पेरियार की दृष्टि में गांधी और आंबेडकर

अपने इंटरव्यू के इस तीसरे हिस्से में एसव्ही राजादुरई व एम गीता विद्या भूषण रावत को बता रहे हैं कि पेरियार, मूलतः, राजनीति के विरोधी थे, क्योंकि उनका कहना था कि वह केवल सीमित लक्ष्यों को प्राप्त करने की कोशिश करती है और स्वतंत्र व तार्किक सोच को बढ़ावा नहीं देती

डा. आंबेडकर और पेरियार ने भारत की स्वाधीनता की पूर्वसंध्या पर एक-दूसरे से हाथ मिलाया। दोनो ने पाकिस्तान की मांग का समर्थन किया और यह ज़ोर दिया कि भविष्य में उभरने वाली नई राजनीति में दलित और शूद्र समुदायों के अधिकारों के लिए स्थान होना चाहिए। उन्होंने बौद्ध धर्म पर भी आपस में सघन चर्चा की और 1950 के दशक के पूर्वार्ध में पेरियार ने आंबेडकर के साथ बर्मा (अब म्यांमार) में आयोजित एक वृहद विश्व बौद्ध सम्मेलन में भी भाग लिया। पेरियार ने हिन्दू कोड बिल के संबंध में बाबासाहेब के विचारों का अध्ययन किया और उनकी प्रशंसा भी की। वे कम्युनल अवार्ड के मुद्दे पर भी आंबेडकर के साथ थे। पेरियार की पत्रिका ने सबसे पहले 1936 में आम्बेेडकर की पुस्तक ‘एनीहीलेशन आफ कास्ट‘ का तमिल अनुवाद प्रकाशित किया। यह इस पुस्तक का पहला अनुवाद था। अन्य भारतीय भाषाओं में इसका अनुवाद काफी बाद में हुआ। सन् 1920 के दशक के उत्तरार्ध से ही पेरियार के साथी पत्रकारों ने बाबासाहेब के आंदोलनों पर नजर रखी और उन पर रपटें प्रकाशित कीं, जिनमें आंबेडकर के दृष्टिकोण का समर्थन किया गया और उनकी प्रशंसा की गई।

डा. अंबेडकर के साथ पेरियार

पेरियार आंबेडकर के संविधानसभा का सदस्य बनने के निर्णय से अप्रसन्न थे। उनका यह मानना था कि अछूत प्रथा के उन्मूलन को मूल अधिकारों में शामिल करने के अपेक्षाकृत कम महत्वपूर्ण लक्ष्य की खातिर बाबासाहेब ने जाति के उन्मूलन को मूल अधिकार और संविधान का लक्ष्य बनाने के अधिक महत्वपूर्ण कार्य की बलि चढ़ा दी। पेरियार का यह भी मानना था कि बाबासाहेब का हिन्दू धर्म त्यागने का निर्णय एक चतुराई भरी राजनैतिक चाल थी, जिसने कांग्रेस को उनकी कुछ मांगों को मानने पर मजबूर किया, परंतु इससे शूद्रों के हित पीछे छूट गए।

धरती से जुड़े व्यक्ति

नागरिक अधिकारों के मुद्दे पर पेरियार के दिलचस्प और जटिल विचार थे। उनका यह मानना था कि राज्य, प्रथाओं और परंपराओं को पुनर्परिभाषित कर सकता है और ऐसे कानून बना सकता है, जो किसी व्यक्ति के अपनी आस्थाओं के अनुरूप आचरण करने की स्वतंत्रता को बाधित करते हैं। उनका तर्क था कि इस स्वतंत्रता का उपयोग महिलाओं के खिलाफ हिंसा और अछूतप्रथा को औचित्यपूर्ण ठहराने के लिए भी किया जा सकता है। अगर पेरियार तमिलनाडू के विधानमंडल के सदस्य बनते तो शायद जहां उनकी प्रशंसा होती, वहीं उन्हें निंदा का पात्र भी बनना पड़ता। हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि सुकरात की तरह, पेरियार भी ज़मीन से जुड़े व्यक्ति थे। जिस तरह अगोरा (प्राचीन यूनान में सार्वजनिक सभाओं व बाज़ारों आदि के लिए इस्तेमाल किया जाने वाला खुला क्षेत्र), सुकरात को प्रिय था, उसी तरह पेरियार भी विधानमंडलों की बजाए सड़कों पर काम करना अधिक पसंद करते थे। पेरियार, मूलतः, राजनीति के विरोधी थे, क्योंकि उनका कहना था कि वह केवल सीमित लक्ष्यों को प्राप्त करने की कोशिश करती है और स्वतंत्र व तार्किक सोच को बढ़ावा नहीं देती। उनका मानना था कि राजनीति में सक्रियता व्यक्ति को भ्रष्ट बना सकती है और इसलिए वे राजनीति से हमेशा दूरी बनाए रहे। वे स्थायी असंतुष्ट और पक्के समालोचक थे।

गांधी के सत्याग्रह पर पेरियार के विचार

पेरियार ने कई आधारों पर गांधी के विचारों की समालोचना और विवेचना की। उनकी एक पुस्तक का उद्धरण बताता है कि वे गांधी को किस रूप में देखते थेः ‘‘उनकी (गांधी) धार्मिक वेशभूषा और ईश्वर से जुड़ी, सत्य, अहिंसा, सत्याग्रह, मन की स्वच्छता, आत्मा की शक्ति, त्याग और तपस्या की लगातार बातें करना एक ओर था, दूसरी ओर था, उनके अनुयायियों और अन्यों, जिनमें राष्ट्रवादी और पत्रकार शामिल थे, द्वारा उन्हें ऋषि-मुनी, ईसा मसीह, पैगम्बर, महात्मा…और विष्णु का अवतार बताना। इसके साथ ही, गांधी के नाम का इस्तेमाल अवसरवादी, धनी और शिक्षित वर्ग अपने हितों को साधने के लिए कर रहा है…इन सबके चलते गांधी एक राजनीतिक तानाशाह बन गए हैं’’ (कुड़ी अरासू 23.07.33; अनाईमुत्थू 1974: 389-90)। [i]

पेरियार और सी राजगोपालाचारी

पेरियार, गांधी की तुलना एनी बेसेन्ट से करते थे और कहते थे कि गांधी की तरह, उन्होंने भी भगवदगीता के बारे में बातें कर और यह दावा कर कि वे ईश्वर और महात्माओं की संगति में रहती हैं और लोगों के पूर्व के व भविष्य के जन्मों के बारे में जानती हैं, राष्ट्रवादी राजनीति पर अपना प्रभुत्व जमाए रखा। पेरियार का कहना था कि एनी बेसेन्ट और गांधी जैसे लोगों की लोकप्रियता का राज़ यह है कि वे अपनी धार्मिक अनुभूतियों का इस्तेमाल अपनी राजनीति के लिए करते हैं और अपनी राजनीति के आसपास रहस्य और धार्मिकता का आभामंडल निर्मित कर देते हैं (कुड़ी अरासू 23.07.33; अनाईमुत्थू 1974: 389-90)।

कुछ महीनों बाद, एनी बेसेन्ट की मृत्यू पर कुडी अरासू में प्रकाशित अपने एक लेख में उन्होंने लिखा कि कांग्रेस पर बेसेन्ट के प्रभाव में जब कमी आ रही थी, ठीक उसी समय गांधी रंगमंच पर प्रकट हुए और पार्टी में उनका प्रभाव बढ़ने लगा। पेरियार का कहना था कि गांधी एक तरह से बेसेन्ट के उचित विकल्प थे (जबकि अन्यों का मत था कि गांधी ने कांग्रेस को एनी बेसेन्ट के प्रभाव से मुक्त किया)। पेरियार का मानना था कि एनी बेसेन्ट की तरह गांधी भी आत्मा-परमात्मा से संबंधित बातों का राजनीति में घालमेल करते थे (कुड़ी अरासू 24.09.33)।

पेरियार के लिए गांधीवाद का एक पहेली होने का एक बड़ा कारण था सत्याग्रह का आदर्श। ‘सत्याग्रह’ शीर्षक से प्रकाशित अपने एक लेख में उन्होंने सत्याग्रह के अर्थ और उसकी प्रासंगिकता पर गहराई से विचार किया। उन्होंने लिखा कि, ‘‘आत्मसम्मान आंदोलन शायद ‘सत्य का यह युद्ध’ न लड़ सकेगा क्योंकि जिन लोगों के खिलाफ यह युद्ध लड़ा जाएगा, वे भी ‘अपने सत्य’ की खातिर आत्मसम्मानियों का विरोध करेंगे।’’ इसके बाद, पेरियार आत्मसम्मान आंदोलन की प्रकृति और जाति-विरोधी और अछूत प्रथा-विरोधी अभियानों के संदर्भ में उसकी उपलब्धियों पर चर्चा करते हैं। उन्होंने लिखा कि यह दावा कर कि आत्मसम्मान आंदोलन एक अवर्णनीय सत्य पर आधारित है, लोगों को अपनी राय बदलने के लिए मजबूर करने की बजाए इस आंदोलन ने तर्कों के द्वारा उन्हें राज़ी करने का रास्ता अपनाया। आंदोलन के कायकर्ता गांव-गांव और शहर-शहर गए, बैठकें आयोजित कीं और लोगों से कहा कि वे उनकी बातें सुनें और यदि उन्हें वे ठीक लगें तो उनका पालन करें। परंतु उन्होंने कभी अपने विचारों का वर्णन और उनकी व्याख्या करने के लिए किसी संदर्भ या विशिष्ट मौके का इस्तेमाल नहीं किया। पेरियार का कहना था कि सार्वजनिक बहस का यह तरीका कांग्रेस के सार्वजनिक और राजनैतिक अभियान चलाने के तरीके से बहुत भिन्न था। कांग्रेस, शक्ति और भावनाओं का प्रदर्शन करने में रूचि रखती थी। वह देश के साम्राज्यवादी शासकों की अवज्ञा कर लोगों को उत्तेजित करना चाहती थी ना कि उन्हें शिक्षित करना।

पेरियार का यह भी कहना था कि कांग्रेस, सत्याग्रह को उसके शाब्दिक अर्थ से जोड़ती थी और सत्याग्रह को धर्म, त्याग और ईश्वरीय इच्छा का प्रतीक बताती थी। ऐसा दावा किया जाता था कि चूंकि सत्याग्रह नैतिक और आध्यात्मिक दृष्टि से सही और श्रेष्ठ है, अतः उसकी सफलता अनिवार्य और अपरिहार्य है, उसकी जीत सुनिश्चित है। सत्याग्रह को विरोध के एक ऐसे आदर्श तरीके के रूप में प्रस्तुत कर, जिसकी सफलता असंदिग्ध है, कांग्रेस ने लोगों को अपने साथ लिया था। सत्याग्रह को वास्तव में सफलता मिले या नहीं परंतु ‘सत्य’ और अन्य आदर्शों के साथ सत्याग्रह को जोड़कर, कांग्रेस ने सत्याग्रह के आसपास एक आभामंडल का निर्माण कर दिया था जिसके चलते हज़ारों साधारण कांग्रेसजन इस परिकल्पना के प्रति आकर्षित हो गए थे। परंतु पेरियार का कहना था कि ‘‘यह आवश्यक नहीं है कि जिस चीज़ के लिए सत्याग्रह किया जाए, वह सत्य ही हो और ना ही यह ज़रूरी है कि जिसकी जीत हो, वह हमेशा सत्य हो’’। ऐसा इसलिए क्योंकि सत्य कभी एक नहीं होता और उसकी कई ढंग से व्याख्या की जा सकती है और उसे कई अलग-अलग कोणों से देखा-समझा जा सकता है। जो मेरे लिए सत्य हो, यह आवश्यक नहीं है कि वह आपके लिए भी सत्य हो। ‘‘सत्य क्या है? असत्य क्या है? वह कौनसा सत्य है, जिसके लिए हमें सत्याग्रह करना चाहिए? क्या इन चीज़ों का परीक्षण करने का कोई तरीका है? जो पंडित मदनमोहन मालवीय को सत्य लगे यह आवश्यक नहीं है कि वही आत्मसम्मान आंदोलन कार्यकर्ताओं का भी सत्य हो।’’

पेरियार को गांधीवाद की सत्याग्रह की अवधारणा से जो समस्या थी, वह यह थी कि वह गलत धारणाओं पर आधारित था और उसकी प्रासंगिकता और महत्व को मापा नहीं जा सकता था। सिवाय उसकी सफलता के, उसके सही होने का कोई मापदंड नहीं था। दूसरे, अगर सत्याग्रह के सत्य होने के दावे की पड़ताल की जाए तो हमें यह पता चलेगा कि सत्याग्रह का सत्य मनमाना और सापेक्ष था। तीसरे-और यह पेरियार की सबसे बड़ी आपत्ति थी-यह पता लगाना असंभव था कि सत्याग्रह की सफलता के पीछे कहीं यह तथ्य तो नहीं था कि उसके पैरोकार यह दावा कर कि वे ‘सत्य’ की राह पर चल रहे हैं, अपने विरोधियों को इस बात के लिए मजबूर कर देते थे कि वे उनकी बात मानें। उनका कहना था कि अगर सत्याग्रह सफल था तो उसका कारण क्या यह था कि सत्याग्रहियों के तर्क और विचार सही थे या फिर यह कि जिनके विरोध में सत्याग्रह किया जाता था, वे सत्याग्रहियों की बात इसलिए मान लेते थे क्योंकि उनके पास कोई और रास्ता नहीं बचता था। पेरियार का कहना था कि चूंकि सत्याग्रह के नैतिक पक्ष को परिभाषित करना मुश्किल था इसलिए सत्याग्रह की सफलता के लिए जोड़तोड़, धोखे और झूठ का सहारा लेना आवश्यक हो जाता था।

जिन्ना, पेरियार, डा. अंबेडकर और अन्य

पेरियार का यह भी कहना था कि आत्मसम्मान आंदोलन का उद्देश्य एक ऐसे समधार्मिक समाज का निर्माण करना है, जहां संपत्ति पर किसी व्यक्ति विशेष का स्वामित्व नहीं होगा और यह आंदोलन यह अपेक्षा या आशा नहीं कर सकता था कि सत्याग्रह के ज़रिए आदि-द्रविड़ों को उस संपत्ति या ज़मीन में हिस्सा मिलेगा, जो धार्मिक संस्थाओं और मंदिरों के स्वामित्व में है। और ना ही सत्याग्रह उन ज़मीदारों, व्यापारियों और राजाओं के खिलाफ सफलता दिला सकेगा जो लोगों को अपना गुलाम बनाकर रखना चाहते थे और जो उन्हें केवल इतना देना चाहते थे, जिससे वे जिंदा रहकर श्रम करते रह सकें। सत्याग्रह जो कर सकता था और जो उसने किया भी, वह यह है कि उसने आम लोगों को सत्य की ईश्वरीय शक्ति पर विश्वास करने पर मजबूर कर दिया और उनके दिलों में एक झूठी आशा पैदा कर दी कि उनकी जिंदगी में बेहतरी आएगी (कुड़ी अरासू 6.9.31)। पेरियार के लिए सत्याग्रह वह साधन था, जिसके ज़रिए गांधीवादी राष्ट्रवाद का विमर्श दुनिया के सामने परोसा गया। सत्याग्रह के आचरण और उसकी अवधारणा की अस्पष्टता को रेखांकित करते हुए पेरियार ने लिखा कि दरअसल वह एक ऐसी राजनीति है जो अपने सरोकारों को सत्य, देशभक्ति और त्याग जैसे वैश्विक मूल्यों से जोड़ देती है। इस अर्थ में सत्याग्रह केवल राष्ट्रवाद की अभिव्यक्ति बनकर रह गया था और राष्ट्रवाद कोई बहुत अच्छी चीज़ नहीं है (द आइडियल सोसायटीः इमेजिनिंग द्रविड़ नाडू, अध्याय 12, टूवर्ड्स ए नॉन ब्राह्मिन मिलेनियम : फ्रॉम  आयोथीथास टू पेरियार, साम्य, कोलकाता, 2008)।

भारतीय राज्य की पेरियार की अवहेलना

अगर हम यह मान भी लें कि शुद्ध अवसरवादी कारणों से भारतीय राज्य ने बाबासाहेब और फुले को ‘स्वीकार’ कर भी लिया है तो भी मूलतः उसने उनकी जयंतियां मनाने, उनकी मूर्तियां स्थापित करने और उनके बारे में लंबे-लंबे और झूठों से भरे भाषण देने के अतिरिक्त क्या किया है। परंतु पेरियार को तो इतनी स्वीकार्यता भी नहीं मिली। इसका कारण यह है कि पेरियार भारतीय राज्य और राष्ट्र को खारिज करते थे और इस कारण, इसके चिंतकों और शासकों के वे कभी प्रियपात्र बन ही नहीं सकते थे। इसके अलावा वे लगातार राष्ट्रवाद को राजनैतिक ब्राह्मणवाद से जोड़ते रहे। वे राष्ट्रवाद के प्रखर आलोचक थे। एक अलग द्रविड़ राष्ट्र के निर्माण का उनका अभियान जाति के उनके विरोध और ब्राह्मण-बनिया भारतीय राष्ट्र-राज्य से उनके मोहभंग के कारण था, इसलिए नहीं कि वे द्रविड़ राष्ट्रवाद की किसी रूमानी विचारधारा के प्रति प्रतिबद्ध थे। उनके लिए राज्य की सत्ता के उपकरणों का कोई उपयोग नहीं था जब तक कि वे उनके विचारों और राजनैतिक सोच को आगे बढ़ाने में मदद न करते हों। उनके लिए उनकी सोच ही सबसे महत्वपूर्ण थी।

इसके अलावा, आंबेडकर के विपरीत, उनके साथ समाज का कोई ऐसा विशिष्ट तबका नहीं था जिसे आकर्षित कर कोई राजनैतिक साध्य हासिल किया जा सके। निःसंदेह बहुत से लोग उन पर श्रद्धा करते थे, उनसे प्रेम करते थे, उनके विरोधी थे और उन्हें बुराभला भी कहते थे। परंतु उनके अनुयायियों की कोई विशिष्ट राजनैतिक पहचान नहीं थी। उनके अनुयायियों में राष्ट्रवादी, उदारवादी, दलित, गैर-ब्राह्मण, साम्यवादी, अराजकतावादी, स्त्रीवादी व समाज के सभी तबकों के लोग शामिल थे। इसलिए राज्य के पास ऐसा कोई कारण नहीं था कि वह उन्हें ‘पालतू’ बनाए या प्रसन्न करे। राज्य ने तो उनके लेखन का संकलन करना भी उचित नहीं समझा और ना ही उनके लेखन के प्रकाशन या प्रचार में कोई रूचि दिखाई।

उनकी नास्तिकता, उनका स्त्रीवाद, उनकी स्वतंत्र सोच-इन सबने उन्हें एक स्थायी असंतुष्ट बना दिया था। एक ऐसा व्यक्ति जो कुछ लोगों को बहुत भला लग सकता था तो अन्यों को असहज बनाने में सक्षम था।

[i] वी. अनाईमुत्थू, संपादित, ‘‘पेरियार ई व र सिथानाईकल’’ (पेरियार के विचार), सिंथानाईयालार पत्थीपगम, त्रिची, 1974


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