शरीर से लम्बी पूंछ

अरुंधति रॉय ने आम द्विज अथवा वाम संस्कार के दलित विरोधियों की तरह अपनी आलोचना में एक छिद्रान्वेषण यह रखा है कि जब कोई गैरदलित किसी दलित के बारे में नहीं लिख सकता तो आम्बेडकर तो महार थे, उनके बारे में महारों के अलावा अन्य कोई दलित लिखने का कैसे अधिकारी हो सकता है

आम्बेडकर की पुस्तिका एनिहिलेशन ऑफ कास्ट (जाति का विनाश) के नए नवायन संस्करण को लेकर जो विवाद साइबर स्पेस, ब्लॉग, फेसबुक सहित पत्र-पत्रिकाओं में हो रहा है, उसमें अचंभित करने वाला कुछ भी नहीं है। पुस्तक की भूमिका ख्यातनाम लेखिका अरुंधति रॉय ने लिखी है। अगर इस प्रसिद्ध लेखिका की पुस्तक में शाब्दिक-उपस्थिति को ‘आग’ माना जाए तो दलित बौद्धिकों द्वारा रॉय की मंशा पर सवाल खड़ा करना ‘घी’ का काम करता दिखाई दे रहा है। इससे पुस्तक की ‘कीर्ति’ फैलेगी और प्रकाशक का व्यावसायिक हित बेहतर सध सकेगा। 60 पृष्ठों की लघु-पुस्तक की भूमिका में 200 पृष्ठों का भाषण झाडऩा कि सी तर्क से उचित नहीं ठहराया जा सकता। यह 60 के सोने में 200 के टलहे को फेंट, विशुद्ध प्रदूषण फैलाने का मामला है।

क्या अरुंधति की खुद की किसी पुस्तक में ऐसी असंतुलित भूमिका है, जिसमें पुस्तक से तिगुने शब्द भूमिका में हों? एक कहावत है कि ‘एक आने का मुर्गा, नौ आने का मसाला।’ दलित-बहुजन तबकों की ओर से इसका विरोध होने पर अरुंधति रॉय एवं उनके अंध-समर्थक वही पिटा-पिटाया राग अलाप रहे हैं कि यह अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर हमला है। भाई, आप आलोचना के जनतांत्रिक अधिकार को विरोध का जामा क्यों पहना रहे हैं? यदि कोई बौद्धिक-सामाजिक संगठन किसी विषय पर संयत-संगत तरीके से अपनी मतविभिन्नता दर्ज कर रहा है तो इसमें आपत्तिजनक क्या है?

आदिवासियों एवं बांध विस्थापितों के आंदोलनों का अरुंधति हिस्सा रही हैं, अगुआ रही हैं ? क्या उनका नैतिक दायित्व नहीं बनता कि वे ऐसे लापरवाह वक्तव्य न दें? आम्बेडकर ने ‘मनुस्मृति’ दहन किया था। परंतु क्या वह किसी किताब को जलाना था या समाज में पल रही अमानवीय विचारधारा का प्रतीकात्मक विरोध था? औचित्य पर बिना विचारे क्या इसे आप गैर-मुनासिब कृत्य ठहरा देंगे?

अरुंधति रॉय अपनी भारी-भरकम भूमिका में लिखती हैं कि ‘संयोग’ से रिचर्ड एटनबरो निर्देशित ‘गांधी’ फिल्म में आम्बेडकर को दिखाया ही नहीं गया। पर इसे वे मात्र एक तथ्य के रूप में रखती हैं, इसकी आलोचना नहीं करतीं। वे यहां ‘संयोग’ शब्द का प्रयोग करती हैं। हालांकि ऐसा कह वे आलोचना का सूत्र हमें थमा जाती हैं क्योंकि वे यह भी जोड़ती हैं कि फिल्म को भारत सरकार का आर्थिक सहयोग भी मिला था। बताइए, यह कैसी फिल्म है जिसमें गांधी-आम्बेडकर की कुछ मिनटों की भी मुलाकात नहीं दिखलाई जाती है ? और, इस प्रकरण पर वे अपनी 200 पृष्ठों की बात में से कुछ शब्द भी आलोचना में खर्च करना नहीं चाहतीं?

इस भूमिका में गांधी के बारे में टोकरी भर बातें लिखकर व उनको बाबासाहेब पर भारी बताने में अरुंधति का मूल ध्येय गांधी के वैश्विक कद को पुस्तक के विज्ञापन के लिए प्रयोग करने का है। पत्रकार अरुण शौरी द्वारा ‘वरशिपिंग फॉल्स गॉड्स’ (1997) लिखकर आम्बेडकर को जानबूझ कर नीचा दिखाने का प्रयास किया गया, कम करके आंकने का प्रयत्न किया गया। यहां अरुंधति भी सायास यही कर रही लगती हैं, कारण कि विवाद के परिप्रेक्ष्य में उनका जो लिखित स्पष्टीकरण आया है उसमें वे अनेक बार बचाव की मुद्रा में आती दिखती हैं। सवर्ण एवं वामपंथी बुद्धिजीवियों की तरह, उनकी आलोचना में मुखर हुए बहुजन बुद्धिजीवियों को वे पिटे-पिटाए ढर्रे पर अक्षम, अयोग्य, आक्रामक और आतंकी तक बताने का संकेत छोड़ रही हैं। ध्यान रहे, इस पुस्तक की सामग्री, आम्बेडकर का वह भाषण है जो उन्हें आर्य समाज से प्रभावित ‘जात-पांत तोड़क मंडल’ के मंच से सन् 1936 में देना था। पर इस पर्चे को जब आयोजन के अधिकारियों ने पढ़ा तो जात-पांत तोडऩे के उनके इरादे को लकवा मार गया और आम्बेडकर की तीखी मार को वे सह नहीं पाए। मंडल ने बीच का रास्ता सुझाया कि भाषण को आम्बेडकर कुछ कांट-छांट कर नरम बना दें परंतु बाबासाहेब को अपने भाषण से एक शब्द भी जाति की तरफदारी में त्यागना मंजूर न था।

हम याद रखें कि जब गैर-बहुजन ने दलित साहित्य को अछूत मानना बंद किया, अन्यमनस्क-अनमने-सहानुभूति में ही सही, उस पर लिखना-पढऩा शुरू किया, तभी उनके अच्छे दिन आए। बात बढ़ी, धार बढ़ी, संवाद बढ़ा और, यह तय है कि उन्होंने सेंत में इस ‘स्व-अहितकारी एवं परकल्याणकारी’ कार्य में हाथ नहीं लगाया। सरकारी संस्थानों, कॉलेजों, विश्वविद्यालयों, शोध संस्थानों में दलित शोध, अध्ययन, विमर्श आदि के नाम पर देखिए द्विजों की कितनी चांदी है। अधिकांश माल वे ही चटकर रहे हैं। इस क्षेत्र में भी दलित-पिछड़े हाशिए पर ही हैं। अनुयायी की भूमिका में ही हैं, अगुआई पर द्विजों का ही कब्जा है। द्विजों की नेतृत्वकारी भूमिका के अपने खतरे हैं। वे चाहेंगे कि दलित लेखन की त्वरा, तेज, धार व एक्सक्ल्युसिवनेस को खत्म कर उसे नखदंतविहीन कर दे। इतिहास गवाह है कि कबीरपंथ, बौद्ध धर्म, जैन धर्म आदि के प्रगतिशील, मानवतावादी, बुद्धिवादी तत्वों को द्विजों ने उनमें घुसकर मटियामेट किया।

प्रसंगवश, आम्बेडकर जयंती मनाए जाने के समाचार जानने के लिए इन पंक्तियों के लेखक ने दिनांक 15 अप्रैल, 2014 के कुछ अखबारों के पटना संस्करण की छानबीन की तो रोचक तथ्य हाथ लगे। केवल बहुजन समुदाय से जुड़े राजनैतिक-सामाजिक संगठनों द्वारा ही आम्बेडकर जयंती मनाए जाने की खबरें पढऩे को मिलीं। द्विज जातियों, जमातों व संगठनों द्वारा आम्बेडकर जयंती मनाए जाने की कोई खबर नहीं थी। जबकि द्विज गांधी ही नहीं बल्कि गैर-द्विज सरदार पटेल से जुड़े समारोहों का आयोजन द्विज संगठनों द्वारा बड़े पैमाने पर तामझाम के साथ किया जाता रहा है।

जैसे हिंदी अखबार वाले बहुसंख्यकों के प्रतिनिधि बनकर अल्पसंख्यकों के पर्व-त्योहारों पर बधाई और शुभकामना व्यक्त करते हैं, उसी तरह से अखबारों के रिपोर्टर अरुंधति रॉय की तरफ से समाचार बनाते दिखते हैं। जब वे अरुंधति की बात करते हैं तो अपना बनाकर कहते हैं, और जब अरुंधति के मत से अलग विचारों को सामने रखते हैं तो ‘दलितों के विचार’, ‘उनके विचार’ जैसे परायेपन का बोध कराने वाले जुमलों का इस्तेमाल करते हैं। दूसरे शब्दों में, अरुंधति के लिए अपनापा का भाव एवं विरोधी मत अथवा स्वर के लिए दुराव वाले संबोधन।

इसी आसंग में प्रश्न फेंटा जा सकता है कि आखिर साहित्य में बहुजन के लिए बोलने, लिखने का अधिकार किसको है? यानी क्या स्वानुभूति एवं सहानुभूति के खांचे में बद्ध करके इस सवाल को देखा जा सकता है? उत्तर, हां में भी है और ना में भी। स्पष्ट है कि सच की बुनियाद के रूप में अनुभव का कोई मुकाबला नहीं हो सकता। दूसरी ओर, सहानुभूति की अभिव्यक्ति का भी अपना महत्व है। साहित्य में ‘परकाया-प्रवेश’ की धारणा का आत्यंतिक महत्व है। किसी दूसरे व्यक्ति अथवा स्रोतों से पाए ज्ञान अथवा पर-अनुभव को अपने कला-कौशल से निखारकर ही अधिकांश साहित्य लिखा गया है। यह भी अनुभव को बरतने का एक उदाहरण है। डायरी, यात्रा-वृत्तांत, आत्मकथा, रिपोर्ताज जैसी प्राय: स्व-अनुभव एवं यथार्थ पर आधारित विधाओं से अलग कविता, कहानी, उपन्यास जैसी वृहत्तर विधाओं में जो लेखन उपलब्ध हैं, वे अपने-पराये के अनुभवों, लिखित-मौखिक विविध जानकारियों में कल्पना का पुट मिलाकार ही रचे जाते हैं।

साहित्य में यथार्थ आधारित विधाओं में लेखन जरूर हो रहा है पर उसकी विश्वसनीयता बहुत नहीं है। हम अपने अनुभवों का, अपनी सुविधा एवं राजनीति अनुसार, छोड़-पकड़ भी करते हैं, और तोड़-मरोड़ भी। अत: साहित्य मूलत: कल्पनाजीवी ही होता है। कल्पना के नाम पर लिखने का सबसे बड़ा लाभ यह है कि उसमें आनय तथ्यों, वाद-विवादों के लिए कोई प्रमाण नहीं मांगा जा सकता। जबकि अनुभव अथवा तथ्य आधारित लेखन को कोई भी जांच-परख पर आरोपित कर सकता है। अप्रिय, प्रतिकूल, अवमाननाजन्य तथ्यों के अंकन पर घमासान मच सकता है, प्रमाण मांगे जा सकते हैं, कोर्ट-कचहरी का चक्कर लग सकता है। रिश्तों-नातों में दरार आ सकती है।

प्रसंगवश, अरुंधति रॉय ने आम द्विज अथवा वाम संस्कार के दलित विरोधियों की तरह अपनी आलोचना में एक छिद्रान्वेषण यह रखा है कि जब कोई गैरदलित किसी दलित के बारे में नहीं लिख सकता तो आम्बेडकर तो महार थे, उनके बारे में महारों के अलावा अन्य कोई दलित लिखने का कैसे अधिकारी हो सकता है ? साफ है, आम द्विज लेखकों के जो पूर्वग्रह दलित लेखन के प्रति है, वही इस ख्यातनाम लेखिका के अंतस में भी पल रहे हैं। वे और उनके धुर समर्थक यह कतई नहीं मान सकते कि दलितों के बारे में हमारी द्विज प्रतिभा जो कलमबद्ध कर रही है उसमें कोई खोट हो सकती है, वह वेद-वाणी से कम हो सकती है और, सबसे बढ़कर तो यह ‘पारंपरिक अस्वीकार’ कि यह खोट एक दलित कुलजनमा कैसे निकाल सकता है ? गांधी और आम्बेडकर के विचार-द्वंद्व में भी यह एक मूल बात रही।

दलित लेखन में गैर-दलित आमद के स्वीकार-अस्वीकार पर तनिक बात करें तो तथ्य यह है कि दलित लेखन का बहुत सारा हिस्सा गैर दलितों का है। इस गैर दलित में ओबीसी भी हैं, द्विज भी। दलित लेखन जिस आम्बेडकरवाद को मूल मानकर चलता है उसमें सारे मानववादी विचार एवं विचारधाराएं एवं उनके पोषक आ जाते हैं। दलित लेखन में क्या द्विज कुलजनमा महामानव बुद्ध का स्वीकार नहीं है, क्या इसमें मार्क्स नहीं आते, राहुल सांकृत्यायन नहीं समाते? प्रेमचंद, निराला, मुक्तिबोध, नागार्जुन सहित अनेक द्विज लेखकों की कतिपय रचनाएं दलित साहित्य का हिस्सा हैं। कबीर, रैदास, फुले, पेरियार और हाल में आएं तो राजेंद्र यादव, प्रेम कुमार मणि, रमणिका गुप्ता, राजेंद्र प्रसाद सिंह, चौथीराम यादव जैसे बहुजन ब्रेन के बिना तो दलित साहित्य व चेतना की कल्पना भी नहीं की जा सकती। कोई भी प्रमुख दलित साहित्यिक पत्रिका उल्टा कर देख लीजिए, उसमें आपको दलित, ओबीसी एवं द्विज लेखकों की रचनाएं साथ-साथ मिलेंगी।

दलित साहित्य में यदि जोर देकर यह कहा जाता है कि सहानुभूति की अपेक्षा यहां स्वानुभूति का अधिक महत्व है, और यही इस साहित्य का मूल स्वर है, धुरी है और सहानुभूति उसकी आवश्यक परिधि, उसका जरूरी हाशिया-हिस्सा तो इस तथ्य को पचाने में किसी को क्यों परेशानी होनी चाहिए?

 

(फारवर्ड प्रेस के जुलाई, 2014 अंक में प्रकाशित)


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