सैराट : जमाने की आँख में झांकता सिनेमा

इस फिल्म में आप मनमोहन देसाई,आदित्य चोपड़ा, करन जोहर, माजिद मजीदी,अडूर गोपालकृष्णन और आनंद पटवर्धन जैसे अलग-अलग फिल्म– निदेशकों को एक साथ देख लेते हैं

nagraj-manjule-rinku rajguruमराठी फिल्म निर्देशक नागराज मंजुले पर हो रही चर्चाओं का दौर थम नहीं रहा है। उनकी हालिया फिल्म सैराट (wild) जाति, लिंग और प्रेम के उलझे, असहज प्रश्नों को तीखे ढंग से उठाने के बावजूद 100 करोड़ के आंकड़े के पास पहुँचने वाली पहली मराठी फिल्म है। शोलापुर की वडार दलित जाति से आने वाले नागराज की सिनेमा की विधा में किसी भी तरह की विधिवत शिक्षा नहीं अलबत्ता बचपन से ही वे सिनेमा देखने के दीवाने थे। जन-संचार में एमए के पाठ्यक्रम के तहत पंद्रह मिनट की फिल्म ‘पिसतुलिया’ उनकी पहली लघु फिल्म थी जिसे 2010 में राष्ट्रीय पुरस्कार मिला था। पिसतुलिया एक दलित बच्चे की कहानी है जो स्कूल जाना चाहता है, पर गरीब माता-पिता को लगता है कि पढाई लिखाई से क्या होगा, बेहतर वह काम में हाथ बटाये।

जमाने की आँख में झांकता मंजुले का सिनेमा

‘फंड्री’ में एक अत्यंत गरीब, दलित परिवार का दुबला-पतला गहरे रंग का लड़का ‘जब्या’, ऊँची जाति की गोरी रंग की अपनी सहपाठी को बहुत पसंद करता है। वह उसे अपनी ओर आकर्षित करने की तरकीबे सोचता/करता रहता है। उसके सामने अच्छे कपड़ों में आना चाहता है और अपनी पारिवारिक पृष्ठभूमि उससे छुपाता है। लड़की को इसकी भनक भी नहीं है। फिल्म कभी नहीं बताती कि जब्या की चाहत का क्या हुआ। क्या होता अगर जब्या गोरा होता और लड़की थोडा दबे रंग की होती? क्या होता अगर वह लड़की भी जब्या को पसंद करती? क्या होता अगर जब्या के सपनों की जादुई चिड़िया सचमुच उसकी चाहत को उसके करीब ला देती? इन प्रश्नों के जवाब के लिए आप सैराट देख सकते हैं। कुछ लोग सैराट को उनकी पिछली फिल्म फंड्री (सुअर) का सिक्वेल कह रहे हैं जिसका काला-कलूटा दलित किशोर जब्या/जामवंत सैराट में आकर प्रशांत/परश्या हो जाता है।

अलबत्ता सैराट, फंड्री का सिक्वेल नहीं है। फंड्री का कैमरा 14 साल के दलित किशोर की आँख और हसरतों भरा दिल है। जहाँ राष्ट्रगान की कीमत एक सूअर से तय होती है और मरा हुआ सूअर जब्या के टूटे हुए मनोजगत के साथ-साथ राष्ट्र के महापुरुषों के सामने ‘विडंबनात्मक यथार्थ’बन दर्शक पर पत्थर की तरह चलता है।

एक विलक्षण सिनेमैटिक-सबवर्जन

नागराज सिनेमा के ‘इडियम’ और ‘लोकप्रिय’ होने की अहमियत जानते हैं। वे मुख्यधारा के सिनेमा के तरीकों का इस्तेमाल करते तो हैं पर कहानी अपनी कहते हैं। एक ऐसे वक़्त में जब सामजिक अस्मिताएं ज्यादा से ज्यादा संकीर्ण और कठोर हो रही हैं, सैराट का सफलतम मराठी फिल्म हो जाना- आशा की किरण जैसा है। सैराट ‘सिनेमैटिक सबवर्जन’ का एक मॉडल है। यह उन चुनिन्दा फिल्मों में से है, जब हम कमोबेश खुद को ही सिनेमा में देख लेते हैं। हाँ, इस फिल्म के कर्णप्रिय, मादक, उत्सवी संगीत की कल्पना और रचना करने के लिए अजय-अतुल और मंजुले बधाई के पात्र हैं। देशज धुनों, पदों और रूपकों के प्रयोग,संगीत के आधुनिकतम यंत्रों व तकनीकों की इस सिम्फनी  ने फिलहाल पूरे महाराष्ट्र को झुमाकर रख दिया है। मंजुले ने साबित कर दिया कि जाति, लिंग और उत्पीड़न के विषय सिर्फ डॉकूमेंट्रीज के लिए नहीं हैं। कल्पना कीजिये कि आप एक ऐसी फिल्म देख रहे हैं जहाँ आप मनमोहन देसाई, आदित्य चोपड़ा, करन जोहर, माजिद मजीदी, अडूर गोपालकृष्णन और आनंद पटवर्धन को एक साथ देख लेते हैं।

स्कूल, कविता, प्यार और दोस्ती – सिनेमा की नई दुनिया

नागराज की विशेषता यह भी है वे सिनेमा की दुनिया से बाहर निकाल दिए गए दृश्यों और रूपकों को पुनर्स्थापित करते हैं। कमोबेश उनकी हर फिल्म में स्कूल का केन्द्रीय महत्व है। यही वह जगह है जहाँ दोस्तियाँ परवान चढ़ती हैं, चाहत नए-नए रंगों में सामने आती है, जीवन में पहली बार कविता आती है और दुनिया अपने रहस्य खोलती है। मंजुले की फिल्मों के स्कूल में मध्यकालीन निर्गुण कवि चोखामेला (फंड्री) या दलित कविता के हस्ताक्षर नामदेव ढासाल की कविताएँ (सैराट) सहज रूप से चली आती हैं। नागराज बताते हैं कि कितना भी जटिल हो जीवन कविता साथ देती है। उनकी दोनों फिल्मों के युवा नायक कविता लिखते हैं।

आजकल का ‘बम्बईया सिनेमा’ दोस्ती के नाम पर दो प्रतिस्पर्धी चरिर्त्रों का निर्माण करता है जो औरत या ताकत के लिए एक दूसरे से जोर आजमाइश करते रहते हैं, पर हम जानते हैं कि जीवन दोस्तियों का ही दूसरा नाम है। खासकर किशोरावस्था की दोस्तियाँ बगैर छल-कपट के सच्चे मानवीय और सरल मूल्यों का निर्माण करती हैं। सैराट को उसके मामूली लोगों की बेपनाह दोस्तियों के लिए भी याद किया जाएगा। सैराट आपको अपने बचपन और किशोरावस्था में लेकर जाती हैं, यह आपके मन की सबसे नरम जगह छू लेती है और आप छपाक से प्यार की बावड़ी में बावले से कूद जाते हैं।

सिनेमा का सेट और शैली में प्रयोग 

24bm_Music-Revi_24_2826638fसैराट भारत के ग्रामीण परिवेश में कई धरातलों पर हो रहे बदलावों को पकड़ती है। मंजुले यह दिखाने से नहीं चूकते कि जमाना कुछ न कुछ बदला है और उनकी फिल्मों के दलित चरित्र पाटिल (ऊँची जाति) की बावड़ी में जमकर नहाते हैं। ‘परश्या’ किसी से दबता नहीं है, उसकी कविताएँ कॉलेज के नोटिसबोर्ड पर लगती हैं और वह क्लास में सबसे ज्यादा नंबर लाने वालों छात्रों में गिना जाता है। जब पूरी तरह से सजा-धजा परश्या अपने दोस्त को घड़ी और पर्स थमा बावड़ी में कूदने के बाद आर्ची की फटकार पर निकल रहा होता है तब आप कैमरे के मूवमेंट पर गौर कीजिये। कैसे परश्या निचली सीढ़ी से ऊपर आता है। एक क्षण के लिए वह टशन में खड़ी आर्ची पर भारी पड़ जाता है।

चाहे क्रिकेट की कमेंट्री हो या पुरस्कार वितरण में मुख्य अथिति के रूप में विराजमान एक भगवा साधु हो, स्कूटी चलाती आर्ची के पीछे बच्चे को लेकर बैठा परश्या हो या सड़क किनारे भगवा झंडा लिए कार्यकर्ता युवा ‘प्रेमियों/जिहादियों’ की पिटाई कर रहे हों- मंजुले की नजर से कुछ छूटता नहीं है। कुछेक मौकों पर लगता है कि फिल्म खिंच रही है पर तुरंत समझ में आ जाता है कि ऐसा संपादन की समस्या के चलते नहीं हो रहा है। जीवन की सांसारिकता का आख्यान रचने के लिए ‘डिटेलिंग’ में जाना ही पड़ता है।

सैराट निचली जाति के परश्या और एक सवर्ण जमींदार की बेटी आर्ची के प्यार की कहानी है। जाहिर है यह प्यार किसी को बर्दाश्त नहीं। इस जोड़े को जमींदार परिवार की हिंसा का सामना करना पड़ता है। जान बचाने के लिए वे दूसरे शहर भागते हैं। जहाँ उन्हें एक अप्रत्याशित और नेक मदद मिलती है। शक-शुबहे के भीतर तक चीर देने वाले एक दौर के बाद अपने प्रेम की पुनर्खोज कर वे शादी कर लेते हैं और अब उन्हें एक बच्चा भी है। लगता है कि ‘हैप्पी इंडिंग’ होने वाली है कि अचानक सालों बाद आर्ची का परिवार उन्हें खोजकर ख़त्म कर देता है। पर उनका बच्चा बच जाता है, क्योंकि नरसंहार के समय एक पड़ोसी महिला उसे घुमाने ले गयी होती है। फिल्म के अंत में लहू में डूबे अपने मां-बाप के मृत शरीरों के आतंक में वह बच्चा रोते हुए बाहर की तरफ भागता है। सीमेंट की फर्श पर बच्चे के खून सने पैरों के निशान छूटते जाते हैं। एक लहूलुहान भविष्य की ओर इशारा करते हुए

सिनेमा का क्राफ्ट

सैराट के माध्यम से नागराज ने यह साबित कर दिया है कि वे ‘सिनेमा के क्राफ्ट’ के अनोखे कीमियागर हैं। ख़ास बात यह है कि विराट बिम्बों की रचना करते वक़्त बारीक और उपेक्षित सच्चाइयाँ उनकी नजर से फिसल नहीं जातीं। फिल्म का पहला हिस्सा संगीत और रंगों से भरा हुआ है और दूसरे हिस्से में यह कम होने लगता है। फिल्म के अंतिम भाग में सारे कृत्रिम उपादान धुंधले और हलके होते जाते हैं। कोई संगीत नहीं, कोई बड़ा दृश्य नहीं। अंत में सब कुछ हट जाता है, बचता है सिर्फ सन्नाटा, बच्चे का दारुण रूदन और हमारे इर्द-गिर्द का कोरस।गहरी संवेदनशीलता, ‘पोएटिक इनसाइट’ और असाधारण ‘डिटेलिंग’ से बुनी मंजुले की शैली विराट से सूक्ष्म की तरफ जाने की है।दर्शक को थोडा-थोडा अंदाजा रहता है कि फिल्म कहाँ ख़त्म होगी, पर फिल्म का अंत उसके लिए एक ‘शॉक’ की तरह आता है। एक मंटोई पटाक्षेप! जहाँ आपके अंतर्मन में कांच की कोई चादर टूट जाती है।

Sairat-Box-Office-Collection-2सैराट में (फंड्री की तरह) पेशेवर कलाकार न के बराबर हैं। इन सबमें 15 साल की रिंकू राजगुरु द्वारा अभिनीत आर्ची का किरदार सबसे अहम है। सैराट की आर्ची एक दबंग जमींदार और राजनेता की बेटी और उभरते हुए दभंग भाई की बहन है। मुखर और हर मौके पर हावी रहने वाली आर्ची प्यार में पड़ने के बाद सामन्ती ठसक त्याग देती है। वह अपने प्यार की रक्षा में गोली चलाती है, थानेदार से भिड़ जाती है और ट्रैक्टर चलाकर भरी दोपहर में परश्या के घर पहुँच जाती है। साफ़तौर से असहज दिख रही परश्या की मां से वह पीने के लिए पानी (!) मांगती है और बाजार में सबके सामने उसका पैर छूती है।। ऐश्वर्य और सामन्ती माहौल में पली-बढ़ी आर्ची, निचली जाति के गरीब लड़के के प्यार में पड़ी आर्ची, एक अजनबी शहर की झुग्गी-झोपड़ी में गटर के ऊपर बने अपने टीन के कमरे और बिना दरवाजे वाले बाथरूम से गुजरते हुए बॉटलिंग प्लांट में मजदूर की नौकरी तक कैसे बदलती है, सीखती है, मंजुले ने इसे रिंकू राजगुरु के कलाकार से निकलवाने में सफलता पायी है।

जाहिर है सिनेमा की राजनीति होती है पर सिनेमा का काम राजनीति करना भर नहीं है। सारी कलाओं में क्रांतिकारियों के लिए सिनेमा को सबसे महत्वपूर्ण विधा, लेनिन यूँ ही नहीं मानते थे। जो हो, सिनेमा के रंगमंच पर जीवन के नायक आ पहुंचे हैं। आइये उनका स्वागत करें।

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3 Comments

  1. Vivek Kumar Ram Reply
  2. Raju Nekwal Reply
  3. Husain Tabish Reply

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