मोदी के अधीन प्रेस स्वतंत्रता

ऐसी अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का कोई अर्थ नहीं है जिसमें दूसरों की भावनाओं को चोट पहुंचाने का अधिकार शामिल न हो। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता अर्थहीन है यदि वह केवल ‘स्वीकार्य’ विचारों पर लागू हो

कुछ संक्षिप्त कालखंडों को छोड़कर-जिनमें तीसरी शताब्दी ईसा पूर्व में अशोक और 16वीं शताब्दी ईस्वी में अकबर का शासनकाल शामिल है-भारत में आम नागरिकों को पूर्ण स्वतंत्रता शायद ही कभी उपलब्ध रही हो। ब्रिटिश साम्राज्यवादियों के शासनकाल में अंग्रेज शासकों के दो वर्गों के बीच सतत संघर्ष चलता रहा, जिनमें से एक वर्ग भारतीयों को स्वराज की ओर ले जाना चाहता था तो दूसरे की इच्छा उन्हें गुलाम बनाए रखने की थी। 1947 में भारत की स्वतंत्रता के बाद से, भारत सरकार ने इन दोनों परस्पर विरोधाभासी नीतियों के एक अजीब से मिश्रण को अपनाया है। एक ओर शिक्षा, विचारों की स्वतंत्रता आदि को प्रोत्साहित किया जा रहा है तो दूसरी ओर, साम्राज्यवादी काल के कानूनों, सोच और व्यवहार के चलते, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का दमन भी किया जा रहा है।

क्या हमारे देश में स्वतंत्रताओं में कमी आ रही है?

अगर हम 12 वर्ष पहले (2002) से शुरूआत करें तो हम पायेंगे कि उस वर्ष भारत ”रिपोर्टर्स विदाउट बार्डर्स वैश्विक प्रेस स्वतंत्रता सूचकांक” में 80वें स्थान पर था। पांच वर्ष बाद (2007), भारत 120वें स्थान पर पहुंच गया और पिछले वर्ष (2013), भारत को 140वें स्थान पर रखा गया था।

रिपोर्टर्स विदाउट बार्डर्स के अनुसार, सन् 2013 में भारत में ”पत्रकारों के विरूद्ध अभूतपूर्व हिंसा हुई जिसमें आठ पत्रकार…व एक मीडियाकर्मी मारा गया…इनमें से आधी मौतें सोची-समझी प्रतिशोधात्मक कार्यवाहियों में हुईं। यह, 2012 में पत्रकारों की पाकिस्तान में हुई हत्याओं से दोगुनी थीं। पाकिस्तान को मीडियाकर्मियों के लिए दुनिया का सबसे खतरनाक देश माना जाता रहा है…आपराधिक संगठन… प्रदर्शनकारी व (गैरकानूनी रूप से) हथियारबंद समूह-ये सभी भारतीय पत्रकारों के लिए एक खतरे के रूप मे उभरे हैं। पत्रकारों को राज्य और राज्य से इतर संगठनों व व्यक्तियों द्वारा निशाना बनाया जा रहा है। इस प्रवृत्ति से देश का कोई क्षेत्र मुक्त नहीं है…जो लोग पत्रकारों को धमकियां देने के लिए और उनके खिलाफ शारीरिक हिंसा करने के लिए जिम्मेदार हैं, उन्हें न्यायिक व्यवस्था से शायद ही कभी सजा मिलती है। इनमें पुलिस, सुरक्षाबल व राजनैतिक दलों के समर्थक शामिल हैं। ऐसे में पत्रकार स्वयं को सेंसर करने पर मजबूर हो जाते हैं”। स्पष्टत:, भारत में स्वतंत्रताओं का दमन हो रहा है परंतु यह दमन किन विशिष्ट क्षेत्रों में हो रहा है इस पर चर्चा आवश्यक है।

संवैधानिक स्वतंत्रताएं

भारतीय संविधान सभी नागरिकों को विचार और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के अधिकार के साथ-साथ अपने विचारों का प्रचार करने और संगठित होने की आजादी भी देता है। यह सही है कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर अनुच्छेद 19(2) के अंतर्गत भारत की प्रभुसत्ता एवं अखंडता, राज्य की सुरक्षा, विदेशी राज्यों के साथ मैत्रीपूर्ण संबंध, सार्वजनिक शांति एवं व्यवस्था, शालीनता का संरक्षण, नैतिकता का संरक्षण, किसी अपराध के मामले में अदालत की अवमानना, मानहानि, अथवा किसी अपराध के लिए उकसाना आदि कारणों से प्रतिबंध लगाया जा सकता है। परंतु यह प्रतिबंध किसी समुचित कारण के बगैर नहीं लगाया जा सकता और ऐसा प्रतिबंध केवल कार्यपालिका के आदेश के द्वारा नहीं वरन् विधिवत बनाए गए कानून के आधार पर ही लगाया जा सकता है।

इसके बाद भी भारत की सरकारें इन संविधान-प्रदत्त अधिकारों पर बिना समुचित कारण के प्रतिबंध लगाती रही हैं। सौभाग्यवश भारतीय न्यायपालिका अब तक संवैधानिक प्रावधानों के प्रति प्रतिबद्ध रही है और सरकारों द्वारा अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को सीमित करने के प्रयासों को नाकाम करती रही है।

शायद इसलिए गुजरात जैसे कुछ राज्यों ने अपनी संवैधानिक शक्तियों से बाहर जाकर इन स्वतंत्रताओं को सीमित करने की कोशिशें कीं। गुजरात इस बात का उदाहरण है कि किस तरह संवैधानिक प्रावधानों के बावजूद, सरकारें सफलतापूर्वक स्वतंत्रताओं का गला घोंट सकती हैं।

केस स्टडी- स्वतंत्रताओं को सीमित करने की प्रयोगशाला

गुजरात सरकार द्वारा प्रेस की स्वतंत्रता का गला घोंटने के प्रयास के कई उदाहरण हैं। हम उनमें से सिर्फ एक का अध्ययन करेंगे जिसके लिए मैं रिपोर्टर्स विदाउट बार्डर्स के प्रति आभारी हूं। दिनांक 7 अप्रैल 2002 को पुलिस अधिकारियों ने अहमदाबाद स्थित गांधी आश्रम के समक्ष आयोजित दो शांति प्रदर्शनों पर भाजपा के युवा संगठन, गुजरात युवा मोर्चा के सदस्यों द्वारा किए जा रहे हमले को कवर कर रहे पत्रकारों और मीडियाकर्मियों पर दमनात्मक कार्यवाही की। जैसे ही युवा मोर्चा के सदस्यों ने गुंडागर्दी प्रारंभ की, पुलिस के डिप्टी कमीश्नर व्ही.एम. परघी ने निजी टेलीविजन चैनल एनडीटीवी के कैमरामैन प्रणव जोशी को अपना कैमरा बंद करने के लिए कहा। जब जोशी ने यह जानना चाहा कि उन्हें अपना कैमरा क्यों बंद करना चाहिए तो उनके सिर पर जोर से कोई चीज मारी गई, जिसके बाद वे जमीन पर गिर गए। प्रत्यक्षदर्शियों का कहना है कि इसके बाद पुलिस पत्रकारों पर टूट पड़ी और उन्हें बंदूकें दिखाकर डराया, धमकाया गया। यह गैर-कानूनी कार्यवाही लगभग 10 मिनट तक चलती रही, जब तक कि पुलिस अधीक्षक शिवानंद झा ने पुलिस जवानों को मारपीट बंद करने के लिए नहीं कहा। इस पुलिस हमले में 10 पत्रकार और विभिन्न राष्ट्रीय और क्षेत्रीय मीडिया संगठनों के फोटोग्राफर गंभीर रूप से घायल हो गए और उनमें से एक को इंटेन्सिव केयर यूनिट में भर्ती होना पड़ा। इसके तुरंत बाद, मीडियाकर्मियों ने पूरी घटना पर अपनी शिकायत दर्ज करायी।

उसी रात, गुजरात के गृहमंत्री ने एक बयान जारी कर इस बात से इंकार किया कि पुलिसकर्मियों ने पत्रकारों पर हमला किया है। परंतु कुछ घंटों बाद एक और आधिकारिक बयान जारी किया गया जिसमें कहा गया कि मामले की जांच के लिए उच्च न्यायालय के सेवानिवृत्त न्यायाधीश की अध्यक्षता में एक जांच आयोग नियुक्त किया जायेगा। यह कहा गया कि आयोग अपनी रपट तीन हफ्तों के अंदर देगा। 8 अप्रैल को गुजरात सरकार ने यह घोषित किया कि शिवानंद झा और व्ही.एम. परघी को स्थानांतरित किया जा रहा है और मामले की आपराधिक प्रकरण के रूप में जांच की जाएगी। इस ‘आपराधिक जांच’ का आज तक (12 वर्ष बाद) कोई नतीजा सामने आया हो, ऐसा कम से कम मुझे ज्ञात नहीं है।

इस बीच, 2002 में ही व्ही.एम.परघी को डिप्टी कमिश्नर के पद पर पदोन्नत कर दिया गया। 15 अगस्त 2014 को वे पुलिस, ट्राफिक और आपराधिक मामलों के ज्वाईंट कमिश्नर बन चुके थे और उन्हें राष्ट्रपति के पुलिस पदक से भी नवाजा जा चुका था!

जिस अन्य पुलिस अधिकारी ने सन् 2002 के पत्रकारों पर हमले में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी, उसे 12 सितंबर 2011 को गृह सचिव नियुक्त कर दिया गया और अक्टूबर 2013 में अहमदाबाद का पुलिस कमिश्नर बना दिया गया।

दुनिया के सबसे बड़े प्रजातंत्र में आखिर यह कैसे हो रहा है

दुनिया के सबसे बड़े प्रजातंत्र भारत का मीडिया काफी जीवंत और सक्रिय है। सन् 1990 के दशक से शुरू हुए आर्थिक उदारीकरण के बाद से, निजी मीडिया संगठनों की संख्या में तेजी से वृद्धि हुई और वे बिना सरकारी हस्तक्षेप के स्वतंत्रतापूर्वक काम करने लगे। मीडिया के प्रभाव में भी वृद्धि हुई। इसका एक उदाहरण यह है कि मीडिया के दबाव के चलते, हरियाणा सरकार के एक शक्तिशाली मंत्री विनोद शर्मा को अपने पद से इस्तीफा देना पड़ा।

परंतु एक दु:खद तथ्य यह भी है कि देश में पत्रकारों को धमकाने और उन्हें उनका काम करने से रोकने की घटनायें बढ़ रही हैं। पत्रकार पहले से कहीं अधिक खतरे में हैं। केंद्र और राज्यों की सरकारें सुरक्षा, आपराधिक मानहानि व घृणा फैलाने वाले भाषणों से संबंधित कानूनों का दुरूपयोग कर और यहां तक कि अदालतों की अवमानना और देशद्रोह के आरोप लगाकर, उन सभी व्यक्तियों को हतोत्साहित और डराने का प्रयास कर रहे हैं जो सत्ताधारी पार्टी का विरोध करते हैं, उन अपराधियों के कुकर्मों का खुलासा करते हैं जो राजनीतिज्ञों के करीबी हैं या ऐसी कोई भी बात लिखते हैं जिससे सरकार को परेशानी होती है। केंद्र व राज्य स्तर पर होने वाले चुनावों के दौरान ‘पेड न्यूज’-अर्थात उम्मीदवारों द्वारा समाचार के रूप में विज्ञापन के प्रकाशन-पर रोक लगाने के प्रयास भी कुछ हद तक इसी अभियान का हिस्सा हैं। भारतीय कानूनों के अनुसार किसी भी वेबसाईट के लिए यह आवश्यक है कि सरकार द्वारा आदेशित किए जाने पर वह किसी भी सामग्री को वेबसाइट से तुरंत हटा ले। इस तरह केंद्रीय व राज्य सरकारें पिछले दरवाजे से प्रेस पर सेंसरशिप लगा रही हैं।

इस संबंध में यह महत्वपूर्ण है कि इसके पहले प्रेस की स्वतंत्रता पर एक बड़ा हमला आपातकाल के दौरान किया गया था, जिसे श्रीमती इंदिरा गांधी ने सत्ता में बने रहने के लिए लागू किया था। आपातकाल लागू होने के एक दिन, बाद 26 जून 1975 को द टाईम्स ऑफ इंडिया के बंबई संस्करण के ‘शोक संदेश’ कॉलम में एक अविस्मरणीय और दिल को छू लेने वाली श्रद्धांजलि प्रकाशित की गई थी जिसका हिंदी अनुवाद था ‘सत्य के प्रिय पति, स्वतंत्रता के पिता और विश्वास, आशा और न्याय के भाई, प्रजातंत्र का 26 जून को देहांत हो गया है।’ इमरजेंसी के दौरान द इंडियन एक्सप्रेस ने सत्ताधारी पार्टी के फासीवाद का बड़ी हिम्मत से मुकाबला किया। द स्टेट्समैन सेंसरशिप और आपातकाल के खिलाफ प्रेस के संघर्ष का अगुवा था। यह समय ही बताएगा कि प्रेस की स्वतंत्रता के लिए हिम्मत से लडऩे का साहस इस दौर में कौन दिखा पाता है।

वर्तमान स्थिति

फ्रीडम हाउस के ‘वार्षिक मीडिया स्वतंत्रता सूचकांक’ के अनुसार सन् 2014 के चुनाव अभियान के दौरान, ”मालिकों द्वारा मीडिया में प्रकाशित होने वाली सामग्री में हस्तक्षेप की घटनाओं में वृद्धि हुई व (राजनैतिक कारणों से) कई प्रमुख संपादकों को नौकरी से हटाया गया।” चुनाव अभियान के दौरान और भाजपा की विजय के बाद, कई पत्रकारों ने यह कहा कि प्रबंधन द्वारा उन पर यह दबाव डाला जा रहा है कि मोदी की आलोचना ना की जाए। एक टीवी कार्यक्रम के एंकर को इसलिए नौकरी से हटा दिया गया क्योंकि उसने यह कहा कि लोगों को मोदी को वोट देने के पहले सोचना चाहिए।

नाजी ब्राउन शर्ट गुंडों की तरह हिन्दू राष्ट्रवादी पार्टियों के समर्थकों ने सोशल मीडिया पर ‘अपमानजनक’ या ‘असम्मानजनक’ टिप्पणियां करने वालों पर हमले किए और उनकी संपत्ति को नुकसान पहुंचाया। उदाहरणार्थ, पुणे में हिन्दू अतिवादियों ने एक निर्दोष युवा मुस्लिम आईटी कर्मी को इसलिए मार डाला क्योंकि वे फेसबुक पर एक पोस्ट में एक हिन्दू योद्धा और एक हिन्दू राजनैतिक नेता की तस्वीरें लगाए जाने से अपमानित महसूस कर रहे थे। सोशल मीडिया का इस्तेमाल, पत्रकारों पर हमले करने और उन्हें धमकाने के लिए किया जा रहा है। मोदी की जरा सी भी निंदा बर्दाश्त नहीं की जाती है। केरल में नौ छात्रों को इसलिए गिरफ्तार कर लिया गया क्योंकि उन्होंने अपने कालेज की पत्रिका में एक क्रासवर्ड पहेली का प्रकाशन किया, जिसमें मोदी के नाम का इस्तेमाल किया गया था। यह इस तथ्य के बावजूद कि उन्होंने अन्य पार्टियों के नेताओं पर भी निशाना साधा था।

यद्यपि सूचना और प्रसारण मंत्री प्रकाश जावड़ेकर ने इस वर्ष मई में यह कहा था कि ‘सरकार प्रेस की स्वतंत्रता में हस्तक्षेप नहीं करेगी’ परंतु उन्होंने यह साफ नहीं किया कि क्या प्रेस की स्वतंत्रता में हस्तक्षेप करने के और प्रयास नहीं किए जाएंगे या फिर प्रेस स्वतंत्रता के साथ किए जा रहे खिलवाड़ को रोकने का प्रयास किया जाएगा।

मोदी या भाजपा की आलोचना करने वालों के प्रति शत्रुता का भाव आम हो चला है। गत सात जून को कई जानीमानी हस्तियों (जिनमें सामाजिक कार्यकर्ता अरूणा रॉय, इतिहासविद् रोमिला थापर व अर्थशास्त्री जयती घोष व जीन ड्रेस शामिल थे) ने एक संयुक्त बयान जारी कर प्रधानमंत्री की ऐसे लोगों की अभियक्ति की आजादी पर हो रहे हमलों पर चुप्पी पर प्रश्न उठाया जो ‘हालिया चुनाव नतीजों से अति उत्साहित, उल्लासित और आशान्वित नहीं हैं’। बयान जारी करने वालों ने प्रधानमंत्री से यह अपील की कि वे अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की रक्षा करें और ‘असहिष्णुता और भय के उस ने प्रधानमंत्री से यह अपील की कि वे अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की रक्षा करें और ‘असहिष्णुता और भय के उस वातावरण को खत्म करने का प्रयास करें जो हमारे प्रजातंत्र के लिए खतरा बन गया है’।

‘द हिन्दू’ अखबार में जानेमाने डाक्यूमेंन्ट्री निर्माता आनंद पटवर्धन ने भाजपा पर यह आरोप लगाया कि वह राज्यतंत्र की ताकत और शारीरिक हिंसा के जरिए अपना सांस्कृतिक वर्चस्व स्थापित करने का प्रयास कर रही है। उन्होंने कहा, ‘हम बाजार की सेंसरशिप का सामना कर रहे हैं और निष्पक्ष टीवी कवरेज पाना मुश्किल होता जा रहा है’। वे कारपोरेट घरानों द्वारा मीडिया कंपनियों को खरीदे जाने के संदर्भ में बात कर रहे थे। ये कारपोरेट घराने, राष्ट्रीय मीडिया को अपना कैदी बनाना चाहते हैं। ‘मीडिया हमेें नहीं बता रहा है कि हमारी दुनिया में क्या हो रहा है। मीडिया पूरी तरह चुप है’।

आगे क्या?

अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का सम्मान और एक जीवंत निष्पक्ष प्रेस, किसी भी प्रजातंत्र की नींव होते हैं। मोदी ने अब तक प्रेस की स्वतंत्रता की रक्षा के लिए कोई कारगर कदम नहीं उठाया है। वे कम से कम सरकार के आलोचकों की आवाज को दबाने या उन्हें अन्य किसी तरीके से डराने-धमकाने की निंदा करते हुए एक बयान जारी कर अपने आलोचकों को आश्चर्य में डाल सकते हैं और मानवाधिकारों को मजबूती दे सकते हैं । बल्कि सच तो यह है कि वे इससे भी आगे जाकर, उन कानूनों का कड़ाई से लागू किया जाना सुनिश्चित कर सकते हैं जो किसी भी ऐसे व्यक्ति को उसके कृत्यों की सजा देने के लिए बनाए गए हैं, जो सेन्सरशिप लगाने या किसी को आतंकित करने की कोशिश करता है।

परंतु सच तो यह है कि मीडिया के दमन की घटनाओं में वृद्धि हो रही है। कोई यह मानने को तैयार नहीं है कि नई सरकार उन कट्टरपंथियों को नियंत्रित करने का इरादा रखती है जो अपने आलोचकों के खून के प्यासे हैं। ‘मोदी के समर्थकों ने उन्हें ईश्वर का दर्जा दे दिया है और वे उनके नायक की किसी प्रकार की निंदा को सहने के लिए तैयार नहीं हैं। उन्हें अपनी धार्मिक रूढिय़ों की आलोचना भी बर्दाश्त नहीं है। इस अस्वस्थ खुशामदखोरी को रोकने की राजनैतिक शक्ति सिर्फ एक व्यक्ति में है और वह है मोदी स्वयं। नए प्रधानमंत्री को हिन्दू अतिवादियों पर नियंत्रण करना होगा, जो यह मानकर चल रहे हैं कि नई सरकार के राज में उन्हें अपने से भिन्न राय रखने वालों का दमन करने, उनके विरूद्ध हिंसा करने और यहां तक कि उन्हें जान से मारने का लाईसेंस मिल गया है,’ ‘फारेन पालिसी’ पत्रिका यूएसए के जून 2014 के अंक में ऋतिका कटियाल लिखती हैं।

‘अगर भारतीयों को सोशल मीडिया पर राजनैतिक विषयों से संबंधित अपनी राय प्रकट करने के पहले यह सोचना पड़े कि क्या वे धमकियों का मुकाबला कर सकेंगे और यदि पत्रकारों को अपनी रपटों में आलोचना के स्वर को इसलिए धीमा करना पड़े क्योंकि उन्हें इसके परिणामों का डर हो, तो यह भारत के संविधान निर्माताओं द्वारा प्रदत्त अभिव्यक्ति की आजादी का उल्लंघन होगा। इसका एक अर्थ यह होगा कि केवल सरकार की तारीफ करने वाली खबरें ही प्रकाशित और प्रसारित होंगी। जैसा कि ऋतिका कटियाल कहती हैं, ‘भय के वातावरण में अभिव्यक्ति की आजादी जीवित नहीं रह सकती’।

क्या किया जा सकता है और किया जाना चाहिए

कोई भी ऐसा देश प्रगति नहीं कर सकता जिसमें बहस और नए विचारों पर प्रतिबंध हो। इस सिलसिले में भारत की नई सरकार द्वारा अनावश्यक कानूनों को समाप्त करने के लिए की जा रही पहल का स्वागत किया जाना चाहिए। अब समय आ गया है कि भारत सरकार को निम्न कदम उठाकर देश में अभिव्यक्ति की आजादी को मजबूती देने का काम करना चाहिए:

1. भारतीय संविधान के अनुच्छेद 19(2) में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर लगाए गए प्रतिबंधों को समाप्त किया जाना चाहिए। इसी तरह, संविधान की 7वीं अनुसूची की केन्द्रीय सूची (या सूची 1)77 की प्रविष्टि 6076 व राज्य सूची (या सूची 2)79 की प्रविष्टि 3378 को भी हटाया जाना चाहिए।
2. भारतीय दण्ड संहिता की विभिन्न धाराओं द्वारा लगाए गए प्रतिबंधों को भी हटाया जाना चाहिए। इनमें शामिल हैं आईपीसी की धारा 153ए, 153बी, 295ए, 298, 505(1) व 505(2) और आईटी एक्ट 2000 की धारा 66ए व आईटी (इंटरमीडियरीज गाईडलाईन्स) रूल्स 2011 की धारा 3(2)(बी) व 3(2)(1) व गैर-कानूनी गतिविधियां (निरोधक) अधिनियम 1967 की धारा 153(ए) को भी हटाया जाना चाहिए।

ऐसी अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का कोई अर्थ नहीं है जिसमें दूसरों की भावनाओं को चोट पहुंचाने का अधिकार शामिल न हो। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता अर्थहीन है यदि वह केवल ‘स्वीकार्य’ विचारों पर लागू हो। इसलिए अब समय आ गया है कि भारत सरकार उन सभी कानूनों को रद्द करे जो हमारी अभिव्यक्ति की आजादी को सीमित करते हैं और विशेषकर उन कानूनों को, जिनकी चर्चा ऊपर की गई है और जिन्हें ब्रिटिश राज ने हम पर अपने साम्राज्यवादी हितों की पूर्ति के लिए लादा था।

दिमागों को फिर से बंद कर रहे हैं?

भारत ने ईसा से 1000 वर्ष पूर्व कई बौद्धिक सफलताएं (उदाहरणार्थ गणित के क्षेत्र में) अर्जित की थीं। उसके बाद मिथकों, परंपराओं और निरंकुश शासन व्यवस्था के चलते कई सदियों तक भारत की बौद्धिक प्रगति बाधित हो गई। इसके बाद 17वीं और 18वीं सदी में पश्चिम ने हमारे दिमागों को फिर से खोला। ब्रिटिश साम्राज्यवादियों ने अपने शासन के हित में अभिव्यक्ति की आजादी पर कई प्रतिबंध लगाए परंतु अज्ञात कारणों से स्वतंत्र भारत उन साम्राज्यवादी कानूनी प्रावधानों को आज भी जिन्दा रखे हुए है। ऐसे लोगों व समूहों के कारण, जो वर्तमान कानूनों और अपनी गुंडागर्दी के चलते अभिव्यक्ति की आजादी के लिए खतरा बन गए हैं, एक बार फिर भारतीय दिमाग के बंद होने का खतरा हमारे सामने उपस्थित है। यदि हमारे प्रधानमंत्री यह नहीं चाहते कि उनके देश के नागरिक केवल रोबोट बन जाएं और यदि वे हमारे देश को रचनात्मकता, नवाचार, गुणात्मकता और आर्थिक प्रगति के एक नए युग में ले जाना चाहते हैं तो यह जरूरी है कि विचार और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के आधिकारिक व गैर-आधिकारिक खतरों को तुरंत खत्म किया जाए। ये स्वतंत्रताएं चुनने की स्वतंत्रता के लिए आवश्यक हैं और यही वह स्वतंत्रता है जो देश को सच्चे अर्थों में समृद्ध व सामर्थ्यवान बना सकती है।

लेखक के जर्मन पत्रिका ‘सुडएसियन’ के अक्टूबर 2014 अंक में प्रकाशित लेख पर आधारित

(फारवर्ड प्रेस के नवम्बर 2014 अंक में प्रकाशित)


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