आंबेडकर के चिन्तन में मार्क्स

डा. आंबेडकर और कार्ल मार्क्स के बीच में मिलन के अनेक बिन्दू हैं। वहीं भारतीय परिप्रेक्ष्य में मार्क्स के विचारों को लेकर आंबेडकर कई सवाल भी खड़े करते हैं जो प्रथम द्रष्टया केवल भारत तक सीमित प्रतीत होते हैं, लेकिन वास्तव में उनका विस्तार वैश्विक है। बता रहे हैं कंवल भारती :

श्रमिक वर्ग के प्रत्येक सदस्य को रूसो के “सोशल कॉन्ट्रैक्ट”, मार्क्स के “कम्युनिस्ट मैनीफेस्टो”, पोप लियो तेरहवें के “एनसाईक्लीकल ऑन द कंडीशनस ऑफ़ लेबर” और जॉन स्टुअर्ट मिल के “लिबर्टी” से परिचित होना चाहिए। ये उन ग्रंथों में से चार हैं, जो आधुनिक दुनिया के समाज और शासन व्यवस्था के  संगठन के मूल कार्यक्रम से सम्बंधित हैं – बी. आर. आंबेडकर[i]

डा. आंबेडकर

यह उद्धरण डॉ. आंबेडकर के भाषण ‘लेबर एंड पार्लियामेण्टरी डेमोक्रेसी’ से लिया गया है, जो उन्होंने 8 सितम्बर से 17 सितम्बर 1943 तक चले ऑल इंडिया ट्रेड यूनियन वर्कर्स के अध्ययन शिविर के समापन सत्र में दिया था। उन्होंने इस उद्धरण में कहा है, “मजदूर वर्गों के हर व्यक्ति को रूसों का ‘सामाजिक अनुबंध’, मार्क्स का ‘कम्युनिस्ट घोषणापत्र’ पोप लियो तेरहवें का ‘मजदूरों की स्थिति पर जारी परिपत्र’ एवं जान स्टुअर्ट मिल के स्वतंत्रता पर विचारों की जानकारी रखनी जरूरी है, क्योंकि ये चारों आधुनिक समय के समाज और सरकारी संगठन के कार्यक्रम सम्बंधी मूल दस्तावेज हैं।” उन्होंने आगे कहा “मजदूर वर्गों ने इन पर उतना ध्यान नहीं दिया, जितना कि उन्हें देना चाहिए था”। इसकी बजाय “वे प्राचीन राजाओं और रानियों की मनगढ़ंत कहानियां पढ़ कर आनंदित होते रहे।

इस उद्धरण से यह प्रचार मिथ्या हो जाता है कि डॉ. आंबेडकर मार्क्स के विरोधी थे। जो डॉ. आंबेडकर मार्क्स के कम्युनिस्ट घोषणापत्र को मजदूर वर्ग के लिए पढ़ना आवश्यक मान रहे हों, उन पर यदि मार्क्सवादी खेमे से यह आरोप लगाया जाता है कि उनका आंदोलन मार्क्सवाद को कमजोर कर रहा था तो इसका अर्थ सिवाय इसके और क्या हो सकता है कि उन्होंने डॉ. आंबेडकर को पढ़ना जरूरी ही नहीं समझा। वे दलितों से तो यह अपेक्षा करते हैं कि वे मार्क्स को पढ़ें और मार्क्सवाद से जुड़ें। पर वे स्वयं न आंबेडकर पढ़ना चाहते हैं, न समझना। यह एक विडम्बना है, जिसके परिणाम स्वरूप ही भारत में कम्युनिस्ट आंदोलन असफल रहे हैं।

सम्भवतः समाजवादी विचारों के मधुलिमये पहले व्यक्ति थे, जिन्होंने समाजवाद के आंदोलन में डॉ. आंबेडकर की भूमिका को समझा था। उन्होंने उनकी पुस्तक ‘जाति का उच्छेद’ को कम्युनिस्ट मैनीफैस्टो के बराबर महत्व दिया था। उन्हेांने लिखा है कि आंबेडकर का सारा जोर जाति के विनाश पर था। उनके मुताबिक इसके बिना न वर्ग का निर्माण हो सकता है और ना ही वर्ग संघर्ष संभव है।[ii]

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डॉ. आंबेडकर ने मार्क्सवाद का गहरा अध्ययन किया था। उन्हेांने अन्य भारतीय तथा पश्चिमी समाजवादियों के सिद्धांतों का भी अध्ययन किया था। यूरोपीय देशों में अपने प्रवास के दौरान उन्होंने पूंजीवद और उसके दमन चक्र को करीब से देखा था तो भारतीय समाज में दलित वर्ग में पैदा होने के कारण जाति व्यवस्था के कटु अनुभव तो उनके पास थे ही। वे किसी भी सिद्धांत, दर्शन और नियम को उन करोड़ों लोगों की दृष्टि से देखते थे, जो दलित, अछूत शोषित और गरीब हैं। इसलिए उनकी समाजवाद की अवधारणाएं अन्य समाजवादी अवधारणाओं से थोड़ी भिन्न हैं। उन्होंने एक जगह कहा है कि “यदि कार्ल मार्क्स भारत में पैदा होता और उसे अपना प्रसिद्ध ग्रंथ कैपिटल भारत में बैठ कर लिखना पड़ता तो वह उसे दूसरे ढंग से ही लिखता।”[iii] इससे उनके अध्ययन की गम्भीरता को समझा जा सकता है।

डॉ. आंबेडकर मानते हैं कि कम्युनिज्म सर्वहारा की मुक्ति का सिद्धांत है। यदि सर्वहारा समाज का वह वर्ग है, जो अपनी आजीविका के साधन पूर्णतया तथा केवल अपने श्रम की बिक्री से हासिल करता है, किसी पूंजी से हासिल किए गए मुनाफे से नहीं[iv], तो भारत में दलित जातियां ही सर्वहारा वर्ग है। लेकिन फ्रेडरिक एंगेल्स का यह मत भारत पर लागू नहीं हो सकता कि सर्वहारा उस औद्योगिक क्रांति के फलस्वरूप पैदा हुआ वर्ग है, जो गत शताब्दी के उत्तरार्ध में इंग्लैण्ड में हुई थी।[v] यह मत इंग्लैण्ड, जर्मनी और फ्रांस आदि देशों के बारे में सच हो सकता है। परंतु भारत का सर्वहारा अर्थात् गरीब और श्रमजीवी वर्ग वर्ण व्यवस्था के गर्भ से पैदा हुआ है। भारत में जिस समय वर्ण व्यवस्था अस्तित्व में आयी उसी समय सर्वहारा भी अस्तित्व में आया। इसलिए भारत का सर्वहारा वर्ग किसी औद्योगिक क्रांति का परिणाम नहीं है। वह एक ऐसा वर्ग है, जो जन्म से ही सर्वहारा है, जन्म से ही दलित है और जन्म से ही दास है। मार्क्सवाद की नई सामाजिक व्यवस्था उद्योगों में निजि स्वामित्व का पूर्ण उन्मूलन चाहती है। उसमें उसके स्थान पर उत्पादन के औजारों का समाज उपयोग तथा तमाम वस्तुओं का वितरण सबकी सहमति से होगा अथवा तथाकथित वस्तुओं की साझेदारी होगी।[vi]

डॉ. आंबेडकर इससे सहमत हैं कि उद्योगों में निजी स्वामित्व का पूर्ण उन्मूलन जरूरी है। लेकिन यह उन्मूलन किस तरह होगा? डॉ. आंबेडकर यहां कम्युनिस्टों के इस तरीके से सहमत नहीं हैं कि सर्वहारा क्रांति इसे धीरे-धीरे करेगी और वह निजी स्वामित्व को तभी मिटा सकेगी जब उत्पादन [vii] के साधनों का आवश्यक परिमाण में निर्माण हो जाएगा।

भारत में निजी स्वामित्व मनु की न्याय व्यवस्था का अंग है, जिसे धर्म का रूप दे दिया गया है। यहां निजी स्वामित्व का इतिहास और उसकी अवधारणा उस इतिहास और अवधारणा से भिन्न है, जिसे मार्क्स और एंगेल्स ने निरूपित किया है। भारत में वर्ण व्यवस्था ने उद्योग, व्यापार और व्यवसाय करने का अधिकार सिर्फ वैश्य वर्ण या वर्ग को दिया है। इस प्रकार यहां पूंजी का केंन्द्रीकरण उस हिन्दू अर्थ व्यवस्था की देन है, जो वर्ण व्यवस्था के रूप में हिन्दुत्व का प्राण है। इस वर्ण व्यवस्था को समाप्त किए बिना निजी स्वामित्व को मिटाना सम्भव नहीं है जबकि भारत में वर्ण व्यवस्था को सुरक्षित रखने के लिए पूंजीपतियों द्वारा तमाम उपक्रम किए जा रहे हैं।

मार्क्सवाद जनवाद को निजी स्वामित्व पर प्रहार करने तथा सर्वहारा का अस्तित्व सुनिश्चित करने के लिए जो कार्यवाहियां सम्पन्न करने का साधन के रूप में इस्तेमाल करता है, वे कार्यवाहियां इस प्रकार हैं –

  1. उत्तराधिकार के उन्मूलन तथा अनिवार्य ऋण आदि साधनों से निजी स्वामित्व को सीमित करना।
  2. भूस्वामियों, कारखानेदारों, रेलों और जहाजों के स्वामियों की सम्पति को, राजकीय उद्योग की ओर से होड़ के जरिए और करेन्सी नोटों में मुआवजे की अदायगी के जरिए धीरे-धीरे छीन लेना।
  3. बहुसंख्यक जनता के खिलाफ विद्रोह करने वालों की सम्पति छीन लेना।
  4. कारखानों में सर्वहाराओं के श्रम या व्यवसाय का संगठन करना और जब तक कारखानेदार मौजूद रहते हैं, उन्हें ऊंची मजदूरी देने के लिए बाध्य करना, जितनी राज्य देता है।
  5. निजी स्वामित्व का पूर्ण उन्मूलन होने तक समाज के तमाम सदस्यों के लिए काम करने की समान अनिवार्यता।
  6. निजी बैंकों को बंद कर राजकीय बैंकों का गठन।
  7. राष्ट्रीय कल कारखानों, वर्कशाप, रेलों और जलपोतों की संख्या में वृद्धि, बिना जोती जमीन की काश्त तथा पहले से जोती जमीन का सुधार
  8. तमाम बच्चों को बड़े होते ही राष्ट्रीय संस्थानों में राष्ट्रीय खर्च पर शिक्षा, जो उत्पादन से जुड़ी हो।
  9. परिवहन के तमाम साधनों का राष्ट्र के हाथों में संकेन्द्रण।[viii]

मार्क्सवाद कहता है कि निजी स्वामित्व पर एक बार पहला मूलगामी हमला हो जाए तो वह सर्वहारा राज्य के हाथों में सारी पूंजी, सारी कृषि, सारे उद्योग, सारे परिवहन और विनिमय के सारे साधनों को केंद्रित करने की ओर अग्रसर होने के लिए विवश होगा। जब सारी पूंजी, सारा उत्पादन और सारा विनिमय राष्ट्र के हाथों में जमा हो जाएगा, तो निजी स्वामित्व का अस्तित्व अपने आप मिट जाएगा।[ix]

डा. आंबेडकर और कार्ल मार्क्स

पश्चिमी देशों में ऐसी जनवादी व्यवस्था सम्भवतः अस्तित्व में आ सकती है। परंतु भारत में जाति व्यवस्था से टकराये बिना जनवाद को सफलता मिलनी मुश्किल है। ऊपर की जनवादी कार्यवाहियों में यदि यह भी शामिल कर लिया जाए कि जनवादी व्यवस्था में वर्ण व्यवस्था और जातिभेद को मानने वालों की भी सम्पति छीन ली जाएगी तो यह सम्भव है  कि भारत में भी यह क्रांति सम्पन्न हो जाए।

यहां मैं डॉ. आंबेडकर के उन सवालों को रखना जरूरी समझता हूं, जो उन्होंने कम्युनिस्ट क्रांति के संदर्भ में उठाए थे। इन सवालों पर चर्चा श्री सोहन लाल शास्त्री ने अपनी ‘पुस्तक बाबा साहेब के सम्पर्क में मेरे पच्चीस वर्ष’ में विस्तार से की है। उनके अनुसार डॉ. आंबेडकर कहते हैं, अगर कल कम्युनिस्ट भारत में अपनी राज्य सत्ता स्थापित कर लेते हैं, तो उन्हें भी अपना शासन चलाने के लिए तीन चीजों की आवश्यकता होगी। पहली आवश्यकता प्रशासन चलाने वाली मशीनरी की, अर्थात सिविल अफसरों की, दूसरी आवश्यकता होगी – सेना की और तीसरी आवश्यकता होगी श्रम अर्थात् श्रमिकों की। वे मौजूदा अफसरों, सेना तथा श्रमिकों से ही काम चलाएंगे। इस समय प्रशासन और सेना का सारा संगठन सवर्ण हिन्दुओं का है। यही सवर्ण अधिकारी कल अंग्रेजी राज में सत्ता सम्पन्न थे। यही आज कांग्रेस के राज में सत्ता सम्पन्न हैं और यहीं कल को कम्युनिस्ट राज में भी सत्ता सम्पन्न बन कर रहेंगे। भारत की अछूत जन जातियां तथा पिछड़ा वर्ग शूद्र जिस तरह सत्ता सम्पन्न न कल थे और न आज हैं, उसकी प्रकार वे कम्युनिस्ट राज में भी नहीं रहेंगे।[x]

तीसरी श्रेणी मजदूर वर्ग के बारे में डॉ. अम्बेडकर ने कहा कि इस वर्ग में भारत का अछूत वर्ग भी आता है, जिनका काम सड़कें साफ करना तथा गंदगी उठाना, खेतों में मजदूरों के रूप में काम करना, छोटीमोदी दस्तकारी करना तथा कल कारखानों में परिश्रम करना है। इन लोगों को कम्युनिस्ट राज में मजदूरी अच्छी मिलेगी। रहने के लिए आवास भी अच्छे मिल जाएंगे। किन्तु इन्हें न तो प्रशासन तंत्र में और न सैनिक शासन में दखल प्राप्त होगा। ये लोग जो काम आज करते हैं, वहीं करते रहें। किन्तु इनकी आर्थिक दशा अवश्य अच्छी हो जागी। जब कोइ व्यक्ति यह प्रश्न उठाएगा कि हमारे बच्चों को भी प्रशान में अधिकार मिलने चाहिए तो कम्युनिस्ट सरकार का उत्तर होगा कि हमारी दृष्टि में प्रशासनिक अधिकारी और सड़क साफ करने वाले मजदूर एक समान हैं। तुम्हें सड़कें साफ करने का पूरा अनुभव है अतः वहीं काम करो। परिणाम यह होगा कि आज का अछूत और दलित वर्ग समाज में तीसरे स्थान पर ही रहेगा और वर्ण व्यवस्था के अनुयायी सवर्ण वर्गों के हाथों में ही शासन सत्ता बनी रहेगी। भले ही कम्युनिस्ट राज में छुआछूत न रहे, पर रहेंगे वे झाडू देने वाले ही।[xi]

डॉ अम्बेडकर ने अपने कथन की पुष्टि में तेलंगाना का उदाहरण दिया था, जहां अछूत खेत मजदूरों ने बड़े जमींदारों की भूमि छीनने में साम्यवादियों के साथ मिलकर संघर्ष किया था। उनमें सैकड़ों अछूत मजदूर मारे भी गए थे। लेकिन जब भूमि के बंटवारे का समय आया तो ऊंची जाति के कम्युनिस्टों ने अछूत मजदूरों से कहा कि – “तुम्हारी मजदूरी हम दुगनी कर देंगे, पर तुम्हें भूमि का मालिक नहीं बनाया जा सकता।” वहां छीनी गई भूमि कम्मे और रेड्डी जमींदारों को दे दी गई। डॉ. आंबेडकर ने पूछा, क्या यही उदाहरण सारे भारत में कम्युनिस्ट राज स्थापित होने पर चरितार्थ नहीं होगा?[xii]

भारत में जनवादी क्रांति के संदर्भ में डॉ आंबेडकर के इन सवालों पर साम्यवादियों ने न तब विचार किया था और न वे आज विचार करना चाहते हैं। जब तक भारत के कम्युनिस्ट प्राचीन साम्राज्यवाद अर्थात चातुर्वर्ण व्यवस्था पर प्रहार नहीं करेंगे और जातियों के विनाश को अपने आंदोलन का मुख्य ध्येय नहीं बनाएंगे तब तक भारत में ऐसी कोई क्रांति नहीं लायी जा सकती, जैसी रूस और चीन में लाई जा चुकी है।

डॉ आंबेडकर भारतीय कम्युनिस्टों को बंच आफ द ब्राह्मण बायज कहते थे और अफसोस करते थे कि गरीब और मजदूरों की मुक्ति का एक क्रांतिकारी आंदोलन भारत में गलत हाथों में आकर बेकार हो गया। इससे मार्क्सवाद के प्रति उनके सकारात्मक दृष्टिकोण को समझा जा सकता है।

डॉ. आंबेडकर कम्युनिस्ट पार्टी के घोषणापत्र से काफी प्रभावित हुए थे। वे इस विचार से सहमत थे कि पूंजीवादी समाज में पूंजी स्वतंत्र है और उसका व्यक्तित्व होता है, परंतु जीवित व्यक्ति परतंत्र है और उसका कोई व्यक्तित्व नहीं होता। वे भी पूंजीवादी व्यक्तित्व, पूंजीवादी स्वतंत्रता तथा पूंजीवादी स्वाधीनता को जड़ मूल से खत्म कर देने के समर्थक थे। सर्वहारा के लिए मार्क्स का यह नारा भी उन्हें पसंद था कि दुनिया के मजदूरों एक हो, तथा तुम्हारे पास खोने के लिए गुलामी की बेडि़यों के सिवा कुछ नहीं है और पाने के लिए अनंत आकाश है। किंतु, भारत के संदर्भ में डॉ. आंबेडकर इसकी व्याख्या करते हुए कहते थे कि वर्ण और जाति भेद भारत के मजदूरों को एक नहीं होने देगा, क्येांकि यहां के मजदूरों (सवर्ण मजदूरों) के पास गुलामी की बेडि़यां ही खोने के लिए नहीं है, विशेषाधिकार भी हैं, जिन्हें वे खोना नहीं चाहते।

श्रमिकों की मुक्ति के संबंध में डॉ. आंबेडकर के विचारों में कम्युनिस्ट घोषणापत्र का प्रभाव देखा जा सकता है। पर वे स्वतंत्रता जैसे शाश्वत सत्य को समाप्त करने के पक्षधर नहीं थे। वे इस बात से सहमत थे कि सर्वहारा वर्ग को सबसे पहले राजनैतिक प्रभुत्व प्राप्त करना है और राष्ट्र में प्रधान वर्ग का स्थान ग्रहण करना है। इसीलिए उन्होंने कहा था – “भारत को नेतृत्व चाहिए और यह नेतृत्व उसे श्रमिक वर्ग ही दे सकता है। एक सही नेतृत्व के लिए आदर्शवाद और स्वतंत्र विचार का होना जरूरी है। अभिजात वर्ग आदर्शवादी हो सकता है, पर स्वतंत्र रूप से वह नहीं सोच सकता। श्रमिक वर्ग में दोनों चीजें सम्भव हैं – आदर्शवाद भी और स्वतंत्र सोच भी। लेकिन मध्यवर्ग में न आदर्शवाद हो सकता है और स्वतंत्र सोच। मध्यवर्ग में तो उतनी उदारता भी नहीं होती है, जितनी एक आदर्श को स्वीकारने और विकसित करने के लिए जरूरी होती है। उसमें ‘नयी व्यवस्था’ की भी लालसा नहीं होती है, जिसकी आशा में श्रमिक वर्ग जिन्दा रहता है। अतः श्रमिक के नेतृत्व से भारतीय संघर्ष में उतरेंगे और संगठित होंगे। इसका परिणाम होगा स्वाधीनता और एक नयी समाज व्यवस्था। ऐसी विजय के लिए सब को लड़ना होगा। यह विजय ही सबकी विरासत होगी और उस विरासत में भागीदारी के लिए संगठित भारत के अधिकारों से कोई वंचित नहीं होगा।”[xiii]

वर्ष 1848 में कम्युनिस्ट मैनफिस्टो रिलीज करते कार्ल मार्क्स की एक पेंटिंग

डॉ. आंबेडकर फ्रांसीसी क्रांति से भी प्रभावित थे। उन्होंने स्वतंत्रता, समानता और बंधुता के सूत्र इसी क्रांति से लिए थे। उन्होंने 1942 में अपने रेडियो वार्ता में, जो ‘वाई इंडियन लेबर इज डिटरमिन्ड टू विन द वार’ शीर्षक से उनकी रचनावली में संकलित है, कहा है कि मजदूर वर्ग को स्वाधीनता, समानता और बंधुता की आवश्यकता है। उन्होंने इन तीनों सिद्धांतों को मजदूर वर्ग की दृष्टि से देखा। उन्होंने कहा कि इन सिद्धांतों को लेकर मजदूर वर्ग की अवधारणाएं बहुत स्पष्ट हैं। उन्होंने कहा मजदूर वर्ग के लिए स्वाधीनता का अर्थ है जनता के द्वारा शासन। लेकिन, उन्होंने कहा कि इसका अर्थ संसदीय लोकतंत्र नहीं है। संसदीय लोकतंत्र वह व्यवस्था है, जिसमें जनता अपने मालिकों को वोट देकर उन्हें अपने ऊपर शासन करने के लिए छोड़ देती है। उन्होंने कहा कि मजदूर वर्ग वह सरकार चाहता है, जो नाम से ही नहीं, हकीकत में भी जनता के द्वारा शासित हो। उसके लिए स्वाधीनता का अर्थ है सबके लिए समान अवसर और यह कि राज्य प्रत्येक व्यक्ति को उसकी जरूरत के अनुसार विकास के लिए सारी सुविधाएं प्रदान करें।

इसी तरह उन्होंने समानता को स्पष्ट करते हुए कहा कि मजदूर वर्ग जिस समानता को चाहता है, उसका अर्थ है नागरिक सेवाओं से लेकर सेना, व्यापार और उद्योग तक हर क्षेत्र में हर प्रकार के विशेषाधिकार को खत्म किया जाए। वे तमाम चीजें खत्म की जाएं, जो असमानता पैदा करती हैं।

मजदूर वर्ग के लिए बंधुता का क्या अर्थ है? इसे स्पष्ट करते हुए डॉ. आंबेडकर बताते हैं कि इसका अर्थ है : ‘पृथ्वी पर शांति और मानव के प्रति सदिच्छा के मकसद के साथ सभी जातियों और राष्ट्रों में समान मानवीय भाईचारे का सर्वव्यापक भाव।’[xiv]

डॉ. आंबेडकर ने जिस समय यह रेडियो भाषण दिया था, उस समय दूसरा विश्वयुद्ध चल रहा था। डॉ. आंबेडकर ने इस युद्ध को ‘पब्लिक वार’ (जनता का युद्ध) कहा था, जबकि मार्क्सवादियों ने इस सच्चाई को बहुत बाद में स्वीकारा था। उन्होंने कहा था कि मजदूर वर्ग को यह मालूम है कि यह युद्ध नयी नाजी व्यवस्था और पुरानी व्यवस्था दोनों के विरूद्ध है। उन्होंने कहा था कि इस लड़ाई की कीमत पर ही वह नयी व्यवस्था स्थापित होगी, जिसमें स्वाधीनता समानता और बंधुता केवल नारे नहीं होंगे, बल्कि जीवन की हकीकत होगी।[xv]

उन्होंने फ्रांसीसी क्रांति की याद दिलाते हुए कहा कि नई व्यवस्था की जड़ें फ्रांसीसी क्रांति में है।

उन्होंने कहा कि फ्रांसीसी क्रांति ने दो सिद्धांतों को उभारा। पहला स्वशासन (स्वराज) का सिद्धांत और दूसरा आत्मनिर्णय (स्वाधीनता) का सिद्धांत। स्वशासन का सिद्धांत लोगों की स्वयं शासन करने की भावना को बताता है, न कि दूसरे लोगों द्वारा शासित होने को, चाहे वे दूसरे शासक राजा, तानाशाह अथवा विशेषाधिकार सम्पन्न वर्ग हों। आत्मनिर्णय अथवा स्वाधीनता का सिद्धांत बाहरी दबाव के बिना, समान विचारों और समान उद्देश्यों के साथ निर्णय लेने के लिए लोगों को संगठित होने की भावना को व्यक्त करता है। इसी को डॉ. आंबेडकर राष्ट्रवाद कहते हैं। इन सिद्धांतों के अमल पर मानवता की आशा केंद्रित थी। पर उन्होंने कहा कि दुर्भाग्य से 140 साल के बाद भी ये सिद्धांत अमल में नहीं लाएगा। वहीं पुरानी व्यवस्था अपने नग्न रूप में कायम रही या फिर इन दोनों सिद्धांतों को अमल में लाने का झूठा स्वांग किया गया।[xvi]

लेकिन राष्ट्रवादियों को डॉ. ऑम्बेडकर ने मजदूर वर्ग का शत्रु माना है। उन्होंने कहा कि मजदूर वर्ग राष्ट्रवाद को पूजा की वस्तु (ताबीज) बनाने के लिए तैयार नहीं है। अगर राष्ट्रवाद का अर्थ प्राचीन अतीत की पूजा करना है, तो मजदूर वर्ग उसे स्वीकार नहीं कर सकता। मजदूर वर्ग यह नहीं चाहेगा कि जीवित को मार दिया जाए और मरे हुए को जीवित मान लिया जाए। उन्होंने कहा कि अगर राष्ट्रवाद जीवन का इस तरह पुनर्निर्माण और पुनर्गठन  करता है, तो मजदूर वर्ग इस राष्ट्रवाद को मानने से इनकार कर देगा।

उन्होंने कहा कि मजदूर वर्ग का सिद्धांत या मत अंतर्राष्ट्रवाद है। वह राष्ट्रवाद में केवल लोकतंत्र के चक्र के कारण रूचि लेता है, जो प्रतिनिधि संसद, उत्तरदायी कार्यपालिका तथा संवैधानिक सभाओं के रूप में राष्ट्रीय भावनाओं से संगठित समुदाय में बेहतर काम करता है। मजदूर वर्ग के लिए राष्ट्रवाद केवल एक लक्ष्य तक जाने का साधन है। वह स्वयं में लक्ष्य नहीं है, जिसके लिए मजदूर जीवन के अत्यंत अनिवार्य सिद्धांतों का त्याग करने को तैयार हो सकता है।[xvii]

क्या मार्क्सवाद इससे कुछ भिन्न मजदूर वर्ग के बारे में विचार करता है? क्रांति की अवधारणा को लेकर यह अंतर जरूर है कि डॉ. आंबेडकर लोकतंत्र में विश्वास करते हैं। जबकि मार्क्सवादी अवधारणा सर्वहारा की तानाशाही की अवधारणा है। शुरू में डॉ. आंबेडकर इस मत के जरूर थे कि संसदीय लोकतंत्र जनता की मूल समस्याओं को हल नहीं कर सकता।[xviii] 1943 में उन्होंने आल इंडिया ट्रेड यूनियन वर्कर्स के एक सम्मेलन में, जो 8 से 17 सितम्बर तक एक सप्ताह चला था, ‘मजदूर और संसदीय लोकतंत्र’ पर बहुत महत्वपूर्ण भाषण दिया था, जो भारत के मजदूर संगठनों के बारे में आज भी अर्थपूर्ण है। इस भाषण में उन्होंने इस विषय पर विस्तार से प्रकाश डाला है कि संसदीय लोकतंत्र क्यों असफल हो गया? उन्होंने कहा कि खराब विचारधारा से ज्यादा खराब संगठन भी लोकतंत्र की असफलता के लिए जिम्मेदार रहा है।[xix]  उन्होंने कहा कि यह एक बुराई है कि सारे राजनैतिक समाज शासक और शासित दो वर्गों में बंट जाते हैं और इससे भी खराब यह है कि शासक हमेशा शासक वर्गों से ही आते हैं  तथा शासित लोगों का वर्ग कभी शासक नहीं बन पाता।[xx] उन्होंने कहा लोकतंत्र इसी शासक वर्ग की वजह से गरीब मजदूर और दलित वर्गों को लाभ पहुंचाने में असफल रहा है।

डॉ. आंबेडकर का यह भाषण लोकतंत्र की विफलता की घोषणा नहीं है, जैसा कि डॉ. रामविलास शर्मा जैसे कुछ विचारकों ने भी समझ लिया है।[xxi] यह भाषण उन परिस्थितियों को रेखांकित करता है, जिनमें लोकतंत्र मजदूरों की आशाओं को पूरा नहीं करता है। ये परिस्थितियां को रेखांकित करता है, जिनमें लोकतंत्र मजदूरों की आशाओं को पूरा नहीं करता है। ये परिस्थितियां शासक वर्ग द्वारा निर्मित हैं, लोकतंत्र द्वारा नहीं। आगे वे परिस्थितियों का आर्थिक विश्लेषण करते हुए कहते हैं कि यदि लोकतंत्र गरीब मजदूर और दलित वर्ग को खुशहाली नहीं दे सका है तो इसके लिए वे स्वयं भी जिम्मेदार हैं। इन वर्गों ने अपने जीवन के निर्माण में आर्थिक पक्ष के प्रभाव की अनदेखी की है। उसके प्रति उन्होंने विस्मित कर देने वाला उदासीन रवैया अपनाया है।[xxii]

उस समय किसी ने एक किताब लिखी थी, ‘आर्थिक मानव का अंत’ (एंड आफ द इकोनोमिक मैन)। इस किताब का हवाला देते हुए डॉ. आंबेडकर ने कहा कि हम आर्थिक मानव के अंत के विषय में बात नहीं कर सकते और इसलिए नहीं कर सकते, क्योंकि आर्थिक मानव कभी पैदा ही नहीं हुआ। उन्होंने कहा कि मार्क्स को दिया गया आम जवाब कि मनुष्य केवल रोटी पर जिन्दा नहीं रह सकता, दुर्भाग्य से सच है। वे कार्ल के इस मत से सहमत थे कि सभ्यता का मकसद लोगों की चर्बी बढ़ाना नहीं है, जैसा कि सूअर करते हैं। लेकिन, उन्होंने कहा कि हम इस स्थिति से बहुत दूर हैं। सूअरों की तरह मोटा होना तो दूर, मजदूर वर्ग भूखे मर रहे हैं। और हरेक चाहता है कि वह रोटी के बारे में पहले सोचे और बाकी चीजों के बारे में बाद में।[xxiii]

उन्होंने इतिहास की आर्थिक व्याख्या के मार्क्सवादी सिद्धांत पर टिप्पणी करते हुए कहा कि इस पर विवाद है, पर उनके विचार में मार्क्स ने यह व्याख्या एक सिद्धांत के तौर पर कम, मजदूरों को निर्देश देने के तौर पर ज्यादा प्रतिपादित की थी। उन्होंने कहा कि यदि मजदूर वर्ग भी अपने आर्थिक हितों को उसी तरह सर्वोच्च प्राथमिकता दे, जिस तरह मालिक वर्ग देते हैं तो इतिहास जीवन के आर्थिक तथ्यों की पहले की अपेक्षा ज्यादा सही तस्वीर होगा। उन्होंने कहा कि यदि इतिहास की आर्थिक व्याख्या का सिद्धांत पूरी तरह सही नहीं है तो इसका कारण यह है कि मजदूर एक वर्ग के रूप में  जीवन से जुड़े आर्थिक तथ्यों को ताकत देने में असफल हो गए हैं।[xxiv]

इसी भाषण में उन्होंने मजदूर वर्गों को कम्युनिस्ट घोषणापत्र पढ़ने की सलाह दी है जिसका उद्धरण इस लेख के आरम्भ में दिया जा चुका है। उन्होंने आगे इसी भाषण में एक अति महत्वपूर्णबात यह कही है कि मजदूर वर्ग ने अपने ही खिलाफ एक बड़ा अपराध यह किया है कि उसने सरकार पर कब्जा करने की किसी आकांक्षा को अपने अंदर विकसित नहीं किया है, यहां तक कि अपने हितों की सुरक्षा के लिए वे सरकार पर नियंत्रण की भी आवश्यकता नहीं समझते हैं। उन्होंने इस अन्य सभी त्रासदियों से बड़ी त्रासदी माना है।

उन्होंने मजदूर संगठनों का ट्रेड यूनियन में बदल जाने को भी आलोचना की है। उन्होंने कहा कि वे ट्रेड यूनियनों के खिलाफ नहीं है, पर यह मानना गलत होगा कि यही मजदूरों की सभी समस्याओं का हल है। उन्होंने कहा कि ट्रेड यूनियनें यदि शक्तिशाली भी हैं तो इतनी शक्तिशाली नहीं हैं कि पूंजीपतियों को बेहतर पूंजीवाद लागू करने के लिए बाध्य कर सकें। उन्होंने कहा कि ट्रेड यूनियनें तब ज्यादा प्रभावशाली होती जब मजदूरों की सरकार भी होती। यदि ट्रेड यूनियनें सरकार को नियंत्रित करने का लक्ष्य नहीं बनातीं, तो वे मजदूरों का ज्यादा भला नहीं कर सकेंगी।[xxv]

अपने भाषण के अंत में डॉ. आंबेडकर ने मजदूर वर्ग को दो सुझाव दिए हैं, जो इतने क्रांतिकारी हैं कि मार्क्सवादी विचारक भी उन्हें अस्वीकार नहीं कर सकेंगे। उन्होंने कहा कि यदि मजदूर वर्ग को संसदीय लोकतंत्र के भीतर रहना है तो उन्हें इसे अपने हित में बदलने के लिए सर्वोत्तम तरीके ईजाद करने होंगे। उन्होंने कहा कि इस मकसद को हासिल करने के लिए दो चीजें जरूरी हैं। पहली, मजदूरों को यह घोषणा करनी होगी कि उनका लक्ष्य मजदूरों की सरकार कायम करना है। इस काम के लिए उन्हें मजदूरों की एक राजनैतिक पार्टी संगठित करनी चाहिए। यह एक ऐसी पार्टी होनी चाहिए, जिसे साम्प्रदायिक और पूंजीवादी राजनैतिक दलों जैसे हिन्दू महासभा और कांग्रेस से समान रूप से अलग और असम्बद्ध रखना होगा। उन्होंने कहा कि इस पार्टी को निहित स्वार्थों को दूर करने वाली ट्रेड यूनियनों से भी दूर रखना होगा।[xxvi]

यदि हम आजादी से पहले तथा बाद के समय में कम्युनिस्ट संगठनों और कम्युनिस्ट राजनीति की समीक्षा करें, तो क्या तस्वीर उभर कर आती? क्या वे कांग्रेस से नहीं जुड़े  और क्या वे घोर हिन्दुत्ववादी साम्प्रदायिक पार्टी भाजपा के भी साथ नहीं खड़े हुए? इससे भी बड़ी विडम्बना तो यह है कि दलित संगठनों और दलित राजनीति ने भी आजादी के बाद लगभग यही भूमिका निभायी। कुछ रेडिकल वामपंथी और दलित विचारक इस जन विरोधी निर्लज्ज भूमिका को दुखद मानते हैं तो इससे भविष्य के सुधार की आशा की जा सकती है।

दूसरी जो चीज डॉ. आंबेडकर ने मजदूरों के लिए कही, वह यह है कि उन्हें सकारात्मक तौर पर यह प्रमाणित करना पड़ेगा कि वे बेहतर शासन कर सकते हैं। उन्होंने कहा कि जब मजदूर जनता के सामने सत्ता पर अपना दावा पेश करेंगे, तो यह सवाल अवश्य उठेगा कि क्या मजदूर शासन करने योग्य है? तब यह कहना कि दूसरे लोगों से बुरा शासन मजदूर नहीं करेंगे, कोई सही जवाब नहीं होगा। उन्होंने कहा कि यह बात नहीं भूलनी चाहिए कि मजदूर शासन का माडल अन्य वर्गों की सरकारों के माडल से कहीं ज्यादा मुश्किल है। यह नियंत्रण की व्यवस्था पर आधारित सरकार होगी और इसके लिए पर्याप्त ज्ञान और प्रशिक्षण की आवश्यकता है। उन्होंने इस बात पर दुख व्यक्त किया कि भारत में मजदूर कुछ सीखना नहीं चाहते। भारत में मजदूर नेताओं ने यदि कुछ सीखा है तो यह कि वे किस बढि़या तरीके से उद्योगपतियों को गालियां दे सकते हैं। मजदूर नेता के रूप में सिर्फ गालियां देना ही उनका आरम्भ और अंत बन चुका है।[xxvii]

डॉ. आंबेडकर ने एक अछूत और मजदूर का जीवन साथ-साथ जिया था। हम नहीं कह सकते कि गांधी जी गिरमिटिया थे भी कि नहीं। पर, आंबेडकर ने न सिर्फ कुली का काम किया था बल्कि कुलियों की चाल में वे रहते भी थे। यह आकस्मिक नहीं है कि गांधी जी जिस ग्रामीण अर्थ व्यवस्था (दूसरे शब्दों में वर्ण व्यवस्था) के पक्षधर थे, आंबेडकर उसके उतने ही विरोधी थे। गांधी जी के लिए गांव एक आदर्श व्यवस्था थी जबकि डॉ. आंबेडकर गांवो को वर्णव्यवस्था को प्रयोगशाला कहते थे।[xxviii] वे गांवों के विनाश में ही भारत का विकास देखते थे। इसलिए वे गांवों के नगरीकरण की वकालत करते थे, जिसके लिए जरूरी था भारत  का औद्योगिकरण। उन्होंने अपने एक अन्य भाषण में जो उन्होंने 25 अक्टूबर, 1943 को विद्युत शक्ति के युद्धोत्तर विकास की समस्या पर भारत सरकार के श्रम सदस्य की हैसियत से दिया था कहा कि भारत में गरीबी इसलिए है क्योंकि इसका अस्तित्व कृषि पर निर्भर करता है।[xxix] इस बात को उन्होंने अपने एक निबंध ‘स्माल होल्डिंस इन इंडिया एंड देयर रेमिडीज’ (1918) में बहुत विस्तार से स्पष्ट किया है। उनका कहना है कि भारत में जमीन पर जनसंख्या का बहुत अधिक दबाव है। इसी दबाव के कारण जमीन का बार-बार विभाजन होता है और बड़ी जोतें छोटी जोतों में बदलती जाती हैं। इसमें उत्तराधिकार के कानून को उन्होंने मुख्य कारण नहीं माना। इसका परिणाम यह होता है कि खेतों में अधिक से अधिक लोगों को काम नहीं मिल पाता है और बहुत बड़ी श्रम शक्ति बेकार बैठी रहती है। उन्होंने कहा कि यह बड़ी मुसीबत है क्योंकि बेकार बैठी श्रम शक्ति को जिन्दा भी रहना है और जिन्दा रहने के लिए उसे रोटी भी चाहिए। तब वह बचत को ही खाकर जिन्दा रहेगी। उन्होंने कहा कि निठल्ली श्रम शक्ति एक नासूर की तरह है, जो हमारे राष्ट्रीय लाभांश में वृद्धि करने की जगह जो कुछ थोड़ा बहुत लाभांश होता है उसे भी नष्ट कर जाता है।[xxx]

उन्होंने कहा कि इस समस्या को तभी हल किया जा सकता है जब कृषि को उद्योग का दर्जा दे दिया जाए। कृषि को उद्योग बनाये बिना कृषि क्षेत्र में सम्पन्नता नहीं लायी जा सकती। भूमि चकबंदी तथा काश्तकारी नियम भी यह सम्पन्नता नहीं ला सकते।[xxxi] उन्होंने कहा कि औद्योगिकरण से ही जमीन पर दबाव कम होगा और पूंजी तथा पूंजीगत सामान बढ़ने से जोतों का आकार बढ़ाने की आर्थिक आवश्यकता पैदा हो जाएगी। उन्होंने कहा कि यदि हमारी कृषि छोटी और बिखरी हुई जोतों की शिकार है, तो उसका हल निस्संदेह औद्योगीकरण करके ही निकल सकता है।[xxxii]

इसलिए डॉ. आंबेडकर ने शडयूल्ड कास्ट फेडरेशन की ओर से संविधान सभा को दिए गए अपने ज्ञापन (1947) में भारत के तीव्र औद्योगीकरण की मांग करते हुए कृषि को राज्य उद्योग घोषित करने की मांग की थी। उनका यह ज्ञापन ‘स्टेट्स एंड माइनारिटीज’ नाम से उनकी रचनाओं में संकलित है। इस ज्ञापन में राज्य समाजवाद, भूमि का राष्ट्रीयकरण, पृथक आबादी तथा पृथक निर्वाचक मंडल की वह अवधारणा है, जिसे वे संविधान का अंग बनाना चाहते थे। किन्तु संविधान सभा में शामिल होने तथा मसौदा समिति के चेयरमैन होने के बाद भी वे यथास्थितिवादियों के विरोध के कारण संविधान में इसे पूरी तरह शामिल नहीं करा पाए थे।

इस ज्ञापन में डॉ. आंबेडकर पूरी तरह अपनी समाजवादी विचारधारा के साथ दिखाई देते हैं। खेद है कि उनके बाद इस समाजवादी विचारधारा का दलित राजनीति और दलित आंदोलनों में विकास नहीं हो सका। सम्भवतः दलित आंदोलन के पथ भ्रष्ट हो जाने का कारण भी यही है कि उसने डॉ. आंबेडकर के समाजवादी विचारों की उपेक्षा की।

इस ज्ञापन के अनुच्छेद 2, अनुभाग -2 के खंड 4 में[xxxiii], जो आर्थिक शोषण के विरूद्ध संरक्षण के तौर पर है, कहा गया है कि संविधान में निम्नलिखित व्यवस्था की जाए –

  1. वे उद्योग, जो आधारभूत उद्योग हैं अथवा जिन्हें आधारभूत उद्योग घोषित किया जा सकता है, उनका संचालन एवं स्वामित्व राज्य का होगा।
  2. जो उद्योग आधारभूत उद्योग नहीं हैं, परंतु बुनियादी उद्योग है, उनका स्वामित्व और संचालन राज्य द्वारा अथवा राज्य द्वारा स्थापित निगमों द्वारा होगा।
  3. बीमा पर राज्य का एकाधिकार होगा।
  4. कृषि एक राज्य उद्योग होगा।[xxxiv]

कृषि उद्योग को संगठित करने की उनकी योजना इस प्रकार थी –

  1. राज्य अर्जित भूमि को मानक आकार के खेतों में विभाजित करेगा और उन्हें गांव के निवासियेां को निम्न शर्तों पर देगा –

(क) खेती सामूहिक रूप में की जाएगी।

(ख) खेती सरकार द्वारा जारी नियमों और निर्देशों के अनुसार की जाएगी।

(ग) खेती पर लगाए जाने वाले प्रभार को अदा करने के बाद शेष उपज को नियमानुसार आपस में बांट लेंगे।

  1. फार्मों को वित्तीय सहायता देने की जिम्मेदारी राज्य की होगी।
  2. भूमि गांव के लोगों को बिना किसी जातीय या धार्मिक भेदभाव के पट्टे पर इस तरह दी जाएगी कि कोई जमींदार न रहे, पट्टेदार न रहे और न कोई भूमिहीन मजदूर रहे।[xxxv]

डॉ. आंबेडकर की राज्य समाजवाद की यह अवधारणा कृषि और उद्योग पर राज्य के स्वामित्व की विशेषता के कारण मार्क्सवादी अवधारणा के काफी निकट है। पर, इस अवधारणा के साथ दोे बातें गौरतलब है। एक यह कि डॉ. आंबेडकर राज्य समाजवाद की अपनी योजना को केवल दस वर्षों के लिए लागू करना चाहते थे। उन्होंने लिखा है कि इसे लागू करने की अवधि संविधान लागू होने की तारीख से दसवें वर्ष के बाद नहीं बढ़ायी जाएगी।[xxxvi] इस सीमित योजना के पीछे उनका क्या मकसद था, यह उन्होंने नहीं बताया। वे यह भी नहीं बताते हैं कि दस वर्ष के बाद इस योजना का क्या होगा? क्या दस वर्ष के बाद पुनः उसी स्थिति को स्वीकार कर लिया जाएगा, जिसमें गरीबों, दलितों और मजदूरों को पूंजीपतियों के भरोसे उनकी शोषण की व्यवस्था में रहना होगा? उन्होंने इस संबंध में कुछ भी स्पष्ट नहीं किया।

दूसरी बात जो गौरतलब है वह उनका यह स्पष्टीकरण है जिसमें वे कहते हैं कि “इस खंड के पीछे मुख्य प्रयोजन राज्य पर यह दायित्व डालना है कि वह लोगों के आर्थिक जीवन को इस प्रकार योजनाबद्ध करे कि उसससे उत्पादकता का सर्वोच्च बिन्दु हासिल हो जाए और निजी उद्यम के लिए एक भी मार्ग बंद न हो और सम्पदा के समान वितरण के लिए भी उपबंध किया जाए।[xxxvii]

इसका अर्थ है कि डॉ. आंबेडकर निजी क्षेत्र के अवसर को भी खुला रखना चाहते थे। निजी उद्यम का मतलब निजी पूंजीवाद के सिवा और क्या हो सकता है? किंतु इसी स्पष्टीकरण में डॉ. आंबेडकर आगे कहते हैं कि “भारत के औद्योगिकरण के लिए राज्य समाजवाद बहुत जरूरी है। निजी उद्यम यह काम नहीं कर सकता और यदि कर भी सकता है, तो सम्पति की उन्हीं विषमताओं को पैदा करेगा जो निजी पूंजीवाद ने यूरोप में पैदा की है।”[xxxviii]

स्पष्ट है कि डॉ. आंबेडकर स्वयं यह विचार रखते थे कि पूंजीवाद और समाजवाद साथ साथ नहीं चल सकते। फिर निजी क्षेत्र का समर्थन करना उनकी समाजवाद की अवधारणा में एक अंतर्विरोध ही है। लेकिन उनकी अवधारणा में यह निजी क्षेत्र कृषि और बुनियादी तथा बड़े उद्योगों में नहीं था। इन क्षेत्रों में वे राज्य के स्वामित्व के ही पक्षधर थे।

डॉ. आंबेडकर के राज्य समाजवाद की मुख्य और मौलिक विशेषता यह है कि वे इसे विधायिका की मर्जी पर नहीं छोड़ते हैं, बल्कि उसे संविधान के कानून के द्वारा स्थापित करते हैं जिसे न तो विधायिका बदली सकती है और न कार्यपालिका। उनका मत था कि संसदीय लोकतंत्र  में बहुमत की सरकार होती है। किसी एक चुनाव में सत्ता में आया बहुमत कृषि और उद्योग में राज्य समाजवाद के पक्ष में हो सकता है, तो अगले चुनाव में विजयी बहुमत इसके विरुद्ध भी हो सकता है। ऐसी स्थिति में राज्य समाजवाद को विधायिका के भरोसे नहीं छोड़ा जा सकता, क्योंकि साधारण बहुमत उसे कभी भी बना और नष्ट कर सकता है।[xxxix]

फिर विकल्प क्या है? डॉ. आंबेडकर कहते हैं कि विकल्प है तानाशाही। यहां वे तानाशाही का समर्थन भी करते हैं, पर कहते हैं कि जो लोग व्यक्तिगत स्वतंत्रता में विश्वास रखते हैं, वे तानाशाही का विरोध करते हैं। उनकी यह व्यक्तिगत स्वतंत्रता संसदीय लोकतंत्र में ही संभव है। अतः जो स्वतंत्रता चाहते हैं, वे तानाशाही अपनाने के लिए तैयार नहीं होंगे, भले ही उसकी उपलब्धि राजकीय समाजवाद हो। अतः उन्होंने कहा कि इसका हल संसदीय लोकतंत्र ही है। और संसदीय बहुमत राजकीय समाजवाद की स्थापना को निलम्बित, संशोधित या नष्ट न कर पाये, इसके लिए संविधान में विधि द्वारा समाजवाद को विहित करना ही एक उपाय है।[xl]

उन्होंने कहा कि लोकतंत्र का सार ‘एक व्यक्ति एक मूल्य’ का सिद्धांत है। दुर्भाग्य से लोकतंत्र में ‘एक व्यक्ति एक मत’ का सिद्धांत अपना कर सिर्फ राजनैतिक ढांचे तक ही इसे लागू करने का प्रयास किया गया है उन्होंने कहा कि होना यह चाहिए था कि लोकतंत्र में एक व्यक्ति एक मूल्य का सिद्धांत अपनाया जाता है और उसके अनुरूप संविधान में समाज के आर्थिक ढांचे के आकार और स्वरूप को भी निर्धारित किया जाता। उन्होंने कहा कि अब समय आ गया है कि हम साहसी कदम उठाएं और संवैधानिक कानून के द्वारा समाज के आर्थिक और राजनैतिक दोनो ढांचों को परिभाषित करें।[xli]

वास्तव में डॉ. आंबेडकर की राज्य समाजवाद की अवधारणा, खास तौर से कृषि के क्षेत्र में आज भी क्रांतिकारी है। भारत के अन्य समाजवादी विचारकों में कोई भी, यहां तक कि नेहरू और लोहिया भी कृषि क्षेत्र में ऐसा परिवर्तन नहीं चाहते थे। नेहरू ने केवल भूमि सुधारों की अावश्यकता पर जोर दिया था, जबकि लोहिया कृषि क्षेत्र में किसी परिवर्तन के पक्षधर नहीं थे। एम.एन. राय की पार्टी ने भी कृषि क्षेत्र में एेसी किसी योजना पर विचार नहीं कियास था, जो आर्थिक परिवर्तन लाये। यह डॉ. आंबेडकर ही थे, जिन्होंने कृषि का औद्योगिकरण किए जाने की मांग की थी।[xlii]

डॉ. आंबेडकर की समाजवादी अवधारणा की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि उसके केंद्र में सिर्फ मजदूर और गरीब वर्ग है। वहां सवर्ण और दलित तथा हिन्दू और मुलसमान का भेद नहीं है। वे धर्म, सम्प्रदाय, वर्ण, जाति और लिंग के आधार पर मजदूर मजदूर में कोई भेद नहीं करते हैं। डॉ. रामविलास शर्मा ने ठीक लिखा है कि एक मजदूर नेता के रूप में डॉ आंबेडकर में जाति के भेद पीछे छूट गए थे।[xliii] वे सिर्फ वर्गों की बातें करते हैं और मजदूर वर्ग के हाथों में देश का नेतृत्व देखना चाहते हैं।

आज जब देश की अर्थ व्यवस्था उच्च कुलीन तथा मध्यम वर्ग के हाथों में है, जिन्होंने बर्बर शासकों से मिल कर देश को विशाल गरीब, दलित और मजदूर वर्गीय आबादी का जीना मुश्किल कर दिया है तब क्या मजदूर वर्ग के नेतृत्व का प्रश्न सिर्फ बौद्धिक विमर्श का विषय बना रहेगा? जनता के बीच इस सवाल को कौन लेकर जाएगा? क्या यह दायित्व दलित और वामपंथी विचारकों का नहीं है कि वे एक साझा सहमति का कार्यक्रम बना कर इस सवाल को आगे बढ़ायें?

(यह आलेख पहले-पहल हिंदी की साहित्यिक-वैचारिक पत्रिका तदभव के मार्च, 2012 अंक में प्रकाशित हुआ था। लेखक की अनुमति से पुर्नप्रकाशित)

संदर्भ

[i] डॉ. बाबासाहेब आम्बेडकर रायटिंग एंड स्पीचेज वाल्यूम 10, पृष्ठ 110

[ii] हिन्दी कलम, सम्पादक नीलकांत, जनवरी जुलाई 1996 में मधु लिमये का लेख

[iii] बौद्ध धर्म प्रचारक, मार्च 2002

[iv] मार्क्स एंगेल्स संकलित रचनाएं खंड 1, भाग 1, पृ. 97

[v] वहीं

[vi] वहीं, पृ. 105-6

[vii] वहीं, पृ. 107

[viii] वहीं, पृ. 108-9

[ix] वहीं, पृ. 109

[x] बौद्ध धर्म प्रचारक, मार्च 2002, पृ. 13

[xi] वही, पृ. 13-14

[xii] वहीं, पृ. 14

[xiii] बाबा साहेब राइटिंग एंड स्पीचेस, वा. 10, पृ. 43

[xiv] वही, पृ. 36

[xv] वही, पृ 36

[xvi] वही, पृ. 40

[xvii] वही, पृ. 41

[xviii] वही, पृ. 107

[xix] वहीं, पृ. 109

[xx] वहीं

[xxi] कल के लिए (दलित साहित्य विशेषांक) सम्पादक डॉ. जय नारायण, दिसम्बर 1998 में डॉ. रामविलाश शर्मा का लेख पृ. 8

[xxii] बाबा साहेब राइटिंग एंड स्पीचेस, वाल्यूम 10, पृ. 100

[xxiii] वहीं, पृ. 109

[xxiv] वहीं, पृ. 110

[xxv] वहीं

[xxvi] वहीं, पृ. 111

[xxvii] वहीं, पृ. 112

[xxviii] डॉ. आम्बेडकर संपूर्ण वाङ्मय, खंड 9, पृ. 39

[xxix] बाबा साहेब आम्बेडकर राइटिंग एंड स्पीचेस वाल्यूम 10, पृष्ठ 126

[xxx] डॉ. आम्बेडकर संपूर्ण वाङ्मय, खंड -2, पृ.267

[xxxi] वहीं, पृ. 193

[xxxii] वहीं, पृ. 271-72

[xxxiii] कृपया मूल पाठ के लिए देखिए, बा.सा.आ. राईटिंग एंड स्पीचेस, वाल्यूम 1, पृ. 396-97

[xxxiv] डॉ. आम्बेडकर संपूर्ण वाङ्मय, खंड 2, पृ. 108

[xxxv] वहीं, पृ. 181

[xxxvi] वहीं, पृ. 181

[xxxvii] वहीं, पृ. 193

[xxxviii] वहीं, पृ. 194

[xxxix] वहीं, पृ. 196

[xl] वहीं, पृ. 197

[xli] वहीं, पृ. 198

[xlii] वायस ऑफ बुद्धा, सम्पादक उदित राज, (16-31 मई 2002) में ज्ञान सिंह बल का लेख, पृष्ठ 7

[xliii] कल के लिए (दलित साहित्य विशेषांक) दिसंबर 1998, पृ. 10


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