उलगुलान – जारी है जंगल पर दावेदारी का संघर्ष

आज जब बिरसा मुंडा की 143वीं जयंती पर पूरे देश के आदिवासी धरती आबा को याद करेंगे तब उनके सीने में बिरसा की लगायी आग जरूर जलेगी। इसकी वजह भी है। बिरसा जयंती के मौके पर उलगुलान के इतिहास और वर्तमान संघर्ष का स्वरूप बता रहे हैं राजन कुमार :

‘‘मैं केवल देह नहीं
मैं जंगल का पुश्तैनी दावेदार हूँ
पुश्तें और उनके दावे मरते नहीं
मैं भी मर नहीं सकता
मुझे कोई भी जंगलों से बेदखल नहीं कर सकता
उलगुलान!
उलगुलान!!
उलगुलान!!!’’

‘बिरसा मुंडा की याद में’ शीर्षक से लिखी आदिवासी साहित्यकार हरीराम मीणा के कविता की ये पंक्तियां दावा कर रही हैं कि बिरसा मुंडा का आंदोलन ‘उलगुलान’ इक्कीसवीं सदी के दूसरे दशक में भी जारी है। उलगुलान यानी आदिवासियों का जल-जंगल-जमीन पर दावेदारी का संघर्ष।

बिरसा मुंडा  पर बनाया गया यह पहला रेखाचित्र है. 1940 में जब रामगढ़ (झारखंड) में कांग्रेस का वार्षिक अधिवेशन हुआ था तो उस अवसर पर निकाली गयी स्मारिका में बिरसा मुंडा पर जीएस सोंधी का एक लेख है. उसी लेख में बिरसा का यह रेखाचित्र छपा है. इसके चित्रकार हैं ‘पिसेल’. रेखाचित्र की खासियत यह है कि यह हूबहू असली बिरसा के अनुरूप है जबकि दूसरे रेखाचित्र वास्तविकता से दूर हैं. (फोटो एवं स्रोत – अश्विनी कुमार पंकज)

आज 15 नवंबर 2017 को जब आदिवासी समाज बिरसा मुंडा की 143वीं जयंती मना रहा है, तब सभी आदिवासी के जहन में उलगुलान की आग दहक रही होगी और जंगल पर अपनी दावेदारी को और ज्यादा पुख्ता करने के लिए वह खुद को वचनबद्ध कर रहा होगा।

जंगल पर दावेदारी को लेकर बिरसा मुंडा द्वारा अंग्रेजी सरकार के खिलाफ आहूत ‘उलगुलान’ आज स्वतंत्र भारत में भी जारी है। क्योंकि हालात आज भी नहीं बदले हैं।

आदिवासियों में भयानक गरीबी और असंतोष व्याप्त हैं। उन्हें गांवों-जंगलों से खदेड़ा जा रहा है। दिकू आज भी हैं। जंगलों के संसाधन तब भी असली दावेदारों के नहीं थे और आज भी नहीं हैं। आदिवासियों की समस्याएं खत्म नहीं हुईं बल्कि वे ही खत्म होते जा रहे हैं। सब कुछ जस का तस है। यही कारण है कि जल, जंगल और जमीन के हक लिए हर तरफ आदिवासी गोलबंद हो रहे हैं और बिरसा के ‘उलगुलान’ की मशाल को जला रखे हैं।

बिरसा मुंडा का जन्म 15 नवम्बर सन् 1875 को वर्तमान झारखंड राज्य के रांची जिले के अंतर्गत चालकाड़ के निकट उलिहातु गाँव में माता करमी हातू और पिता सुगना मुंडा के घर हुआ था।

उस समय भारत में अंग्रेजी शासन था। आदिवासियों को अपने इलाकों में किसी भी प्रकार का दखल मंजूर नहीं था। यही कारण रहा है कि आदिवासी इलाके हमेशा स्वतंत्र रहे हैं। अंग्रेज़ भी शुरू में वहां जा नहीं पाए थे, लेकिन तमाम षड्यंत्रों के तहत वे घुसपैठ करने में कामयाब हो गये।

अंग्रेजों ने ‘इंडियन फारेस्ट एक्ट 1882’ पारित कर आदिवासियों को जंगल के अधिकार से वंचित कर दिया। अंग्रेजी सरकार आदिवासियों पर अपनी व्यवस्थाएं थोपने लगी। अंग्रेजों ने ज़मींदारी व्यवस्था लागू कर आदिवासियों के वे गांव, जहां वे सामूहिक खेती करते थे, ज़मींदारों और दलालों में बांटकर राजस्व की नयी व्यवस्था लागू कर दी। और फिर शुरू होता है अंग्रेजों एवं तथाकथित जमींदार व महाजनों द्वारा भोले-भाले आदिवासियों का शोषण।

बिरसा मुंडा के जीवन पर आधारित दिवंगत प्रसिद्ध लेखिका महाश्वेता देवी का उपन्यास ‘जंगल के दावेदार’ का कवर पेज

इसी बीच बिरसा बाल अवस्था से किशोरावस्था और  युवावस्था में पहुँचते हैं। वह आदिवासियों की दरिद्रता की वजह जानने और उसका निराकरण करने की उपाय सोचते हैं।

आदिवासियों की अशिक्षा का लाभ लेकर गाँव के जमींदार, महाजन अनैतिक सूद-ब्याज में उलझाकर उनकी जमीन लेते रहते थे। आदिवासियों का कर्ज प्रतिदिन बढ़ता ही रहता। महाजन भी तो यही चाहते थे कि आदिवासियों का कर्ज बढ़े और खेत का पट्टा लिखवा लें फिर आदिवासी खेत में काम करें, पालकी उठायें, उनके नासमझ बच्चे खेत पर मुफ्त में पहरा भी देंगे। हुआ भी यही। आदिवासी अपनी ही जमीन पर गुलाम बन गये।

वन के उत्पादों पर आदिवासियों के पुश्तैनी अधिकारों पर पाबंदी, कृषि भूमि के उत्पाद पर लगान और अन्य प्रकार के टैक्स और इन सब के पीछे अंग्रेज अधिकारी, उनके देसी कारिन्दे-सामंत, जागीरदार और ठेकेदार, ये सब आदिवासियों के लिए दिकू (शोषक/बाहरी) थे।

आदिवासियों की हालत बद् से बद्तर होती गई।

बिरसा समझ गया शोषणकारी बाहरी इन्सान होता है और जब तक उसे नहीं भगाया जायेगा तब तक दुःखों से मुक्ति नही मिलेगी। अपने भाइयों को गुलामी से आजादी दिलाने के लिए बिरसा ने ‘उलगुलान’ की अलख जगाई।

1895 में बिरसा ने अंग्रेजों की लागू की गयी ज़मींदारी प्रथा और राजस्व व्यवस्था के ख़िलाफ़ लड़ाई के साथ-साथ जंगल-ज़मीन की लड़ाई छेड़ी। बिरसा ने सूदखोर महाजनों के ख़िलाफ़ भी जंग का ऐलान किया। यह मात्र विद्रोह नहीं था। आदिवासी अस्मिता, स्वायत्ता और संस्कृति को बचाने के लिए संग्राम था – उलगुलान।

बिरसा ने ‘अबुआ दिशुम अबुआ राज’ यानि ‘हमारा देश, हमारा राज’ का नारा दिया।

देखते-ही-देखते छोटानागपुर के सभी आदिवासी, जंगल पर दावेदारी के लिए गोलबंद हो गये। अंग्रेजी सरकार के पांव उखड़ने लगे। महाजन, जमींदार और सामंत उलगुलान के भय से कांपने लगे।

अंग्रेजी सरकार ने बिरसा के उलगुलान को दबाने की हर कोशिश की, लेकिन आदिवासियों के गुरिल्ला युद्ध के आगे उन्हें असफलता ही मिली। 1897 से 1900 के बीच आदिवासियों और अंग्रेज सिपाहियों के बीच युद्ध होते रहे। बिरसा और उनके अनुयायियों ने अंग्रेजों की नाक में दम कर रखा था। अगस्त 1897 में बिरसा और उसके चार सौ सिपाहियों ने तीर कमानों से लैस होकर खूँटी थाने पर धावा बोला। 1898 में तांगा नदी के किनारे मुंडाओं की भिड़ंत अंग्रेज सेनाओं से हुई जिसमें पहले तो अंग्रेजी सेना हार गयी लेकिन बाद में इसके बदले उस इलाके के बहुत से आदिवासी नेताओं की गिरफ़्तारियां हुईं।


जनवरी 1900 में उलिहातू के नजदीक डोमबाड़ी पहाड़ी पर बिरसा अपनी जनसभा को सम्बोधित कर रहे थे, तभी अंग्रेज सिपाहियों ने चारो तरफ से घेर लिया। अंग्रेजों और आदिवासियों के बीच संघर्ष हुआ। बंदूक-तोप का सामना तीर-धनुष भला कब तक कर पाते! औरतें और बच्चों समेत बहुत से लोग मारे गये। बिरसा के कुछ शिष्यों को गिरफ्तार कर लिया गया। अन्त में स्वयं बिरसा भी 3 फरवरी 1900 को चक्रधरपुर में गिरफ़्तार कर लिये गये।

जेल जाते समय बिरसा ने लोगों से आह्वान किया, जो आज भी मुंडारी लोकगीतों में गाया जाता है – “मैं तुम्हें अपने शब्द दिये जा रहा हूं, उसे फेंक मत देना, अपने घर या आंगन में उसे संजोकर रखना। मेरा कहा कभी नहीं मरेगा। उलगुलान! उलगुलान! और ये शब्द मिटाए न जा सकेंगे। ये बढ़ते जाएंगे। बरसात में बढ़ने वाले घास की तरह बढ़ेंगे। तुम सब कभी हिम्मत मत हारना। उलगुलान जारी है।” (‘आदिवासी शहादत’, अश्विनी कुमार पंकज)

9 जून 1900 को बिरसा ने रांची के कारागार में आखिरी सांस ली। 25 साल के उम्र में ही बिरसा मुंडा ने जिस क्रांति का आगाज किया वह आदिवासियों के लिए हमेशा प्रेरणादायी रहा।

बिरसा मुंडा की एक श्याम-श्वेत तस्वीर(साभार : सूचना एवं जनसंपर्क विभाग, झारखंड सरकार)

बिरसा के आंदोलन को अंग्रेजी सरकार बेशक दबाने में कामयाब हो गयी, लेकिन छोटानागपुर के आदिवासियों पर शासन करना लोहे के चने चबाने जैसा हो गया था। जगह-जगह अंग्रेजी सैनिकों को विरोध झेलना पड़ता।

नतीजतन अंग्रेजी सरकार को ‘छोटानागपुर टेनेंसी एक्ट 1908’ पारित कर आदिवासी क्षेत्रों को विशेष क्षेत्र घोषित करना पड़ा। इन क्षेत्रों में बिना अनुमति बाहरी आबादी के प्रवेश पर रोक लग गई। आदिवासियों को जंगल में एक सीमा तक अधिकार भी मिल गया। परंतु अपनी जमीन और जंगल पर पूर्ण अधिकार को लेकर संघर्ष तब भी जारी रहा।

आज भी देश के तमाम हिस्से में आदिवासी जंगल पर दावेदारी की लड़ाई लड़ रहे हैं। अपने प्रति निरंतर अपमान, उपेक्षा, शोषण आदि के खिलाफ आदिवासियों का विद्रोही स्वर उठना स्वाभाविक भी है।

स्वतंत्र भारत में जब आदिवासी इलाकों को संघ में शामिल किया गया तो सरकार ने उन्हें भरोसा दिलाया कि उनके हितो की रक्षा की जाएगी। इसके लिए बकायदा संविधान में ‘पांचवीं अनुसूची’ और ‘छठी अनुसूची’ में आदिवासियों के लिए विशेष प्रावधान किये गये। इसकी जिम्मेदारी राष्ट्रपति को सौंपी गई। बावजूद इसके किसी भी राष्ट्रपति ने आज तक आदिवासियों का संज्ञान नहीं लिया। घोर उपेक्षा के कारण आदिवासियों की स्थिति जर्जर हो चुकी है। आदिवासी प्रतिरोध के लिए तैयार हो रहे हैं।

मसलन ‘जय आदिवासी युवा शक्ति (जयस)’ देश में जगह-जगह आदिवासियों को गोलबंद कर रहा है। संविधान की पांचवीं अनुसूची को सख्ती से पालन कराने के लिए अगले साल ‘मिशन 2018 का आह्वान जयस द्वारा किया गया है। इसी प्रकार ‘आदिवासी महासभा’ झारखंड-छत्तीसगढ़ में पत्थलगाड़ी कर जंगल पर दावेदारी पेश कर रहा है। ‘आदिवासी बुद्धिजीवी मंच’ पांचवीं अनुसूची के अनुपालन के लिए न्यायालय में दावेदारी पेश कर रहा है। गुजरात में ‘भीलीस्तान विकास मोर्चा’ राजनीतिक रूप से अपनी दावेदारी पेश कर रहा है।

ऐसे ही अनेक आदिवासी संगठन हैं जो जंगल पर दावेदारी के लिए आज भी संघर्ष कर रहे हैं। ये सभी मिलकर बिरसा का उलगुलान जारी रखे हैं। इन सभी के प्रेरणास्रोत हैं बिरसा मुंडा।

इसीलिए तो प्रसिद्ध दिवंगत लेखिका महाश्वेता देवी ‘जंगल के दावेदार’ उपन्यास के उपसंहार में लिखा है – “हम जिस तरह चिरकाल से हैं, संग्राम-बिरसा का संघर्ष भी वैसा है। धरती पर कुछ समाप्त नहीं होता – मुण्डारी देश, धरती, पत्थर, पहाड़, वन, नयी ऋतु के बाद ऋतु – का आगमन – संदर्भ भी समाप्त नहीं होता, इसका अंत हो ही नहीं सकता। पराजय से संघर्ष का अंत नहीं होता। वह बना रह जता है, क्योंकि मानुस रह जता है, हम रह जाते है।”

 


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