ओणम 2016: वर्चस्ववादियों का केरल में पैर ज़माने का प्रयास

इस बहुजन त्यौहार को लेकर हो रही खींचतान से ज़ाहिर है कि ब्राह्मणवाद के खिलाफ लडाई और अधिक जटिल और अनिश्चित हो गयी है क्योंकि ब्राह्मणवाद, बाज़ार का इस्तेमाल कर ऐसे ढांचों का निर्माण करने में सिद्धहस्त है, जिन्हें ध्वस्त करना मुश्किल होता है

mahabaliमलयालम माह चिंगम (अगस्त-सितम्बर) की पूर्वसंध्या पर हर वर्ष असुर सम्राट महाबली केरल की यात्रा पर आते हैं और उनके स्वागत में एक बड़ा सांस्कृतिक पर्व मनाया जाता है। जब तक सम्राट को अगले वर्ष तक के लिए विदा नहीं कर दिया जाता, तब तक वे जनता की सरकार द्वारा आयोजित ग्रैंड केरला शौपिंग फेस्टिवल (जीकेएसएफ) के मुख्य प्रायोजक होते है। सिर पर तना ताड़ के पत्तों का छत्र, ऊपर की ओर मुड़ी हुई मोटी-मोटी मूछें, तोंद को दो भागों में विभाजित करता जनेऊ और मुकुटधारी महाबली के साथ सेल्फी लेने को आतुर लोग। महाबली की यह छवि वर्चस्ववादी जातियों के हितों का संरक्षण तो करती ही है, वह सभी प्रकार के ग्राहकों को जितना आकर्षित कर सकती है, उतना जीरो कमर वाली एक दर्जन माडलों के लिए भी संभव नहीं हैं। मेरे विचार में, देश में कम ही ऐसे त्यौहार होंगें, जिनका चरित्र इतना धर्मनिरपेक्ष होगा, जितना कि ओणम का है। देश-विदेश में फैले मलयालियों के लिए ओणम उनकी पहचान और गर्व का उत्सव है।

 ओणम अन्य लोकप्रिय भारतीय त्योहारों से इस मायने में अलग है कि इसके पीछे कोई पौराणिक कथा नहीं है और इसलिए यह सभी सामाजिक और धार्मिक समूहों का ऐसा भविष्यदृष्टा पर्व बन गया है, जिसका लक्ष्य समतावादी समाज का निर्माण है। अन्य त्योहारों की तरह, ब्राह्मणवादियों ने इस पर कब्ज़ा ज़माने की पूरी कोशिश की परन्तु इस त्यौहार को वामन-महाबली के मिथक से जोड़ने के वर्चस्ववादियों के प्रयास पर आम लोगों और राज्य सरकार, दोनों ने तीखी प्रतिक्रिया ज़ाहिर की। इस त्यौहार के ‘सन्दर्भों’ और इस पर कब्ज़ा ज़माने के प्रयासों पर बहस, भाजपा अध्यक्ष अमित शाह के एक ट्वीट से हुई। इस ट्वीट में शाह ने देश को ‘वामन जयंती’ की बधाई दी और इससे उनका क्या अर्थ है, यह और स्पष्ट करने के लिए साथ में महाबली को पाताल लोक में धकेलते हुए विष्णु के पांचवें अवतार वामन का चित्र भी जोड़ दिया। केरल के मुख्यमंत्री ने अपनी त्वरित प्रतिक्रिया में ओणम को इस रूप में चित्रण को “केरल, केरलवासियों और केरल की संस्कृति” का अपमान बताया। एक दिन बाद जारी अपने बयान में मुख्यमंत्री ने कहा, “वामन एक मिथक है। ओणम एक स्वप्न है – समतावादी और उज्जवल भविष्य का स्वप्न”। एलडीएफ सरकार की इस ‘ईशनिंदा’ ने हिन्दू सभ्यता के रक्षक संघ परिवार को बेहद रुष्ट कर दिया।

amit-shah-onam-tweet ओणम पर दावों और उसके सन्दर्भों पर बहस की शुरुआत, आरएसएस के मलयालम मुखपत्र ‘केसरी’ के ओणम विशेषांक के प्रकाशन से शुरू हुई। ‘केसरी’ साप्ताहिक के मुख्य संपादक एनआर मधु के अनुसार, विशेषांक का प्रकाशन इसलिए किया गया ताकि हिन्दू समुदाय को ओणम के पीछे की ‘असली’ कथा से परिचित करवाया जा सके और वामपंथी बुद्धिजीवियों द्वारा “साहित्य, राजनीतिक इतिहास और धर्म का विरूपण” रोका जा सके। उन्होंने वामन के ‘खलनायिकीकरण’ की कड़ी निंदा की। उनका कहना था इस विरूपण का मुकाबला करने के लिए संघी बुद्धिजीवियों को आगे आना होगा”। प्रोफेसर उन्नीकृष्णन नम्बूदरी को यह ज़िम्मेदारी दी गयी। उन्होंने फ़रमाया, “इस त्यौहार को मूलतः वामन जयंती के रूप में मनाया जाता था। वामन ने महाबली को नरक नहीं भेजा था। उन्होंने तो उसे सम्मानपूर्वक ऐसे स्थान पर प्रतिष्ठित किया था, जो स्वर्ग से भी बेहतर था”। उन्होंने यह भी कहा कि महाबली ने कभी केरल पर शासन नहीं किया- बल्कि उनके समय में तो केरल था ही नहीं (शायद उन्नीकृष्णन महाशय यह मानते हैं कि मिथकों में वर्णित घटनाएं सचमुच घटी थीं!)। उन्होंने यह भी कहा कि विष्णु के छठे अवतार परशुराम ने केरल की भूमि को समुद्र से छीना और ब्राह्मणों को सौंपा”। अतः, महाबली का मिथक गलत है। वाह, क्या शानदार तर्क है!

 ओणम शायद एकमात्र ऐसा हिन्दू त्यौहार है, जो एक सबाल्टर्न शख्सियत की याद में मनाया जाता है – एक ऐसे शक्तिशाली राजा की याद में जो आदर्श सामाजिक व्यवस्था का हामी था। केरल में लोकप्रिय गीत जैसे “मावेली नाडू वानिदुम कालम/ मानुषर एल्लारुम ओंनु पोले (जब इस धरती पर मवेळी का राज था, तब सभी मनुष्य बराबर थे) और महाराष्ट्र में गाया जाने वाला गीत “इडा पिडा जावो, बालिका राज्य येवो” (दुःख और कष्ट जायें, बली का राज आये) हिन्दू धर्म के मिथक की जड़ों पर प्रहार करते हैं।

इस तरह, मिथक से विलग कर इस त्यौहार को देखने से लोगों की सोच बदलती है और यह साबित होता है कि केरल कभी एक जतिमुक्त और समतामूलक समाज था। अजय एस. शेखर के अनुसार, “यह सोच आधुनिक सबाल्टर्न परिप्रेक्ष्य के अनुरूप है और यह परिप्रेक्ष्य, शैक्षणिक संस्थानों में दलित-बहुजन विद्यार्थियों की दिन-ब-दिन बढ़ती संख्या के साथ मजबूत होता जा रहा है। इस मिथक पर प्रश्न उठाना, संघ परिवार तो बिलकुल पसंद नहीं आ रहा है”।

onam-mahabaliपत्रकार मीनू इत्तियिपे कहते हैं कि यह आख्यान “हिन्दुओं के उच्चतम देव विष्णु के एक अवतार वामन को खलनायक बनता है”। किसी भी अन्य संघी की तरह, एनआर मधु, वामन के खलनायिकीकारण से नाराज़ हैं। उनका कहना है कि “जेएनयू में जब महिषासुर उत्सव मनाया गया होगा, तब भी तो यही हुआ होगा”। मिथक का यह सबाल्टर्न पुनर्पाठ और एक असुर राजा का महिमामंडन, उन चरित्रों को संदेह के घेरे में लाता है, जो सांस्कृतिक वर्चस्ववादियों के पसंदीदा चरित्र हैं। जो लोग आज की राजनीति को समझते हैं, उन्हें यह स्पष्ट होगा कि जवाहरलाल नेहरु विश्वविद्यालय और हैदराबाद केन्द्रीय विश्वविद्यालय पर पुलिसिया कार्यवाही का सम्बन्ध, दलित-बहुजनों की तेज होती आवाज़ और मिथकीय देवी-देवताओं के खलनायिकीकरण से अधिक था, ‘देशद्रोही’ विद्यार्थियों से कम।[1]

महाबली के लोकप्रिय मिथक के अतिरिक्त, ओणम से जुड़ी अन्य लोककथाएं भी हैं।[2] इस पर्व से जुड़े आख्यान चाहे जो भी हों, पदालित वर्ग, ओणम को ब्राह्मणवादी ताकतों द्वारा सबाल्टर्न नायकों को उनसे छीनने का प्रतीक मानते हैं। डीडी कौसम्बी की पुस्तक ‘मिथ एंड रिअलिटी’ यह बताती हैं कि ब्राह्मणवादी जातिगत पदक्रम को चिरस्थायी बनाये रखने के लिए किस तरह मिथक गढ़ते हैं।[3] जगन्नाथ का हिन्दुकरण इसका एक उदाहरण है। जगन्नाथ, मूलतः आदिवासियों के स्थानीय अराध्य  थे। जिस प्रकार से उन्हें पूरे ओडिशा का नायक बना कर पेश किया जा रहा है, बताता है कि वर्चस्ववादी ताकतें कैसे अपनी सदियों पुरानी सामाजिक व्यवस्था को बनाये रखती हैं। गौतम को बुद्ध बनाकर उन्हें विष्णु का अवतार घोषित कर दिया गया और बौद्ध धर्म को भारत से बाहर खदेड़ दिया गया। यह ब्राह्मणवादी धूर्तता और विश्वाघात की इंतिहा थी।

वर्णाश्रम व्यवस्था के विरुद्ध संघर्ष बहुत पुराना है परन्तु इस एकसार संस्कृति के खिलाफ लडाई और अधिक जटिल और अनिश्चित हो गयी है क्योंकि ब्राह्मणवाद, बाज़ार (हमारे अधिकांश त्यौहार उपभोक्तावादी संस्कृति के वाहक बन गए हैं) का इस्तेमाल कर ऐसे ढांचों का निर्माण करने में सिद्धहस्त है, जिन्हें ध्वस्त करना मुश्किल होता है। हमारा सीमित प्रजातंत्र, जिसमें जातिगत वर्चस्व के कई लक्षण आज भी मौजूद हैं, इस प्रक्रिया में सहायक है। अब, जब कि दलित-बहुजन परिप्रेक्ष्य सार्वजनिक मंचों पर जगह पा रहे हैं और ये वर्ग अपने विमर्श शुरू कर रहे हैं, यह ज़रूरी है कि अध्येता फुले और आंबेडकर की दिखाई राह पर गौर करें। अगर हम उनके दिखाए रास्ते पर नहीं चलेंगे तो हम ब्राह्मणवादी जाल को तोड़ने के प्रयास में, खुद ही जाल में फँस जायेंगे।

[1] इस बारे में अधिक जानकारी के लिए देखें “बहुजन विमर्श के कारण जेएनयू निशाने पर ”, फारवर्ड प्रेस, मार्च 2016

[2] उदाहरण के लिए संकरन, नारायणन एम की ‘ओणम फॉर अदिवासीस: सेलिब्रेशन ऑफ़ एक्सक्लूशन, बिट्रेयल एंड एक्सप्लोयटेशन?”, राउंड टेबल इंडिया, 26 अगस्त, 2015; और मायकल जेम्स की “द मर्डर ऑफ़ दलित-बहुजन किंग महाबली एंड द मिथ ऑफ़ ओणम” राउंड टेबल इंडिया, 26 अगस्त, 2012.

[3] सत्चिदानंदन के, “ए यूटोपिया इन डिसटोपियन टाइम”, द हिन्दू, 13 सितम्बर, 2016


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