लाल भूमि पर दलितबहुजन दावेदारी

जेएनयू में दलितबहुजन नेतृत्व का उदय रातों-रात नहीं हुआ. इसकी शुरुआत आरक्षण व नीची जातियों के विद्यार्थियों को उच्च शिक्षा पाने के अवसर मिलने के साथ हुई

अधिकांश राजनैतिक पंडितों के लिए सन् 2014 के जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय छात्रसंघ चुनाव के नतीजों की भविष्यवाणी करना अंतिम क्षणों तक मुश्किल था। अध्यक्ष पद के चारों प्रत्याशियों के बीच कड़ा मुकाबला था। परन्तु वरिष्ठ पत्रकारए लेखक और जेएनयू की राजनीति के गहरे जानकार दिलीप मण्डल पूरे आत्मविश्वास से यह भविष्यवाणी कर रहे थे कि ‘‘परिणाम दलितबहुजन उम्मीदवारों के पक्ष में जायेगा’’।

हर वर्ष, सितंबर के मध्य में, जब जेएनयू का विशाल कैंपस हरियाली से ढका होता है, तब जेएनयू व अन्य विश्वविद्यालयों के हजारों छात्रए स्कूल आफ इंटरनेशनल स्टडीज के लाॅन में जुटते हैं। तीन दिन तक वे लाॅन में लगे लाउडस्पीकरों से छात्रसंघ चुनावों के नतीजों और रूझानों की घोषणाएं सुनते रहते हैं।

दिनेश कुमार अहिरवाल, जो चीनी अध्ययन के शोध छात्र हैं और जिन्होंने अध्यक्ष पद के लिये सन् 2011 में चुनाव लड़ा था, कहते हैं, ‘‘चूंकि अब कोई भी विद्यार्थी केंद्रीय पैनल के लिए एक ही बार चुनाव लड़ सकता है इसलिए अब छात्रसंघ के दरवाजे नीची जातियों के छात्रों के लिए खुल गये हैं। पहले ऊँची जातियों के छात्र साल दर साल चुनाव लड़ते रहते थे और नवागत विद्यार्थियों को मौका ही नहीं मिलता था।’’ मंडल की तरहए अहिरवाल भी इस तथ्य से वाकिफ हैं कि जेएनयू छात्रसंघ में ऊँची जातियों के नेतृत्व का वर्चस्व धीरे-धीरे समाप्त हो रहा है। वे इसका श्रेय लिंगडोह कमेटी की सिफारिशों को देते हैंए जो सन् 2011 में लागू की गई हैं। जेएनयू के वामपंथी और प्रजातांत्रिक खेमों में लिंगडोह सिफारिशों को बहुत प्रशंसा की दृष्टि से नहीं देखा जाता। इन खेमों के सदस्यों का कहना है कि ये सिफारिशें, दरअसल, शासक वर्ग द्वारा छात्र राजनीति के आमूल परिवर्तनवादी तबके को कमजोर करने का प्रयास हैं। अहिरवाल की राय इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि यूनाईटेड दलित स्टूडेंट्स फोरम, जिससे वे जुड़े हुए हैं, लिंगडोह समिति की सिफारिशों का विरोध करने के लिए गठित संयुक्त संघर्ष समिति का हिस्सा है।

तीसरे दिन राष्ट्रीय मीडिया ने ऑल इंडिया स्टूडेंट्स एसोसिएशन के उम्मीदवारों की केंद्रीय पैनल के चारों पदों पर विजय की खबर को काफी महत्व दिया परंतु यह नहीं बताया कि चारों विजयी उम्मीदवार दलितबहुजन व अल्पसंख्यक सामाजिक पृष्ठभूमि के थे-आशुतोष कुमार, जो कि यादव हैंए अध्यक्ष चुने गये, अनंत प्रकाश नारायण जो उपाध्यक्ष बने व चिंटू कुमारी, जो महासचिव चुनी गयीं, दलित हैं और सहसचिव चुने गए शफकत हुसैन कश्मीरी मुसलमान हैं । मंडल सही सिद्ध हुए।

मीडिया से बातचीत करते हुए आशुतोष कुमार और चिंटू कुमारी ने बिना किसी लागलपेट के अपनी जीत को वंचित तबके की जीत बताया। ‘‘हम सब वंचित तबके की दावेदारी के लिए संघर्ष कर रहे थे’’, चिंटू ने एक टीवी चैनल से कहा।

न केवल विजेता बल्कि उनके निकटतम प्रतिद्वंद्वी और अन्य अनेक उम्मीदवार नीची जातियों के थे। उदाहरणार्थ, ‘लेफ्ट प्रोग्रेसिव फ्रंट‘ की राहिला परवीन, जो अध्यक्ष पद की उपविजेता रहीं, पसमांदा मुसलमान हैं। ‘अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद‘ के सौरभ कुमार, जो तीसरे नंबर पर रहे, कुर्मी हैं और स्टूडेंट्स फेडरेशन आफ इंडिया के पिंडिगा अंबेडकर, जो चैथे स्थान पर थे, दलित हैं।

क्या 2014 के जेएनयू छात्रसंघ चुनाव, जेएनयू के लाल किले में दलितबहुजनों की सेंध का प्रतीक हैं? अगर हम जेएनयू छात्रसंघ राजनीति में आए हालिया परिवर्तनों को देखें तो यह स्पष्ट हो जायेगा कि दलितबहुजनों की आवाज वहां बुलंद होती जा रही है।

ऊंची जातियों के वर्चस्व से

सन् 1969 में स्थापित जेएनयू, अपने इस दावे के विपरीत, कि वह सामाजिक न्याय की अवधारणा पर आधारित है, लंबे समय तक उच्च जातियों और वर्गों के वर्चस्व का केंद्र बना रहा। काफी लंबे संघर्ष के बाद, जेएनयू में दलितबहुजन छात्रों और शिक्षकों के लिए आरक्षण का प्रावधान किया गया। जानेमाने मानवाधिकार कार्यकर्ता और जेएनयू के पूर्व छात्र उमाकांत कहते हैं कि सन् 1990 के दशक की शुरूआत में जेएनयू में पहला एससी शिक्षक नियुक्त हुआ और यह नियुक्ति एक लंबे संघर्ष के पश्चात हो सकी। ‘‘जब जेएनयू अपनी रजत जयंती मना रहा था और भारत के तत्कालीन राष्ट्रपति शंकरदयाल शर्मा को समारोह में मुख्य अतिथि के बतौर आमंत्रित किया गया तब हमने इसका विरोध किया और यह सुनिश्चित किया कि वे कैंपस तक न पहुंच सकें। हमारा विरोध इसलिए उचित था क्योंकि दलितों, आदिवासियों और पिछड़ी जातियों को इस तथाकथित प्रगतिशील विश्वविद्यालय में उनके अधिकारों से वंचित किया जा रहा था।’’

नवंबर 1971 में जेएनयू छात्रसंघ का पहला चुनाव हुआ। तब से लेकर हाल तक, अधिकांश छात्रसंघ अध्यक्ष समाज के उच्च वर्गों से संबंधित थे। उदाहरणार्थ, जेएनयू छात्रसंघ के पहले अध्यक्ष एक ब्राह्मण ओ.एन. शुक्ला (1971-72, स्वतंत्र उम्मीदवार) थे। यहां तक कि सबसे ‘लोकप्रिय’ व ‘सफल’ छात्र नेता भी ऊँची जातियों से संबंध रखते थे-प्रकाश कारत, (1973-74, एसएफआई, वर्तमान में सीपीएम के महासचिव) आनंद कुमार, भूमिहार (1974-75, फ्री थिंकर्स, वर्तमान में आम आदमी पार्टी के नेता), डी.पी. त्रिपाठी, ब्राह्मण (1975-76, एसएफआई, वर्तमान में एनसीपी के महासचिव), एवं सीताराम येचुरी, ब्राह्मण (1976-77, एसएफआई, वर्तमान में सीपीएम पोलिट ब्यूरो सदस्य)।

 …से दलितबहुजनों के प्रभाव में वृद्धि तक

दलित बहुजनों का विश्वविद्यालय कैंपस में प्रभाव बढ़ने की शुरूआत सन् 1990 के दशक में मंडल आयोग की सिफारिशें लागू होने के साथ हुई। एआईएसए के चंद्रशेखर प्रसाद, कोयरी व एसएफआई के बातीलाल बेरवा, दलित दो-दो बार (क्रमशः 1994-96 व 1996-98) अध्यक्ष चुने गए। इसके अलावा, अल्पसंख्यक व महिला उम्मीदवार भी अध्यक्ष पद के चुनाव में सफल रहे। इनमें शामिल थे नसीर हुसैन (1999-2000, एसएफआई), अलबीना शकील (2001-2002, एसएफआई ), मोना दास (2005-07, एआईएसए)।

परंतु जेएनयू छात्रसंघ के नेतृत्व की सामाजिक बुनावट में बड़ा परिवर्तन मंडल-2 के बाद आया। इस प्रतिष्ठित संस्थान में ओबीसी के लिए 27 प्रतिशत आरक्षण होने के बाद, यहां के विद्यार्थियों की सामाजिक पृष्ठभूमि में तेजी से बदलाव आया। आज जेएनयू के लगभग 50 प्रतिशत विद्यार्थी ऐसे हैं जो ऊँची जातियों से संबंधित नहीं हैं। अगर हम इनमें अन्य वंचित सामाजिक समूहों, अल्पसंख्यकों और महिलाओं को जोड़ दें तो ऊँची जातियों व वर्गों के विद्यार्थी घोर अल्पमत में नजर आयेंगे।

इस परिवर्तन का प्रभाव जेएनयू छात्रसंघ के पिछले तीन चुनावों के नतीजों में प्रतिबिंबित हुआ। इन तीनों चुनावों में अध्यक्ष पद के लिए निर्वाचित उम्मीदवार समाज के हाशिए पर पड़े वर्गों से थे-व्ही. लेनिन कुमार (2012, एसएफआई-जेएनयू या डीएसएफ) जो कि तमिलनाडू के ओबीसी थे, अकबर चैधरी (2013, एआईएसए) जो कि उत्तरप्रदेश के मुसलमान थे और आशुतोष कुमार (2014, एआईएसए), जो कि बिहार के यादव हैं।

दलितबहुजनों का जेएनयू में बोलबाला बढ़ने का एक अन्य उदाहरण है फुले, पेरियार व अंबेडकर की विचारधाराओं पर आधारित छात्र संगठनों की बढ़ती संख्या। इनमें से कुछ, जो मंडल-2 के बाद अस्तित्व में आए, हैं आल इंडिया बैकवर्ड स्टूडेंट्स फोरम, अंटचेबल इंडिया, स्टूडेंट्स फाॅर सोशल जस्टिस व आल इंडिया बैकवर्ड स्टूडेंट्स पार्लियामेंट आदि।

इसके अलावा, जेएनयू की संस्कृति का ‘दलितीकरण‘ भी हो रहा है। पिछले कुछ सालों में जेएनयू में हमेशा से शक्तिशाली रहे वामपंथी छात्र संगठन, जो दलितबहुजन विभूतियों को नजरअंदाज करते आ रहे थे, को अब आम्बेडकर, पेरियार, बिरसा मुंडा और फुले के बारे में बात करने से कोई परहेज नहीं है। जेएनयू के कैंपस में सबालटर्न विभूतियों के प्रतीक और उनकी प्रतिमाएं, चित्र आदि आम हो गए हैं। पिछले वर्ष जेएनयू छात्र संघ के कार्यालय में फुले और बिरसा मुंडा के चित्र लगाए गए। पोस्टरों, पर्चों और बेजों पर अब दलितबहुजन नायक और नायिकाओं के चित्र और नारे देखे जा सकते हैं और इनकी संख्या मार्क्स, लेनिन, ट्रोटोस्की, स्टालिन व माओ के चित्रों से अधिक ही जान पड़ती है।

दलितबहुजनों की बुलंद होती आवाज का एक अन्य प्रकटीकरण है सबालटर्न एजेण्डे की बढ़ती स्वीकार्यता। लंबे समय तक ऊँची जातियों के मार्क्सवादियों का यह तर्क था कि जाति या आरक्षण संबंधी कोई भी बात, सर्वहारा वर्ग की एकता को कमजोर करेगी। परंतु अब वामपंथी पार्टियों के नेताओं के लेखों और भाषणों में ‘सामाजिक न्याय’, ‘समावेश’, ‘प्रतिनिधित्व’, ‘आरक्षण’, ‘गरिमा’, ‘जाति का उन्मूलन’ जैसे शब्दों की भरमार होती है।

कुछ आलोचकों का तर्क है कि वंचित वर्गों का प्रतिनिधित्व बढ़ने मात्र से उनका सशक्तिकरण नहीं होगा और ना ही ढांचागत ऊँचनीच समाप्त होगी। वे कहते हैं कि कई बार चुने हुए प्रतिनिधि, अपनी पार्टी के या व्यक्तिगत हितों को मेहनतकश वर्गों के अधिकारों पर प्राथमिकता देते हैं। ‘‘हमें यह देखना होगा कि नवनिर्वाचित नेता किस हद तक अपनी पार्टी के अंदर और उसके बाहर वंचित वर्गों से संबंधित मुद्दों को उठाते हैं’’, चंद्रसेन, पीएचडी छात्र व 2013 में अध्यक्ष पद के उम्मीदवार कहते हैं। जहां यह चिंता जायज है और दलितबहुजन नेताओं को इस पर ध्यान देना चाहिए वहीं हमें इस चिंता को कैंपस में आयी नई गतिशीलता का स्वागत करने में बाधक नहीं बनने देना चाहिए।


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