आडंबरों से दूर एक शादी ऐसी भी

ब्राहम्णवादी विवाह संस्कार आडंबर और विषमताओं से भरा होता है। खासकर कन्या पक्ष को नीचा दिखाया जाता है। इसके विपरीत अर्जक संघ और बुद्धिस्ट तरीके से होने वाला विवाह संस्कार समानता पर आधारित होता है और इसमें आडंबर के लिए कोई जगह नहीं होती है

हाल ही में लखनऊ में एक भव्य शादी समारोह में शामिल हुआ। समारोह स्थल पर सबसे पहले दरबानों ने इस तरह स्वागत किया मानों हम राजंतत्र वाले युग के किसी समारोह में शामिल हो रहे हों। पंडाल के अंदर का दृश्य अत्यंत ही भव्य था। दूल्हा एक राज सिंहासन सरीखे सोफ़े पर बैठे थे। बगल के स्टेज में संगीतमय प्रस्तुति हो रही है। चूंकि हम देरी से पहुंचे थे इसलिए हम तुरंत खाने की तरफ मुड गये। खाने के पंडाल में दो बड़ी एलईडी स्क्रीन लगी थीं, जिनमें वह सब दिख रहा था, जो शादी के मंडप मे चल रहा था। हम लोग खाना खा ही रहे थे कि स्क्रीन में यह घोषणा हुई कि अब दुल्हन धीरे-धीरे क़दमों से दूल्हे के पास आ रही है और एक-दूसरे को माला डालकर एक-दूजे के हो जायेंगे।

आडंबर से दूर बौद्ध तरीके से शादी : वर-वधू दोनों पक्षों को मिलता समान सम्मान

यह सब चल ही रहा था कि अचानक मित्र रामपाल और सुमन की शादी फ्लैशबैक में चलने लगी। सच में दोनों कितने अच्छे लग रहे थे। भंतेजी ने जब दोनों से कहा कि अब आप दोनों एक दुसरे के हो गये हो तो वहां मौजूद सभी बाराती-घराती ने जमकर फूलों वाली वर्षा की थी। उस अनोखी शादी में घटित एक-एक लम्हा याद आने लगा।

मित्र रामपाल वर्मा से मुलाकात 2013 में अर्जक संघ के एक कार्यक्रम में हुई थी। रामपाल वर्मा उम्र में मुझसे छोटे थे, लेकिन समझदारी अच्छी थी। रामपाल ने महामना रामस्वरूप वर्मा जी के विचारों को पढ़ा, जीया और उसे अंगीकार किया। उन्होंने ब्राह्मणवाद की बारीकियां समझी और मानववाद के विकल्प पर चलने लगे थे। पिछले साल हम दोनों ने श्रावस्ती के जेतवन आश्रम में विपस्सना की थी। दस दिनों के शिविर में हमने काफी कुछ सीखा। रामपाल ने वहीँ दृढ निश्चय किया था कि उनकी शादी ब्राह्मणी रीति-रिवाज से नहीं वरन अर्जक विधि से होगी। हालांकि अर्जक विधि से शादी कराने वाले चौधरीजी शादी में नहीं आ पा रहे थे, इसलिए शादी को बुद्धिस्ट तरीके से करने का निश्चय किया गया।

ब्राह्म्णवादी विवाह संस्कार : वर की पूजा करता कन्या का पिता

रामपाल ने शादी के दिन सायं 5 बजे ही भंतेजी को सुमन के घर भेज दिया था। भंते जी जैसे ही सुमन के घर पहुंचे, वहां उनका सामना पहले से मौजूद शादी कराने के लिये आये दो ब्राहम्णों से हुई। भंतेजी का कोई स्वागत सत्कार नहीं हुआ। यह बात उन्होंने रामपाल को फोन से बता दिया। रामपाल बारात लेकर 9 बजे मदारगढ़ पहुंचे। रामपाल ने रास्ते भर वधु पक्ष को मनाने का प्रयास किया कि शादी बुद्धिस्ट तरीके से ही होगी। वधु पक्ष मानने को तैयार नहीं था। काफी कोशिशों के बाद वधु पक्ष का एक व्यक्ति जनवासे में आया और कहा कि क्या बीच का रास्ता निकल सकता है। यानि पहले पंडित द्वारा शादी संपन्न हो जाये फिर आप अपने पंडितजी (भंतेजी) द्वारा करवा लें। रामपाल ने कहा कि भंतेजी आपके यहाँ सायं 5 बजे से बैठे हुए हैं, अब शादी बुद्धिस्ट तरीके से ही होगी। लेकिन सुमन के घर वाले तैयार नही हुए। रामपाल जब बारातियों के संग सुमन के घर पहुंचे तो देखा कि एक ब्राहमण सुमन के दादाजी से द्वारचार से पूर्व के संस्कारों को संपन्न करा रहे थे। रामपाल कार से उतरे नहीं। शादी के मंडप में काफी तनाव उत्पन्न हो गया, लड़की पक्ष वाले इस बात की दुहाई दे रहे थे कि हमारे खानदान में बिना ब्राह्मण के शादी हुई ही नहीं, इस बार यदि बिना ब्राह्मण के शादी हुयी तो भारी अपशकुन हो जायेगा। घर की स्त्रियाँ भी नाराज हो गयीं लेकिन उनके मन में कौतूहल भी था कि दोआबा में ऐसी शादी पहले तो कभी नहीं हुयी। मंडप के बाहर गाँव के प्रधान भी मौजूद थे। उन्होंने भी ब्राहमण के बिना विवाह को अनर्थ माना। जब लगा कि बात बिगड़ सकती है तो मैंने प्रधान जी और अन्य ग्रामीणों को समझाया। उनसे आग्रह किया कि शादी कम खर्चे में होगी और वर और वधु दोनों को बराबर सम्मान मिलेगा। गाँव के लोगों से काफी समय तक तर्क होता रहा। काफी कशमकश के बाद ब्राह्मण ने अपनी जगह छोड़ दी और भंतेजी से आने का आग्रह किया।

मंडप में भंतेजी के बैठ जाने के बाद रामपाल मंडप में गये और शादी के संस्कार सपन्न होने शुरू हुये। भंतेजी को लड़की पक्ष से कोई सहयोग नहीं मिल रहा था लेकिन वे मंडप में डटे रहे। द्वारचार पूरा होने के बाद जब दुबारा बचे हुये विवाह के संस्कार के लिये भंतेजी मंडप में बैठे तो तो लड़की के पिता कहीं चले गये और लौटे ही नहीं। लेकिन सुमन अब पूरी तरह से तैयार थी। मंडप में मौजूद नाई अजीब बर्ताव कर रहा था। चूंकि मंडप में ब्राह्मण अब मौजूद नहीं था इसलिए नाई का कोई विशेष काम नहीं रह गया था। ब्राह्म्णवादी विवाह के मौके पर नाई और ब्राह्मण के बीच अन्योन्याश्रय सम्बन्ध होता है। ब्राह्मण जो विवाह में पैसा या अन्य वस्तुओं का चढ़ावा लेता है उसमें से कुछ हिस्सा नाई को भी मिलता है। भंतेजी ने नाई के मन को पढ़ा और कहा कि आपको वाजिब पैसा और चढ़ावा मिल जायेगा। भंतेजी ने विवाह के बचे हुये संस्कारों को पू्रा करना शुरू किया। विवाह समारोह में उदासी का माहौल हो गया था।

मैंने भंतेजी से आग्रह किया कि जो मन्त्र आप पालि भाषा में पढ़ रहे हैं, उसका भावार्थ हिंदी में भी बता दीजिये ताकि सभी को समझ में आ सके। भंतेजी ने वैसा ही किया। भंतेजी जब हिंदी में विवाह संस्कार संपन्न करने लगे तो वहां मौजूद लोगों में हलचल होना शुरू हुआ। वर और वधू पक्ष को एक समान स्तर पर बिठाया गया और समतामूलक प्रतिज्ञा करवाई गयी। सबसे बड़े आदर्श वर और वधु के माता-पिता को बताया और भगवान बुद्ध, संघ और और धम्म के प्रति समर्पित होने को कहा गया। मंडप में मौजूद लोगों में उत्साह का संचार हुआ और यह सुनने को मिलने लगा कि ऐसा विवाह तो बहुत अच्छा है। इसमें वधु पक्ष को भी बराबरी का सम्मान मिलता है। अंत में जब भंते जी ने दोनों को एक दुसरे के गले में माला डालने को कहा तो मौजूद लोगो ने दिल खोलकर फूलों की वर्षा की। पूरा मंडप फूलों की खुश्बू से सराबोर हो गया। सभी लोग आह्लादित थे और विवाह की इस कम खर्चीली, सरल सुगम विधि की भूरि-भूरि प्रशंसा की।

इस प्रकार रामपाल और सुमन के दृढ-निश्चय के चलते ये समतामूलक शादी संपन्न हुई जिसमें ब्राह्मणी संस्कारों और रीति रिवाजो की कोई जगह नहीं है। भंतेजी ने ‘प्रतिज्ञा-पत्र’ में वर और वधु दोनों के दो-दो हस्ताक्षरयुक्त फोटो लिये और उनके हस्ताक्षर भी करवाये। उल्लेखनीय है कि प्रतिज्ञा पत्र दोनों के विवाह का वैध प्रमाण-पत्र है और उनका विवाह सरकारी विभाग में दर्ज भी हो जायेगा।

मैं फ्लैशबैक में ही खोया था कि इसी बीच मेरे मित्र तरुण ने टोका कि क्या सोच रहे हो। मैंने कहा कुछ नहीं। हालांकि मै यह सोच रहा था कि यदि यहाँ भी ये वर-वधू दोनों बुद्धिस्ट तरीके से शादी के लिये दृढ-निश्चयी होते तो शादी बहुत कम पैसों और समतामूलक तरीके से संपन्न होती।


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