पीएमके नेता का जेएनयू में विरोध : नैतिक राजनीति बनाम व्यवहारिक राजनीति

सवर्ण वामपंथी विद्यार्थियों ने अपने चुनावी फायदे के लिए नहीं बल्कि शोषित-वंचित-पिछड़े वर्गों के बीच बन रहे एकता को तोड़ने के लिए अवसर के रूप में उन्होंने अंबुमणि रामदास को चुना। मुझे याद है 2011 में जब अंबुमणि रामदास आयें थे तब आज विरोध कर रहे संगठन और विद्यार्थियों ने उनका कोई विरोध नहीं किया था बल्कि कार्यक्रम में हिस्सा लिया था। लेकिन तब उन्हें मालूम नहीं था कि एक छोटा सा आन्दोलन शोषित-वंचित-पिछड़े वर्गों के बीच इतना तेजी से फ़ैल जाएगा

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(बाएं से) पी. एस. कृष्णन, शरद यादव, अंबुमणि रामदास और हरीश वानखड़े

अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) के हकों की बात करने का दावा करने वाले संगठन “यूनाइटेड ओबीसी फोरम” (गठन-जेएनयू, नई दिल्ली 2015) द्वारा 25 अगस्त 2016 को “दरकिनार किए गए बहुमत और सामाजिक न्याय के लिए खंडित संघर्ष” विषय पर एक राष्ट्रीय सेमिनार का आयोजन किया गया था। इसने वक्ता के रूप में शरद यादव, जनतादल यूनाइटेड से राज्यसभा सदस्य; अंबुमणि रामदास, पूर्व केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री और पीएमके से लोकसभा सदस्य; माननीय पी. एस. कृष्णन, सेवानिवृत आईएएस और पूर्व सदस्य राष्ट्रीय पिछड़ा वर्ग आयोग; और हरीश वानखेड़े, फैकल्टी जेएनयू को बुलाया गया था। सेमिनार का मुख्य उद्देश्य इस विषय पर विचार करना था कि कैसे हमारे खंडित संघर्ष के कारण समाज का एक बड़ा वर्ग, जो संख्या की दृष्टि से बहुत बड़ा है फिर भी उसे राष्ट्रीय संसाधनों, पदो और मूल्यों के बटवारे से दरकिनार कर दिया गया है। राजनीतिशास्त्र के विद्यार्थियों को संघर्षो पर अध्ययन करते हुए पढ़ाया जाता है कि समाज में संघर्षो का मुख्य कारण संसाधनों, पदों और मूल्यों का बटवारा है। ओबीसी समाज के सन्दर्भ में इन्हीं विषयो पर चर्चा होना था।

अमेरिकी राजनीतिशास्त्री हेरोल्ड लास्वेल  का राजनीति के बारे में प्रसिद्ध कथन है कि “राजनीति: कौन क्या, कब, और कैसे पाता है” का अध्ययन है। भारतीय समाज का संघर्ष मूल्यों (सरप्लस) को पाने और बंटवारे का संघर्ष है। संघर्ष मानव समाज के लिए यह सार्वभौमिक सत्य है। कार्ल मार्क्स का केंद्रीय विचार आर्थिक मूल्यों का बंटवारा है। यही आर्थिक मूल्य सामाजिक मूल्यों को निर्धारित करता है। कार्ल मार्क्स को पढ़ने के बाद, मेरी समझ बनी है कि उसकी केन्द्रीय समस्या भी पूंजीवाद का विरोध न होकर मूल्यों का बंटवारा है (“कम्युनिस्ट पार्टी का मैनिफेस्टो” 1848 की मूल कॉपी पढ़ें)।

आयोजित सेमिनार का केंद्र बिंदु भले ही मूल्यों के बंटवारे में ओबीसी समाज की स्थिति टटोलना था, लेकिन वास्तविकता यह है कि इन्हीं असमान मूल्यों के बंटवारे की समस्यायों से पूरा गैर-सवर्ण/द्विज भारतीय समाज गुजर रहा है। यह समस्या सिर्फ इज्जत और हकों की लड़ाई नहीं है। बल्कि यह मानव सभ्यता के न्यूनतम मानकों और मूल्यों के लिए है। इस लेख के सन्दर्भ में मानव सभ्यता का न्यूनतम मानक और मूल्य “अवसरो की समानता” है। भारत का गैर-सवर्ण/द्विज समाज इन न्यूनतम मानव मूल्यों से वंचित है। भारतीय समाज में इज्जत और सम्मान सवर्ण/द्विज समाज का कैदी था, जो कमो-बेस आज भी है। यह अकारण नहीं था कि अर्जक संघ (स्थापना 01 जून 1968) के संस्थापक माननीय रामस्वरूप वर्मा (22.08.1923–19. 08.1998) का नारा था– “दो बातें मोटी-मोटी: सबको इज्जत-सबको रोटी”। इन मूल्यों के संघर्ष में शिक्षा की निर्णायक भूमिका होती है। इसीलिए राष्ट्रमाता सावित्रीबाई फुले (03.01.1831–10. 03.1897) और राष्ट्रपिता महात्मा फुले 11.04.1827–28.11.1890) के साथ-साथ आधुनिक भारत के निर्माता डॉ. आंबेडकर ने (14. 04. 1891–06.12.1956) शिक्षा पर प्रमुखता से ध्यान और जोर दिया है।

लेकिन सेमिनार इन समस्याओं पर विचार न कर जातीय उत्पीडन पर अपनी-अपनी स्थिति स्पष्‍ट करने पर ही केन्द्रित रहा, क्योंकि इसके एक वक्ता के खिलाफ विरोध प्रदर्शन हो रहे थे। सेमिनार आयोजन के चार-पांच दिन पहले ही आयोजकों को तमिलनाडु के विद्यार्थियों ने पीएमके नेता और पूर्व केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री डॉ. अंबुमणि रामदास के आने पर अपनी आपत्ति जाता दी थी। आयोजकों को मालूम था कि अंबुमणि रामदास के आने पर उनका विरोध किया जाएगा। आयोजन के एक दिन पहले ही अर्थात 24 अगस्त 2016 को पूरे कैंपस में डॉ. अंबुमणि रामदास के विरोध में तमिल स्टूडेंट्स ने पोस्टर चिपका दिया था। इस पोस्टर में कहा गया था कि डॉ. अंबुमणि रामदास और उनकी पार्टी पीएमके जातिवादी, पितृसत्तावादी और समाज को तोड़ने वाला है। उनका आरोप था कि पार्टी के संस्थापक और उनके पिता एस. रामदास जातीय शुद्धता में विश्वास करतें थे और इसलिए वे दलित और गैर-दलितों (यहाँ मुख्यतः ओबोसी) के बीच वैवाहिक संबंधो के विरुद्ध आन्दोलन करने वालो में से थे। उनका यह भी आरोप था कि एस. रामदास के बेटे अंबुमणि रामदास ने यह साबित कर दिया है कि वह अपने पिता से अलग नहीं हैं। यही पर्चा 25 अगस्त 2016 को आयोजन स्थल पर भी बांटा गया था। पोस्टर और पर्चे में  अंबुमणि रामदास के विरोध का आह्वान किया गया था। पोस्टर-पर्चा अलगू, अरुणकुमार, गुरु, हरीकृष्णा, इंदुबाला, मुथुरमण, शिबी और वेंकटेश्वर के हस्ताक्षर से जारी कियेे  गए थे।

आयोजन के दिन अर्थात 25 अगस्त 2016 को ‘बिरसा, आंबेडकर, फुले स्टूडेंट्स एसोसिएशन’ (बापसा) ने भी एक पर्चा लाया।  इस पर्चे का शीर्षक था “हत्यारे सामाजिक न्याय के वाहक नहीं हो सकते”। इसने भी डॉ. अंबुमणि रामदास के विरोध का आह्वान किया गया था। इनका पर्चा यहाँ से शुरू होता है कि “तमिलनाडु का आत्मसम्मान आन्दोलन में गैर-ब्राह्मण जातियों को ब्राह्मणवाद के विरोध में एकजुट किया गया। लेकिन दलितों पर हमला हुआ,उन्हें क्षत-विक्षत किया गया, उनकी हत्या की गई और वे लगातार गैर-ब्राह्मणों द्वारा भेद-भाव और दमन के शिकार हो रहें हैं। इसलिए यह आन्दोलन दलित और मध्यम-जातियों के बीच बंट गया, दलितों को यह एहसास हुआ कि उनकी स्थित में कोई बदलाव नहीं होने वाला है, उनके साथ वही भेद-भाव और शोषण हो रहा है, जैसा कि सैकड़ो सालों से ब्राह्मण उनके साथ करते आ रहें थे। ” बापसा ने अपने पहले ही पैराग्राफ में स्पष्ट कर दिया है कि गैर-ब्राहमण (अर्थात ओबीसी) भी उनका शोषण ब्राह्मणों जैसा ही करता है।  बापसा अपने पर्चे में दूसरे और तीसरे पैराग्राफ में कहता है कि “तमिलनाडु में ओबीसी और दलितों में कोई ज्यादा अंतर नहीं है लेकिन ओबीसी की जातीय स्थिति ऊँचा होने और ब्राह्मणवादी विचारधारा के प्रभाव के कारण वह दलितों को खुद से नीचा समझते हैं। इसके कारण अंतरजातीय विवाह करने वाले कई लोगो को अपनी जान गवानी पड़ी है।” पर्चे में इसके कई उदहारण भी दिए गएँ हैं। पर्चे में कहा गया है कि पीएमके भी आरएसएस/बीजेपी जैसा ही हिन्दू फासीवादी पार्टी है। बापसा का आरोप है कि पीएमके के संस्थापक का कहना था कि “फैशनेबुल दलित लड़कों  के प्रलोभन में गैर-दलित लड़कियाँ शादी तक तैयार हो जाती है, जो असफल होती है।” उनका यह भी आरोप था कि उनकी पार्टी ने “अनुसूचित जाति/ जनजाति अत्याचार निरोध अधिनियम, 1989” के कुछ प्रावधानों को बदलने के लिए पूरे तमिलनाडु में अभियान चलाया था। पीएमके का कहना था कि इसके कुछ प्रावधानों का दुरूपयोग किसी को फंसाने में हो सकता है। इसके साथ ही पर्चे में ‘यूनाइटेड ओबीसी फोरम’ को कहा गया कि अंबुमणि रामदास को बुलाना ओबीसी-बहुजन महिलाओं के भी खिलाफ है। ज्ञात हो कि अंबुमणि रामदास जेएनयू में पहली बार नहीं आ रहे थे। इससे पहले वो 2011 में एआईबीएसएफ और ‘यूनाइटेड दलित स्टूडेंट्स फोरम’ के संयुक्त कार्यक्रम में जेएनयू आ चुके थे।

कैंपस के अन्दर और बाहर ‘यूनाइटेड दलित स्टूडेंट्स फोरम’ अनुसूचित जातियों के हितो की बात करने वाला कैंपस का सबसे प्रमुख और पुराना संगठन है।  कार्यक्रम में पहले शरद यादव आये, उनका कोई विरोध नहीं हुआ। लेकिन जैसे हीं अंबुमणि रामदास आये तमिल स्टूडेंट्स और बापसा के लोगो ने उन्हें घेर लिया और उनके खिलाफ नारेबाजी करने लगे। नारेबाजी के समय उनके सेमिनार हॉल में जाने का रास्ता रोका गया था। लेकिन साथ ही धक्का-मुक्की की भी अफवाह उड़ाई गई। इसके साथ-साथ यह भी अफवाह उड़ाई गई कि उनका शर्ट फट गया था, जो सरासर गलत है।  इसकी रिकॉर्डिंग यूट्यूब पर भी उपलब्ध है। इस घटना को “दलितों ने ओबीसी के कार्यक्रम मे बाधा डाला” के रूप में प्रचारित किया जाने लगा और कहीं न कहीं इसका मेसेज भी ऐसा ही गया। लोकतंत्र में हर किसी को अपनी बात कहने और विरोध करने का अधिकार है। लेकिन जिस तरीके से विरोध किया गया वह कई दृष्टिकोणों से सोचने पर विवश करता है। या फिर हो सकता है मैं तमिलनाडु के दर्द को महसूस नहीं कर पा रहा हूँ।   इतना बड़ा विरोध करना बापसा के वश की बात नहीं थी। विरोध करने वालो में तमिल विद्यार्थी और दुसरे वामपंथी छात्रो की संख्या ज्यादा थी।  नारे लगाने में सवर्ण वामपंथी छात्र भी थे, जो यूनाइटेड ओबीसी फोरम मुर्दावाद के भी नारे लगा रहें थे। माहौल कुछ इस तरह से बनाया गया मानो ओबीसी विद्यार्थी अनुसूचित जाति के विद्यार्थियों के खिलाफ हों और इसलिए अनुसूचित जाति के विद्यार्थियों ने भी ओबीसी विद्यार्थियों के खिलाफ अपना बिगुल फुक दिया है। बापसा के पर्चे और पोस्टर से ऐसा लगा मानो उनकी सारी लड़ाई ओबीसी से है। यह ध्यान रहे बापसा कोई जाति विशेष का संगठन न होकर जेएनयू में एक राजनीतिक विद्यार्थी संगठन है, और इस वर्ष जेएनयू स्टूडेंट्स यूनियन का चुनाव भी लड़ रहा है। उसके नाम में ही बिरसा, फुले और आंबेडकर है जो क्रमशः आदिवासी, अन्य पिछड़ा वर्ग और अनुसिचित जाति का प्रतिनिधित्व करता है।

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सेमिनार में उपस्थित श्रोता

सेमिनार में सबसे पहले अपनी बात रखने का मौका हरीश वानखड़े को मिला, जिन्होंने अपनी बात, तमिल विद्यार्थियों और बापसा द्वारा अंबुमणि रामदास के विरोध कर रहे विद्यार्थियों के समर्थन से किया। उन्होंने कहा कि “उनकी पार्टी ने तमिलनाडु में दलितों के खिलाफ कई कार्य किये हैं, हम उसकी निंदा करतें हैं, और बहार विरोध कर रहे विद्यार्थियों का समर्थन करतें हैं”। शरद यादव ने भारतीय जाति प्रथा के कुप्रभाव पर प्रकाश डाला। मुझे लगता है कि उनका भाषण विरोध कर रहें छात्रो को संबोधित था। अगर विरोध-प्रदर्शन न हो रहा होता तो शायद उनका भाषण कुछ और होता। इसके बाद अंबुमणि रामदोस ने अपनी बात रखी। उन्होंने ने भी सेमिनार के विषय पर न बोलकर अपने खिलाफ हो रहे प्रदर्शन के जबाब में भाषण दिया। उन्होंने कहा कि उनकी पार्टी से जो पहला मंत्री बना था, वह अनुसूचित जाति का था। उन्होंने एम्स (AIIMS) और अन्य मेडिकल कॉलेजो में अनुसूचित जातियों पर हो रहे अत्याचारों का मुद्दा उठाया और उसका समाधान किया। इसके लिए उन्होंने थोराट कमिटी बनाई थी। उन्होंने अनुसूचित जातियों को एम्स में स्नातकोत्तर स्तर पर आरक्षण दिलाया आदि। सबसे अंत में पी. एस.  कृष्णन ने आरक्षण किन परिस्थितियों और दिक्कतों से मिला इसपर प्रकाश डाला।

सेमिनार के बाद, जेएनयू परिसर में यह सन्देश चला गया था कि विभिन्न पिछड़े वर्गों में जो एकता बन रही थी वह टूटा है। शाम होते-होते तरह-तरह की अफवाहें भी फ़ैलने लगीं कि अंबुमणि रामदोस के साथ धक्का-मुक्की हुई और यहाँ तक कि उनके शर्ट भी फाडे गए। धीरे-धीरे सबको यह एहसास होने लगा कि परिसर में बन रही एकता तोड़ने में सवर्ण/ द्विज वामपंथियों का हाथ है। वही लोग बढ़-चढ़ कर हिस्सा ले रहे थें। इसका सीधा सा कारण यह भी था कि बापसा चुनाव की तैयारी कर रहा था- उसे “यूनाइटेड दलित स्टूडेंट्स फोरम” का समर्थन पहले से ही प्राप्त था और “यूनाइटेड ओबीसी फोरम” भी उसे समर्थन दे रही था। यही कारण है कि संबंधित नेतृत्व ने इसे समझा और इसकी क्षतिपूर्ति की।  दो दिन बाद बापसा ने अपने कार्यक्रम में जनता दल यूनाइटेड से राज्य सभा सदस्य माननीय अली अनवर को बुलाया जो पिछड़ी जाति से हैं।  इस कार्यक्रम में यूनाइटेड ओबीसी फोरम के सदस्य भी शामिल हुये थे।

वहीं दूसरी ओर यूनाइटेड ओबीसी फोरम ने 28 अगस्त 2016 को अपने पर्चे में बापसा को याद दिलाया कि उसने कब किसके साथ गठबंधन किया और किस-किस को अपने मंच पर जगह दी थी। लेकिन इस पर्चे में मुख्य निशाना सवर्ण/द्विज वामपंथी छात्र और उनके संगठन ही थे जो चुनावी फायदे के लिए अंबुमणि रामदोस का विरोध कर रहें थें। इसी पर्चे में इन लोगों को याद दिलाया गया कि तमिलनाडु के चुनाव में एआईडीएमके अगुआई वाले गठबंधन में पीएमके के साथ-साथ सीपीआई और सीपीआई (एम) भी सामिल था। इतना ही नहीं जो लोग विरोध कर रहे थे, उनलोगों ने कभी भी भाजपा के सुब्रह्मण्यम स्वामी, रणवीर सेना के अरुण कुमार (सांसद) के जेएनयू आने पर विरोध नहीं किया।  सीपीआई (एमएल) के विद्यार्थी संगठन आईसा ने सिंगुर और नंदीग्राम के दोषियों को अधिकारिक तौर पर माफ़ करके सीपीआई(एम) के एसएफआई के साथ जेएनयू में चुनाव लड़ रही है।

लेकिन विरोधियों को यह भी मालूम है कि उत्तर भारत में अनुसूचित जातियों और पिछड़ों के बीच एक राजनीतिक-वैचारिक सहमति है। यही कारण है कि जब वामपंथ पूरे देश में गुजरात के तत्कालीन मुख्यमंत्री माननीय नरेन्द्र दामोदरदास मोदी का विरोध कर रहा था तब भी उसने जेएनयू में शरद यादव का विरोध नहीं किया। शरद यादव उस समय भाजपा नेतृत्व वाले एनडीए के संयोजक थे। बिहार में नरसंहारो के आरोपी, रणवीर सेना प्रमुख ब्रह्मेश्वर सिंह को जब 8 जुलाई 2011 को देश की अदालात ने रिहा किया था, तब 9 जुलाई 2011 को जेएनयू के गंगा ढाबा पर उसका पुतला दहन किया गया था। यह एक तथ्य है कि रणवीर सेना ने सभी नरसंहार सामाजिक न्याय के दावा ठोकने वाले लालू प्रसाद यादव के मुख्यमंत्रीत्व काल में किया और नीतीश कुमार के मुख्यमंत्रीत्व काल में वह बरी हो गया। सवर्ण/द्विज वामपंथी इस स्वर्णिम अवसर का उपयोग यह कहने में किया था कि बिहार के जातीय और पिछड़ी राजनीति से अनुसूचित जातियों को क्या मिला? उस समय इसका जबाब यह कह कर दिया गया था कि देश की अदालतें क्या कर रहीं थी? अदालतों में जज कौन है? उस सभा को मैंने भी संबोधित किया था।  2015 से लालू-नितीश दोनों साथ हैं।

फिर भी, एक अहम सवाल किसी के भी मन में उठ सकता है कि अंबुमणि रामदास का विरोध जेएनयू तक आने का बैकग्राउंड क्या है? हर चीज को किसी की साजिश मानकर नहीं चलना चाहिए। कई बार हम किसी घटना को किसी और की साजिश कहकर अनावश्यक रूप से किसी को बचा रहे होते हैं  ऐसा करके अंततः हम अपना ही नुकसान कर रहें होतें हैं। इसलिए हमें हर अहम दृष्टिकोणों पर भी ध्यान देना चाहिए।  इसलिए इसकी पड़ताल जरुरी है।

पीएमके और उसके नेता, जिसमें अंबुमणि रामदास भी शामिल हैं पर अनुसूचित जातियों के खिलाफ बोलने और हिंसा करने का आरोप तमिलनाडु के ही राजनीतिक पार्टी वीसीके ने लगाया था। वीसीके को तमिल में विधुतालसी चिरुथैगल कात्ची और अंग्रेजी में लिबरेशन पैंथर पार्टी कहेंगे। इसका इतिहास, विचार और कार्य-कलाप पढ़ने से पता चला कि हम इसकी तुलना महाराष्ट्र के “दलित पैंथर पार्टी” या उत्तर प्रदेश के “बहुजन समाज पार्टी” से कर सकतें हैं। नियमतः कोई भी राजनीतिक दल किसी विशेष जाति या जातीय समूह का होने का दावा नहीं कर सकती है, लेकिन हर राजनीतिक पार्टी में कोई/कुछ जाति/जातियां वर्चस्व में होती हैं और इसकारण उस राजनीतिक दल को उसका ही पार्टी माना जाता है।  तमिलनाडु में पीएमके को पिछड़ों,  अर्थात ओबीसी और वीसीके को अनुसूचित जातियों की पार्टी मानी जाती है।  पीएमके के नेता अंबुमणि रामदास ने ‘द हिन्दू’ ग्रुप के ‘द हिन्दू सेंटर’ को 28 मई 2013 को दिए साक्षात्कार में कहा कि “हम दलितों या अंतरजातीय विवाह के खिलाफ नहीं है। लेकिन अगर हम वीसीके के खिलाफ कुछ कहतें हैं तो उसे दलितों के खिलाफ मान लिया जाता है। हम अंतरजातीय विवाह के खिलाफ नहीं है। अंतरजातीय विवाह कोई जरुरी नहीं है कि वह दलितों और ऊँची जातियों के बीच हो। लेकिन कुछ अंतरजातीय विवाहों के बाद लडके वाले लड़की के घरवालो की हैसियत के हिसाब से लड़की वापस पाने के लिए पैसा वसूलते हैं, हम उसके खिलाफ हैं।” इसी साक्षात्कार में उन्होंने यह भी कहा कि “एससी/एसटी अत्याचार निरोधी कानून” में कुछ बदलावो के लिए हमारा संषर्ष जारी रहेगा और तमिलनाडु में हमारी पार्टी एकमात्र है जो इसतरह की मांग कर रही है।“ ‘टाइम्स ऑफ़ इंडिया’ को 15 मार्च 2016 को दिए गए अपने वक्तव्य में भी अंबुमणि रामदोस ने कहा था कि वे अंतरजातीय विवाहों के खिलाफ नहीं है।

जहाँ तक अंतरजातीय विवाह और अनुसूचित जातियों पर हो रहे अत्याचारों का सवाल है, नैतिकता और व्यवहारिकता दोनों का तकाजा है कि अंतरजातीय विवाह का समर्थन और अनुसूचित जातियों पर हो रहे अत्याचारों का विरोध किया जाए। साथ ही किसी को भी इसलिए माफ़ नहीं किया जा सकता है कि उसने कोई और भी अच्छे काम किये हैं। लेकिन जैसा कि अंबुमणि रामदास ने अपने भाषण में अनुसूचित जातियों के हितों में अपने और अपनी पार्टी के काम गिनाएं उससे यह यकीन करना मुश्किल है कि उन्होंने अनुसूचित जातियों के खिलाफ नफ़रत फैलाया होगा।

व्यवहारिक स्तर पर इटालियन चिंतक निक्कोलो मैकियावेली (1469-1527) का यह कहना कि “राजनीति का नैतिकता से कोई संबंध नहीं है” स्वीकार नहीं किया जा सकता है। इसलिए यूनाइटेड ओबीसी फोरम ने अनुसूचित जातियों के हित में अपनी नैतिकता दिखाते हुए, अपने 28 अगस्त 2016 के पर्चे में अंबुमणि रामदास और उनके पार्टी के कथित दलित विरोधी बयानों और कृत्यों की आलोचना की है, लेकिन साथ ही सामाजिक न्याय के लिए उनके योगदानों को भी रेखांकित भी किया गया है।

हालाँकि मैंने यह भी जाना कि दोनों पक्षों में अपनी-अपनी राजनीति के अनुरूप आपसी सहमति थी, लेकिन बाद में सवर्ण/द्विज वामपंथियों के आने से स्थिति दोनों के हाथ से निकल गई। बाद में उसकी क्षति-पूर्ति की गई, जिसमें वामपंथ का ही पर्दाफाश हुआ। यह गौर करने वाली बात है कि तमिल विद्यार्थियों और बापसा के नेतृव में हो रहे विरोध प्रदर्शन का विरोध न तो किसी पिछड़े या ओबीसी विद्यार्थी ने किया न हीं आयोजकों की तरफ से उनके खिलाफ कोई अपील की गई। बल्कि अंबुमणि रामदोस के विरोध में कई पिछड़े या ओबीसी छात्र भी थे। यहाँ यह भी बताना आवश्यक है कि जेएनयू के पिछडो ने अनुसूचित जातियों को “अपने कार्यक्रम” स्थल पर विरोध का अवसर दिया और उसका प्रतिकार नहीं किया।

जेएनयू में किसी पिछड़े या अनुसूचित जाति/जनजाति के नेता/नेतृ का भी इसप्रकार से विरोध नहीं देखा गया है। एक तर्क यह भी दिया जा सकता है कि भाजपा शासित गुजरात के उना में जुलाई में अनुसूचित जातियों पर हुए अत्याचार और जुलाई में ही भाजपा शासित महाराष्ट्र में डॉ. आंबेडकर के बनाए प्रेस पर बुलडोजर चलाने के प्रयास से उपजे आक्रोश में डॉ. अंबुमणि रामदास आ गये होंगें। इसके साथ ही इससे कोई इंकार नहीं कर सकता कि तमिलनाडु में अनुसूचित जातियों पर जातीय अत्याचार हुए हैं।  इसका कारण और कर्ता चाहे कोई भी हो, लेकिन अत्याचार तो हुआ है। फिर भी जेएनयू के छात्र इतने अपरिपक्व भी नहीं ही कि एक विरोध प्रदर्शन को अनुसूचित जाति बनाम पिछड़ा बना दें, जैसा कि बनाने की पुरजोर कोशिश हुई, जिसे असफल कर दिया गया।

इसलिए मेरा मानना है कि सवर्ण वामपंथी विद्यार्थियों ने अपने चुनावी फायदे के लिए नहीं बल्कि शोषित-वंचित-पिछड़े वर्गों के बीच बन रही एकता को तोड़ने के लिए इस अवसर के रूप में उन्होंने अंबुमणि रामदास को चुना। मुझे याद है 2011 में जब अंबुमणि रामदास आये थे तब आज विरोध कर रहे संगठन और विद्यार्थियों  ने उनका कोई विरोध नहीं किया था बल्कि कार्यक्रम में हिस्सा लिया था। लेकिन तब उन्हें मालूम नहीं था कि एक छोटा सा आन्दोलन शोषित-वंचित-पिछड़े वर्गों के बीच इतना तेजी से फ़ैल जाएगा। हालाँकि मुख्य आरोप तमिलनाडु में 2013 में हुए घटनाओं का है, लेकिन आरोप उनके पिता और पार्टी पर भी था, जो एकाएक नहीं बदल जाता। मैंने अपना लेख हेरोल्ड लास्वेल के कथन से शुरू किया था। अंत भी उन्हीं के कथन से किया जा सकता है। अगर हमें सवर्ण/द्विज वामपंथियों के इस चाल को समझना है तो हेरोल्ड लास्वेल के राजनीतिक संचार मॉडल को समझाना होगा। उनका संचार मॉडल “कौन, किससे, किस माध्यम से, किस प्रभाव से” कह रहा है पर केन्द्रित है, हमें इसे समझना होगा।

तमिलनाडु में जातीय तनाव, प्रेम और अंतरजातीय विवाह के साथ-साथ पीएमके और वीसीके की राजनीति और अंबुमणि रामदास का संबंधित इंटरव्यू यहाँ देखा जा सकता है.

  1. “‘It’s social engineering, not caste politics’, asserts Anbumani Ramadoss” in, The Hindu Centre, 28 May 2013
  2.  “Dharmpuri Inter-Caste Marriage: Dalit Youth Ilavarasan Found Dead” in The Hindu, 4 July 2013
  3.  “PMK not against inter-caste marriage: S. Ramadoss” in The Times of India, 15 March 2016
  4.  “Jeans, ‘Love Drama’ and the Electoral Spoils of Tamil Nadu’s Hidden Caste Wars” in The Wire, 6 May 2016

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