त्रिवेणी संघ : संगठन की ताकत का पहला एहसास

आजादी के पूर्व पिछड़ी जातियों के महत्वपूर्ण संगठन त्रिवेणी संघ के इतिहास, खूबियों, खामियों का जायजा ले रहे हैं ओमप्रकाश कश्यप

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सरदार जगदेव सिंह

बुद्धिजीवियों और लेखकों ने 20 वीं शताब्दी के दो बड़े आंदोलनों की भारी उपेक्षा की है। यदि उन्हें समर्थन मिलता तो बात दूसरी होती। कदाचित वे समस्याएं न देखनी पड़तीं, जिनसे हम आज गुजर रहे हैं। उनमें पहले का नाम है—‘त्रिवेणी संघ’।दूसरा ‘अर्जक संघ’। दोनों ही संगठन सामाजिक न्याय की भावना से अनुप्रेत थे। ‘त्रिवेणी संघ’ का गठन शाहाबाद, बिहार तथा ‘अर्जक संघ’ का गठन इलाहाबाद, उत्तरप्रदेश में हुआ था। दोनों का उद्देश्य था, दबी-पिछड़ी जातियों में आत्मसम्मान का भाव जाग्रत करना। उन्हें तथाकथित उच्च जाति के भू-सामंतों, जमींदारों, धर्म के नाम पर ठगी करने वाले पंडा-पुरोहितों से बचाना। ‘त्रिवेणी संघ’ पिछड़ी जातियों को राजनीतिक स्तर पर गोलबंद कर कांग्रेस के वर्चस्व को तोड़ना चाहता था, जो उन दिनों मुख्यतः सर्वर्णों का संगठन था। ‘अर्जक संघ’ का उद्देश्य तंत्र-मंत्र, जादू-टोने, पूजा-पाखंड में धंसे समाज में मानवतावादी, राष्ट्रीयतावादी एवं वैज्ञानिक सोच का विकास करना था।

विचार और  गठन की प्रक्रिया

‘त्रिवेणी संघ’ का विचार सबसे पहले सरदार जगदेव सिंह के मन में उपजा था। उसे आगे बढ़ाने के लिए उन्होंने कई नेताओं से बात की। उस समय तक बिहार में सामाजिक न्याय की मांग उठने लगी थी। लेकिन बराबरी और समानता की बात करना भू-सामंतों और पुरोहितों की निगाह में पाप था। पिछड़ी जातियां मान चुकी थीं कि सवर्ण वर्चस्व के विरुद्ध लड़ाई केवल संगठन के बल पर लड़ी जा सकती है। यदुनंदनप्रसाद मेहता और शिवपूजन सिंह ‘जनेऊ आंदोलन’ सहित अनेक समतावादी आंदोलनों में शिरकत कर चुके थे। उनका लोगों पर प्रभाव था। इसलिए सरदार जगदेव सिंह द्वारा संगठन के प्रस्ताव पर दोनों ने अपनी तत्क्षण सहमति दे दी। गंगा, यमुना, सरस्वती की त्रिवेणी के आधार पर उसे नाम दिया गया—‘त्रिवेणी संघ।’ उसके लिए आदर्श वाक्य चुना गया—‘संघे शक्ति कलयुगे।’ इस तरह 30 मई 1933 को बिहार के शाहाबाद जिले की तीन प्रमुख पिछड़ी जातियों यादव, कोयरी और कुर्मी के नेताओं क्रमशः सरदार जगदेव सिंह, यदुनंदन प्रसाद मेहता और शिवपूजन सिंह ने ‘त्रिवेणी संघ’ की नींव रखी। कुछ इतिहासकार उसका गठन 1920 से मानते हैं।

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शिवपूजन सिंह

आगे की लड़ाई और भी चुनौतियों से भरी थी। ‘त्रिवेणी संघ’ के गठन से पहले तीनों नेता कांग्रेस में सक्रिय थे। उस समय कांग्रेस भारत की समस्त जनता की प्रतिनिधि होने का दावा करती थी, परंतु प्रांत-भर में लगभग सभी राजनीतिक पदों पर सवर्णों का कब्जा था। पिछड़ों को राजनीति से दूर रखने के लिए उन्हें तरह-तरह से हतोत्साहित किया जाता था। उनके लिए चुनावों में हिस्सा लेना आसान भी नहीं था। पूरा समाज सामंतवाद और कुलीनतावाद की जकड़ में था। जिला बोर्ड का चुनाव वही लड़ सकता था जो न्यूनतम 64 रुपये सालाना मालगुजारी का भुगतान करता हो। जबकि बिहार की कुल आबादी के मात्र 0.06 प्रतिशत लोगों की आमदनी ही कर-योग्य थी। इस तरह ब्राह्मण, बनिया, ठाकुर और कायस्थ का आर्थिक साम्राज्यवाद, राजनीतिक साम्राज्यवाद का पूरक और परिवर्धक बना हुआ था। पिछड़ी जाति के नेता कांग्रेस के पास टिकट मांगने जाते तो उनकी खिल्ली उड़ाई जाती थी।

पृष्ठभूमि

‘त्रिवेणी संघ’ के गठन में हालांकि तीन प्रमुख पिछड़ी जातियों का हाथ था, मगर योजना सभी पिछड़ी जातियों को साथ लेकर चलने की थी। दबंग जातियों द्वारा गरीब दलित और पिछड़ी जाति की महिलाओं का यौन शोषण उन दिनों सामान्य बात थी। त्रिवेणी संघ ने बेगार और महिलाओं के यौन शोषण के विरुद्ध आवाज उठाई। 1937 में विधान सभा चुनावों से पहले टिकट की कामना के साथ संघ के प्रतिनिधि कांग्रेसी नेताओं से मिले। कुछ दिनों बाद उन्होंने डा. राजेंद्र प्रसाद से भी संपर्क किया। सभी ने उन्हें टिकट का आश्वासन दिया। लेकिन हुआ वह जो पहले से तय था, ‘कांग्रेस ने एक न सुनी और सब उम्मीदवार उच्च जातियों के रखे गए.’ (त्रिसबि) कांग्रेसी नेताओं की चालाकी का खुलासा यदुनंदनप्रसाद मेहता ने अपनी पुस्तिका ‘त्रिवेणी संघ का बिगुल’ में किया है—‘पहले ऐलान किया गया कि योग्य व्यक्तियों को लिया जाएगा। जब इन बेचारों ने योग्य व्यक्तियों को ढूंढना शुरू किया तो कहा गया कि खद्दरधारी होना चाहिए। जब खद्दरधारी सामने लाए गए तो कहा गया कि जेल यात्रा कर चुका हो। जब ऐसे भी आने लगे तो कहा गया कि वहां क्या साग-भंटा बोना है….किसी को कहा जाता कि वहां क्या भैंस दुहनी हैं? तो किसी को व्यंग्य मारा जाता कि वहां क्या भेड़ें चरानी हैं?….किसी को यह कहकर फटकार दिया जाता कि वहां क्या नमक-तेल तौलना है!’(त्रिसबि) निराश होकर त्रिवेणी संघ ने अपने प्रतिनिधि खड़े करने का निश्चय किया। किंतु संसाधनों और अनुभव की कमी तथा अपने ही लोगों की कांग्रेसी नेताओं के साथ मिली-भगत के उसके प्रतिनिधि चुनावों में अपेक्षित सफलता अर्जित न कर सके।

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यदुनंदनप्रसाद मेहता

‘त्रिवेणी संघ’ के नेता परंपरागत धर्म के विरोध में नहीं थे। तथापि उसकी आचारसंहिता पर सोवियत क्रांति के प्रभाव को नकारा नहीं जा सकता। संघ मानता था कि उसकी असली लड़ाई साम्राज्यवाद से है और उसका लक्ष्य है साम्यवाद—‘त्रिवेणी संघ’ चाहता है, धार्मिक, सामाजिक, राजनीतिक तथा आर्थिक साम्राज्यवादों का अंत तथा उनके स्थान पर धार्मिक, सामाजिक, राजनीतिक और आर्थिक साम्यवाद का प्रचार, औद्योगिक क्रांति, जिससे सभी फलफूल सकें’(त्रिसबि)। धार्मिक साम्यवाद से उनका आशय था, धर्म के नाम पर चल रहे सर्वाधिकारवाद और आडंबरों का विरोध। संघ का विश्वास था कि—‘धर्म के ठेकेदार अपनी तोंद फुलाने के लिए धर्म-अधर्म, पाप-पुण्य, नरक-स्वर्ग तथा मोक्ष आदि के अड़ंगे लगा-लगा, जनता को कूपमंडूक बना-बना उसकी आंखों में धूल झोंक दिन-दोपहर लूट रहे हैं.’ (त्रिसबि)

त्रिवेणी संघ की स्थापना के मूल में जातीय चेतना थी। उसके सिद्धांतकारों का मानना था जातिगत भेदभाव से मुक्ति ही सामाजिक साम्राज्यवाद से मुक्ति है। सिद्धांततः संघ के नेता जातीय समानता और समरसता के समर्थक थे, ‘जन्म से कोई ऊंच है न नीच। लोग अपने-अपने कर्तव्य से ऊंच-नीच हुआ करते हैं.’(त्रिसबि) जाति असमानताकारी व्यवस्था है। यह कुछ लोगों को अत्यधिक अधिकार संपन्न करती है, तो समाज के बड़े हिस्से के निर्णय-सामर्थ्य का हनन कर उसे प्रभुता संपन्न जातियों का दास बना देती है। इतिहास साक्षी है कि जातीय भेदभाव ने भारतीय समाज को हमेशा पीछे की ओर ढकेला है—”ऊंच-नीच और छूत-अछूत की भेद-भावना ने बड़े-बड़े महात्माओं को भी नहीं छोड़ा है। यही कारण है कि हमारे देश में एकता नहीं हो पाती…..त्रिवेणी संघ ऐसे अन्यायों को मिटा देना चाहता है। और इस अछूत शब्द को दुनिया से विदा कर देना चाहता है’(त्रिसबि) यह त्रिवेणी संघ का प्रभाव ही था जो कांग्रेस को पिछड़ी जातियों को लुभाने के लिए 1937 में अपने भीतर ‘बैकवर्ड कास्ट फेडरेशन’ स्थापना करनी पड़ी थी।

triveni-sangh-ka-bigulइसके बावजूद त्रिवेणी संघ का प्रयोग ज्यादा दिन न चल सका। 1937 के चुनावों की असफलता के पश्चात नेताओं का उत्साह मद्धिम पड़ने लगा। उसके कई कारण थे। पहला यह कि संघ के कुछ नेताओं के कांग्रेसी नेताओं से गहरे संबंध थे। कांग्रेस ने ‘पिछड़ा जाति संघ’ का गठन किया तो उसके कई कद्दावर नेता उसकी शरण में चले गए। दूसरी और महत्त्वपूर्ण बात यह कि साम्राज्यवाद से लड़ाई के लिए संघ के नेता लोकतंत्र को हथियार बनाना चाहते थे। परंतु लोकतंत्र की मूल भावना से तालमेल बनाए रखने का उन्हें अभ्यास न था। लंबे समय तक सामंतवादी संस्कारों तथा जातिवादी परिवेश में जीने के कारण उनका स्वभाव उसी के अनुकूल ढल चुका था। आपसी संवाद द्वारा विरोधों का समाहार करने, असहमतियों के बीच से सामान्य सहमति की राह निकालने की कला से वे अनभिज्ञ थे। एक उदाहरण इसे समझने के लिए पर्याप्त है। चुनावों में त्रिवेणी संघ के उम्मीदवारों की भारी संख्या में पराजय के बाद एक पत्रकार प्रतिक्रिया जानने के लिए उसके यादव नेता से मिला। वह चारपाई पर बैठा हुक्का गुड़गुड़ा रहा था। लाठी बराबर में रखी थी। उस समय बजाय हार के कारणों की समीक्षा करने के नेता ने लाठी पर नजर टिकाते हुए कहा था—‘चुनाव हार गए तो क्या हुआ। हमारी लाठी तो हमारे पास है

त्रिवेणी संघ के पराभव का चौथा और महत्त्वपूर्ण कारण यह था कि संघ के गठन से पहले यादव, कुर्मी और कोयरी जातियों के अपने-अपने महासंघ थे। सब अपनी-अपनी ऐंठ में रहते थे। यादव कृष्ण का वंशज होने का दावा करते थे तो कुर्मियों का मानना था कि वे राम के वंशज क्षत्रिय हैं। जातीय क्षत्रपों का निजी अहंकार अंततः ‘त्रिवेणी संघ’ को भारी पड़ा। उसकी एकता बिखरने लगी। हालांकि ‘अखिल भारतीय कुर्मी क्षत्रिय सभा’ के तीसवें सत्र में कुछ नेताओं ने सभा से ‘क्षत्रिय’ शब्द हटाकर कोयरियों के साथ जातीय गठबंधन को मजबूत करने की बात उठाई थी। मगर तब तक बहुत देर हो चुकी थी। संघ अपनी चमक खो चुका था। आज की बहुजन राजनीति त्रिवेणी संघ के उस बिखराब से सबक ले सकती है।

संदर्भ:

(त्रिसबि: त्रिवेणी संघ का बिगुल, स्रोत—भारत में सामाजिक परिवर्तन के कुछ आयाम, लेखक प्रसन्न कुमार  चौधरी/श्रीकांत)


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