फारवर्ड प्रेस के विरूद्ध पुलिस कार्यवाही के तथ्य

आयवन कोस्का व प्रमोद रंजन को क्रमश: 13 और 16 अक्टूबर को पटियाला हाउस की एक अदालत ने अग्रिम जमानत दे दी

आपमें से अनेक पाठकों को गत माह फारवर्ड प्रेस के विरूद्ध हुई पुलिस कार्यवाही के बारे में जानकारी होगी। पिछले दिनों विभिन्न समाचारपत्रों में इससे संबंधित रिपोर्टें छपी हैं। प्राय: सभी प्रतिष्ठित हिंदी-अंग्रेजी समाचारपत्रों ने इसे अभिव्यक्ति की आजादी पर हमले के रूप में देखा जबकि दक्षिणपंथी समूहों ने इसे फारवर्ड प्रेस पर विभिन्न आधारहीन आरोपों के साथ हमले के अवसर के रूप में लिया। हम जानते हैं कि इस घटनाक्रम से हमारे पाठक व शुभचिंतक दुखी व उद्वेलित हैं, तथा वे सही घटनाक्रम जानना चाहते हैं। तथ्य इस प्रकार हैं:

घटनाक्रम

• 9 अक्टूबर, 1:40 बजे प्रात: नई दिल्ली में जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के नजदीक स्थित वसंतकुंज उत्तर पुलिस स्टेशन में फारवर्ड प्रेस व उसके मुख्य संपादक आयवन कोस्का के विरूद्ध भारतीय दंड संहिता की धारा 153-ए, 295-ए व 34 के तहत एफआईआर दर्ज की गई।

• यह कार्यवाही कुछ छात्रों की शिकायत पर की गई। इनमें शामिल थे जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के रविंद्र सिंह बसेरा, अंबाशंकर वाजपेयी, अब्दुल मुघनी व अमित कुमार।

• शिकायत में कहा गया था कि एफपी के अक्टूबर 2014 अंक में ‘भड़काऊ सामग्री’ प्रकाशित की गई है, विशेषकर जानेमाने चित्रकार डॉ. लाल रत्नाकर के चित्र, जिन्हें पृष्ठ क्रमांक 6, 7 व 8 पर ”महिषासुर की शहादत” शीर्षक से छापा गया है। शिकायतकर्ताओं ने कहा कि यह सामग्री आपत्तिजनक और हिन्दू धार्मिक भावनाओं को चोट पहुंचाने वाली है और इससे ”(ओबीसी में) ब्राह्मणों के विरूद्ध घृणा और उनसे बदला लेने की भावना उत्पन्न होगी।”

• कुछ छात्रों द्वारा आधी रात को दायर की गई शिकायत तुरंत कैसे एफआईआर में बदल दी गई और उस पर इतनी तेजी से कार्यवाही क्यों की गयी? स्क्राल डाट इन (12 अक्टूबर 2014) के एक रिपोर्टर के अनुसार, ”वसंतकुंज उत्तर थाने के एक अधिकारी ने अपना नाम न छापने की शर्त और श्रीमती कोस्का अपने एक परिजन के अंतिम संस्कार में शामिल होने मुंबई गये हुए थे, इसलिए पुलिस कोस्का को गिरफ्तार नहीं कर सकी।

• 9 अक्टूबर 8:30 बजे प्रात: सादी वर्दी में पुलिसकर्मी, जो शायद क्राइम ब्रांच से थे, फारवर्ड प्रेस के नेहरू प्लेस स्थित ऑफिस में पहुंचे और पहले कर्मचारी के आगमन के साथ ही ऑफिस में घुस गए। उन्होंने तीन कम्प्यूटर और अक्टूबर अंक की समस्त प्रतियां जब्त कर लीं। इस बीच कंपनी का प्रतिनिधित्व करने वाला एक वकील वहां पहुंच गया। पुलिस लगभग 7 घंटे तक कार्यालय में रही परंतु इस दौरान वह कोई तलाशी या जब्ती वारंट प्रस्तुत नहीं कर सकी। न तो संपादक के निवास स्थान और ना ही पत्रिका के कार्यालय पर की गई कार्यवाही को औचित्यपूर्ण ठहराने के लिए पुलिस के पास गृह मंत्रालय का कोई पत्र था। देर शाम को पुलिस स्टेशन में वकील को वारंट की एक प्रति दिखाई गई। अगर पुलिसकर्मियों के पास आवश्यक दस्तावेज होते और अगर वहां वकील उपस्थित नहीं होता तो एफपी के कर्मचारियों का अंदाजा है कि पुलिस का इरादा कार्यालय को सील करने का था।

• 9 अक्टूबर 3:30 बजे अपरान्ह: पुलिस कार्यालय से चली गई व अपने साथ ग्राफिक डिजायनर राजन कुमार, मार्केर्टिंग एक्जीक्यूटिव हाशिम हुसैन व प्रसार प्रबंधक धनंजय उपाध्याय को ले गयी। देर रात इन कर्मचारियों को छोडा गया। पुलिस ने फारवर्ड प्रेस के सलाहकार संपादक प्रमोद रंजन को गिरफ्तार करने के लिए जवाहरलाल यूनिवर्सिटी समेत दिल्ली के कई स्थानों पर दबिश दी।

• 10 अक्टूबर : कोस्का के वकील ने अग्रिम जमानत की अर्जी अदालत के समक्ष प्रस्तुत की। इस बीच पुलिस ने न्यूज एजेंटों और बुक स्टॉलों से फारवर्ड प्रेस के अक्टूबर अंक की जितनी भी प्रतियां उसे मिल सकीं, जब्त कर लीं।

• 13 और 16 अक्टूबर : आयवन कोस्का व प्रमोद रंजन को क्रमश: 13 और 16 अक्टूबर को पटियाला हाउस की एक अदालत ने अग्रिम जमानत दे दी। निर्धारित कानूनी प्रक्रिया के तहत, दोनों को यदाकदा पूछताछ के लिए थाने जाना पड़ रहा है। पुलिस ने आदालत में अभी तक चार्जशीट दायर नहीं की है।

• जैसा कि एफपी के पाठक जानते हैं कि जवाहरलाल नेहरू यूनिविर्सिटी में पिछडे वर्गों के एक छात्र संगठन द्वारा महिषासुर शहादत दिवस’ का आयोजन किया जाता रहा है। पुलिस में दर्ज करवाई गयी शिकायत में इस आयोजन का भी हवाला दिया गया है तथा पुलिस से इसे रोकने अथवा ‘किसी भी प्रकार की अप्रिय घटना के लिए तैयार रहने’ की धमकी भी दी गयी है।

• 10 अक्टूबर के बाद से -फारवर्ड प्रेस पर पुलिस कार्रवाई को समाज में अभिव्यदक्ति की स्वतंत्रता पर हमला तथा बहुजनों की आवाज को दबाने की कोशिश के रूप में देखा गया। अनेक स्थानों पर इसके विरूद्ध प्रदर्शन हुए (देखें पृष्ठ 6, 7, 8 पर प्रकाशित फोटो फीचर) तथा अरूंधति राय, उदय प्रकाश, शमशुल इस्लाम, गिरिराज किशोर, आनंद तेल्तुम्बडे, कँवल भारती, मंगलेश डबराल, अनिल चमडिया, अपूर्वानंद, वीरभारत तलवार, राम पुनियानी, कुमार प्रशांत समेत अंग्रेजी, हिंदी और मराठी के लगभग 500 लेखकों, बुद्धिजीवियों ने प्रेस बयान जारी कर इस कृत्य की घोर निंदा की ( कुछ अन्य, चुनिंदा वक्तव्य देखें पृष्ठ संख्या 39 पर)।

(फारवर्ड प्रेस के नवम्बर 2014 अंक में प्रकाशित)


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