नेपाल अब बहुजन राष्ट्र

विकट और विषम परिस्थितियों से मुकाबला करते हुए दलित, आदिवासियों तथा पिछड़ी जातियों के राजनैतिक दृष्टि से जागरूक साथियों के संयुक्त आंदोलन की उपलब्धि आज हमारे सामने है। सदियों से नेपाल में चल रहा हिंदू राष्ट्र ध्वस्त हो गया है और समता, बंधुता तथा स्वतंत्रता पर आधारित संविधान को मान्यता मिली है

नेपाल में कई शताब्दियों से दलितों तथा जनजातियों के सदस्यों के दिलों में विद्रोह की आग सुलग रही थी। बीच-बीच में जब भी इस आग की लपटें बाहर आई, हिंदू साम्राज्यवाद ने उन्हें बुझा दिया। दमित समुदायों को स्वप्न देखने से भी रोकने की भरसक कोशिश की गयी। लेकिन उनके सपने पीढ़ी-दर-पीढ़ी हस्तांतरित होते रहे। चाहे वह नेपाल हो या भारत, दलितों और आदिवासियों को जल, जंगल और जमीन से बेदखल किया जाता रहा है। उनके जीवन को गिरवी रख, सवर्णों द्वारा उनसे मनचाहा काम लिया जाता रहा है। उनकी महिलाओं की अस्मिता से खिलवाड़ किया जाता रहा है। इन सब विकट और विषम परिस्थितियों से मुकाबला करते हुए दलित, आदिवासियों तथा पिछड़ी जातियों के राजनीतिक दृष्टि से जागरूक साथियों के संयुक्त आंदोलन की उपलब्धि आज हमारे सामने है। नेपाल का सदियों पुराना हिंदू राष्ट्र ध्वस्त हो गया है और समता, बन्धुत्व तथा स्वतंत्रता पर आधारित संविधान को मान्यता मिली है। नेपाल में सात वर्षों की सियासी कशमकश और मशक्कत के बाद तैयार ऐतिहासिक संविधान, मनुवादियों के हिंसक विरोध के बीच सितम्बर के दूसरे पखवाड़े में लागू हो गया। देश हिंदूशाही से मुक्त हुआ और धर्मनिरपेक्ष तथा लोकतांत्रिक गणतंत्र में परिवर्तित हो गया।

राष्ट्रपति रामबरन यादव ने संविधानसभा को संबोधित करते हुए कहा, ‘मैं संविधानसभा द्वारा पारित और संविधानसभा के अध्यक्ष द्वारा अधिप्रमाणित नेपाल के इस संविधान को आज 20 सितम्बर 2015 से लागू किये जाने की घोषणा करता हूं।’ संविधान में दलित, पिछड़े और क्षेत्रीय समुदायों के साथ-साथ महिलाओं के सशक्तिकरण के लिए आरक्षण की व्यवस्था की गई है।

Nepalese President displaying the constitution which was formally adopted at the constitution Assemble hall in Kathmandu, Nepal, Sunday, Sep 20, 2015. (AP Photo/Niranjan Shrestha)

नेपाल के हिंदू राष्ट्र में परिवर्तित होने का लम्बा इतिहास है। सन 1768 में जब गोरखा के राजा ने नेपाल का एकीकरण किया, तब अन्य राष्ट्रीयताओं की अवहेलना करते हुए एकमात्र नेपाली भाषा को राष्ट्रभाषा घोषित कर दिया। यही सरकारी कामकाज की भाषा बनी। दूसरी भाषा जिसे सम्मान मिला वह थी संस्कृत। यह बात अन्य राष्ट्रीयताओं को नागवार गुजरी। नेपाली आज भी पूरे नेपाल में नहीं समझी जाती है। मगर संपूर्ण नेपाल पर नेपाली का राज है और इसकी सहयोगी हैं संस्कृत और अंग्रेजी। दरअसल नेपाली, गोरखा राज्य की भाषा थी। इस कारण नेपाली को गोरखाली भी कहा जाता है। एक माओवादी छापामार योद्धा के अनुसार, ‘जनयुद्ध में मेरे शामिल होने का कारण केवल आर्थिक उत्पीडऩ नहीं बल्कि मेरा यहां के एक देशज जातीय समूह का सदस्य होना भी था। दरअसल, हम यहां न तो अपनी भाषा पढ़ सकते है और ना अपनी मातृभाषा का इस्तेमाल कर सकते हैं। हम तो बस केन्द्र की हिन्दू सरकार का दमन झेलते रहते हैं। हमने क्रांति कर कुछ करना चाहा। कितना हुआ, अलग बात है, पर हमारे संघर्ष का उद्देश्य सामाजिक बदलाव ही है।’

नेपाल में लगभग 25 उत्पीडित जनजातियां हैं। इनमें मुख्य हैं मगर, नेवार, भोटिया, तमंग, लिम्बू, राइ, शेरपा, गुरूंग, सुनुवार, किरात, व लेप्चा। इनकी अपनी-अपनी भाषाएं हैं। नेवार जनजाति की भाषा नेवारी का तो अपना व्याकरण और लिखित साहित्य भी है। इसका अपना शब्दकोष भी है। लेकिन राजनीतिक कारणों से इसकी उपेक्षा की गई। नेवार जनता ने ‘नेवार खाला’नामक संगठन बनाया है। इसके अध्यक्ष दिलीप महर्जन कहते हैं, ”यहाँ आर्य और हिन्दू धर्म को ही श्रेष्ठ माना जाता है और सरकार इन्हें संरक्षण देती है। दफ्तरों, स्कूलों तथा अन्य जगहों में नेपाली का बोलबाला है और नेवारियों को मजबूर किया जाता है कि वे अपनी भाषा नहीं बल्कि नेपाली पढ़ें। अधिकांश नेवारी बौद्ध हैं लेकिन नेपाल एक हिन्दू राज्य है। यहां हिन्दू धर्म, नेपाली भाषा व आर्य इन सभी को श्रेष्ठ माना जाता है। नेवारी (काठमांडू) घाटी के देशज लोग हैं। नेवारियों को न तो सरकारी नौकरियां मिलती हैं, न उन्हें सेना और पुलिस में भर्ती किया जाता है और ना ही वे राजनीति में भाग ले पाते हैं। पश्चिमी नेपाल में मगर जनजाति की बहुलता है। मगर जनजाति के लोगों ने अपनी भाषाओं यानी खाम, मगर और कायकेक में पढ़ाई की व्यवस्था किये जाने की मांग की लेकिन सरकार ने इजाजत नहीं दी। अधिकांश मगर लोग अपनी भाषा ओर नेपाली दोनों बोलते हैं। स्कूलों में सरकार संस्कृत की शिक्षा देती है। संस्कृत के खिलाफ यहां प्रदर्शन हुए हैं, संस्कृत भाषा की पुस्तकें भी जलायी गयी हैं। इस सबके बावजूद सरकार ने कुछ नहीं किया।

जिस हिंदूराज तंत्र को आदर्श मानकर नेपाल के परंपरागत सत्ता स्रोतों के साथ भारत की हिंदूवादी पार्टियां भी नेपाल में इसके नष्ट होने की आंशका से बेचैन रही हैं, वह राजतंत्र कभी भी जनहितैषी नहीं रहा।

नेपाल में चार बड़े राजनीतिक दलों नेपाली कांग्रेस, सीपीएन यूएम एल, यूसीपीएन माओवादी और मधेसी पीपुल्स फोरम डेमोक्रेटिक का नेपाल की 601 सदस्यीय संविधानसभा में 90 फीसद बहुमत है। संविधानसभा में बहुमत हिंदू राष्ट्र के प्रतिनिधियों का ही है। दिखावे भर के लिए दलितों तथा अल्पसख्यकों की भागीदारी है।

विश्वेन्द्र पासवान को संविधानसभा में दूसरी बार लिया गया है। उन्हें नेपाल के जुझारू दलित प्रतिनिधि के रूप में देखा जाता है, जो समय-समय पर दलितों के सवाल उठाते रहे हैं। 1972-73 में उन्होंने नेपाल में आंदोलन शुरू किया और बहुजन शक्ति पार्टी भी बनाई। दलित मुद्दों मसलन शिक्षा, रोजगार तथा अन्य क्षेत्रों में उनके लिए आरक्षण के सवाल पर प्रदर्शन भी किये। परन्तु इस मामले में संविधानसभा के अधिकांश सदस्य उनसे असहमत थे।

पिछले दिनों पासवान का दिल्ली आना हुआ। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर दलित लेखकों तथा सामाजिक कार्यकताओं का यह पहला हस्तक्षेप था, जब उन्होंने एकजुट होकर नेपाल के हिंदू राष्ट्र के खिलाफ आंदोलन शुरू किया और उसमें उन्हें सफलता भी मिली। इसके लिए विश्वेन्द्र पासवान के सतत् प्रयासों को श्रेय दिया जाना चाहिए। पिछले दो वर्षों में वे पटना, लखनऊ, हरियाणा और दिल्ली के बार-बार दौरे कर बहुजन समाज के साथियों से संवाद स्थापित करते रहे। दिल्ली में अनेक साथियों ने व्यक्तिगत रूप से तथा अपने-अपने संगठनों के माध्यम से नेपाली दूतावास जाकर ज्ञापन भी दिये। नेपाल में तो उनका संघर्ष ऐतिहासिक था ही। अब हमें नया नारा देना चाहिए दुनिया के बहुजनों एक हो जाओ।

About The Author

Reply