‘भारत माता’ और उसकी बगावती बेटियाँ

आदिवासी दलित बहुजनों ने इक्कीसवीं सदी के मुख्यधारा के धर्म के रूप में स्थापित किए जा रहे, हिंदू धर्म में खुद को शामिल किए जाने के प्रयासों का लगातर विरोध किया है। साथ ही भारतीय महिलाएं राष्ट्रीय स्वंय सेवक संघ द्वारा निर्मित भारत माता की परिकल्पना को खारिज करते हुए राष्ट्र की अपनी छवियां गढ़ रही हैं. बता रही हैं निवेदिता मेनन :

भारत की माता थोपने के विरोध में पिंजरा तोड़ प्रदर्शन (साभार : टवीटर)

बेटियां, ‘भारत माता की’? कहाँ से आ गयीं ये भारत माँ की बेटियाँ, क्योंकि हिंदुत्ववादी भारत माता तो केवल पुत्र जनती हैं, वह भी हिंदू सवर्ण पुत्र, जो पुत्र अपनी माँ की अस्मिता की रक्षा करते हैं, जिसकी अस्मिता हमेशा ही संकट में रहती है।

इन संकटों की अभिव्यक्तियां किन रूपों में होती है इसे समझने की  शुरूआत निशा पाहुजा की बेचैन करने वाली फिल्म ‘वर्डस् बिफोर हर’ के उस लम्हे के साथ करते हैं, जिसमें दो युवा लड़कियों की कहानी कही जाती है। इसमें एक है, रूही, जो एक सौंदर्य प्रतियोगिता की प्रतिभागी है। दूसरी लड़की प्राची है, जो विश्व हिंदू परिषद के महिला शाखा हिंदू युवा वाहिनी को शिक्षित-दीक्षित करती है।


बाद में ये दोनों युवा लड़कियां अपने आगामी जीवन के प्रति अलग-अलग रूख अख्तियार करती हैं, रूही और उसके साथ सौंदर्य प्रतियोगिता में शामिल अन्य लड़कियाँ परंपरागत और आवेगहीन जीवन जीने वाली लड़कियों के रूप में सामने आती हैं, जबकि प्राची के अंदर एक आग है, प्रश्न हैं, और वह अपने दिमाग का स्वतंत्र तौर पर इस्तेमाल करती है। लेकिन फिल्म के अंत में आप इस बात को महसूस करेंगे कि इन दोनों लड़कियों के जीवन में उनके शिक्षा-दीक्षा के समय ही ने उनके लिए,  एक अवसर उपलब्ध कराया था, जिसमें उन्होंने जीवन के विशाल क्षितिज की एक छोटी सी झलक देखी थी। उनके लिए केवल यही एक छोटा सा लम्हा था, जिसमें भावावेग था और उम्मीद थी और एक स्त्री का असली जीवन शुरू होने से पहले की आजादी जैसी लगने वाली चीज थी। इन असली महिलाओं के असल जीवन ने, उनके लिए ये रास्ते बंद कर दिए।

पूरी फिल्म के दौरान प्राची फिल्म निर्माता से कहती रही कि वह कभी भी शादी नहीं करेगी। वह अपना पूरा जीवन हिंदुत्ववादी कार्यकर्ता के रूप में जीयेगी। वह दो टूक तरीके से एक पत्नी और माँ का अदना सा जीवन जीने से इंकार करती हैं। लेकिन अन्त में उसके पिता साफ-साफ घोषणा कर देते हैं कि ऐसा होने का सवाल ही नहीं उठता। वह कभी भी पूर्णकालिक कार्यकर्ता नहीं हो सकती है। उसे हर हालत में शादी करनी होगी। उसके पास एक बच्चेदानी है, क्या पुरूषों के पास बच्चेदानियां होती हैं? इसलिए उसकी जिम्मेदारी है कि वह बच्चों का पालन-पोषण करे। शुरू-शुरू में प्राची कुछ समय तक उद्दंडता की हद तक अपने पिता के तर्कों का तीखा प्रतिवाद करती है, लेकिन धीरे-धीरे वह चुप्पी के आगोश में चली जाती है। कुछ दिनों तक उसके तेवर विद्रोही बने रहते हैं, लेकिन सदमा और निराशा से भरे हुए। जो हमारे लिए प्राची की इस स्वीकृति के संकेत है कि हिंदू राष्ट्र की बेटी को सिर्फ माँ बनने के लिए शिक्षित-दीक्षित किया जाता है। हिंदू राष्ट्र की एक बेटी, जो सबसे बड़ी महत्वाकांक्षा पाल सकती है, वह है, माँ बनने की महत्वाकांक्षा। चूँकि वह एक सवर्ण परिवार में पैदा हुई है, इसलिए उसे इन नियमों का पालन करना ही है।

जब इन नियमों का पालन करने वाली ये बेटियां हैं, तो नियमों का पालन न करने वाली बेटियां कौन हैं? उद्दंड, हठी बेटियां कौन हैं? यह आलेख पूरे भारतीय परिदृश्य में हिंदुत्व की परियोजना का प्रतिरोध करने की संभावना रखने वाली और प्रतिरोध करने वाली शक्तियों की पहचान की एक अलग तरह की कोशिश है। ये वे प्रतिरोध हैं जो हिंदुत्व के भीतर से ही विकसित हो रहे हैं और जो उसकी स्व-निर्मित छवि को भंग कर रहे हैं। इसी छवि को आजकल हिंदुत्व कहा जाता है। यह कहने की जरूरत नहीं है कि देशव्यापी पैमाने पर प्रतिरोध की जिन शक्तियों का लेखा-जोखा लिया जा रहा है, वह केवल प्रतिरोधों के घनीभूत, संश्लिष्ट परिदृश्य का एक मोटा-मोटी आकलन है, यानी समग्र परिदृश्य पर केवल विहंगम दृष्टि ही डाली गई है। मैंने अपनी इस योजना में केवल सतह पर दिखने वाले आम परिदृश्य को ही समाहित किया है। इस बारे में कोई गलतफहमी पालने की जरूरत नहीं है कि प्रतिरोध की जिन कहानियों का इस आलेख में वर्णन किया गया है। वे इक्का-दुक्का या अपवादस्वरूप नहीं हैं।

मानचित्र के रूप में ‘भारत माँ’

नियमों का पालन न करने वाली बगावती बेटियों की चर्चा करने से पहले, हमें आरएसएस की भारत माता की चर्चा जरूर ही करनी चाहिए। जिस भारत माता के हाथ में हमेशा भगवा झंडा होता है, कभी भी वे तिरंगा झंडा हाथ में पकड़े नहीं दिखीं, इसके बावजूद भी, वह दूसरे लोगों की देशभक्ति को हिंसात्मक तरीके से चुनौती देती दिखाई देती हैं। भारत माता की इस तस्वीर के पीछे अखंड भारत का मानचित्र है, इस मानचित्र में समग्र अफगानिस्तान, म्यंमार, तिब्बत समाहित है, पाकिस्तान और बांग्लादेश के न होने का कोई प्रश्न ही नहीं उठता।

आरएसएस की भारत माता (साभार : काफिला)

लेकिन जब बात आरएसएस के भारत माता के हाल-फिलहाल की राजनीतिक सीमाओं की बात आती है तो आरएसएस किस हद तक देशद्रोही हो सकता है, इस बात को उसके ही मुखपत्र आर्गेनाइजर में 2015 में प्रकाशित मानचित्र से समझ सकते हैं। आर्गेनाइजर ने अपने एक लेख  क्वेस्ट फॉर इन्टरग्रांटिंग सार्क  में दक्षिण एशिया क्षेत्रीय सहयोग संगठन (सार्क) के देशों का एक मानचित्र प्रकाशित किया, जिसमें भारत के हिस्से ‘पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर’ को पाकिस्तान का हिस्सा दिखाया गया था। आर्गेनाजर के संपादक ने एक लिखित औपचारिक माफीनामा जारी करते हुए ‘भारत की एकता और अखंडता’ के प्रति अपनी प्रतिबद्धता जाहिर की। इस गलती का कारण बताते हुए कहा कि अनजाने में  वेब से प्राप्त दक्षिण एशिया के एक मानचित्र का इस्तेमाल कर लिया गया, जिस मानचित्र में जम्मू और कश्मीर का, पाकिस्तान द्वारा अधिकृत एक हिस्से को भारत के हिस्से के रूप में नहीं दिखाया गया था…

इस पूरे प्रसंग में दिलचस्प बात यह है कि दक्षिण एशिया का वेब से प्राप्त यह मानचित्र आराम से पूरी दुनिया के लिए उपलब्ध है, जिसमें भारतीय क्षेत्रों को ‘पूरी तरह से गलत’ दिखाया गया है। इस मानचित्र का इस्तेमाल करके बेचारा आर्गेनाइजर एक गलती कर बैठा। दूसरे शब्दों में सारी दुनिया चीन, पाकिस्तान और भारत की सीमाओं के बारे में एक अलग तरह का मानचित्र स्वीकार करती है, जबकि भारत में रहने वाले भारतीयों को इससे भिन्न राय रखने लिए बाध्य किया जाता है। जो पत्रिकाएं भारत के मानचित्र को ‘गलत तरीके’ से चित्रित करती हैं, उन्हें या तो प्रतिबंधित कर दिया जाता हैं, या उन मानचित्रों को ढंक दिया जाता है। इसी तरह का एक मामला दी इकोनामिस्ट के सदंर्भ में (19 नवंबर 2011)  आया था। दक्षिण एशिया के क्षेत्र में जल स्रोतों के संदर्भ में इस क्षेत्र के मानचित्र  के साथ दी इकोनामिस्ट ने एक लेख ‘अनक्वेंचेबल थ्रस्ट’ प्रकाशित किया था, जिस मानचित्र को भारत सरकार द्वारा ढंक दिया गया था। लेकिन इसकी अवज्ञा करते हुए दी इकोनामिस्ट ने निम्न बातें कही :

गायब हुआ मानचित्र ? भारत ने उस मानचित्र को प्रतिबंधित किया जो वास्तविक सीमारेखा को दर्शाता है। भारत इस बात पर जोर देता है कि उस पूरी सीमारेखा को दिखाया जाए, जिस पर भारत दावा करता है। भारत इस मामले में चीन और पाकिस्तान से ज्यादा असहिष्णु है। इसके चलते भारत के पाठक इस आलेख के विवरण में दिखाए गए मानचित्र से वंचित हो गए। हम सोचते हैं कि भारतीय पाठक अपनी सरकार की राय के विपरीत राजनीतिक सच्चाई का सामना कर सकते हैं। जो लोग विविध क्षेत्रीय दावों के सटीक चित्रण को देखना चाहते हैं, वे लोग इकोनामिस्ट डाट कॉम/ एशियन बॉर्डर्स में हमारे एक दूसरे से जुड़े  मानचित्र को देख सकते हैं।

क्या हुआ, यदि भारत सरकार विश्वव्यापी स्तर पर प्रसारित तथ्यों और मानचित्रों को नियंत्रित नहीं कर सकती? वह अपने नागरिकों को तो नियंत्रित कर सकती है, खासकर उस स्थिति में जब यह सरकार दावा करती है कि दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र है। इससे पहले की सरकारें भारत के मानचित्र के मामले में केवल हल्की सी नाराजगी दर्ज कराती थी, लेकिन आरएसएस समर्थित यह सरकार मई 2016 में एक नए कानून का प्रस्ताव लेकर आई, जिसमें उन लोगों को दंडित करने का प्रावधान किया गया है, जो भारत की सीमा को गलत तरीके से चित्रित करते हैं। इसमें कारावास और आर्थिक दण्ड शामिल है। प्रस्तावित बिल यह भी सुनिश्चित करेगा कि ऑनलाइन काम करने वाले प्लेटफॉर्म जैसे कि गूगल, भारत का मानचित्र या गूगल अर्थ संचालित करने के लिए लाइसेन्स के लिए आवेदन करेंगे। देखते हैं कि इस मामले में क्या होता है। मुझे लगता है कि हिंदुत्व की राजनीति का विरोध करने वालों का उत्पीड़न करने और उन्हें गिरफ्तार करने के अलावा शायद ही यह कानून कोई और काम करे। यह कानून गूगल के सीईओ को खुला छोड़ देगा।

अच्छी माँ और बुरी माँ

फिर भारत माता की तरफ लौटते हैं, वह गोरी रंगत वाली, हाथ में भगवा झंडा फहराते, अपने हजारों पुत्रों को आलिंगबद्ध करने के लिए तैयार हैं। बहुत सारे लेखकों ने यह दिखाया है कि भारत माता की यह तस्वीर किसी अनन्त काल से चली आ रही, तस्वीर नहीं हैं, या दूसरे शब्दों में कहें तो यह कोई शाश्वत तस्वीर नहीं है। इस तस्वीर को हिंदुत्व की राजनीतिक परियोजना के लिए निर्मित किया गया है। इन लेखकों ने यह भी दिखाया है कि कैसे इस माँ को केवल अपने पुत्रों की ही चिन्ता है और यह पुत्र हर हालात में हिंदू ही होंगे, मुस्लिम कभी भी नहीं।

अरविन्द घोष इस मानचित्र के बारे में कहते हैं कि “आप इस मानचित्र को देखिए?  एक मानचित्र नहीं है, बल्कि भारत माँ का चित्र है।  शहर और पहाड, नदियां और जंगल से इसका भौतिक शरीर का बना है। उसके सभी बच्चे उसकी शिरा-धमनियां हैं। ये शिरा और धमनियां बड़ी और छोटी हैं…… .. इस भारत माता को जीवित माँ की तरह देखिए, उनकी पूजा कीजिए, नवधा भक्ति के साथ”। (उद्धृत, शोएब दानियाल)।

यदि राष्ट्र एक शरीर है, कुछ लोगों के लिए उनकी अपनी माँ का शरीर है, तो स्वाभाविक है उसके बच्चों का स्थान पहले आता है या अरविन्द घोष की यह संकल्पना कि माँ इन बच्चों (शिराओं और धमनियों, बड़ी और छोटी) से बनी है। बच्चों के जन्म की इस संकल्पना में ही उनके बीच श्रेणीक्रम (बड़े और छोटे, बड़े भाई और छोटे भाई, बेटा और बेटियों) की सोच निहित है। अगर इस विचार को आगे बढ़ाएं तो, इसका निहितार्थ यह निकलता है  कि बच्चे माँ से अलग नहीं हो सकते है, क्योंकि ऐसा करने का अर्थ होगा माँ के अगों का विच्छेदन। यह विच्छेदन माँ के शरीर का विखंडन कर देगा। ऐसा होने  से दोनों में से कोई बच नहीं सकता है, न तो माँ, न तो बच्चे।

अभनिंद्रनाथ टैगोर द्वारा बनायी गयी भारत माता की पेंटिंग जिसकी कल्पना बंगाल विभाजन के समय की गयी थी (साभार : काफिला)

एक बात और यह माँ भी, माँ ही हैं, जो पितृसत्तात्मक परिवार की कहने के लिए मुखिया होती है। पितृसत्तात्मक नियमों को बनाए रखने में ही उसकी सारी शक्ति निहित है। इन पितृसत्तात्मक नियमों में रक्त की शुद्धता और पितृसत्तात्मक श्रेणीक्रमों को बनाए रखना  शामिल है। यह ‘माँ’ घर के मुखिया के रूप में अपने बेटे या बेटों के एजेंट का काम करती है, जब तक इस कामों को कर रही होती है।… आरएसएस उत्तर भारतीय सवर्ण आर्य माँ की संकल्पना करता है। लेकिन यह संकल्पना भारतीय उपमहाद्वीप में एकमात्र आरएसएस तक सीमित नहीं है। उदाहरण के लिए सदन झा ने अवनिंद्रनाथ टैगोर की तपस्विनी बंग माँ की ओर ध्यान दिलाया है, जिनकी कल्पना बंगाल के विभाजन के समय की गई थी।

अवनिंद्रनाथ टैगोर की बंग माँ शान्त, विचारमग्न, एक भगवा वस्त्र वाली तपस्विनी हैं और अपने भीतर देख रही हैं। उसके हाथ में एक किताब, धान का गट्ठर, कपड़े का एक टुकड़ा (स्वदेशी आंदोलन का प्रतीक) है और उसके गले में बहुत सारे हाथ हैं। अवनिंद्रनाथ टैगोर की बंग भारत माता और आरएसएस की एकवर्णीय भारत माता के बीच जमीन- आसमान का अन्तर है। आरएसएस की भारत माता के हाथों में भगवा झंड़ा है, उनका भावात्मक जुड़ाव केवल हिंदुत्व से है, भारतीय राष्ट्र से नहीं।

एक और माता हैं, वे हैं केरल की मातवु , इस माता की ओर हमारा ध्यान जे. देविका ने खींचा था। इस केरल माता की तस्वीर महिलाओं की पत्रिका श्रीमती में 1935 में प्रकाशित हुई थी। यह अवनिंद्रनाथ ठाकुर की माता की तरह निस्तेज और साध्वी नहीं है। अवनिंद्रनाथ ठाकुर की बंग माता क्लांत, आभाहीन और राष्ट्र से परे देख रही हैं, अपने पुत्रों से दूर हैं, और उनकी दृष्टि अरब सागर की ओर नहीं है। उनकी इसी स्थिति को रेखांकित करते हुए देविका कहती हैं- ‘विषादग्रस्त, पश्चिम की ओर टकटकी लगाए’

केरल मातवु (साभार : काफिला)

इसके विपरीत केरल माता की टकटकी में इस बात की स्वीकृति है कि सागर और समुद्र भूमि से पृथक चीज नहीं है, बल्कि दोनों व्यापार और सांस्कृतिक आदान-प्रदान के माध्यम से एक दूसरे से जुड़े हुए और संबंधित हैं। इसी जुड़ाव को होसकोट और ट्रोजानोव नामक लेखक संस्कृतियों के संगम का नाम देते हैं। केरल का शताब्दियों से अरब सागर के पार के विभिन्न देशों से व्यापार रहा है। इसके परिणामस्वरूप इसकी सार्वदेशीय संस्कृति (कास्मोपोलिटन संस्कृति) 20वीं शताब्दी में पश्चिम (यूरोप)  में जन्म लेने वाली सार्वदेशिकतावाद की विचारधारा से काफी पहले की चीज है। हिंदी क्षेत्र को केंद्र में रखने वाले हिंदुत्वादियों की तुलना में केरल का अरब सागर के पार के देशों से अभी भी गहरा संबंध ( यह चीज उनकी मलयालम भाषा, खान-पान और मलयाली कल्पनाशक्ति में दिखती है)। इस केरल के बरक्स  हिंदुत्ववादियों को अपने पांवों से आगे नहीं दिखता है, ये अनपढ़ भी हैं। इनको केरल के इतिहास और अतीतकालीन समृद्ध विविधता के बारे में कुछ भी नहीं पता है। इसका अभी हाल का एक खास उदाहरण लेते हैं, भारतीय जनता पार्टी के अध्यक्ष अमित शाह ने ओणम को वामन जयन्ती नाम दिया। इसे ब्राह्मण वामन के त्यौहार का उत्सव मनाने के रूप में तब्दील कर दिया। जबकि असलियत यह है कि वामन ने न्यायी असुर राजा महाबली से धूर्ततापूर्वक उसका राज्य छीन लिया था।

हिंदुत्व या हिंदू राष्ट्रवादी परियोजना का अभिप्राय उत्तर भारतीय  सर्वण ‘हिंदू धर्म’  के अनुसार पूरे देश के ‘हिंदुओं’ का एकरूपीकरण करना है, दूसरे शब्दों में सबको इन्हीं के रंग में रंगना है। कुल मिलकार हिंदुत्व का यह उत्तर भारतीय सवर्ण रूप सापेक्षिक तौर पर आधुनिक परिघटना है, यह उन्नीसवीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध में सामने आया। उत्तर भारतीय हिंदी भाषी क्षेत्र के सवर्णों के अशिष्ट आचार-विचारों को पूरे देश पर थोपने की कोशिश की जा रही है, इसी को भारत कहा गया। लेकिन इस भारत के भीतर ही ऐसे आचार-विचार मौजूद हैं, जो इसे निरंतर चुनौती दे रहे हैं।

आरएसएस की भारत माता की बरक्स इस देश में अत्यन्त प्राचीन काल से महिला शक्ति की अन्य संकल्पनाएं मौजूद रही हैं। उत्तर भारत से शताब्दियों पहले  आर्यों के आगमन और पितृसत्तात्मक व्यवस्था को आम तौर पर स्वीकृत विचार बनाने से, बहुत पहले से काली देवियां मौजूद रही हैं। ये शक्तिशाली रहस्यमयी शक्ति अपने भक्तों को विध्वंस, रक्त और प्रचण्ड आक्रोश का दर्शन कराती रही हैं।  भारतीय उपमहाद्वीप के दक्षिणी हिस्से की, इस तरह की काली देवियों की एक ऐतिहासिक विवेचना मानवशास्त्री लिन गेटवूड ने किया है। अपनी किताब ‘देवी और स्पाउज गाडेस’ में गेटवूड यह तर्क देते हैं कि पूर्व-वैदिक काल की इन प्रचण्ड, आजाद और कामुक आदिवासी देवियों को ब्राह्मणवादी पुरोहित वर्ग द्वारा दक्षिण के अनार्यों को अपने आचारों-विचारों के हिसाब से ढालने की प्रक्रिया में इन देवियों को घरेलू रूप में ढाला और निस्तेज बनाया गया था। उन्हें किसी आर्य देवता की पत्नी बनाकर घरेलू रूप में ढाल दिया गया था। उनको किसी आर्य पुरूष देवता की पत्नी के रूप में स्थापित किया गया। इसके अतिरिक्त हम अन्य प्रकार के देवी-देवताओं को भी घरेलू रूप में ढालने  की प्रक्रिया देखते हैं। इस रूप में ढालने की  इस प्रक्रिया का एक जटिल इतिहास है। घरेलू या दूसरे शब्दों में अपना बनाने की इस प्रक्रिया में जंगलों के देवता भी शामिल हैं, इसमें से बहुत सारे मानव प्राणी नहीं है। जैसे कि गणे, अय्यपा, स्कंद/ सुब्रमनियन। ये सब आर्य देवता और अनार्य देवियों से बनाए गए नए-नए दम्पतियों (पति-पत्नी) के बच्चे बन गए। चूंकि देवताओं की कामलोलुपता का वर्णन इन आख्यानों में नहीं किया जा सकता है, तो इससे बचने के लिए पुराणों ने मिथको का शरण लिया। इसी तरह का एक मिथक शिव और विष्णु (विष्णु का समय विशेष के लिए मोहिनी रूप) के संयोग से अयप्पा का जन्म है। इस मिथक में कहा गया है कि अयप्पा का जन्म विष्णु की जंघा से हुआ है।

भले ही आजाद देवियों को मुख्यधारा की देवियों में समाहित कर या उनके मुख्यधारा के देवों की पत्नियां बनाकर उन्हें घरेलू या पालतू बनाने की ब्राह्मणवादियों ने कोशिश की हो, लेकिन इसके बावजूद भी देवियों के पूजास्थल के रूप में इनकी स्वतंत्र उपस्थिति निरंतर बनी हुई है। इन देवियों की  अराधना करने भारी संख्या में लोग आते हैं। ये आजाद देवियां आर्यों की ब्राह्मणवादी व्यवस्था में समाहित हुए बिना, अपनी जीवन्त उपस्थिति बनाए हुए हैं, उनके संदर्भ में जो मान्यताएं हैं, वह जिन्दा हैं। उदाहरण के लिए इलाईयम्मन और शीतला माता, जो बच्चों की चेचक से रक्षा करती हैं।

इलाईयम्मन की हमें दो तरह की तस्वीरें मिलती हैं। एक में उनका रंग काला और उनके चेहरे पर उग्र भाव है, उनके होंठ रक्त की तरह लाल हैं, दूसरी तस्वीर में उनको आर्यों की परंपरा में ढाल दिया गया है, उनका रंग गोरा है, उनका स्वरूप आर्यों की तरह का है। दोनों तस्वीरें एक ही जगह से ली गई हैं, जिस जगह पर इन देवियों की पूजा होती है। लगता है कि मरियम्मन या कुमारी को भी इनमें समाहित कर लिया गया है और अन्य ग्रामीण देवियां भी इसमें समाहित हैं, जैसा कि विद्या देहजिया कहती हैः

इलैयाअम्मन की दो तस्वीरें, खूनी लाल होंठ वाली काली व डरावनी और दूसरी आर्यों की छवि वाली घरेलू और गोरी चमड़ी वाली

ये देवियां अनेक रूपों में मिलती हैं। इनमें से एक हिमालय की तलहटियों के छत्रादी शहर में एक साधारण सा लकड़ी का मंदिर है। इस मंदिर में देवी की पीतल की कांतिमान प्रतिमा है, जो कोमल और मांसल है और आभूषणों और रेशमी वस्त्रों से सुशोभित है। दूसरी देवी गुवाहाटी के नजदीक एक पहाड़ी की चोटी पर हैं….श्रद्धालु यहां साधारण तरीके से उबड़-खाबड़ पत्थरों के बीच से होकर जाते हैं, इन पत्थरों के बीच से प्राकृतिक जलधाराएं बहती हैं।… एक अन्य देवी जो तिब्बत के बगल में हैं, वह विचित्र पैशाचिक आकृति वाली हैं, एक जंगली गधे पर सवार हैं उनके पास एक तीसरी आंख है।… एक अन्य देवी दक्षिण मदुरई में हैं, उनकी आकृति काले पत्थर के रंग की है। वह मुकुट, आभूषणों, रेशमी वस्त्रों और फूलों से ढंकी हुई हैं। भारतीय उपमहाद्वीप के असंख्य गांवों में चिकने पत्थरों या मिट्टी के टीलों से बनी असंख्य देवियां हैं, दो सिंदूरी रंग से रंगी होती हैं।  (‘इनकाउनटरिंग देवी’ इन देवी, दी ग्रेट गाडेस)

कांगड़ा के ब्रजेश्वरी देवी मंदिर में एक पेड़ के नीचे देवी की पूजा की तस्वीर (साभार : काफिला)

 मैं अन्यत्र यह बात लिख चुकी हूं कि समकालीन नृत्यांगना चन्द्रलेखा जनक्षमता/ मातृत्व के युग्म को खारिज करने पर जोर देती हैं। उनके लिए जनन शक्ति का सिद्धांत एक रहस्यपूर्ण शक्ति है। वह बताती हैं कि समय के साथ इन शक्ति देवियों को ‘मातृ देवियों’ के व्यक्तित्व में ढाल दिया गया। इसी कारण से चन्द्रलेखा कहती हैं कि ‘किस आधार पर आप इन्हें माता कहते हैं, ये प्रचंड शक्ति वाली उर्जावान व्यक्तित्व हैं, जो भैंसे, शेर और बाघ पर सवारी करते हुए भी शान्त और आत्मविश्वास से भरी लगती हैं। वे शस्त्र ऐसे धारण करती हैं, जैसे उनके केश के गहने हों। ये किसी भी तरह से मातृवत नहीं हैं। (‘हू आर दीज एज ओल्ड फिमेल फीगर्स?’ दी इकोनामिक टाइम्स, 8 मार्च 1992)

बगावती माताओं की बगावती बेटियां

मैं यहां ‘बेटियों’ पद का इस्तेमाल दो संदर्भों में कर रही हूँ, पहला, पितृसत्तात्मक परिवार में बेटियों की दोयम दर्जे की स्थिति। लेकिन परिवार की निरंतरता के लिए ये जरूरी है। दूसरा, ब्राह्मणवादी और हिंदुत्व की परियोजना में इनकी दोयम दर्जे की स्थिति। ये दोनों एक बिंदु पर जाकर मिलते हैं, यह चीज हिंदुत्व के इस चरण में ज्यादा साफ तरह से उभरकर सामने आती है। हिंदुत्व के इस चरण ने सावरकर के आधुनिकतावादी और तार्किकतावादी हिंदुत्व की परियोजना को किनारे लगा दिया है। सावरकर की परियोजना हिन्दू समुदाय को संगठित करके और उसका सैन्यीकरण करने की थी, जिसका उद्देश्य हिंदुओं को मुसलमानों (और इसाईयों) के खिलाफ खड़ा करना था।

सिंधु घाटी सभ्यता में प्रजननशीलता की देवी

ये ‘बेटियां’ एक खास तरह की ब्राह्मणवादी हिन्दू पहचान को स्थापित करने के उद्देश्य को पूरा करने के लिए जरूरी है। इनको अपने में समाहित करके ही हिंदुत्ववादी परियोजना पूरी हो सकती है। आरएसएस की भारत माता के लिए उसके सवर्ण पुत्रों की तुलना में अन्य ऐसी बेटियां हो सकती हैं, जिन्हें बचाना जरूरी नहीं हो। यहां पर मेरे लिए ‘बेटियों’  का अर्थ आदिवासियों से है। मैं इस शब्द का इस्तेमाल ठीक उसी अर्थ में कर रही हूँ, जैसे ‘मूल निवासी’ कहने से आदिवासी और दलित बहुजन अर्थ ही निकलता है।

अब हम कुछ लोकप्रिय हिंदू त्यौहारों की उन दिलचस्प व्याख्याओं का जायजा लेंगे, जो इन त्यौहारों के संबंध में प्रचलित धारणा को उलट देती हैं। ये व्याख्याएं आदिवासी-दलित बहुजन परिप्रेक्ष्य से की गई हैं। ये लोग इस देश की बेटियां हैं। ये वास्तव में कोई संसोधनवादी व्याख्याएं नहीं है। ये व्याख्याएं मुख्यधारा के सवर्ण हिंदु समाज के त्वचा के भीतर लंबे समय से उबल रहे इतिहासों को सामने ला देती है। हिंदू समाज के भीतर से ही उनकी सवर्णों की व्याख्याओं को अब खंडित किया जा रहा है।

आंबेडकरवादी बुद्धिजीवी कंवल भारती हमें इस बात की याद दिलाते हैं कि अधिकांश हिंदू त्योहारों के पीछे का मिथक असुरों की देवों से पराजय से घनिष्ठ रूप से जुड़ा हुआ है, चाहे वह दशहरा हो, दिवाली हो, ओणम हो या होली। इन देवताओं को भारतीय ब्राह्मणों के रूप में चिन्हित करते हैं और बताते हैं कि इन असुरों की पराजय ब्राह्मण विरोधी और ब्राह्मणवाद के पहले की जीवन पद्धतियों और धार्मिक व्यवहारों की पराजय है। ब्राह्मणवाद विरोधी या ब्राह्मणवाद के पहले की ये संस्कृतियां जंगलों और स्थापित साम्राज्यों की सीमा से बाहर रही हैं। अक्सर असुरों की पराजय धूर्ततापूर्ण तरीके से हुई (महाबली को वामन द्वारा, एकलव्य को द्रोणाचार्य द्वारा) है या असुरों में से उन लोगों को अपने में समाहित करके, जो समाहित होने के इच्छुक थे।

कंवल भारती अपने दावे को उदाहरण से पुष्ट करने के लिए होली की कहानी नए सिरे से कहते हैं। उनका कहना है कि बसंत के पहले का हिंदू त्यौहार  बाद में एक हिंदू पौराणिक कथा जुड़ गया और इसे देवों और असुरों के एक शाश्वत संघर्ष की आर्यवादी व्याख्या के अनुरूप ढाल दिया गया। होली के त्यौहार को प्रह्लाद और हिरण्याकश्यप के बीच के संघर्ष की पौराणिक कथा से जोड़ दिया गया। इस पौराणिक कथा के अनुसार प्रह्लाद असुर हिरण्याकश्यप का एक ‘धर्मनिष्ठ’ पुत्र था (हिरणाकश्यप भी कम धर्मनिष्ठ नहीं था, लेकिन उसकी निष्ठा आर्यों के देवताओं के प्रति बिल्कुल नहीं थी, वह उनकी उपेक्षा करता था) और प्रहलाद विष्णु का भक्त था। हिरण्याकश्यप विष्णु से नफरत करते थे। प्रह्ललाद की विष्णु भक्ति देखकर हिराण्यकश्यप उसकी हत्या करना चाहता था। उसने उसकी हत्या करने के कई तरीके अपनाए। इन्हीं तरीकों में से एक में हिरणाकश्यप की बहन अर्थात प्रह्लाद की बुआ उसे अपनी गोद में लेकर पवित्र अग्नि में बैठ जाती है। उसकी बुआ को यह वरदान प्राप्त है कि अग्नि उसे जला नहीं सकती है, लेकिन यह वरदान काम नहीं करता है, वह अग्नि में भस्म हो जाती है, लेकिन भक्त प्रह्लाद विष्णु का नाम जपता रहता है और आग उसे जला नहीं पाती। वह आग से बच निकलता है। बाद में हिराण्याकश्यप की हत्या विष्णु करता है। यह हत्या वह नरसिंह रूप धारण करके करता है। होली के एक दिन पहले वाली रात को होलिका का पुतला असुरों की पराजय के प्रतीक के रूप में जलाई जाती है।

इस पराजय का मतलब क्या था? इसे विश्लेषित करते हुए कंवल भारती बताते हैं कि प्रह्णाद ने ब्राह्मणवादी धर्म अपना लिया (सनातन धर्म), जबकि हिरण्याकश्यप और होलिका ब्राह्मणवाद से संघर्ष करते रहे।

एम. बी. मनोज द्वारा इसी तरह का वर्णन ओणम के संदर्भ में किया जाता है, वे कहते हैं कि ओणम को दलितों के नजरिए से देखें। मनोज कहते हैं कि असल बात यह है कि इस त्यौहार ने मलयाली पहचान के साथ अपने स्वाभाविक संबंध को खो दिया है। ओणम दलितों के लिए काला दिन है, एक हत्या का दिन है, सच बात तो यह है कि ऊँची जातियों के लिये खुशी का दिन है।

इस परिप्रेक्ष्य के हिसाब से ओणम का आगमन केरल में जाति व्यवस्था और दासता के आगमन के साथ जुड़ा हुआ है। मनोज इस संदर्भ में उन दलित लोकगीतों की चर्चा करते हैं, जो ओणम के ‘उच्च जातीय चरित्र’ और शाकाहारवाद की आलोचना करते हैं और साथ ही ये लोकगीत केरल में मंदिर प्रवेश के ऐलानों की भी आलोचना करते हैं (इन ऐलानों में दलितों के मंदिर प्रवेश पर रोक लगाई गई)। मनोज कहते हैं कि दलित यह महसूस करते हैं कि ओणम उनके राजा की ‘ऊँची जातियों’  द्वारा हत्या का उत्सव मनाने का त्यौहार है। इसी एहसास के तहत दलित आंदोलन, खासकर इंडियन दलित फेडरेशन ओणम के दिन भूख हड़ताल करता है। मनोज याद करते हैं कि कॉलेज के दिनों के दौरान इडुक्की कस्बे में उन्होंने इसी तरह के एक भूख हड़ताल में भाग लिया था। मनोज इस बात पर जोर देते हैं कि अधिकांश दलित, आदिवासी और पिछड़ी जातियां ओणम के दौरान मांस खाती हैं और यह काम ये लोग ओणम के सांस्कृतिक माहौल से निकलकर अपनी संस्कृति के अनुसार करते हैं। इसलिए ‘निम्न जातियों’ के लिए ओणम न तो संस्कृति है और न सांस्कृतिक त्यौहार है, यह ‘उच्च जातियों’  का त्यौहार है।

आदिवासी-दलित-बहुजन समुदायों में ऐसी शक्तिशाली महिलायें रही हैं, जिनकी ब्राह्मणवादियों द्वारा हत्या की गई, उनका अंग-भंग किया गया और उनका अपमान किया गया। इरावती कर्वे, नवनीता देव और उमा चक्रवर्ती आदि नारीवादी महिलाओं ने इसकी ओर हमारा ध्यान आकर्षित किया है। बहुजन समाज की इन महिलाओं का एक उदाहरण सूपर्णनखा हैं। वह एक ऐसी महिला हैं, जो बिना किसी अपराधबोध के अपनी सेक्सुअल इच्छा को जाहिर करती हैं। उन्हें कभी यह नहीं सिखाया गया था कि स्त्री को आवेग विहीन और दब्बू होना ही चाहिए। अपनी इच्छा जाहिर करने की सजा सूर्पणनखा को भुगतनी पड़ी, क्रूरतापूर्वक उनकी नाक काटकर उनको सबक सिखाया गया। (यह काम तथाकथित विष्णु के अवतार राम के कहने पर उनके भाई लक्ष्मण ने किया)। उमा चक्रवर्ती अपने एक दिलचस्प निबंध में बाल्मिकी रामायण का पाठ पूरे दक्षिण और दक्षिण पूर्व एशिया में विद्यमान रामायण की कहनियों के विविध तत्वों की पुनरर्चना के रूप में करती हैं। इस पुनरर्चना में रामायण की खास तरह की व्याख्या को ही स्थापित किया गया है। इस व्याख्या का उद्देश्य इस देश की विविधतापूर्ण जीवन पद्धतियों को एक नई कसौटी पर कसना है। इस नई कसौटी का आधार आर्यवंशीय, पितृसत्तावादी, यौनिकता और संपत्ति की पितृवंशीय व्यवस्था है। इसी कारण से लंका के दक्षिण के लोगों को अपने अधीन बनाने और आर्यों की सेक्सुअल संहिता को समुचित तरीके से पालन करने के लिए सबक सिखाने का काम किया गया। ब्राह्मणवादियों की सेक्सुअल संहिता उन्हें इसलिए सिखाई गई क्योंकि यहाँ की औरतें इस मामले में आजाद थीं। राम ने जंगल में जाकर जंगल के लोगों (वनवासियों) को अपनी सेना में भर्ती किया, उन्हें अपना वफादार बनाया, उन्हें शान्त करके अपन पक्ष में किया और सीता को बताया कि  यहाँ उनकी शुचिता खतरे में है, और लक्ष्मण रेखा के माध्यम से उन्हें उनकी सीमा बताई गई, जिस सीमा को वह लांघ नहीं सकती हैं। (‘दी डवलपमेंट ऑफ सीता मिथः ए केस स्टडी  ऑफ वुमन इन मिथ एण्ड लिटरेचर’ साम्य शक्ति, 1 जुलाई 1983)

इस संदर्भ में जैसा कि कँवल भारती हमें याद दिलाते हैं कि अयोध्या से निर्वासित  युवा राजकुमार (राम और लक्ष्मण) अपनी सेना सजा कर घने जंगलों में जाते हैं और वहाँ के मूल निवासियों पर आर्यों के ब्राह्मणवादी नियमों को आरोपित करते हैं। ये मूल निवासी विविध तरह के असुर थे। आर्यों के ब्राह्मणवादी तपस्याओं और धर्मानुष्ठानों में विघ्न  डालने के लिए राम-लक्ष्मण ने इन असुरों की हत्यायें कीं।  असुरों के  जंगलों में यह तपस्या और धर्मानुष्ठान सपन्न करने के लिए ब्राह्ममवादी ऋषि जोर देते थे।


महिषासुर और दुर्गा की कहनी भी लें तो, यह भी एक स्तर पर आदिवासियों की पराजय का एक अन्य आख्यान है। यह पराजय भी ब्राह्मणों की धूर्तता (यहाँ मैं इस पद का प्रयोग व्यापक अर्थों में कर रही हूँ) के चलते ही हुई थी। लेकिन दुर्गा के मिथक की एक नारीवादी लेखिका अन्य स्तर पर व्याख्या करती हैं, यह व्याख्या इस मिथक की संश्लिष्ठता को अपने में समाहित करती है।

महिषासुर मर्दिनी – दुर्गा द्वारा महिषासुर की हत्या (साभार : द वायर)


दुर्गा द्वारा महिषासुर की पराजय का दिन हिंदुओं के सबसे महत्वपूर्ण त्यौहारों में से एक है, जिसे दुर्गा पूजा कहते हैं। दलित-बहुजन छात्रों ने जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में महिषासुर की पूजा का उत्सव मनाया था। यह उत्सव जेएनयू को 2016 में राष्ट्रविरोधी घोषित करके उसके ऊपर हमलावर होने की संघ और उसके आनुषांगिक संगठनों की कोशिश  के पांच साल पहले मनाया गया था।  दरअसल ‘दैत्य की पूजा’ करने का उत्सव भी, एक ऐसा महत्वपूर्ण विषय बना, जिसने जेएनयू को एक ऐसी जगह के रूप ‘कुख्याति’ दिलाई, जहाँ  नासमझी में सभ्यता विरोधी काम किए जाते हों। जेएनयू पर इस आरोप की अनुगूंज संसद में भी सुनाई दी, जहाँ तत्कालीन मानव संसाधन मंत्री (शिक्षा मंत्री) स्मृति इरानी ने बहुत ही भावुक होकर पुलिस की इस रिपोर्ट को सांसदों को पढ़कर सुनाया कि जेएनयू में ‘दैत्य की पूजा’ होती है।

फारर्वड प्रेस (पत्रिका) ने कुछ वर्ष पहले एक रिपोर्ट प्रकाशित की थी, जिसमें बताया गया था कि पूर्वी भारत में आदिवसियों द्वारा महिषासुर की पूजा की जाती है। इस पत्रिका  में महिषासुर की तस्वीरें भी प्रकाशित की गई थीं। इसका परिणाम यह हुआ कि पुलिस ने पत्रिका के कार्यालय पर धावा बोल दिया ।

पश्चिम बंगाल के पुरूलिया में महिषासुर की पूजा का आयोजन

झारखण्ड के 10 हजार से अधिक असुर आदिवासियों को भारत सरकार द्वारा ‘विशेष तौर पर अतिसंवेदनशील आदिवासी समूह’  के रूप में  वर्गीकृत किया गया है। इस आदिवासी समूह की भाषा को यूनेस्को  द्वारा ‘निश्चित तौर पर संकटग्रस्त’  भाषा का दर्जा दिया गया है। यह भाषा लगभग 7 हजार लोगों द्वारा बोली जाती है। असुर लोग जो अपने को महिषासुर का वंशज मानते हैं, उनका मानना है कि मार्कण्डेय पुराण की देवी महात्म्य की यह कहानी पक्षपातपूर्ण है। इस कहानी में दुर्गा के जन्म और उनके नौ दिनों के संघर्ष के बारे में बताया गया है। इन असुरों के अनुसार ब्रह्मा, विष्णु और शिव की शक्तियों के मेल से दुर्गा का जन्म होना एक ‘धूर्ततापूर्ण षड़यंत्र’ था,  क्योंकि उनके राजा महिषासुर को यह वरदान प्राप्त था कि कोई इंसान या भगवान उनको मार नहीं सकता था। यह वरदान उन्होंने ब्रह्मा की तपस्या करके प्राप्त किया था। इस कारण से जो असुर अपनी परंपरा से गहराई से जुड़े हुए हैं, वे अपने को दुर्गा पूजा की परंपरा से अलग-थलग महसूस करते हैं और इस दौरान महिषासुर की मौत का शोक मनाते हैं।

हिंदू धर्म में विश्वास रखने वाले, बहुत सारे समुदायों के लोकगीतों, मौखिक गाथा-गीतों और अन्य रिवाजों की उपेक्षा हिदुंत्ववादी परियोजना के राजनीतिक चरित्र को सामने लाता है। हिंदुत्ववादियों का अपना एक शानदार मूर्तिपूजक इतिहास है और हिंदुओं के अपने रीति-रिवाज हैं, लेकिन  हिंदुओं के भीतर के ही बुहत सारे समुदाय हैं, जो इसको मानने से इंकार करते हैं। इस स्थिति पर हिंदुत्ववादी लज्जित और शर्मिंदा महसूस करते हैं। लेकिन ये लोग हिंदुओं की उच्च जातीय परंपरा से इंकार करने वाले, इन लोगों को अपनी नीरस, रूढिबद्ध, उत्तर भारतीय, उच्च जातीय हिंदुवादी संस्करण में समाहित नहीं कर सकते हैं। यह उत्तर भारतीय उच्च जातीय संस्करण ही हिंदू राष्ट्रवादी परियोजना का आधार है।

अब दुर्गा के लंबे समय से चले आ रहे विविध रूपों और उनकी भूमिकाओं पर विचार करते हैं। दुर्गा का संभोग के लिए ललचाने वाली औरत के रूप में ही एक मात्र चित्रण, पूरी कहानी को जटिल बना देता है। दुर्गा कौन है?  उसका एकमात्र वही रूप है, जिसकी सवर्ण पूजा करते हैं? शायद ऐसा नहीं है।  दुर्गा का नारीवादी पाठ उनके दो रूपों को ध्यान में रखता है। दुर्गा/ काली के रूप के साथ-साथ उनका वेश्या रूप का भी। उनके पहले रूप के बारे में मृणाल पाण्डेय लिखती हैं कि :  

“यह शिक्षाप्रद है कि कोई भी पक्ष इस बात से इंकार नहीं कर सकता है कि दुर्गा स्वतंत्र व्यक्तित्व की एक शक्तिशाली प्रतीक हैं। किसी की अधीनता में न रहने वाली हैं। उन्होंने किसी पुरूष देवता की अधीनता स्वीकार नहीं की। इसके अलावा वह युद्ध में किसी भी पुरूष से श्रेष्ठ योद्धा हैं, माना यह जाता है कि पुरूष ही श्रेष्ठ योद्धा होते हैं। उनके संदर्भ में यह भी उल्लेखनीय है कि स्थानीय और क्लासिक दोनों मिथकों में वर्णित अपने वीरता के कारनामों से प्राप्त शक्ति को, दुर्गा  मुख्यधारा देवगणों में से किसी पुरूष देवता के सामने समर्पित नहीं करती हैं। ये वे देवगण हैं, जिन्होंने सम्मिलित रूप में उनका सृजन किया है। विष्णु ने उनके हाथों में अपना चक्र, शिव ने त्रिशूल और वायु ने तीर-धनुष और बहुत सारे देवताओं ने इसी प्रकार की अन्य चीजें दीं।  इन देवताओं ने अपनी आन्तरिक शक्ति या आग उनका सृजन करने के लिए दिया, और ऐसा करके उन्होंने अपनी अंतःशक्ति को उनको समर्पित किया…”

दुर्गा की ऐतिहासिक उत्पत्ति आर्य-पूर्व स्थानीय संस्कृतियों से निर्णायक तौर पर घनिष्ठ रूप में जुड़ी हुई है। वैदिक परंपरा में कोई ऐसी देवी नहीं है, जो योद्धा देवी, दुर्गा से मेल खाती हो। दुर्गा का जो सबसे शुरूआती संदर्भ मिलता है, वह महाभारत के विराट पर्व (इस महाकाव्य का चौथा खण्ड) में मिलता है, और बाद में हरिवंशपुराण और विष्णुपुराण में मिलता है। ये सारे संदर्भ विन्ध्य की पहाड़ियों में निवास करने वाली सबर आदिवासियों से भी जुड़े हुए हैं। शुरू में यह ऐसे क्षेत्र थे, जिसका पता लगाना मुश्किल था। इस क्षेत्र का  वर्णन एक ऐसी जगह के रूप में किया गया है, जहां पहुंचना अत्यन्त कठिन था। ऐसे स्थल को संस्कृति भाषा में  ‘दुर्गेन गम्यते’  कहते हैं, इसी से इनका नाम दुर्गा  पड़ा। ‘सभ्य समाज’ जहां निवास करता था, उसके चारों ओर पहाड़ियों वाला यह क्षेत्र, घने जंगलों से घिरा हुआ है और यह जंगली आदिवासियों और जानवरों का निवास स्थान था। यहीं से विन्ध्यवासिनी दुर्गा की अवधारणा पैदा हुई। कौशिकी के रूप में या रक्तपायी, यह कुंवारी देवी समय के साथ मुख्यधारा की विविध देवियों और भारतीय समाज के विविध  स्तरों को अपने ओर खींचने वाली मां बन जाती है।…  इस प्रकार अत्यधिक शक्तिशाली, आक्रामक हथियारों से लैस दुर्गा के रूप में वह सामने आती है। किसानों और व्यापारियों की मुख्यधारा की देवियां केवल मध्यकाल के दौरान थीं। दुर्गा  अपने अनार्य आदतें  आदिवासी पृष्ठभूमि से लेकर आईं और इन अनार्य आदतों को देवों की मनाही की अवज्ञा करके और दैत्य पुरूष की विवाह की याचना को ठुकरा कर भी बनाए रखीं और अपने सम्मान में चढ़ाए जाने वाले शराब (मद्य), मांस  और खून (रक्त) को भी स्वीकार करती रहीं।

समय के साथ विविध तरह के मिथक दुर्गा के बारे में गढ़े गए थे और उन मिथकों को, पुराणों की एक श्रृंखला के माध्यम से प्रचारित- प्रसारित किया गया। विष्णु पुराण में कहा गया है कि मुख्यधारा के भगवान विष्णु ने याचना करके इन्हें पहाड़ों से बाहर निकाला और बालक कृष्ण के जीवन के लिए खतरा – दैत्य राजा को मारने के लिए इनसे सहायता मांगी। देवी  महात्म्य की एक दूसरी व्याख्या के अनुसार  एक अन्य पुरूष भगवान ब्रह्मा द्वारा इनकी सहायता ली गई, जिन्होंने दो दैत्यों को मारने में विष्णु की सहायता की। जैसे ही विष्णु सो गए, दुर्गा ने इन दोनों दैत्यों की आखिरकार हत्या कर दी। स्कंदपुराण कहता है कि दुर्गा पार्वती से भिन्न नहीं हैं। पार्वती मुख्यधारा की देवी हैं और लक्ष्मी, गणेश, कर्तिकेय और सरस्वती की माँ हैं। स्कंदपुराण कहता है कि जब एक भैंसा नामक दैत्य से संसार को खतरा पैदा हो गया, तो शिव ने अपनी पत्नी पार्वती से कहा कि वह एक योद्धा देवी बन जाए और भैंसे दैत्य की हत्या करें। मिथक कहता है कि पार्वती ने दुर्गा के रूप में दैत्य की हत्या की।  ब्रह्माण्ड को उत्पन्न खतरे का मुकाबला करने और दुश्मन की हत्या करने के बाद, वह अपनी नई-नई फिर से पाई गई आक्रमकता और कई भुजाओं वाले रूप के साथ अपना नया नाम दुर्गा बनाए रखीं।

महिषासुर की हत्या करती दुर्गा की पहली छवियां पूरे भारत में लगभग चौथी शताब्दी ईसवी से दिखाई देना शुरू होती हैं। इन छवियों में दुर्गा अर्द्ध नर भैंसे की अपनी भुजाओं और दांतों से हत्या कर रही हैं। दुर्गा का त्यौहार फसल कटने के समय मनाया जाता था, यह आज की दुर्गापूजा का पूर्व रूप था। यह उर्वरता से भी जुड़ा था, इसका कुछ ज्यादा संबंध उनकी बच्चेदानी से नहीं था। हां, यह शाकाहार (शाकाम्भरी) से जुड़ा था। आनुवांशिक प्रकार का मातृत्व उसकी प्राथमिकता नहीं थी। वह एक सशस्त्र योद्धा के रूप में पुरूषों और स्त्रियों की रक्षक थीं। युद्ध के लिए उद्धत दुर्गा के शरीर और आत्मा को रक्त और शराब का चढ़ावा उर्जा देता था, इस दुर्गा को पूरी तरह से हथिया लिया गया। इस प्रकार विभिन्न मामलों में, शुरू से ही पुराणों की दुर्गा आज की आंसुओं से भरी आंखों वाली और मातृत्व की छवि प्रस्तुत करने वाली माता रानी का निषेध करती हैं। जिस माता रानी की पूजा आज के भक्त जोर-शोर से करते हैं। इस प्रकार दुर्गा को शिव की पत्नी के रूप में कभी भी पूरी तरह से ढाला नहीं जा सका, वह अपनी प्रचंडता और मनमौजी, जंगली तत्वों को बनाए रखीं।

दुर्गा का एक दूसरा रूप है, जहां वह केवल ब्राह्मणवाद के एजेंट के रूप में सामने आती हैं। यहां वह एक ‘यौनाकांक्षा जगाने वाली स्त्री’  एक वेश्या, एक जासूस के रूप में सामने आती हैं। लेकिन आदिवासी पाठ कहता है कि ब्राह्मणवाद से इसकी पराजय के बाद इन्हें आदिवासी पौरूष पुनः जरूर प्राप्त करना चाहिए। मृणाल पाण्डेय के हवाले से कहें तो यह बात साफ है कि दुर्गा का आदिवासी मिथ विशेष देवी के रूप में दुर्गा की पूजा की तुलना में स्त्री शक्ति के सामान्य सिद्धांत की बात करता है।

दुर्गा के वेश्या रूप पर भी भारत माता की बेलगाम बेटियों का एक अन्य समूह दावा पेश करता है। वह समूह है, आज के सेक्स वर्करों का। आक्रोश से भरी मानव संसाधन मंत्री द्वारा संसद में यह रिपोर्ट प्रस्तुत किया गया कि जेएनयू में महिषासुर की पूजा के लिए जारी एक पोस्टर में दुर्गा को सेक्स वर्कर या वेश्या कहा गया है। (हमें नहीं पता वास्तव में ऐसा पोस्टर था। मंत्री ने यह आरोप एबीवीपी ( अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद) के लिखित शिकायत के आधार पर पढ़ा) जेएनयू में  चाहे जो कुछ भी हुआ हो, लेकिन इसकी प्रतिक्रिया में जेएनयू के छात्रों को ‘सेक्स वर्कर’ यूनियन  ने निम्न पत्र लिखाः

“जेएनयू के प्रिय छात्रों,

जय भीम! लाल सलाम!  हम देशद्रोह का युद्ध जीत लेंगे!  अन्तर्राष्ट्रीय सेक्स वर्कर अधिकार दिवस 3 मार्च, जिंदाबाद!  हम सेक्स वर्कर अधिकार आंदोलन की ओर से आपके संघर्ष का अभिवादन करते हैं और आपने ने जो विमर्श शुरू किया है, उसे आगे बढ़ाना चाहते हैं।  हम लोग महिषासुर शहादत दिवस के दिन जारी तथाकथित पम्फलेट में  सेक्स वर्कर क्यों इस्तेमाल किया गया है, इस पर बहस करना चाहते हैं। यह विचार रंडीबाजी के कलंक से भरा हुआ है। आमतौर पर इस्तेमाल होने वाले ‘वेश्या’  पद की जगह राजनीतिक तौर पर सही, सेक्स वर्कर शब्द गंदे कर्म के रूप इसको प्रस्तुत करने के तथ्य को किनारे नहीं लगाता है। इस शब्द का इस्तेमाल सिर्फ और सिर्फ ज्यादा गलतफहमी को बढ़ावा देगा।

सेक्स वर्कर्स अधिकार आंदोलन द्वारा सेक्स वर्कर शब्द का इस्तेमाल वयस्कों द्वारा सहमति से पैसे के लिए दी जाने वाली सेक्सुअल सेवा को गरिमा प्रदान करने का दावा करने के उद्देश्य से किया जाता है, जो पैसे के बदले में सेक्स सेवा उपलब्ध कराते हैं, लेकिन इस मामले में (जेएनयू) में कथित तौर पर ‘देवी’ (दुर्गा) की सच्चाई को उजागर करने के लिए सेक्स वर्कर शब्द का इस्तेमाल किया गया है, क्या इससे किसी प्रकार की गरिमा बढ़ती है?  यह शब्द अपना स्वतंत्र अस्तित्व ग्रहण कर चुका है। राजनीतिक तौर पर सटीक इस शब्द को अब राष्ट्र-विरोधी, देवियां विरोधी, यहां तक कि पितृसत्ता विरोधी भी कहा जा रहा है! लेकिन दुर्गा को ‘सेक्स वर्कर’ कहने में सेक्स वर्करों का एक तिरस्कार भी छिपा हुआ है। ……..सेक्स वर्कर अधिकार आंदोलन इस तथ्य को अापके ध्यान में लाना चाहता है कि  ‘रंडी’ का कलंक एक ऐसा कलंक है, जो अधिकार सहित जीने के दायरे से बाहर कर देता है, उन विशेषाधिकारों और अधिकारों से पूरी तरह वंचित कर देता है, दो कथित तौर पर हर नागरिक को प्राप्त है, बिना इस बात का परवाह किए की, वे अपनी रोजी-रोटी के लिए क्या करते हैं।

हम आजादी की माँग करते हैं!

हम भेदभाव से आजादी, एक निंदात्मक नजरिये की हिंसा से आजादी, सेक्स वर्करों,  जिन्हें अनेक प्रकार के अन्याय भुगतने पड़ते हैं, उससे आजादी की मांग करते हैं। हम राजनीतिक रूप में ठीक, पर गंदे तरीके से और गहरे स्तर पर कलंकित करने वाले शब्द सेक्स वर्कर से आजादी चाहते हैं। सेक्स वर्कर ‘देवी’ दुर्गा से भी आजादी चाहते हैं।

मुख्यधारा का हिंदू समाज जिन कहानियों से अनजान बना हुआ है, उन पुरानी कहानियों की नए सिरे से तलाश हमें बताती है कि देवियों को घरेलू रूप में ढालने और अनार्य लोगों को आर्यों के अनुकूल बनाने की प्रक्रिया कभी भी पूरी तरह से सफल नहीं हुई। हिन्दू धर्म का एकरूपीकरण करने और आर्यों के पहले के देवी-देवताओं को मातहत बनाने की परियोजना आज भी अधूरी है। जिसे हम ‘हिंदू धर्म’ कहते हैं और अतिसरलीकृत हिंदुत्व की जो नकली व्याख्या उन्नीसवीं शताब्दी के अन्त और बीसवी शताब्दी के शुरूआत में स्थापित की गई, उस व्याख्या की सीमाओं को अनार्य परंपराएं तोड़ती हैं। उन्नीसवीं शताब्दी की शुरूआत में हिंदुत्व की जो व्याख्या हुई, उसमें देवों को नायक और असुरों को खलनायक के रूप में पेश किया गया। इस व्याख्या को निरंतर मजबूती से कायम वैकल्पिक व्याख्याओं से चुनौती दी जाती रही है।

राम और विष्णु की पूजा करने वाले भक्तों के अलावा अन्य लोग असुरों के राजा रावण, हिरण्याकश्यप और महाबली की एक विद्वान, एक भक्त और यहाँ तक कि महान व्यक्ति की तरह आदर करते हैं। जोधपुर के मंदसौर शहर के 200 परिवार अपने को रावण का वंशज मानते हैं। मंदसौर के लोग मानते हैं कि यह जगह रावण की पत्नी मंदोदरी का जन्म स्थान  है। यहां पर रावण के दो मंदिर हैं, और यहां कभी भी दशहरे में रावण का पुतला नहीं जलाया जाता है। मंदसौर के एक कपड़ा व्यापारी रवि रंका ने एक पत्रकार को बताया कि :

हम रावण को उनके सभी वेदों के ज्ञान और शिव के प्रति उनकी भक्ति के लिए याद करते हैं। उनके पुतले को जलाने को हम उनके अनादर के एक प्रतीक के रूप में देखते हैं और इसी कारण से कभी भी इस कस्बे में ‘रावण दहन’ नहीं होता है। रावण को शिव के महान भक्त के रूप में प्रस्तुत कर  उन्हें आर्य परंपरा में समाहित करने की कोशिश की गई, हालांकि रामायण की हिंदुत्ववादी व्याख्या ने बदत्तर तरीके से इस प्रक्रिया को भंग कर दिया।

(यह सच है कि शिव अपने भीतर बहुत सारे आयाम समाये हुए हैं, और वे आर्य देवताओं की तरह राजसी ठाट से नहीं रहते हैं, गोरी रंगत वाले नहीं हैं। न तो काले रंगों वाले यादव कृष्ण ही आर्यों की देवता की तरह हैं। कृष्ण आर्य पूर्व देवाताओं को आर्य परंपरा में समाहित करने के एक अन्य उदाहरण हैं। वे सेक्सुअली भी ब्राह्मणवादी हिंदुत्व के तत्वों से मुक्त हैं )

उत्तरांचल के हिमालय के ड्रोंगरी गांवों में लोग हनुमान की पूजा नहीं करते हैं, क्योंकि उन्होंने उस पहाड़ एक पूरे हिस्से को को तोड़-फोड़ दिया, जिसकी वे लोग पूजा करते थे। यह काम उन्होंने लक्ष्मण को जीवित करने के लिए संजीवनी बूटी  के लिए किया।

बंगाल में गांवों की महिलाएं धोखेबाज राम के चरित्र का गीत गाती हैं, क्योंकि उसने सीता को घर से निकाल दिया था।

ये सभी बगावती बेटियां हैं।

हिंदू धर्म की एकरूपी परियोजना को खंड़ित करने वाली जो पूरी तस्वीर बनती है, उसके संदर्भ में एक ‘बुरी मां’, असुरों की माता पूतना को भी जरूर याद करना चाहिए। जिसने अपने स्तनों का जहरीला दूध पिलाकर बालक कृष्ण को मारने का प्रयास किया था। बालक कृष्ण ने दूध पीने की प्रक्रिया में उसकी जान ले ली, मिथक कहते हैं कि बालक ने दूध के साथ ही उसके प्राण खींच लिए। मृत्यु के बाद पूतना के शरीर  के टुकड़े- टुकड़े करके नन्द के गांव से बाहर गोकुल में उन टुकड़ों को जलाया गया। जब उसका शरीर जल रहा था, अगर की सुंगंध चारों ओर फैल गई। पुराण इसका कारण बताते हुए कहते है कि ऐसा इसलिए हुआ क्योंकि स्वंय भगवान ने उसका दूध पीया था। पुराण कहते हैं कि पूतना का भगवान ने उद्धार कर दिया, क्योंकि उन्होंने उसका दूध पीया था। ब्राह्मणवादी हिंदू परंपरा इस कृष्ण के अलावा,  और भी  ऐसे ‘लायक पुत्र’ हुए हैं, जिन्होंने अपनी उद्दंड या दुष्ट माओं की हत्या कर उनका उद्धार किया है। इस संदर्भ में रेणुका और परशुराम का नाम सामने आता है। परशुराम ने अपनी मां रेणुका का वध किया था। पूतना के संदर्भ में एक महत्वपूर्ण बात यह है  अन्य ग्रन्थ जैसे कि गर्ग संहिता और ब्रह्म वैवर्त पुराण कहते हैं कि पिछले जन्म में पूतना महाबली की पुत्री थी। वह विष्णु द्वारा धूर्ततापूर्वक अपने पिता की हत्या का बदला लेना चाहती थी। चूंकि कृष्ण विष्णु का अवतार है, इस कारण से उसने कृष्ण को मारने की कोशिश की।

असुरों और देवों के संदर्भ में ब्राह्णणवादी व्याख्यों से भिन्न ये वैकल्पिक व्याख्याएं असुरों  को दुष्टता का प्रतीक ठहराने की धारणाओं  से लोंगों को मुक्त करना चाहती हैं और असुरों के चरित्र को नए सिरे से गढ़ना चाहती हैं। उनको अच्छाई से घृणा करने वाले चरित्र के रूप में चित्रित करने की सरलीकृत व्याख्या को तोडना चाहती हैं और उनकी सश्लिष्ट प्रेरणों को सामने लाना चाहती हैं।

आरएसएस के हाथ में भारत माता सिर्फ हिंदुत्व के शस्त्रागार की  एक कुटिल और जहरीला हथियार बनकर रह गई हैं, जैसे कि गाय।  हिंदुत्ववादी जब भारत माता के नाम पर उठाए गए भगवा झंड़े से अलग वास्तिक जीवन में आते हैं, तो अपने रोज-बरोज के जीवन की असली मां को या तो वृंदावन में छोड़ आते हैं या उनको कुंभ मेले में लाखों लोंगों की भीड़ में भक्त और कर्तव्यपरायण बेटों द्वारा छोड़ दिया जाता है। जहां तक गाय माता का सवाल है, तो यह कारूणिक प्राणी शहरों की सड़कों पर प्लास्टिक खाते हुए घूमती रहती है, जब यह मर जाती है तो इसके भक्त बेटे इसके मृत शरीर को छूते भी नहीं हैं, बल्कि हिंसात्मक तरीके से दलितों को बाध्य करते हैं कि वे भारत माता की इस अनचाही  बहिष्कृत बेटी को उनकी आंखों से ओझल करें।

आरएसएस की भारत माता मात्र गत्ते से बनी एक कटआउट भर है। इसके इतर  लाखों और जीवन्त और सांस लेती शक्तियां हैं, जो भारतमाता के इस अचानक उभार को इस घेरे के बाहर से चुनौती दे रही है,जिन शक्तियों का आरएसएस के लोग हिंदुकरण करना चाहते हैं। ये बगावती बिटियां सिर्फ आदिवासी-दलित बहुजन ही नहीं हैं, जिन्होंने लगातार मुख्यधारा के हिंदू धर्म से एकीकृत होने से इंकार कर दिया है, लेकिन ये लोग भी 21 वीं शताब्दी के ही विद्रोही हैं।

माहवारी के जश्न का अभियान

इन बगावती बेटियों में वे युवा महिलाएं भी शामिल हैं, हैप्पी ब्लीड अभियान के माध्यम से मासिक रक्तस्राव पर गर्व करती हैं, उसको नए सिरे से परिभाषित करती हैं। 

पिंजरा तोड़ पोस्टर

इनमे पिंजरा तोड़ अभियान की महिलाएं भी शामिल हैं, जो सुरक्षित कैम्पस के लिए संघर्ष करती हैं, राष्ट्रवाद को चुनौती देती हैं और  भारत माता के नाम पर बनाए जा रहे दबाव को साफ तौर पर खारिज करती हैं। पूरे देश में हो चल रहे लाखों बगावतों के ये मात्र दो उदाहरण हैं।  या पिंजरा तोड़ अभियान के शब्दों में- मां से आजादी, मां के लिए आजादी

भारत माता (साभार : लाल रत्नाकर)

भारत में  एक काली रंगत वाली, स्वाभिमान से तनी खड़ी एक दलित-आदिवासी महिला है, जिसके साथ एक ‘पवित्र गाय’ नहीं,  एक भैंस है, यह महिला, बगावती बेटियों और मुक्त स्वभाव के लिए राष्ट्र पर दावा पेश कर रही है। या तो यह राष्ट् को पूरी तरह से खारिज कर रही है, या आरएसएस के हाथों से भारत माता को छीन कर उन पर अपनी नए सिरे से दावेदारी पेश कर रही है। ये बगावती बेटियां हमें यह याद दिला रही हैं कि ऱाष्ट्र  लोगों से ऊपर की कोई चीज नहीं है, बल्कि राष्ट्र लोगों मिलकर बना है।          

(यह आलेख निवेदिता मेनन द्वारा जाधवपुर विश्वविद्यालय, कोलकत्ता के स्कूल ऑफ वुमेन स्टडीज (अप्रैल 2016), साउथ एशिया रिसर्च इंस्टीट्यूट, आस्ट्रेलियन नेशनल यूनिवर्सिटी, कैनबरा (नवंबर 2016), चेन्नई (मई 2017) में दिए गए व्याख्यान पर आधारित है)

(अनुवाद- सिद्धार्थ)

काफिला, 15 जुलाई, 2017 में प्रकाशित मूल अंग्रेजी लेख का यह अनुवाद लेखिका की अनुमति से प्रकाशित किया जा रहा है।


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