जल्लीकट्टू पर रोक : क्या तमिल जातीय गर्व आहत हुआ?

जल्लीकट्टू न केवल पितृसत्तात्मकता का प्रतीक है बल्कि जाति प्रथा की जकड़न में फंसे हमारे समाज का प्रतिनिधित्व भी करता है। तमिलनाडु के दलित समुदाय ने इस खेल का कड़ा विरोध किया है। जल्लीकट्टू आज भी मुख्यतः उन जिलों में होता है, जहां ऊँची जातियों के हिन्दुओं का बहुमत है। जो दलित युवक इस खेल में भाग लेने का प्रयास करते हैं, उन पर हमले किए जाते हैं

जनवरी 2017 में जल्लीकट्टू पर प्रतिबंध के विरोध में चेन्नई के मरीना समुद्र तट पर लाखों लोग उमड़ पड़े। ये लोग केन्द्र और राज्य सरकारों के विरूद्ध आक्रोशित थे और आक्रामक नारे लगा रहे थे। मीडिया के अनुसार, अधिकांश प्रदर्शनकारी युवा, कॉलेज विद्यार्थी और बुद्धिजीवी थे। मीडिया ने इसे ‘जनांदोलन’ की संज्ञा दी। वहां जो भाषण दिए गए, उनमें कई मुद्दे उठाए गए, जिनमें से अधिकांश का संबंध तमिल गौरव और संस्कृति पर हो रहे कथित हमलों से था परंतु इनके केन्द्र में था जल्लीकट्टू पर लगाया गया प्रतिबंध। प्रदेश के अन्य स्थानों पर भी इसी तरह के जबरदस्त विरोध प्रदर्शन हुए। इस प्रतिक्रिया के निहितार्थों को समझना आवश्यक है।

जल्लीकट्टू पर प्रतिबन्ध के खिलाफ प्रदर्शन

जल्लीकट्टू के संदर्भ में दो अलग-अलग परिप्रेक्ष्यों से बातें कही और लिखी जा रही हैं। कुछ लोग इसे बैलों के प्रति क्रूरता बताते हैं और कहते हैं कि इस तरह के खूनी खेल, हमारी संस्कृति का हिस्सा नहीं हो सकते। कुछ अन्य लोगों का कहना है कि जल्लीकट्टू, तमिल परंपरा का भाग है और अब तमिलों की पहचान और उनके गौरव का प्रतीक बन गया है। दोनों पक्षों के पास अपने-अपने तथ्य और तर्क-वितर्क हैं। इस खेल, उस पर लगे प्रतिबंध और उस प्रतिबंध को समाप्त करने के लिए भाजपा की केन्द्र सरकार द्वारा जारी अध्यादेश पर पशुओं के साथ क्रूरता और परंपरा/संस्कृति जैसे मुद्दों से आगे बढ़कर विचार किए जाने की ज़रूरत है। क्या हम एक ऐसी संस्कृति का निर्माण करना चाहते हैं, जिसमें मनोरंजन के साधन हिंसक और पुरूषवादी मानसिकता पर आधारित हों? क्या हम असहाय और मूक प्राणियों की कीमत पर मनोरंजन करना चाहते हैं? या फिर हम एक ऐसे शांतिपूर्ण, समावेशी समाज का निर्माण करना चाहते हैं, जो करूणा और समानता के मूल्यों पर आधारित हो? यह लेख इन मुद्दों पर प्रकाश डालने का प्रयास है।

जल्लीकट्टू में एक बैल को एक बड़े मैदान में खुला छोड़ दिया जाता है और खिलाड़ी, उस बैल के कूबड़ से लटक कर कुछ दूरी तक जाने का प्रयास करते हैं। कूबड़ से पैसों का एक थैला बंधा होता है और विजेता को वह थैला पुरस्कार स्वरूप प्राप्त होता है। खेल को रोमांचक और उसमें जीत को कठिन बनाने के लिए बैल को क्रोधित और उत्तेजित किया जाता है। इसके लिए उसे भाले जैसी पैनी चीज़ें चुभाई जाती है, उसकी पूंछ मरोड़ी जाती है और कब-जब उसकी आंखों में मिर्ची का पाउडर डाला जाता है। उसे शराब भी पिलाई जाती है। बैलों को उनकी नाक में पड़ी रस्सी के सहारे घसीटा जाता है, जिससे उनकी नाक से खून बहने लगता है। इससे बैल उत्तेजित, क्रोधित और लगभग पागल हो जाता है, जिससे उस पर काबू पाना कठिन बन जाता है और उस पर जीत, पुरूषोचित वीरता का प्रतीक बन जाती है। इस खेल में बैलों के साथ जो भयावह क्रूरता की जाती है, उसके कारण ही उच्चतम न्यायालय ने सन 2014 में जल्लीकट्टू व उसके जैसे अन्य खेलों जिनमें रेखला, कंबाला और मंजूविरत्थू शामिल हैं, पर प्रतिबंध लगा दिया था। तब से ही लगातार यह मांग उठ रही थी कि इस प्रतिबंध को वापस लिया जाए। भारत सरकार ने एक अध्यादेश जारी कर कुछ प्रतिबंधों के साथ इस खेल को खेले जाने की इजाज़त दे दी। इस अध्यादेश को कुछ पशु अधिकार कार्यकर्ताओं द्वारा चुनौती दी गई और उच्चतम न्यायालय ने अध्यादेश पर रोक लगा दी। तत्पश्चात, तमिलनाडु राज्य विधानसभा ने पशु क्रूरता अधिनियम, 1960 में कुछ संशोधन कर, जल्लीकट्टू को वैध घोषित कर दिया। प्रतिबंध के विरोध और भारत सरकार के उसके आगे झुकने से महाराष्ट्र, कर्नाटक और कई अन्य राज्यों में बैलगाड़ी दौड़ों और कंबाला पर लगे प्रतिबंध को उठाने की मांग की जाने लगी। जल्लीकट्टू के समर्थन में जो तर्क दिए जा रहे हैं, उनमें बैलों की देशी प्रजातियों के लुप्त हो जाने के खतरे से लेकर तमिल पहचान की रक्षा तक शामिल हैं।

इस मामले में यह महत्वपूर्ण है कि राज्य और केन्द्र सरकारों ने किस तरह उच्चतम न्यायालय के आदेश को पलटने के लिए अध्यादेश का इस्तेमाल किया। जनता के दबाव में आकर सरकारों ने न्यायपालिका, कार्यपालिका और विधायिका की शक्तियों के पृथक्करण के सिद्धांत का उल्लंघन किया। उच्चतम न्यायालय ने संवैधानिक आधारों पर जो निर्णय दिया था, उसे कार्यपालिका और विधायिका ने बदल दिया। यह एक खतरनाक शुरूआत है। भविष्य में, अध्यादेश जारी कर न्यायालयों के इस तरह के निर्णयों को भी पलटा जा सकता है, जो नागरिकों के मूल अधिकारों या संवैधानिक मूल्यों की रक्षा करने वाले हों। देश के कई भागों में आज भी अछूत प्रथा जारी है। देश के कुछ अन्य हिस्सों में ‘ऑनर किलिंग’ आम है। इन प्रथाओं को भी कुछ लोग अपनी संस्कृति का भाग मानते हैं। क्या कल को सरकारें इन्हें भी वैध घोषित कर देंगी? हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि जल्लीकट्टू खेलने के दौरान कई युवकों की मृत्यु हो जाती है। इस साल भी दो युवक मारे गए हैं। क्या यह संविधान में निहित उनके जीवन के मूल अधिकार का उल्लंघन नहीं है? उनके इस मूल अधिकार के उल्लंघन का कोई विरोध क्यों नहीं हो रहा है?

जल्लीकट्टू में हिंसक पौरुष की झलक

यह दिलचस्प है कि इस प्रतिबंध के विरोध में लाखों युवक मरीना बीच पर इकट्ठा हो गए। यह कहना मुश्किल है कि वे अपने आप वहां पहुंचे थे या उन्हें किसी राजनीतिक दल ने इकट्ठा किया था। यह भी कहा जा रहा है कि जल्लीकट्टू तो केवल एक बहाना था। दरअसल, भीड़ का गुस्सा तमिलनाडु के साथ कावेरी जल के बंटवारे में हुए कथित अन्याय और अन्य कई मुद्दों से उपजा था। कहा जा रहा है कि इस आम धारणा, कि भारत सरकार तमिलों के साथ भेदभाव कर रही है, के चलते इतना विशाल प्रदर्शन हुआ। परंतु क्या हमें इस प्रश्न पर विचार नहीं करना चाहिए कि इतनी बड़ी संख्या में युवक कभी बेरोज़गारी और गरीबी जैसे उनसे सीधे जुड़े मुद्दों पर इकट्ठा होकर विरोध प्रदर्शन क्यों नहीं करते? जल्लीकट्टू को क्यों तमिल पहचान का इतना महत्वपूर्ण हिस्सा मान लिया गया है?

इस संदर्भ में तमिलनाडु के सामाजिक-सांस्कृतिक चरित्र का ज़ायज़ा लेना आवश्यक है। जल्लीकट्टू का आधार यह धारणा है कि धरती पर खून बिखरने से समृद्धि आती है। जल्लीकट्टू के मूल में है पशुओं और अन्य मनुष्यों पर पूर्ण अधिकार जमाने की प्रवृत्ति। प्रकृति के साथ सामंजस्य और ईश्वर के समक्ष समर्पण जैसे शाश्वत मूल्यों को बढ़ावा देने के स्थान पर जल्लीकट्टू जैसे खेल, जातिगत और लैंगिक पदक्रम और खून बहाने को बढ़ावा देते हैं। तमिलनाडु में कई पीढ़ियों से भक्ति संतों का गहरा प्रभाव रहा है। जल्लीकट्टू केवल तमिलनाडु के दक्षिणी जिलों के 20 गांवों में खेला जाता है। इससे यह दावा गलत सिद्ध होता है कि जल्लीकट्टू, तमिल संस्कृति का भाग है। तमिल संस्कृति के कई आयाम हैं, और उनमें से अधिकांश समावेशी और मानवतावादी हैं। जल्लीकट्टू को तमिल संस्कृति का केन्द्रीय तत्व मानना अनुचित है।

इसके अतिरिक्त, जल्लीकट्टू का मूल चरित्र पुरूषवादी और पितृसत्तात्मक है। पहले ज़माने में बैलों के मालिक जल्लीकट्टू के विजेताओं के साथ अपनी लड़कियों की शादी कर देते थे। महिलाओं की इस खेल में बहुत कम भूमिका रहती है। वे केवल बैलों की देखभाल करती हैं। यह खेल महिलाओं और बैलों, दोनों का वस्तुकरण करता है-बैल ऐसी वस्तु बन जाता है, जिस पर नियंत्रण स्थापित किया जाना है और महिला ऐसी वस्तु, जिसे इनाम में दिया जा सकता है। यह सोच और इससे जुड़ी हिंसक संस्कृति, गांधी के समानता व स्वतंत्रता के मूल्यों के समर्थन में चलाए गए आंदोलन और पेरियार के जाति प्रथा विरोधी संघर्ष के विरूद्ध हैं।

जल्लीकट्टू न केवल पितृसत्तात्मकता का प्रतीक है बल्कि जाति प्रथा की जकड़न में फंसे हमारे समाज का प्रतिनिधित्व भी करता है। तमिलनाडु के दलित समुदाय ने इस खेल का कड़ा विरोध किया है। जल्लीकट्टू आज भी मुख्यतः उन जिलों में होता है, जहां ऊँची जातियों के हिन्दुओं का बहुमत है। जो दलित युवक इस खेल में भाग लेने का प्रयास करते हैं, उन पर हमले किए जाते हैं। अगर कोई दलित युवक विजेता बन जाता है तो अक्सर इस मुद्दे पर खूनी टकराव होते हैं। जो दर्शक दलित होते हैं, उन्हें भी उनके लिए निर्धारित स्थान पर खड़े रहना होता है। वे ऊँची जातियों के हिन्दुओं के साथ खड़े होकर खेल नहीं देख सकते। जिस खेल में समाज का एक बड़ा तबका हिस्सा ही नहीं ले सकता वह भला तमिल समाज का शुभंकर कैसे हो सकता है? दलितों का मानना है कि जल्लीकट्टू का समर्थन, दरअसल, जातिगत ऊँच-नीच को तमिल संस्कृति का अभिन्न हिस्सा बताने का षड़यंत्र है।

पेरियार (चित्र में जयललिता के साथ) ने जिस जातिवाद के खिलाफ संघर्ष किया था जल्लीकट्टू उसे बनाये रखता है

आम लोगों का भावनाओं में बह जाना तो समझ में आता है परंतु भारत सरकार और राज्य सरकार का व्यवहार समझ से परे है। वर्तमान एनडीए केन्द्र सरकार गोवंश की रक्षक होने का दंभ भरती है परंतु उसी सरकार ने जल्लीकट्टू को वैध घोषित करने के लिए अध्यादेश जारी किया। यह विडंबना है कि हिन्दू राष्ट्रवादी यह मानते हैं कि जल्लीकट्टू एक हिन्दू प्रथा है और उस पर प्रतिबंध हिन्दू संस्कृति और धर्म में अनुचित हस्तक्षेप है। ये लोग शायद यह भी मानते होंगे कि सती और अछूत प्रथाएं भी हिन्दू संस्कृति का भाग हैं और उन पर प्रतिबंध भी अनुचित है। भाजपा, गोवंश को पवित्र मानती है और यही कारण है कि मध्यप्रदेश, गुजरात, हरियाणा और महाराष्ट्र सहित कई भाजपा-शासित प्रदेशों में बैलों के वध पर भी प्रतिबंध है। गाय, हिन्दुत्ववादी राजनीति का प्रतीक बन गई है। गोरक्षकों ने ऊना में एक मरी हुई गाय की खाल उतार रहे दलितों की निर्मम पिटाई की थी। दादरी में मात्र इस संदेह पर कि मोहम्मद अखलाक के घर में गोमांस रखा हुआ है, उसे पीट-पीटकर मार डाला गया। जहां एक ओर गोवंश को पूजे जाने की बात कही जाती है, वहीं बैलों के साथ क्रूरता को रोकने का प्रयास नहीं होता। उल्टे इस क्रूरता को रोकने की कोशिश को धार्मिक मामलों में हस्तक्षेप बताया जाता है। दरअसल, इसके पीछे भाजपा की तमिलनाडु में अपनी जड़ें मज़बूत करने की कोशिश भी है। तमिलनाडु के लोगों का समर्थन हासिल करने के लिए भाजपा ने गोवंश की चिंता को भुला दिया है। एक ओर तो उन समुदायों का दानवीकरण किया जाता है, जो गोवंश पर अपने जीवनयापन और भोजन के लिए निर्भर हैं तो दूसरी ओर, मनोरंजन के नाम पर बैलों के साथ निर्मम व्यवहार पर कोई आपत्ति नहीं की जाती। इससे यह स्पष्ट है कि भाजपा और उसके साथी, जिनके लिए गाय के प्रति प्रेम ही राष्ट्रवाद की कसौटी बन गया है, को दरअसल गाय से नहीं, वरन वोटों से प्रेम है।

जल्लीकट्टू का मुद्दा बहुसंख्यकवाद से भी जुड़ा हुआ है। क्या सरकारों के लिए यह उचित है कि वे किसी भी ऐसी मांग के आगे झुक जाएं, जिसका समर्थन समाज के अधिकांश लोग कर रहे हों, भले ही वह मांग कितनी भी अनुचित या गैरकानूनी क्यों न हो। जल्लीकट्टू का समर्थन, दरअसल, उस हिंसक, क्रूर व प्रतिगामी संस्कृति का भाग है, जिसमें मनुष्यों और प्राणियों के साथ क्रूरता, मनोरंजन का साधन थी। इस खेल के जातिगत व पुरूषवादी चरित्र के बाद भी सरकार ‘तमिल गौरव’ के कथित रक्षकों के आगे दंडवत हो गई है। क्रूरता कभी किसी संस्कृति के गौरव का आधार नहीं हो सकती। गौरवपूर्ण संस्कृति तो वह होती है जो समानता व करूणा पर आधारित हो। क्या हर परंपरा को, चाहे वह कितनी ही क्रूर, अनुपयोगी या प्रतिगामी क्यों न हो, संस्कृति का हिस्सा माना जाना चाहिए? क्या संस्कृति कोई स्थिर चीज़ है जिसमें कभी कोई बदलाव नहीं आ सकता? क्या हमें अधिक मानवतावादी संस्कृति का निर्माण करने का प्रयास नहीं करना चाहिए? ये वे कुछ मुद्दे हैं जिन पर गहन विचार आवश्यक है।


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