत्य में आपका,

(फारवर्ड प्रेस के जनवरी, 2014 अंक में प्रकाशित )


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