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छत्तीसगढ़ में भैंसासुर

असुर, गोंड समेत कई आदिवासी समुदाय स्‍वयं को महिषासुर का वंशज कहते हैं। उन्हें अपने नायक के रुप में याद करते हैं तथा अनेक तरह की समस्याओं से रक्षा में सक्षम मानते हैं

महिषासुर को दशकों से खलनायक के रूप में पेश किया जा रहा है। खास तौर से अक्टूबर-नवंबर में उत्तर भारत में मनाए जाने वाले दशहरा-दिवाली पर्व में दुर्गा द्वारा महिषासुर के वध को दर्शा कर धूमधाम से मनाया जाता है और इसे देवताओं द्वारा असुरों पर विजय के रुप में याद किया जाता है। वहीं दूसरी ओर देश के विभिन्न प्रदेशों में महिषासुर की पूजा की जाती है। असुर, गोंड समेत कई आदिवासी समुदाय स्‍वयं को महिषासुर का वंशज कहते हैं। उन्हें अपने नायक के रुप में याद करते हैं तथा अनेक तरह की समस्याओं से रक्षा में सक्षम मानते हैं।

छत्‍तीसगढ के गांव के खेत में महिषासुर के पूजन का दृश्‍य

मैं छत्तीसगढ़ का मूलनिवासी हूँ और बचपन से ही यहाँ विभिन्न क्षेत्रों में महिषासुर की पूजा देखते आया हूँ। छत्तीसगढ़ के आदिवासी समुदायों में सदियों से महिषासुर की पूजा की जाती है। यहाँ यह पूजा जनवरी-फरवरी या मार्च में होती है और अधिकांश जगहों पर इसे फसली त्यौहार के रूप में मनाया जाता है।

छत्तीसगढ़ के जिला- बलोदा बाजार में डमरू नामक एक गांव हैं। यहाँ शिव की अनेक प्राचीन मंदिर और मूर्तियां हैं, जो पुरातत्व विभाग, भारत सरकार द्वारा संरक्षित हैं। इस गांव में महिषासुर की पूजा ग्राम देवता के रूप की जाती है। खेत में इनका स्थान होता है। पूजा के दौरान सूअर की बलि भी दी जाती है। यहाँ महिषासुर को अन्न की उपज बढ़ाने के लिए फसल कट जाने या पक जाने के उपरांत धन्यवाद स्वरूप पूजा दी जाती है।

कोरबा जिला के भैसमा गांव में महिषासुर को लेकर अनेक लोककथाएं प्रचलित हैं। यहाँ के लोगो के अनुसार प्राचीन काल में गांव के एक तालाब में एक जंगली वन भैंसा आता था और कीचड़ में खूब लोटता था। उस जगह सदियों से भैंसासुर की पूजा की जाती है। प्रतीक के रूप में वहाँ एक पत्थर है, जिसकी तीन वर्ष में एक बार पूजा होती है। यहाँ भी पूजा में सूअर की बलि दी जाती है। यह पूजा जनवरी-फ़रवरी में फसल कट जाने के बाद ही होती है।

कोरबा जिले के ही पुलाली कला गांव में पनिका समाज के लोगों द्वारा महिषासुर की पूजा की जाती है। यहाँ से लगभग 8 किमी पूर्व में एक प्राचीन शिव मंदिर है, जो पुरातत्व विभाग, भारत सरकार द्वारा संरक्षित है। पुलाली कला में पनिका समाज के लोगों की बहुलता है। यहाँ भी फरवरी माह में तीन साल के अंतराल पर फसल पकने के बाद महिषासुर की पूजा होती है। पूजा के दौरान चौका-आरती की जाती है, जिसमें कबीरपंथी दोहा एवं भजन का पाठ होता है। चौका-आरती के लिए पनिका समाज का अपना एक ग्रंथ है, जिसमें कबीर समेत कई संतो के दोहे एवं भजन संकलित है।

चेन्नई में 29 अक्टूबर, 2016 को टीपीडीके कार्यकर्ताओं ने नरक चतुर्दशी का आयोजन किया था

सरगुजा जिले के ओड़गी गांव में महिषासुर का प्रतीक चिन्ह है। यह एक आदिवासी बहुल जिला है, जो उत्तर प्रदेश के सोनभद्र और झारखंड के गुमला जिले से सटा हुआ है। इसके निकटवर्ती सोनभद्र और गुमला जिला भी आदिवासी बहुल जिले हैं, जहाँ असुर, कोल और उरांव समुदाय के आदिवासी ज्यादा संख्या में हैं। सरगुजा के ओड़गी गांव में महिषासुर की पूजा फाल्गुन मास की शुक्ल पक्ष की एकादशी को होता है। यह पूजा ग्राम के पटेल (ग्राम प्रमुख) के द्वारा की जाती है  जिसमें कर्रा (खेती में उपयोग होने वाला एक औजार), सफेद मुर्गा और शराब चढ़ाई जाती है। महिषासुर को कुर्री और चाढा (खेत समतल करने का  औजार) विशेषकर चढ़ाया जाता है। यहाँ महिषासुर की पूजा हर वर्ष होती है।

बिलासपुर जिला में भैसाझार गांव है, जो रतनपुर से कोटा मार्ग पर स्थित है। यहाँ पहले बहुत बड़ा जंगल था, जिसमें भैसामूढ़ा नाम का एक तालाब था। भैसामूढ़ा तालाब के नाम पर ही इस गांव का नाम भैंसाझार पड़ा। यह गोंड आदिवासियों का क्षेत्र है। भैंसासुर इनके भी अराध्य हैं। भैंसासुर की पूजा गांव के  वैद्य द्वारा की जाती है। यहाँ भी तीन वर्ष के अंतराल पर पूजा होती है, जिसमें सूअर की बलि दी जाती है। भैंसासुर  को फ़सलों की रक्षा के लिए विशेष तौर पर पूजा जाता है।


महिषासुर से संबंधित विस्तृत जानकारी के लिए  ‘महिषासुर: एक जननायक’ शीर्षक किताब देखें। द मार्जिनलाइज्ड प्रकाशनवर्धा/दिल्‍ली। मोबाइल  : 9968527911ऑनलाइन आर्डर करने के लिए यहाँ  जाएँ : महिषासुर : एक जननायकइस किताब का अंग्रेजी संस्करण भी ‘Mahishasur: A people’s Hero’ शीर्षक से उपलब्ध है।

लेखक के बारे में

महेंद्र प्रताप सिंह राज

महेंद्र प्रताप सिंह राज उच्च माध्यंमिक विद्यालय, कोंडतराई, रायगढ ( छत्तीतसगढ) में सहायक शिक्षक हैं। वे राज गोंड जनजाति से आते हैं तथा आदिवासी परंपराओं के जानकार हैं।

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