क्या आपकी जन्मपत्री हमारे देश को नष्ट कर सकती है?

महात्मा जोतिबा फुले (1827-1890), भारत के पहले ‘निम्न जाति’ के समाज सुधारक, का मानना था कि ज्योतिष सबसे मजबूत जंजीरों में से एक है जिनके द्वारा भारत के दबे-कुचले लोगों को गुलाम बनाया गया है। इसलिए हमारे लोगों को इस गुलामी से आजाद करने के लिए अपनी एक पूरी पुस्तक ही समर्पित कर दी

ज्योतिषियों के कारोबार के लिए नया साल बहुत शुभ होता है। लोग उन्हें काफी पसंद करते हैं क्योंकि उन्हें अपनी जन्मपत्री में हमेशा अपने बारे में कुछ अच्छा लिखा मिलता है। कुछ ज्योतिषियों के पास सिद्धियाँ भी होती हैं जिनके द्वारा वे तथाकथित रूप से आपकी मनोकामनाएँ – नौकरी, पैसा, सफलता, जीवनसाथी, सम्पति आदि – पूरी करने में आपकी मदद करते हैं। व्यक्ति  विशेष के लिए यह सब सकारात्मक हो सकता है – हालांकि यह निजी स्वार्थ को ही पूरा करता है – लेकिन क्या ज्योतिष ने हमारी वृहद् संस्कृति को नुकसान नहीं पहुँचाया?

जंतर मंतर : सबक जो भारत को सीखना होगा

हाल ही में, मैं लखनऊ में एक सेमीनार में भाग ले रहा था। मैंने वहाँ मौजूद 45 ग्रामीण अगुवों से पूछा कि जंतर-मंतर क्या होता है।

उनका स्वभाविक उत्तर था – जादू-टोना।

उनमें से कुछ जानते थे कि जंतर-मंतर नई दिल्ली में एक जगह का नाम भी है। वहाँ अजीब किस्म के ढाँचे बने हुए हैं। किसी को यह मालूम नहीं था कि उसका निर्माण एक धार्मिक-वैज्ञानिक वेधशाला के तौर पर किया गया था। विद्वान महाराजा जयसिंह द्वितीय (1686-1743) ने ऐसे ही ‘वैज्ञानिक’ यंत्र (जंतर) वाराणसी, उज्जैन, मथुरा और जयपुर में बनवाए थे जिनके द्वारा सूर्य, चंद्रमा, ग्रहों और तारों की चाल पर गौर करने के द्वारा समय को मापा जा सके।

बतौर एक शासक जयसिंह जानते थे कि प्रभावी शासन के लिए समयों की जानकारी जरूरी होती है। ज्ञान ही बल है। सृष्टि के एक विशिष्ट क्षण में यदि आप अपनी विशेष उपस्थिति को जानते हैं तो यह आपको बहुत सशक्त बनाता है। इतिहास में आए अपने समय को जयसिंह भली-भांति जानते थे।

अट्ठारहवीं सदी के शुरू में औरंगजेब के उत्तराधिकारी एक-दूसरे का सफाया कर रहे थे। यह मुगल साम्राज्य को अंदर से तबाह कर रहा था। इससे एक सदी पहले, मुगलों ने अँग्रेजों को अपने व्यापार स्थापित करने की अनुमति दे दी थी। लेकिन इस समय तक अँग्रेज व्यापारियों के पास न तो लड़ाई और न ही शासन करने की कोई भूख थी। जयसिंह के राज्य में, इरानी हमलावर नादिर शाह ने दिल्ली लूटी (1739) और मुगल साम्राज्य के सैन्य दिवालिएपन का पर्दाफाश कर दिया।

जयसिंह जानते थे कि उनके समय में हिंदुओं के पास एक खास मौका था कि वे भारत पर फिर से अपना अधिकार स्थापित करें। इसीलिए (जैसा कि एंड्रीयास वॉलवाहसेन अपनी पुस्तक ‘कॉस्मिक आर्कीटेक्चर इन इंडिया में लिखते हैं) ऐसी भव्य ज्योतिष-संबंधी वेधशालाओं के महत्वकांक्षी निर्माण के पीछे उनका प्रमुख प्रयोजन विज्ञान नहीं, राजनैतिक सत्ता थी। भारतीय दर्शन में एक बुनियादी उलझन के कारण यह समस्या और भी गहरी हो जाती है। आध्यात्मिक, तार्किक और भौतिक जगत एक दूसरे के साथ कैसे जुड़ते है? इस उलझन के कारण, दुर्भाग्यवश, जयसिंह के गुरुओं ने विज्ञान का इस्तेमाल जादू-टोने से जुड़ी सिद्धियों की सेवा में किया। परिणामस्वरूप, उन्होंने मध्यकालीन भारत को एक ऐसी संस्कृति में बदलने का मौका गंवा दिया जिसकी ताकत सत्य (जिसमें वैज्ञानिक सत्य भी शामिल है) से आती है। जयसिंह के बमुश्किल 14 साल बाद ही, 1757 में, ईस्ट इंडिया कंपनी के एक क्लर्क  रॉबर्ट क्लाइव ने, जिसके पास कोई सैन्य प्रशिक्षण या अनुभव नहीं था, प्लासी की लड़ाई में जीत हासिल की। हमारे प्रबुद्ध गुरुओं की सिद्धियों ने 190 साल के औपनिवेशिक शासन से बचाने में हमारी कुछ मदद नहीं की।

एक छोटे-से द्वीप से आए अँग्रेज भारत को अपना उपनिवेश कैसे बना पाए? क्या हम उनसे कई बड़े उपमहाद्वीप में रहने वाले और उनसे कई अधिक धनी नहीं थे? हम इंग्लैंड तक की समुद्री यात्रा क्यों नहीं कर पाए, कम से कम व्यापार के लिए या फिर अपनी फिलॉस्फी और कला सिखाने?

महात्मा जोतिबा फुले (1827-1890), भारत के पहले ‘निम्न जाति’ के समाज सुधारक, का मानना था कि ज्योतिष सबसे मजबूत जंजीरों में से एक है जिनके द्वारा भारत के दबे-कुचले लोगों को गुलाम बनाया गया है। इसलिए हमारे लोगों को इस गुलामी से आजाद करने के लिए अपनी एक पूरी पुस्तक ही समर्पित कर दी। सत्य पर आधारित शिक्षा के द्वारा उत्पीडि़तों को मुक्त करने का फुले का प्रयास पुणे और मुंबई में मौजूद ईसाई शैक्षिक आंदोलन से ही उत्प्रेरित था। फुले से पचास वर्ष पूर्व, बैपटिस्ट मिशनरी विलियम कैरी ने बंगाल में खगोलशास्त्र पढ़ाना शुरू किया जिससे कि ज्योतिष की जादू-टोने की ताकत के स्थान पर विज्ञान की वस्तुपरक ताकत स्थापित हो।

ज्योतिष गुलाम क्यों बनाता है? इस संक्षिप्त लेख में हम इस जटिल विश्वदृष्टि के केवल एक ही पक्ष का उदाहरण दे सकते हैं  –  समय के प्रबंधन में भारतीय अक्षमता।

समय का हिंदू दृष्टिकोण

विलियम कैरी से कई दशक पहले महाराजा जयसिंह की जेसुइट कैथोलिक मिशनरियों से मित्रता हुई और उन्होंने उन्हें जयपुर में रहने की जगह भी दी। कैथोलिक मिशनरियों ने राजा को टेलीस्कोप से परिचित करवाया। अपनी पुस्तक जिज-ए मोहम्मद शाही’ में जयसिंह इन यूरोपीय औजारों को खारिज करते हैं, यह कहते हुए कि ये आकार में छोटे हैं, इनके द्वारा सही गणना या निरीक्षण नहीं किया जा सकेगा। जयसिंह विशाल यंत्रों (जंतरों) को पसंद करते थे क्योंकि उनसे देखने वालों में विस्मय का भाव जागता है। उन्हें लगता था कि यह उनके वैभव के अनुकूल है। कोई यंत्र या औजार काम का है या नहीं यह इतना प्रासंगिक नहीं था। इसीलिए भारतवासी उनके कार्यों को जादू-टोना ही मानते हैं – तांत्रिकों के काम के लिए, लेकिन आम लोगों के लिए बेकार।

उनके अधिकांश ‘औजार’ बेशक समय दर्शाते थे (हालाँकि सटीकता से नहीं)। कई दूसरे, जैसे कि जंतर-मंतर का भव्यशाली ‘मिश्र यंत्र’, कोई खगोलीय उद्देश्य पूरा नहीं करते थे। अगर इसका निर्माण देवताओं के तुष्टिकरण के द्वारा सिद्धियाँ पाने के लिए नहीं था तो फिर निश्चित रूप से यह शो-पीस देखने वालों को प्रभावित करने के लिए बनाया गया था। क्यों

विद्वान पंडितों ने वस्तुपरक विज्ञान को जादू-टोने की सिद्धियों के साथ इसलिए जोड़ दिया क्योंकि हिंदू धर्म के अनुसार समय दरअसल मृत्यु का भयावह देवता है जिसका नाम है काल। उससे डरना चाहिए, उसकी पूजा करनी चाहिए और उचित कर्मकांडों और चढ़ावों के द्वारा उसे शांत करते रहना चाहिए। चूंकि ‘काल’ या ‘कल’ एक दैवीय शक्ति  है, आप अपने ‘कल’ को नियंत्रित कर उसकी योजना नहीं बना सकते। आपको क्यों करना चाहिए या फिर आप क्यों करेंगे ज्योतिष के जगत में पहले से ही लिखा है। भाग्य बताने वाले इसे आपकी जन्मपत्री, या हथेली या फिर माथे पर पढ़ सकते हैं। समय के देवता की पूजा ने ज्योतिष की संस्कृति का निर्माण किया जिसमें हमारा समय हम पर शासन करता है। यह संस्कृति हमसे कहती है कि हम उपलब्ध तथ्यों और जानकारी को ध्यान में रखते हुए अपने महत्वपूर्ण निर्णय न करें बल्कि ज्योतिषियों, पुरोहितों और दूसरे भाग्य बताने वालों की सलाह लें जिनकी जानकारी और निर्णय के स्रोत अप्रत्यक्ष हैं, गुप्त हैं और जिनकी पुष्टि नहीं की जा सकती। किसी खास दिन या अवसर पर शासन करने वाले नक्षत्रीय देवता को अगर तुष्ट नहीं किया गया तो वह दुर्भाग्य का कारण बन सकता है।

महात्मा फुले ने ज्योतिष का विरोध किया क्योंकि उन्होंने मूसा की पुस्तकों को पढ़ा था, जिसने 3,500 साल पहले यहूदियों को मिस्र की गुलामी से आजाद करवाया था। मूसा जानता था कि बौद्धिक-आत्मिक गुलामी राजनैतिक और आर्थिक गुलामी से कहीं गहरी होती है। इसलिए, उसने भाग्य बताने वाली हर विद्या को प्रतिबंधित कर दिया। उसका निर्देश था ‘तुम … न टोना करना, और न शुभ या अशुभ मुहूर्तों को मानना’ (लैव्यव्यवस्था 19 : 26)। महत्वपूर्ण प्रश्न यह है कि…

बाइबल ने अँग्रेजों को कैसे सशक्त बनाया?

मूसा ने बाइबल की पहली पाँच पुस्तकें लिखीं। उसकी कृतियों ने एक मुक्तिकामी विश्वदृष्टि का निर्माण किया क्योंकि पहली पुस्तक के पहले ही अध्याय में मूसा ने सिखाया कि देशकाल के खगोल से पहले ही ईश्वर का अस्तित्व था। मनुष्य का निर्माण ईश्वर के स्वरूप में किया गया, अर्थात् हर सृजी गई वस्तु से महानतर। समय (सप्ताह के सात दिन) भौतिक यथार्थ का हिस्सा थे जिसका निर्माण ईश्वर ने किया। और इस भौतिक जगत पर शासन करने के लिए ईश्वर ने मनुष्यों (नर और नारी) की सृष्टि की। मनुष्यों को यह विशेषाधिकार दिया गया कि वह शासन करने में समय (दिनों) की सहायता लें। एक सप्ताह का काम छह दिनों में पूरा किया जाना था ताकि हम सातवें दिन विश्राम कर सकें। विश्राम का दिन, सब्त का दिन, पवित्र दिन था – यह नियमित रूप से याद दिलाता था कि हमें ईश्वर के लिए जीवन व्यतीत करना है, न कि केवल काम के, या समय के या फिर पैसा कमाने के लिए।

योग का एक अभिन्न अंग है सूर्य नमस्कार। लेकिन मूसा को दिए गए इलहाम के अनुसार, सूर्य, चंद्रमा और तारों की उपासना नहीं की जानी चाहिए क्योंकि उन्हें मनुष्यों पर शासन करने के लिए नहीं सृजा गया। उन्हें रात और दिन पर शासन करने के लिए बनाया गया था। मिसाल के तौर पर, सूर्य जीव और वनस्पति जगत को निर्देश देता कि कब जागना है और कब सोना है। दूसरी ओर, मनुष्यों को सृजा गया कि वे सूर्य, चंद्रमा और तारों की मदद से प्रकृति पर अपना अधिकार स्थापित करें।

ऐसा क्यों है कि खगोल के प्रति बाइबल के दृष्टिकोण ने ज्योतिष की बजाय खगोलशास्त्र को बढ़ावा दिया? और क्यों बाइबल-आधारित संस्कृतियों ने भूगोल का अध्ययन किया और कैलेंडर और घडिय़ों का निर्माण किया ताकि ईश्वर की भौतिक सृष्टि पर मानवीय अधिकार स्थापित करें?

ऐसा इसलिए हुआ क्यों बाइबल की शिक्षानुसार खगोल पिंड देवता नहीं हैं। उनका निर्माण ‘चिह्नों’ के रूप में किया गया जिनका हमें अध्ययन करना था ‘फिर परमेश्वर ने कहा, ”दिन को रात से अलग करने के लिए आकाश के अन्तर में ज्योतियाँ हों, और वे चिह्नों, और नियत समयों और दिनों और वर्षों के कारण हों’’’ (उत्पत्ति 1:14)। सूर्य, चंद्रमा, और तारे पूर्व, पश्चिम, उत्तर और दक्षिण दिशाओं के लिए हमारे प्राथमिक चिह्न हैं। वे हमारी सहायता करते हैं कि स्थान और समय की नीरस विशालता को दिशाओं और समय की इकाइयों – दिन, सप्ताह, वर्ष – में बाँट सके।

हम भारतीय यहाँ से निकल कर इंग्लैंड को अपना ‘उपनिवेश’ नहीं बना सके क्योंकि हम सितारों का अध्ययन करते थे उनका गुलाम बनने के लिए। अँग्रेज नाविकों ने सितारों का अध्ययन किया कि वे मानचित्र बनाएँ जिससे वे पृथ्वी की खोज कर सकें और उस पर अपना अधिकार स्थापित कर पाएँ।


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