पेरियार के आदर्श और आज का तमिलनाडु

एस.वी. राजादुरई व वी. गीता, ईमेल द्वारा लिए गए इस साक्षात्कार के पहले भाग में विद्याभूषण रावत को बता रहे हैं कि पेरियार द्वारा आस्था की समालोचना और ब्राह्मणवादी हिन्दुत्व पर उनके हमले में निहित जाति की कड़ी आलोचना को लोगों ने न तो समझा और ना ही उसे आत्मसात किया

पेरियार के विचार आमूल परिवर्तनवादी थे। ब्राह्मणवाद की उनकी समालोचना के कई पहलू थे। वे ब्राह्मणवादियों की श्रम और स्पर्श से घृणा को खारिज करते थे। सी. राजगोपालाचारी (राजाजी), जो उनके अभिन्न मित्र थे, के साथ अपने मतभेदों पर उन्होंने लिखा कि राजाजी अपने मिशन के प्रति हमेशा निष्ठावान रहे और उनका मिशन यह था कि ‘‘वे नहीं चाहते थे कि उनकी जाति के लोग गैंती-फावड़ा उठाएं’’। एक अन्य मौके पर ब्राह्मणवादी बौद्धिकता के लचीलेपन, जो कि उसके चिरस्थायित्व का एक कारक थी, की चर्चा करते हुए उन्होंने कहा कि कुछ ब्राह्मण किसी ‘पंचम’ को अपने घर में ही नहीं घुसने देना चाहते तो कुछ पंचमों को अपने रसोईघरों में भी आने देते हैं; कुछ किसी पंचम को अपने घर के पूजाघर में भी प्रवेश करने देते हैं और कुछ ब्राह्मणों ने तो पंचमों से विवाह करने में भी संकोच नहीं किया। इस तरह, ब्राह्मण हमेशा वही करते थे, जिससे उन्हें अधिकतम लाभ होता था। पेरियार इसके लिए तमिल शब्द ‘‘बलिथावरई’’ का इस्तेमाल करते हैं, जिसका अर्थ है ‘‘जिससे भी काम चल जाए’’। पेरियार का यह तर्क भी था कि ब्राह्मणवाद का मुख्य आधार है वर्णधर्म, जो एक ऐसी सीढ़ी की अवधारणा है जिसके हर पायदान पर कोई न कोई जाति है और हर व्यक्ति के दिमाग में यह पदक्रम बसा हुआ है। हम स्वयं को और अन्यों को इस पदक्रम में उसके स्थान के आधार पर तौलते हैं। परंतु उनके विचारों के जिस पक्ष ने आम लोगों को सबसे अधिक आकर्षित किया वह था ब्राह्मण समुदाय की स्वयं को दूसरों से अलग रखने और जब भी उन्हें चुनौती मिले, अपने स्तर का ‘उन्नयन’ करने की प्रवृत्ति की उनकी आलोचना। ब्राह्मण, रोज़ाना की धार्मिक क्रियाओं, संस्कृति और सामाजिक मूल्यों, सभी पर अपना वर्चस्व कायम रखना चाहते थे। ब्राह्मणवादियों के धार्मिक विशेषाधिकारों की उन्होंने जमकर खिल्ली उड़ाई और हिन्दू धार्मिक शिक्षाओं की बिना किसी लागलपेट के कठोर निंदा की।

पेरियार का तर्क था कि द्रविड़ आस्थाओं और अनुष्ठानों को ब्राह्मणवादी व्याख्याओं और तर्कों द्वारा दूषित कर दिया गया है और इसी आधार पर वे तमिल शैवों के इस दावे का खंडन करते थे कि उनकी आस्था जिस शैव सिद्धांत में है, वह ब्राह्मणवादी हिन्दू धर्म से एकदम अलग है। वे स्थानीय कर्मकांडों और ग्रामीण पंथों को भी खारिज करते थे। ब्राह्मणवादी हिन्दू धर्म की उनकी आलोचना ने एक राजनैतिक आंदोलन की शक्ल अख्तियार कर ली। द्रविड़ शैव, और वे लोग भी, जो स्थानीय धार्मिक विचारों और आस्थाओं से जुड़े हुए थे, ने धर्म के पेरियार के विरोध और उनकी ब्राह्मणों और ब्राह्मणवादियों की आलोचना को अलग करके देखना शुरू कर दिया। उन्होंने पेरियार के धर्म के विरोध को नज़रअंदाज़ किया और केवल ब्राह्मणवाद की उनकी आलोचना को महत्व दिया। यद्यपि यह बात उनके सभी अनुयायियों के बारे में सही नहीं थी और इनमें महिलाएं शामिल थीं। यह महत्वपूर्ण है कि उनके द्वारा स्थापित कई संगठनों के सदस्य अपने दैनिक जीवन में नास्तिक थे और उनमें कई ऐसी साहसी महिलाएं शामिल थीं, जो गर्व से स्वयं को नास्तिक बताती थीं और कहती थीं कि उनका अंतिम संस्कार, धर्मनिरपेक्ष तरीके से उन्हें दफन कर किया जाए।

इससे एक नई संस्कृति का विकास हुआ। धार्मिक आस्थाओं का विरोध करने के लिए पेरियार जो सार्वजनिक कार्यक्रम आयोजित करते थे, जिनमें गणेश की मूर्ति को तोड़ना और भगवान राम के चित्रों को चप्पलों से मारना शामिल था, उन्हें तो जनता का समर्थन मिला परंतु ब्राह्मणवादी हिन्दुत्व पर उनके हमले में निहित जाति की कड़ी आलोचना को लोगों ने न तो समझा और न उसे आत्मसात किया।

तमिलनाडु में हमेशा से धार्मिक कर्मकांड, जिनमें मंदिरों में होने वाले उत्सव और उनमें समुदायों के स्थानीय प्रमुखों को दी जाने वाली पदवियां शामिल थीं, सामाजिक दर्जे के निर्धारक हुआ करते थे। यह बात स्थानीय मंदिरों से लेकर भव्य राजसी ब्राह्मणवादी देवस्थानों तक के लिए सही थी।

इस तरह, किसी व्यक्ति का सामाजिक दर्जा, मंदिरों और धार्मिक कर्मकांडों से जुड़ा हुआ था और नतीजे में धार्मिक और धर्मनिरपेक्ष सत्ता एक दूसरे से घुलमिल गई थीं। यही कारण था कि दलितों ने ऐसे उत्सवों में वर्चस्वशाली जातियों के प्राधान्य को चुनौती दी और इन उत्सवों में अपने लिए उपयुक्त स्थान और भूमिका की मांग की।

 

इसके अतिरिक्त, उन धार्मिक स्थलों, जो पहले ब्राह्मणवादी हिन्दुत्व के प्रभाव से मुक्त थे, का भी ‘उन्नयन’ कर दिया गया और वहां भी ब्राह्मणवादी कर्मकांड होने लगे, जिन्हें केवल ब्राह्मण पुरोहित ही संचालित कर सकते थे। इस तरह के मंदिरों में आराधना करने वाले अधिकांश लोग कथित शूद्र समूहों के हुआ करते थे, जिन्हें हम आज की आधिकारिक शब्दावली में पिछड़े या अति-पिछड़े कहेंगे। दूसरी ओर, जब अदालतों ने ब्राह्मणवादी नियंत्रण से बाहर के मंदिरों में पशु बलि को प्रतिबंधित किया तो इसका कड़ा विरोध हुआ, क्योंकि लोग स्थानीय परंपराओं को ब्राह्मणवादी परंपराओं से ऊपर मानते थे। इस मामले में जिस चीज़ पर ध्यान नहीं दिया गया वह यह थी कि इन स्थानीय परंपराओं में भी दलितों का हमेशा समावेश नहीं होता था अर्थात दलित, जाति से परे स्थानीय संस्कृति का भी हिस्सा नहीं थे। यहां यह महत्वपूर्ण है कि सन 1940 के दशक और उसके बाद, विशेषकर उत्तरी तमिलनाडु में, जो दलित, शेड्यूल्ड कास्ट फेडरेशन और बौद्ध धर्म की ओर आकर्षित हुए, उनमें से कुछ ने इन स्थानीय परंपराओं का त्याग कर दिया। वे मंदिरों में होने वाले अनुष्ठानों में भाग नहीं लेते थे और कई मामलों में उन्होंने पशुओं की बलि देना बंद कर दी। परंतु तमिलनाडु में उतने बड़े पैमाने पर दलित बौद्ध नहीं बने जितने कि महाराष्ट्र में।

अगर हम पेरियार के जीवन और उनके कार्यों को इतिहास पर दूरगामी प्रभाव की दृष्टि से देखें और उनका आंकलन ब्राह्मणवादी हिन्दू धर्म और स्थानीय व क्षेत्रीय आस्थाओं और उनके आचरणों के बीच के जटिल रिश्ते के आधार पर करें, तो हम उनके प्रभाव की अधिक गंभीर विवेचना कर सकेंगे। हमें यह समझ में आएगा कि उन्होंने अपनी बौद्धिकता और समाज पर अपने प्रभाव के ज़रिए धार्मिकता पर प्रभावकारी हमला किया, परंतु इसका अर्थ यह नहीं है कि उन्होंने धार्मिकता का पूरी तरह से उन्मूलन कर दिया। वह आज भी ज़िंदा है। उन देशों, जिन्होंने आस्था का नकार किया, का इतिहास हमें बताता है कि तार्किकता या नागरिकों के विरोध ने नहीं, वरन राज्य ने धर्मों के संसाधनों, उनके संस्थागत अधिकारों और भौतिक संपत्तियों को छीना। यह बात नेपोलियन प्रथम के फ्रांस के बारे में भी उतनी ही सही है जितनी कि सोवियत संघ के बारे में।

जागीरें, भ्रष्टाचार और हिन्दुत्व

पेरियार इन तीनों का विरोध करते क्योंकि वे राजनैतिक शक्ति को संदेह की दृष्टि से देखते थे। उन्होंने कई बार यह दोहराया कि सत्ता, व्यक्तियों को भ्रष्ट बना सकती है और बनाती है, और वह भी केवल भौतिक अर्थों में नहीं वरन इस अर्थ में भी कि वह लोगों को उनकी सामाजिक सोच के साथ समझौता करने पर मजबूर करती है। उन्होंने यह लिखा कि सत्ता से दूर रहने के कारण वे धार्मिक मामलों में स्वतंत्र रह सके और आस्था पर आधारित सामाजिक आचरणों की खुलकर निंदा कर सके। दूसरे, वे व्यावहारिक थे और उन्हें यह पता था कि सामाजिक परिवर्तन लाने में राज्य द्वारा बनाए गए कानूनों की महत्वपूर्ण भूमिका है। परंतु इसके कारण उन्होंने सामाजिक और धार्मिक प्रथाओं और आचरणों का विरोध करना बंद नहीं किया। अर्थात, वे यह मानते थे कि अगर वे राज्य से यह उम्मीद करते हैं कि वह सामाजिक परिवर्तन के लिए कार्य करे, तो इसका अर्थ यह नहीं है कि राज्य को अकेले ही यह करना होगा और शायद इसलिए उन्होंने कामराज के नेतृत्व में बनी तमिलनाडु की सरकार का समर्थन किया था।

जैसा कि हम सब जानते हैं, राजनैतिक व्यावहारिकता, सिद्धांतों पर आधारित हो भी सकती है और नहीं भी। इस संदर्भ में बाबासाहेब आंबेडकर का आचरण नैतिक दृष्टि से सही था। इसके विपरीत, कई वामपंथी और दलित राजनैतिक समूह, विचारधारा के स्तर पर अत्यंत आक्रामक होने के बावजूद, राजनैतिक व्यवहार्यता में उतने सावधान न रह सके। उदाहरण के लिए, आपातकाल का भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी का समर्थन, भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी और मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी का तमिलनाडु में भ्रष्ट और जनविरोधी सरकारों और राजनैतिक दलों का समर्थन और गुजरात के कत्लेआम के बाद हुए चुनाव में मायावती द्वारा मोदी का समर्थन। स्पष्टतः ये राजनीतिक दल व शक्तियां शायद यह मानती हैं कि राजनैतिक व्यवहार्यता की खातिर किए जाने वाले कार्यों से भले ही कुछ समय के लिए समस्याएं उत्पन्न हों परंतु दूरगामी दृष्टि से वे उपयोगी हैं। परंतु यह बात शायद आंबेडकर या पेरियार को मंजूर नहीं होती। पेरियार ने जब ऐसी सरकारों का समर्थन किया, जिनके बारे में उन्हें ऐसा लगता था कि वे सामाजिक न्याय के प्रति प्रतिबद्ध हैं, तब भी उन्होंने इस समर्थन को अपने सार्वजनिक कार्यों के आड़े नहीं आने दिया।

पेरियार के लिए सार्वजनिक जीवन में ईमानदारी एक बहुत महत्वपूर्ण मूल्य था और वे उन लोगों को बहुत नीची दृष्टि से देखते थे, जो सत्ता में रहते हुए धनार्जन करते थे। परंतु वे इस बात से परिचित थे कि धन की लिप्सा किसी व्यक्ति से कुछ भी करा सकती है और इसीलिए वे अपने संगठनों के आर्थिक संसाधनों पर कड़ा नियंत्रण रखते थे और उन्होंने कभी यह प्रयास नहीं किया कि उनके परिजनों का इन संसाधनों पर नियंत्रण स्थापित हो जाए।

पूंजीवाद पर

आर्थिक विषयों पर पेरियार के विचार बहुत सुस्पष्ट नहीं थे परंतु वे यह बात स्पष्टतः समझते थे कि पूंजीवाद का ज़ोर केवल अधिक से अधिक संपत्ति के अर्जन पर होता है और इसलिए पूंजीवाद को इस बात की चिंता नहीं होती कि इससे आम लोगों पर क्या प्रभाव पड़ेगा। अगर वे भारतीय राष्ट्र-राज्य को ब्राह्मण-बनिया राज्य कहते थे तो इसका कारण केवल सांस्कृतिक और सामाजिक मुद्दे नहीं थे वरन इसके पीछे यह मान्यता भी थी कि राज्य, पूंजीवादियों के हितों का संरक्षक है। वे राज्य को एक गणतांत्रिक संस्था मानते थे,  जिसमें जनता हर अर्थ में सर्वप्रभुता संपन्न थी और राज्य की भूमिका यही थी कि वह ज्यादा से ज्यादा लोगों की भलाई के लिए काम करे और इसके लिए आवश्यक कानून और योजनाएं बनाए। यही कारण है कि उनका कहना था कि सत्ता में सभी वर्गों का प्रतिनिधित्व होना चाहिए और इसी कारण वे आरक्षण को महत्वपूर्ण मानते थे। जब तक सत्ता में सभी वर्गों का प्रतिनिधित्व नहीं होगा तब तक राज्य जनहितैषी नहीं हो सकता और ना ही उसकी जनता, सर्वप्रभुता संपन्न हो सकती है।

पेरियार एक दूसरे कारण से भी पूंजीवाद के विरोधी थे। उनका कहना था कि निजी संपत्ति, सामाजिक और वैवाहिक रिश्तों को अनिवार्य बना देती है। चूंकि हम हमारी संपत्ति या संसाधनों को अपनी अगली पीढ़ी को सौंपना चाहते हैं इसलिए विवाह करना हमारे लिए अनिवार्य हो जाता है। भारतीय संदर्भ में हम अगली पीढ़ी को अपनी संपत्ति के साथ-साथ अपनी जातिगत विरासत भी सौंपते हैं। उनका तर्क था कि विवाह की संस्था, अन्यायपूर्ण सामाजिक व्यवस्था को चिरस्थायी बनाती है और शोषक आर्थिक व्यवस्था को जिंदा रखती है। यह विचार उन्होंने ऐंगिल्स से लिया था, और उसमें जाति के के परिप्रेक्ष्य में उचित संषोधन किए थे।

प्रजातंत्र पर

पेरियार मूलतः प्रजातंत्रवादी थे और वे मतभेदों और अपने से भिन्न विश्वदृष्टि को स्वीकार करने में हिचकिचाते नहीं थे। वे यह मानते थे कि आपसी बातचीत में हर व्यक्ति को यह अधिकार होना चाहिए कि वह अपने विचार और राय खुलकर व्यक्त कर सके। वे यह भी मानते थे कि वैचारिक और राजनैतिक मतभेद, हमारे परस्पर व्यवहार में सौम्यता और शिष्टता के आड़े नहीं आने चाहिए। जाति और लैंगिक मुद्दों पर भी उनकी सोच प्रजातांत्रिक थी और वे पूर्ण समानता, न्याय और बंधुत्व के हामी थे। परंतु वे प्रजातंत्र के व्यावहारिक स्वरूप अर्थात चुनावी राजनीति के प्रति असहज थे। उन्हें यह आशंका थी कि राजनैतिक अवसरवाद और बिना मुद्दे को समझे अपनी राय बनाने की प्रवृत्ति के चलते, चुनावी राजनीति में सिद्धांतविहीन लफंगे सफल हो जाएंगे। उनका स्वयं का संगठन भी प्रजातांत्रिक नहीं था और अलग-अलग समय पर उनके कई विश्वस्त सहयोगी उनका साथ छोड़कर चले गए। इनमें से कुछ ने सैद्धांतिक कारणों से ऐसा किया तो अन्यों ने व्यक्तिगत अथवा अन्य कारणों से। परंतु इसमें कोई संदेह नहीं कि वे आमूल प्रजातंत्रवादी थे और राज्य को एक ऐसी संस्था के रूप में देखते थे, जिसका उद्द्शेय अधिकतम लोगों का अधिकतम कल्याण करना था। उनकी यह मान्यता थी कि राज्य की सम्प्रभुता का आधार और स्त्रोत नागरिक ही हैं।

(जैसा कि उन्होंने विद्याभूषण रावत को बताया)


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  1. HandArabella Reply

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