पहले बहुजन, फिर मुसलमान

अन्य दलितों और पिछड़ों के साथ एकजुट होकर और नए नायकों को अपनाकर पसमांदा, श्रेष्ठि वर्ग की जातिवादी अल्पसंख्यक राजनीति के चंगुल से मुक्त हो गए हैं

Abdul Qayyum Ansariभारत के राजनैतिक क्षितिज पर 1990 के दशक में उभरे पसमांदा आंदोलन को पारंपरिक अल्पसंख्यक राजनीति के झंडाबरदारों के कटु विरोध और निंदा का सामना करना पड़ा। मंडल राजनीति (1990) से प्रेरित पसमांदा आंदोलन ने न केवल अशरफ (उच्च जाति) मुसलमानों के वर्चस्व को चुनौती दी वरन उन्होंने सफलतापूर्वक इतिहास का पुनर्लेखन भी किया और ‘कुलीन’ अल्पसंख्यक राजनीति के प्रतीकों और भाषा को खारिज किया।

पसमांदा एक फारसी शब्द है। पसमांदा नेता और जदयू सांसद अली अनवर की एक पुस्तक ”मसावात की जंग’’ (समानता की लड़ाई) के अनुसार पसमांदा शब्द का अर्थ है ”पीछे छूटे हुए’’। कुछ प्रमुख पसमांदा जातियां हैं-लालबेगी, हलालखोर, मोची, पासी, भंत, भटियारा, पमरिया, नट, बक्खो, डफाली, नलबंद, धोबी, साई, रंगरेज़, चिक, मिर्शीकार व दर्जी। अगर हम साधारण भाषा में कहें तो पसमांदा, वे पिछड़े (शूद्र) व दलित (अति-शूद्र) हैं, जिनके पूर्वजों ने सदियों पहले, जातिगत अत्याचारों से मुक्ति के लिए इस्लाम अपना लिया था। परंतु धर्म बदलने से उनके साथ हो रहा जातिगत भेदभाव समाप्त नहीं हुआ और न ही उनकी भौतिक वंचना में कोई कमी आई। नि:संदेह, इस्लाम समानता और भाईचारे का हामी है। परंतु मीडिया में अक्सर इस आशय की रपटें छपती रहती हैं कि अशरफ मुसलमान, मस्जिदों और कब्रिस्तानों में दलित मुसलमानों को प्रवेश नहीं करने देते। मुसलमानों में अंतर्जातीय विवाह भी कम ही होते हैं।

पसमांदा नेता अपनी मुस्लिम पहचान की बजाए अपनी दलित और पिछड़ी पहचान पर अधिक ज़ोर देते हैं और मुसलमानों के एकसार समुदाय होने की मान्यता पर प्रश्नचिन्ह लगाते हैं। मुसलमानों में जातिगत भेदभाव के मद्देनजऱ, पसमांदा राजनीति का लक्ष्य है सभी धर्मों के दलितों और पिछड़ों की व्यापक ‘बहुजन एकता’ की स्थापना।

पसमांदा बुद्धिजीवी खालिद अनीस अंसारी, पसमांदा आंदोलन के इतिहास को दो कालखंडों में विभाजित करते हैं। इस राजनीति का दूसरा कालखंड शुरू हुआ मंडल राजनीति के बाद से। पहले कालखंड की शुरूआत, बिहार में मोमिन कांफ्र्रेंस के दौर से मानी जाती है। मोमिन कांफ्र्रेंस (1930 व 1940 का दशक) राष्ट्रवादी आंदोलन और कांग्रेस की राजनीति से प्रेरित थी।

कोलकाता के बिहारी मुसलमानों द्वारा स्थापित मोमिन कांफ्र्रेंस, हिंदू और मुस्लिम दोनों राष्ट्रवादों को खारिज करती थी। परंतु यह संस्था स्वतंत्रता के बाद सक्रिय नहीं रह सकी यद्यपि इसके शीर्ष नेता कय्यूमी अंसारी (1905-1974) बिहार की कांग्रेस नेतृत्व वाली सरकार में मंत्री थे।

कय्यूम अंसारी, पसमांदा आंदोलन के सबसे लोकप्रिय नेताओं में से एक माने जाते हैं। भारत सरकार ने उनके सम्मान में एक डाक टिकट भी जारी किया है। अपनी पुस्तक ”मुस्लिम पॉलिटिक्स इन बिहार’’ (2014) में इतिहासकार मोहम्मद सज्जाद लिखते हैं कि अंसारी, 1940 के दशक की शुरूआत में बिहारी की राजनीति में तेजी से उभरे।

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वीर अब्दुल हमीद

कय्यूम अंसारी बिहार राज्य जमायत-उल-मोमिनीन के अध्यक्ष भी थे। बिहार के सासाराम में अली बंधुओं के संपर्क में आने के बाद, उन्होंने खिलाफत आंदोलन के ज़रिए स्वाधीनता संग्राम में भाग लिया। सन् 1930 और 1940 के दशक में उन्होंने मुस्लिम लीग और द्विराष्ट्र सिद्धांत का जबरदस्त विरोध किया। स्वतंत्रता के बाद वे बिहार की कांग्रेस सरकारों (1946-52, 1955-57 व 1962-67) में मंत्री रहे। वे बिहार प्रदेश कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष, कांग्रेस कार्यकारी समिति के सदस्य व राज्यसभा के सदस्य (1970-72) भी रहे।

अंसारी की मृत्यु के कई दशक बाद, पसमांदा आंदोलन का दूसरा दौर शुरू हुआ। इसका प्रेरणास्त्रोत था बिहार का सामाजिक न्याय आंदोलन। सन् 1994 में डॉ. एज़ाज अली द्वारा गठित ”ऑल इंडिया बैकवर्ड मुस्लिम मोर्चा’’ और सन् 1998 में अली अनवर द्वारा स्थापित ”पसमांदा मुस्लिम महाज़’’, पसमांदाओं के प्रमुख राजनैतिक संगठन हैं।

अपने पहले दौर में जहां पसमांदा आंदोलन का झुकाव कांग्रेस की ओर था वहीं दूसरे दौर में जनता दल, समाजवादी पार्टी, बहुजन समाज पार्टी, राष्ट्रीय जनता दल व जनता दल यूनाईटेड जैसी सामाजिक न्याय की पार्टियों से उसका गठबंधन होना स्वभाविक था। हिंदुओं और मुसलमानों के दमित तबकों की एकता के पीछे उनका ”दर्द का रिश्ता’’ था। दोनों के अनुभव एक थे, दोनों एक-से काम करते थे और दोनों को ऊँची जातियों के हिंदुओं और मुसलमानों के हाथों अपमान सहना पड़ता था।

इस तथ्य को पसमांदा आंदोलन का नारा ”पिछड़ा-पिछड़ा एक समान, हिंदू हो या मुसलमान’’ बड़े सहज व सटीक शब्दों में व्यक्त करता है।

धर्मों से ऊपर उठकर, दलितों और पिछड़ों की एकता कायम करने में बसपा के संस्थापक कांशीराम की राजनैतिक विचारधारा का महत्वपूर्ण योगदान था। वे बहुजन की अवधारणा के जनक थे और उन्होंने भारतीय राजनीति में एक नए गुट का निर्माण किया जिसमें दलित, पिछड़े और अल्पसंख्यक शामिल थे। पारंपरिक राजनीति मानती थी कि दलित और मुसलमान अल्पसंख्यक हैं। कांशीराम का कहना था कि शोषक उच्च जातियां अल्पसंख्यक हैं और दमित जातियां बहुजन हैं।

राजनैतिक समीकरणों को बदलने और नई पहचानें स्थापित करने के लिए इतिहास की पुनव्र्याख्या भी जरूरी होती है। जहां पारंपरिक मुस्लिम विद्वानों ने जाति के प्रश्न को नजऱअंदाज़ किया वहीं पसमांदा मुस्लिम बुद्धिजीवियों ने उसे प्रमुखता दी। उदाहरणार्थ, मसूद आलम फलाही (”हिंदुस्तान में जांतपांत और मुसलमान’’, 2007) लिखते हैं कि मध्यकाल से ही नीची जातियों के मुसलमानों के साथ भेदभाव होता आ रहा है और उन्हें सत्ता में भागीदारी से वंचित किया जाता रहा है। मुगल बादशाह औरंगज़ेब (1618-1707) और बहादुर शाह जफर (1775-1862) को पसमांदा नेता जातिवादी बताते हैं। वे यह भी कहते हैं कि आधुनिक भारत के प्रतिष्ठित मुस्लिम नेता जैसे अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय के संस्थापक सर सैय्यद एहमद खान (1817-1898) भी नीची जातियों के मुसलमानों के बारे में अपमानजनक शब्दों (बदज़ात जोल्हा) का इस्तेमाल करते थे और उच्च जातियों के हितों के संरक्षक थे।

अशरफ नायकों को दरकिनार कर, पसमांदा मुसलमानों ने अपने नए नायकों का निर्माण किया जो कबीर-फुले-आंबेडकर परंपरा के थे। आंबेडकर के जाति व्यवस्था के खिलाफ संघर्ष के कारण उन्हें पसमांदाओं ने अपना नायक बनाया। पसमांदा मुसलमान, ओबीसी नेता कर्पूरी ठाकुर को भी अपना नायक और आंबेडकर के समकक्ष मानते हैं। जब वे बिहार के मुख्यमंत्री थे, तब कर्पूरी ठाकुर ने पिछड़ी जातियों को 26 प्रतिशत आरक्षण प्रदान किया था और इनमें कई दलित मुस्लिम जातियां भी शामिल थीं।

इसके अलावा, पसमांदा मुसलमानों ने नीची जातियों के कई मुसलमानों को अपने नायक का दर्जा दिया है। इनमें शामिल हैं वीर अब्दुल हमीद (1933-1965) जिन्हें 1965 में पाकिस्तान के साथ हुए युद्ध में अदम्य साहस दिखाने के लिए परमवीर चक्र (मृत्योपरांत) से सम्मानित किया गया था; प्रतिष्ठित शहनाई वादक उस्ताद बिस्मिल्लाह खां (1903-2006) जिन्हें 2001 में भारत रत्न प्रदान किया गया था; कय्यूम अंसारी व मौलाना अतीक-उर-रहमान आरवी, जो दारूल उलूम देवबंद के छात्र और राष्ट्रवादी स्वतंत्रता संग्राम सैनानी थे।

इन नायकों को अपनाकर पसमांदा मुसलमानों ने सामाजिक व सांस्कृतिक क्षेत्र में ऊँची जातियों के वर्चस्व को चुनौती दी है। सार्वजनिक संस्कृति के दलितीकरण के इस दौर में इन नए सांस्कृतिक बिम्बों का उभार स्वागतयोग्य है।

फारवर्ड प्रेस के अक्टूबर, 2015 अंक में प्रकाशित

 

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