ओबीसी व्यवसायियों के संगठन बिक्की से जागी उम्मीदें

दिल्ली के होटल जनपथ में करीब दस राज्यों के व्यवसायी इकट्ठे हुए और फिक्की तथा डिक्की की तरह ही, बिक्की यानी बैकवर्ड इंडियन चैंबर्स ऑफ कॉमर्स एंड इंडस्ट्री के गठन का फैसला किया। महेंद्र नारायण सिंह यादव की रिपोर्ट

वर्तमान सामाजिक, राजनीतिक और आर्थिक परिवेश में अपनी अलग पहचान बनाने के लिए आतुर ओबीसी समुदाय अब व्यापार जगत में भी अपनी पहचान बनाने की पहल कर रहा है। फिक्की और डिक्की जैसे उद्योग-संगठनों की तरह ओबीसी व्यवसायियों ने बिक्की यानी बैकवर्ड इंडियन चैंबर्स ऑफ कॉमर्स एंड इंडस्ट्री का गठन किया है।

बिक्की के गठन में प्रमुख भूमिका निभाने वाले और संगठन के संस्थापक सदस्य ताराचंद रतन बताते हैं कि “1927 में महात्मा गाँधी की सलाह पर घनश्याम दास बिड़ला और पुरुषोत्तम ठक्कर ने फिक्की यानी फेडरेशन ऑफ इंडियन चैंबर्स ऑफ कॉमर्स एंड इंडस्ट्री की स्थापना की थी। यह संगठन तभी से काम कर रहा है और वर्तमान में पंकज पटेल इसके अध्यक्ष हैं।”

सुरेन्द्र रोहिला, राष्ट्रीय अध्यक्ष, बिक्की, भरत मौर्या, महासचिव, और अन्य संस्थापक सदस्य (फोटो : नामदेव न्यूज)

बाद में पिछड़े वर्गों और दलितों में बीच चेतना बढ़ने का प्रभाव उद्योग जगत पर भी पड़ा। 2005 में महाराष्ट्र के उद्यमी इंजीनियर मिलिंद कांबले ने पुणे में दलित इंडियन चैंबर्स ऑफ कॉमर्स एंड इंडस्ट्री का गठन किया। इन संगठनों के जरिए उद्यमियों को सरकार की ओर से सहायता भी मिलती है जिसके सहारे कई उद्यमियों ने अपने व्यवसाय को आगे बढ़ाया है।

नब्बे के दशक में मंडल आयोग लागू होने के समय से ओबीसी समुदाय में भी काफी चेतना आई, लेकिन यह चेतना ज्यादातर राजनीति और छात्र समुदाय तक सीमित रही। ओबीसी सरकारी कर्मचारियों के भी संगठन सामने आने लगे लेकिन व्यापारिक जगत ने इस तरह की कोई पहल नहीं की। अपनी-अपनी राजनीतिक प्रतिबद्धताओं के अनुसार ओबीसी व्यवसायी, उद्योगपति राजनीतिक दलों से जुड़े तो रहे, लेकिन ओबीसी व्यवसायियों के लिए कोई संगठन हो, ऐसा काफी दिनों तक नहीं सोचा गया।”

जनवरी 2017 में ओबीसी समुदाय के हितों के लिए सक्रिय कुछ व्यवसायी नेताओं ने इस बारे में पहल करने की ठानी। दिल्ली के होटल जनपथ में करीब दस राज्यों के व्यवसायी इकट्ठे हुए और फिक्की तथा डिक्की की तरह ही, बिक्की यानी बैकवर्ड इंडियन चैंबर्स ऑफ कॉमर्स एंड इंडस्ट्री के गठन का फैसला किया।

संगठन की कमान करनाल के व्यवसायी और रोहिल्ला एसोसिएट्ट लॉ फर्म के मालिक एडवोटेकट सुरेंद्र रोहिल्ला को सौंपी गई है। इनके साथ ही लखनऊ के ओबीसी व्यवसायी भारत मौर्य को राष्ट्रीय महासचिव नियुक्त किया गया।

संगठन बनाने का निर्णय होने के साथ ही नियुक्त पदाधिकारियों ने इसके पंजीयन की प्रक्रिया शुरू कर दी है। संस्थापक सदस्य ताराचंद रतन कहते हैं कि “मार्च के महीने में पंजीयन की प्रक्रिया पूरी हो जाएगी और अप्रैल से बिक्की औपचारिक रूप से काम करना शुरू कर देगा।”

अध्यक्ष सुरेंद्र रोहिल्ला कहते हैं कि “आने वाले दिनों में देश भर के ओबीसी व्यवसायियों को बिक्की से जोड़ा जाएगा, और शासन से मिलने वाली सारी सुविधाएँ उन्हें दिलाई जाएँगी।

फिक्की पर मूल रूप से सवर्ण व्यवसायियों का कब्जा रहा है, और जातीय चेतना की कोई लहर वहाँ पर नहीं दिखती। जातियों में बँटे भारतीय समाज की विविधता का वहाँ घोर अभाव है, इसलिए उसकी नीतियाँ भी मूल रूप से सवर्ण व्यापारियों के हितों में ही रहती हैं।

राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के कार्यक्रम में मिलिंद काम्बले (बाएं तीसरे)

कुछ यही स्थिति डिक्की की है। डिक्की के अध्यक्ष मिलिंद कांबले वैसे तो आरएसएस से जुड़े हैं और खुलेआम आरएसएस के कार्यक्रमों में हिस्सा लेते हैं, फिर भी इस संगठन के जरिए दलित उद्यमियों को एक पहचान मिली है, और शासन की नीतियों का लाभ कुछ दलित उद्यमियों तक पहुँचा भी है।

ऐसी स्थिति में देश की करीब आधी आबादी वाले ओबीसी समुदाय के व्यवसायी दोनों ही संगठनों में तकरीबन गायब हैं। आर्थिक उदारीकरण के दौर के बाद अर्थ-व्यवस्था के बढ़ते महत्व के बीच ओबीसी की विशाल आबादी की व्यापार जगत में अनुपस्थिति निश्चित ही चिंता की बात थी।

आमतौर पर ओबीसी समुदाय खेती-किसानी, पशुपालन या दस्तकारी से जुड़ा रहा है। इनकी नई पीढ़ी पढ़-लिखकर आ तो रही है, लेकिन निजी कंपनियों में इनको जगह न मिलने के कारण उसका भविष्य सँवर नहीं पा रहा है। सवर्ण हितों की पोषक कंपनियाँ सरकारी नौकरियों तक में ओबीसी आरक्षण को सहन नहीं कर पाई हैं, तो ऐसे में निजी क्षेत्र में आरक्षण के बारे में तो सोचना भी मुश्किल दिख रहा है।

स्टार्टअप जैसी नई योजनाओं के जरिए अगर ओबीसी समुदाय के लोग व्यापार जगत में जगह बनाते हैं, तो इसके व्यापक प्रभाव देखने को मिल सकते हैं। खेती और छोटे व्यवसायों में लाभ की स्थिति न रहने के कारण ओबीसी के लोग अब बड़े शहरों की ओर पलायन तो कर ही रहे हैं, और अगर बड़े शहरों में ओबीसी व्यवसायियों की कंपनियाँ उन्हें मिलेंगी तो ये दोनों के लिए लाभ का सौदा रहेगा।

ओबीसी समुदाय के व्यवसाय में पिछड़े रहने का बड़ा कारण ये भी है कि इन वर्गों की समस्याओं को सरकार के सामने सही तरह से पेश नहीं किया जाता। ओबीसी उद्योग संगठन बिक्की इस कमी को दूर कर सकता है।”

बिक्की से जुड़े ओबीसी बिजनेस लीडर चाहते हैं कि ओबीसी युवाओं को भी व्यवसाय और उद्योग क्षेत्र में आने के लिए प्रेरित किया जाए ताकि वे भी देश की अर्थ-व्यवस्था में अपना योगदान दे सकें, और आर्थिक प्रगति का लाभ ओबीसी समुदाय तक भी पहुँचे। बिक्की नए व्यापारिक अवसरों को ओबीसी युवाओं तक पहुँचाने में खासी दिलचस्पी रखता है।
बिक्की का एक और मुख्य मकसद ओबीसी व्यवसायियों को एक मंच पर लाना भी है। संगठन के संस्थापक बिक्की को उभरते ओबीसी व्यवसायियों के लिए रिसोर्स संगठन का रूप भी देना चाहते हैं, जिससे लगता है कि इनके अंदर एक व्यापक सोच है।

ओबीसी व्यवसायियों की कई सामाजिक-आर्थिक परिस्थितियाँ हैं जो कई मायनों में सवर्ण व्यवसायियों और दलित व्यवसायियों से अलग हैं। बिक्की के जरिए उनके सामने मौजूद चुनौतियों का मिलकर सामना करने की योजना है।

बिक्की से जुड़े लोग सामान्य रूप से भी ओबीसी हितों के लिए सामाजिक रूप से सक्रिय रहे हैं। ओबीसी समुदाय के अन्य संगठनों से भी उनका जुड़ाव है जो कि एक अच्छा संकेत देता है। दिल्ली में पिछले महीनों में हुए ओबीसी साहित्य सम्मेलन और उसके जरिए ओबीसी को साहित्यिक पहचान देने की पेशकश को भी ये अच्छी पहल मानते हैं।

संगठन अप्रैल से औपचारिक रूप से काम करना शुरू कर देगा, जिसके बाद बिक्की के उद्देश्यों और गतिविधियों के बारे में और अधिक खुलासा होगा। अन्य क्षेत्रों के ओबीसी संगठनों से भी तालमेल बनाकर काम करने के संकेत ताराचंद रतन ने दिए हैं। उन्होंने कहा है कि “अप्रैल के बाद बिक्की के पहले सम्मेलन में ओबीसी पत्रकारों, साहित्यकारों और बुद्धिजीवियों को भी आमंत्रित करने की योजना है। उम्मीद की जा सकती है कि जल्द ही ओबीसी बिजनेस लीडरों की भी अलग पहचान बनेगी।”


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