फॉरवर्ड विचार, जनवरी 2015

आदिवासी कार्यकर्ता व लेखक ग्लेडसन डुंगडुंग। झारखंड में एक आदिवासी परिवार के साथ हुए वहशियाना व्यवहार पर उनकी रपट भारत के दमित बहुजनों के ‘इतिहास का पहला मसविदा है’

चालीस बरस एक लंबा अरसा होता है। सन् 1974 में, 22 साल की उम्र में मुंबई में पत्रकारिता शुरू करने के कुछ ही समय बाद मैंने नवगठित दलित पैंथर्स पर एक लेख लिखा था व संगठन के संस्थापक महासचिव जे.व्ही. पवार का साक्षात्कार भी लिया था, जो कि एक ‘स्कूप’ था। उसके बाद, सन् 2014 की शुरूआत में हम दोनों के एक मित्र ने मुंबई से फोन पर पवार से मेरी बात करवाई। उन्होंने छूटते ही पूछा, ”क्या तुम्हारे पास मेरे साक्षात्कार की प्रति है?”

जैसा कि मैंने दिसंबर अंक के संपादकीय में लिखा था, ”फारवर्ड प्रेस में हम दो चीजों को ध्रुवसत्य मानते हैं-यह कि ‘भारतीय प्रमुखत: अ-ऐतिहासिक हैं और पत्रकारिता इतिहास का पहला मसौदा है”। इस माह की आवरणकथा, कोरेगांव के छोटे परंतु महत्वपूर्ण युद्ध पर है और इस मामले में हम दो तरह से भाग्यशाली हैं। चूंकि इस अंतिम एंग्लो-मराठा युद्ध में वीर दलित सैनिक, ब्रिटिश कमान में थे इसलिए युद्ध का ब्यौरा बहुत बारीकी से दर्ज किया गया और युद्ध में जीत की स्मृति में स्मारक भी बनवाया गया। दूसरे, उपन्यासकार और कवि पवार, पत्रकार से कहीं बढ़कर हैं। सच्चे आंबेडकरवादी पवार, आंबेडकर के बाद के दलित आंदोलनों का दस्तावेजीकरण कर रहे हैं। हम जे.व्ही. पवार का एफपी में स्वागत करते हैं। हमें आशा है कि वे हमारे लिए लिखते रहेंगे।

एक अन्य लेखक, जिनका एफपी के इस अंक में स्वागत है, वे हैं आदिवासी कार्यकर्ता व लेखक ग्लेडसन डुंगडुंग। झारखंड में एक आदिवासी परिवार के साथ हुए वहशियाना व्यवहार पर उनकी रपट भारत के दमित बहुजनों के ‘इतिहास का पहला मसविदा है’। इस परिवार को यह सब इसलिए झेलना पड़ा क्योंकि उन्होंने एक पुलिस जांच चैकी के हैण्डपंप से पानी पीने का दुस्साहस किया। रपट को पढ़कर मुझे पति के सिर पर लगे 22 टांकों के दर्द और पूरे परिवार के अपमान का अहसास हुआ। साहसी पत्नी द्वारा अपनी खून में सनी साड़ी को सुरक्षित रखने के निर्णय से यह आशा जागती है कि अति-निर्धन भी अब अपने आत्मसम्मान व गरिमा के लिए संघर्ष करने को उद्यत हैं।
यद्यपि इस घटना की राष्ट्रीय मीडिया में बहुत चर्चा हुई तथापि छत्तीसगढ़ में 13 आदिवासी महिलाओं की हत्या की वसीमा खान की रपट पढ़कर खून खौल उठता है। हमारा फोकस उन गरीब अशिक्षित आदिवासी महिलाओं पर है जिनके साथ हुए पाश्विक व्यवहार के कारण उनके बच्चे अनाथ हो गए। यह घटना बताती है कि आदिवासियों के साथ अन्य राज्यों में तो छोडि़ए, तथाकथित आदिवासी राज्यों में भी कैसा व्यवहार होता है।

(इस अंक के जनमीडिया में इसी मुद्दे को लेकर यह पड़ताल की गई है कि एक हिंदी दैनिक, जो दुनिया में सबसे ज्यादा पाठकों वाला अखबार होने का दावा करता है, में इस घटना का कैसा एकतरफा कवरेज हुआ।)

आदिवासियों से संबंधित ये दोनों रपटें हमें बताती हैं कि संघ परिवार क्या नहीं समझता या समझना नहीं चाहता बहुजन, विशेषकर एस.सी.एस.टी, को धर्मपरिवर्तन करने के लिए किसी लोभ या धमकी की जरूरत नहीं है। उन्हें तो केवल प्रेम और गरिमा चाहिए। बल्कि लालच और धमकियों की जरूरत तो उन्हें उनके उस घर में वापिस घसीटने के लिए पड़ती है, जहां उनके लिए कोई स्थान नहीं था। और यह भी कि तब, यदि हम यह मानें कि आदिवासी और दलित हिंदू ‘घर’ के वासी हैं। जाहिद खान और हुसैन तबिश हाल में हुई घरवापसियों का विश्लेषण कर रहे हैं। धर्मपरिवर्तन करने वाले चाहे मुसलमान हों या ईसाई, वे सभी दलित हैं। क्या संघ परिवार ब्राह्मण, राजपूत और खत्री पृष्ठभूमि वाले कश्मीरी मुसलमानों की ‘घरवापसी’ करवाएगा? दरअसल, इन आयोजनों के पीछे जातिवादी पाखंड है। सबसे ज्यादा पाखंडी तो वे सत्ताधारी हैं जो हमारे संविधान के अनुच्छेद 25 द्वारा हमें दिए गए मूलभूत अधिकार की रक्षा नहीं कर रहे हैं। याद रहे कि उन्होंने संविधान का पालन और उसकी रक्षा करने की शपथ ली है।

(फारवर्ड प्रेस के जनवरी, 2015 अंक में प्रकाशित )


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