h n

यूजीसी के आरक्षण विरोधी सर्कुलर के खिलाफ लालू प्रसाद ने लिखी प्रधानमंत्री मोदी को चिट्ठी

मानव संसाधन विकास मंत्रालय के सर्कुलर, जिसमें प्रोफेसर और एसोसिएट प्रोफेसर की नियुक्तियों में पिछड़ा वर्ग के अभ्यर्थियों के लिए आरक्षण समाप्त कर दिया गया है, के बहाने बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री और राष्ट्रीय जनता दल के राष्ट्रीय अध्यक्ष लालू प्रसाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को याद दिला रहे हैं उनकी सामाजिक स्थिति और उनकी वादा खिलाफी

24-6-2016

आदरणीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी,

आपका ध्यान 3 जून को प्रकाशित मानव संसाधन विकास मंत्रालय के सर्कुलर की ओर ले जाना चाहता हूँ, जिसमें यह कहा गया था कि प्रोफेसर और एसोसिएट प्रोफेसर की नियुक्तियों में पिछड़ा वर्ग के अभ्यर्थियों के लिए आरक्षण समाप्त कर दिया गया है। इसे लेकर बहुसंख्यक वर्ग के लोगों में संशय की स्थिति यथावत बनी हुई है। लोगों में यह शंका घर कर गई है कि नियमों और प्रावधानों की अनदेखी करते हुए lalu-modiजानबूझकर पिछड़ा वर्ग के अभ्यर्थियों की हकमारी की जा रही है। आप से यह निवेदन है कि इस अविश्वास की स्थिति का अंत करने के लिए मानव संसाधन विकास मंत्रालय से इस विषय में पूरी जानकारी मांगें और श्रीमान स्वयं इसपर अपने विचार स्पष्ट करें। और यह भी जानकारी दें कि केन्द्रीय विश्वविद्यालयों में पिछड़े, दलित और आदिवासी वर्ग से कितने प्रोफेसर और एसोसिएट प्रोफेसर के पद पर नियुक्त हैं और उनकी कुल संख्या उन्हें मिलने वाली आरक्षण के अनुपात में है या नहीं। यह जगजाहिर है कि सुनियोजित तरीके से आरक्षण के हकदारों को आरक्षण से वंचित किया जाता है। बहुसंख्यक वर्ग यह जानने का इच्छुक है कि क्या प्रधानमंत्री इस यथार्थ से परिचित है भी या नहीं!

कुछ दिनों पहले अनुसूचित जनजातियों के विद्यार्थियों को मिलने वाली फ़ेलोशिप को भी यह हवाला देते हुए रोक दिया गया कि इसके लिए धनराशि की कमी है। प्रायः कम धनराशि का हवाला कमजोर वर्ग के लोगों से जुडी योजनाओं में ही क्यों दिया जाता है? और वह भी उनकी शिक्षा जैसी महत्वपूर्ण क्षेत्र से जुडी योजनाओं के लिए कम पड़ जाती हैं जो उनके जागरण और उत्थान के लिए अपरिहार्य हैं? क्या देश के संसाधन और खज़ाने पिछड़े, दलितों और आदिवासियों की बारी आते-आते समाप्त हो जाते हैं? क्या सरकार के पास लगभग 650 आदिवासी छात्रों को उच्च शिक्षा में फेलोशिप देने के लिए 80-85 करोड़ नहीं हैं? वहीँ दूसरी ओर सरकार की नाक के नीचे हज़ारों करोड़ का घालमेल करके बड़े बड़े उद्योगपति आसानी से विदेश भाग जाते हैं। बिहार चुनावों के दौरान भाजपा की मार्गदर्शक दक्षिणपंथी वैचारिक संस्था आरएसएस प्रमुख ने आरक्षण को हटाने की बात कही थी। मानो उन्हीं के दया दृष्टि के कारण देश के बहुसंख्यक वर्ग को आरक्षण मिला हो। उस बयान की छाया में सरकार के इन कदमों को देखने पर यह स्पष्ट हो जाता है कि सरकार आरएसएस के बताए मार्ग पर चल पड़ी है। कहाँ आप आरक्षण के लिए अपने जान देने की बात कर रहे थे और कहाँ आपकी सरकार कुरेद-कुरेद कर आरक्षण की नींव खोखली करने में लगी है। जब देश में व्याप्त असमानता, ऊँच-नीच और छुआछूत आर्थिक नहीं है तो फिर सरकार आर्थिक आधार पर आरक्षण की पक्षधर क्यों है?  हम जानते हैं कि आपने राजस्थान और गुजरात में सबलों को आरक्षण दिया है। हरियाणा और राजस्थान में पंचायती राज संस्थाओं में शिक्षा अनिवार्य कर बहुसंख्यकों को दौड़ से बाहर करने की साजिश की है। बहुसंख्यक वर्ग को आपकी जान नहीं चाहिए, बल्कि यह भरोसा चाहिए कि यह सरकार बहुसंख्यक वर्ग की हकमारी नहीं करेगी। आरक्षण कोई गरीबी उन्मूलन कार्यक्रम नहीं, एक संवैधानिक अधिकार है| हम बीमारी को खत्म करने की बात करते है और आपकी सरकार कहती है कि नहीं पहले ईलाज ही बंद कर देते है।

महोदय, जब पीड़ा और बीमारी ही खत्म हो जाएगी तो इलाज बंद करने की जरूरत ही नहीं पड़ेगी। चोरी छुपे आरक्षण हटाने की यह दक्षिणपंथी चाल शायद एक बहुत बड़े निर्णय के पहले देश की बहुसंख्यक आबादी के संयम और प्रतिक्रिया को नापने तौलने की कोशिश है।

श्रीमान, हम आन्दोलन करते हुए राजनीति में आए हैं| हमारे लिए राजनीति आन्दोलन का दूसरा नाम है। मंडल कमीशन को लागु करने के लिए हमने संघर्ष किया, सडकों पर उतरे। पर आज भी मंडल कमीशन के कई सिफारिशों को अमलीजामा नहीं पहनाया गया है। पर आरक्षण और मंडल कमीशन के जिन भी प्रावधानों को लागु किया गया है अगर उनपे ही आँच आने लगे, तो सडकों पर उतरने में क्षण भर भी नहीं सोचेंगे। जिन लोगों ने हज़ारों सालों तक तिरस्कार और ज़िल्लत सहा हो, उनको मिलने वाली आरक्षण से 20-25 साल में ही लोगों को इतनी तकलीफ पहुँचने लगी है। अगर कोई आरक्षण विरोधी हैं तो वो अस्पृश्यता, तिरस्कार, जातिवाद, वर्ण व्यवस्था और क्रूर अन्यायपूर्ण पारम्परिक सोच का पक्षधर हैं। यहाँ सब दिखावे के लिए राम के अनुयायी तो हैं लेकिन शबरी के झूठे बैर खाने से परहेज करते हैं। आप आंबेडकर जयंती और अन्य अवसरों पर भाषण तो मर्मस्पर्शी देते हैं, पर आपके सरकार के वास्तविकता के धरातल पर निर्णय स्पष्ट कर देते हैं कि जीते जागते व्यथित और संशयित बहुसंख्यकों के मर्म को समझ भी नहीं पाए हैं। सरकार की कथनी और करनी का यह अंतर बहुसंख्यक वर्ग के संयम को तोड़ देने की क्षमता रखता है।

मैं पुनः सादर आपसे आग्रह करता हूँ कि जिस गरीबी और पिछड़ेपन की दुहाई देकर इस पद तक पहुंचे हैं| कम से कम वहाँ बैठकर वंचितों, उपेक्षितों, उत्पीड़ितों के साथ अन्याय नहीं होने देंगे, यह आशा है।

 

(लालू प्रसाद)

राष्ट्रीय अध्यक्ष

राष्ट्रीय जनता दल

 

सेवा में,

श्री नरेंद्र दामोदरदास मोदी,

प्रधानमंत्री,

भारत सरकार

 

लेखक के बारे में

लालू प्रसाद

बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री लालू प्रसाद राष्ट्रीय जनता दल के राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं।

संबंधित आलेख

राजस्थान : हनुमानगढ़ और श्रीगंगानगर में नहरी क्रांति से दलितों को क्या मिला?
राजस्थान में अनुसूचित जातियों की कृषि भूमि के हस्तांतरण को लेकर विशेष कानूनी प्रावधान मौजूद हैं। इनके अनुसार दलितों की कृषि भूमि को सवर्ण...
डेमोग्राफी परिवर्तन आयोग : निशाने पर दलित-बहुजन व मुस्लिम एकता
लंबे समय से इस धारणा को हमारी आम समझ का हिस्सा बनाने की सचेत कोशिश की गई कि जहां मुसलमानों की आबादी ज़्यादा होती...
आखिर हम तिरस्कृत पसमांदा-बहुजन कॉकरोच कब करेंगे अपना आंदोलन वायरल?
लगभग हर दशक में कुछ मेधावी दलित-बहुजन शख्सियतें उभर के आती हैं जो व्यवस्था की बारीकी से समालोचना करते हैं और सत्ताधारी आसानी से...
अर्जक संघ में शामिल हों महिलाएं : रीता चौधरी
लखनऊ यूनिवर्सिटी की प्रोफेसर डॉ. रीता चौधरी ने अपने वक्तव्य में अर्जक संघ के आंदोलन में शामिल स्त्री-विमर्श को रेखांकित किया। उन्होंने अर्जक संघ...
बहुजन स्पोर्ट्स : मध्य प्रदेश के पन्ना जिले के आदिवासी स्केटबोर्डिंग खिलाड़ियों का टूट रहा सपना
जनवार गांव में 50 से ज्यादा आदिवासी लड़के-लड़कियां हैं, जो स्केटबोर्डिंग के खेल में माहिर हैं। इनमें कई लड़के-लड़कियों ने तो गोल्ड मेडल भी...