जनेऊ एक अश्लील धागा है  

पिछले दिनों भाजपा के आरोप के जवाब में कांग्रेस ने राहुल गांधी को जेनऊधारी द्विज हिंदू के रूप में प्रस्तुत किया। वरिष्ठ पत्रकार राजकिशोर ने इस घटनाक्रम पर प्रतिक्रिया देते हुए फेसबुक पर लिखा कि जेनऊ एक अश्लील धागा है। इसके बाद उन्हें सोशल मीडया पर ट्रोल किया जाने लगा। यहां वे फारवर्ड प्रेस के पाठकों के लिए अपनी बात विस्तार से कह रहे हैं :  

अश्लील का अर्थ सिर्फ वह नहीं है जो यौनिक रूप से श्लील नहीं है। इसका क्षेत्र बहुत  व्यापक है। इंटरनेट पर उपलब्ध शब्दकोश में इसके तीन अर्थ दिये गये  हैं : जो नैतिक तथा सामाजिक आदर्शों से च्युत हो, जो संस्कृत तथा सभ्य पुरुषों की रुचि के प्रतिकूल हो, तथा गंदा और भद्दा। स्पष्टतः अश्लील के साथ यौनिकता का कोई संदर्भ नहीं है। जो कुछ भी आदर्शच्युत है, गंदा है, भद्दा है, वह अश्लील है। इसी अर्थ में मैं जोर दे कर कहना चाहता हूँ कि जनेऊ एक अश्लील धागा है। अश्लीलता तो राखी के धागे में भी है जो सुरक्षा की दृष्टि से पुरुष पर स्त्री की निर्भरता का प्रतीक होने के अलावा कुछ नहीं है, लेकिन यह अश्लीलता भाई-बहन के प्रेम में लिपटी रहती है, इसलिए आँखों से ओझल रहती है। फिर राखी का धागा साल भर में एक बार दिखाई देता है, लेकिन द्विज जातियों के लोग जो जनेऊ पहनते हैं, वह उनके लिए रोज का गहना है, इसलिए यह ज्यादा अश्लील है। जो भी आदमी जनेऊ पहनता है, वह प्रत्येक दिन चौबीसों घंटे यह घोषित करता है कि हम दूसरों से श्रेष्ठ हैं, इसलिए हमारा विशेष आदर होना चाहिए। जिन्हें जनेऊ धारण करने का अधिकार नहीं है, वे समाज के हीनतर सदस्य हैं। इस तरह जनेऊ समाज को दो वर्गों में बाँट देने का धार्मिक औजार है और हर तरह से अश्लील है। विषमता के किसी भी प्रतीक को अस्तित्व में बने रहने का कोई नैतिक अधिकार नहीं है।

चेन्नई में जनेऊ पहनने के एक धार्मिक अनुष्ठान में अपनी उच्चता और श्रेष्ठता के प्रतीक के रूप में जनेऊ लहराते ब्राह्मण

संसार की सब से पुरानी समस्या विषमता है। यह अनेक रूपों में प्रकट होती है। लेकिन हिंदुओं ने जाति व्यवस्था के रूप में सामाजिक विषमता के एक विशिष्ट स्वरूप का आविष्कार किया है। चराचर सृष्टि में एक ही ब्रह्म के दर्शन करने वाली हिंदू दृष्टि जब जमीन पर उतरती है, तब वह समाज में विषमता का वाहक बन जाती है और आदमियों को चार वर्गों में बाँट देती है तथा यह भी निर्धारित कर देती है कि कौन किससे श्रेष्ठ है। शेष दुनिया में लोग अपने प्रयत्नों से श्रेष्ठता अर्जित करते हैं या खो देते हैं, पर हिंदू समाज में यह जन्म से ही उपार्जित हो जाती है। ब्राह्मण का बच्चा है तो वह स्वाभाविक रूप से श्रेष्ठ है, भले ही आगे चल कर वह अनपढ़, मूर्ख, असभ्य और दुष्ट निकले। श्रेष्ठता का इससे बड़ा अपमान और क्या हो सकता है? इसी अर्थ में डॉ. भीमराव अंबेडकर ने कहा था कि हिंदू समाज समाज नहीं, जातियों का समूह है। यह वह व्यवस्था है जिसमें बीस प्रतिशत से भी कम लोगों ने अपने को श्रेष्ठ और जनेऊ धारण करने का अधिकारी घोषित कर रखा है और बाकी अस्सी प्रतिशत को जन्म से ही हीन घोषित कर दिया है, भले ही इनमें से कोई बड़ा हो कर डॉ. अंबेडकर जैसा विद्वान और महान बने।   

अपनी विशिष्टता साबित करने के लोग हमेशा से ही कुछ विशिष्ट पहनते आये हैं। राजा सिर पर मुकुट पहनता है और इस तरह अपने को उनसे अलग और खास घोषित करता है जो राजा नहीं हैं। ब्राह्मण यज्ञोपवीत धारण करता है, जो दूर से ही घोषित करता है कि कोई पूज्य पुरुष चला आ रहा है। खास तरह की पगड़ी पहनने के अधिकार सरदार या पंचायत के प्रमुख को होता है। इन्हीं लोगों ने दलितों और स्त्रियों के लिए नियम बना रखे थे कि वे क्या पहनेंगे और क्या नहीं पहनेंगे। अपने विख्यात भाषण जाति का विनाश में डॉ. आंबेडकर  कई उदाहरण देते हैं। एक उदाहरण यह है : ‘मराठों के देश में, पेशवाओं के शासन काल में अछूत को उस सड़क पर चलने की अनुमति नहीं थी जिस पर कोई सवर्ण हिंदू चल रहा हो, ताकि उसकी छाया पड़ने से हिंदू अपवित्र न हो जाये। उसके लिए आदेश था कि वह एक चिह्न या निशानी के तौर पर अपनी कलाई में या गले में काला धागा बाँधे रहे, ताकि कोई हिंदू गलती से उससे छू जाने पर अपवित्र न हो जाये। पेशवाओं की राजधानी पूना में अछूत के लिए यह आदेश था कि वह कमर में झाड़ू बाँध कर चले, ताकि वह जिस मिट्टी पर पैर रखे, वह उसके पीछे से काम कर रहे इस झाड़ू से साफ हो जाये,  ताकि उस मिट्टी पर पैर रखने से कोई हिंदू अपवित्र न हो जाये। पूना में, अछूत के लिए जरूरी था कि वह जहाँ भी जाये, अपने गले में मिट्टी की हाँड़ी बाँध कर चले और जब थूकना हो तो उसी में थूके, ताकि जमीन पर पड़ी हुई अछूत की थूक पर अनजाने में किसी हिंदू का पैर पड़ जाने से वह अपवित्र न हो जाये।  

चेन्नई में पेरियारवादियों ने जनेऊ पहनने के ब्राह्मणों के अनुष्ठान के विरोध में वराह (सूअर ) को जनेऊ पहनाने का कार्यक्रम आयोजित किया। कार्यक्रम के लिए जारी पोस्टर

दूसरा उदाहरण मध्य भारत के बलाई जाति के लोगों का है। डॉक्टर साहब ने अपने इसी भाषण में बतलाया है :  टाइम्स ऑफ इंडियाके संवाददाता ने रिपोर्ट दी कि (इंदौर राज्य के) इंदौर जिले के सवर्ण हिंदुओं यानी कालोटों, राजपूतों और ब्राह्मणों, कनरिया, बिचोली-हफ्सी, बिचोली-मर्दाना तथा पंद्रह अन्य गाँवों के पटेलों और पटवारियों ने अपने-अपने गाँव के बलाइयों से कहा कि अगर तुम लोग हमारे साथ रहना चाहते हो, तो तुम्हें इन नियमों का पालन करना होगा :

  1. बलाई ऐसी पगड़ी नहीं पहनेंगे जिसकी किनारी में सोने का लेस लगा होगा।
  2. वे रंगीन या फैंसी किनारी वाली धोती नहीं पहनेंगे।
  3. अगर किसी हिंदू के घर में मृत्यु हो जाती है, तो उसके रिश्तेदारों तक यह खबर पहुँचाने के लिए उन्हें जाना होगा वे रिश्तेदार चाहें जितनी दूर रहते हों।
  4. हिंदुओं के सभी विवाहों में बलाई बारात के आगे-आगे और विवाह के दौरान बाजा बजायेंगे।
  5. बलाई औरतें सोने या चाँदी के गहने नहीं पहनेंगी। वे फैंसी गाउन या जैकेट नहीं पहनेंगी।
  6. बलाई औरतें हिंदू महिलाओं की जचगी के समय मौजूद रहेंगी।
  7. बलाई मेहनताने की माँग किये बिना सेवाएँ प्रदान करेंगे और हिंदू उन्हें खुशी-खुशी जो कुछ देंगे, उसे वे स्वीकार करेंगे।
  8. जिन बलाइयों को ये नियम मंजूर नहीं होंगे, उन्हें गाँव छोड़ कर चले जाना होगा।

बलाइयों ने इस तानाशाही को मानने से इनकार कर दिया, तो उन पर जुल्म ढाना शुरू हो गया। इसी तरह एक जमाने में केरल में सवर्णों की यह तानाशाही थी कि दलित स्त्रियाँ वक्ष को ढँक कर सड़क पर नहीं निकलेंगे। इस पराधीनता से बाहर आने के लिए दलित स्त्रियों को बहुत संघर्ष करना पड़ा।

यह है जनेऊ की राजनीति और जनेऊ का समाजशास्त्र।

फेसबुक पर जब मैंने जनेऊ की औचित्यहीनता पर बहस छेड़ी, तो जनेऊ के पक्ष में बहुत-से शर्मा, पाठक, मिश्र, पांडेय, उपाध्याय सामने आ गये। लेकिन दो-तीन मित्रों ने पूछा कि जनेऊ का समर्थन करने के पहले यह तो बताइए कि उसकी उपयोगिता क्या है, तो एक की भी जुबान नहीं खुली। उनके तर्क का ढर्रा यह था कि जनेऊ को हिंदू धर्म में पवित्र माना गया है, इसलिए वह पवित्र है। कुछ लोगों के लिए पवित्र होगा वह, पर उसे पहनने से फायदा क्या है, इस प्रश्न का उत्तर उनके पास नहीं था, क्योंकि इक्कीसवीं शताब्दी में यह कहने की हिम्मत वे इसलिए नहीं जुटा पाये कि जनेऊ सामाजिक विषमता और भेदभाव का सब से ज्यादा प्रकट प्रतीक है। जनेऊ नहीं होगा, तो ब्राह्मण या ठाकुर को पहचाना कैसे जायेगा?

चेन्नई में विष्णु के एक अवतार वराह (सूअर) की प्रतिमा जनेऊ पहने हुए

लगभग सौ वर्षों से हिंदुओं में यह बीमारी लगी है कि वे अपनी हर चीज का समर्थन वैज्ञानिक तर्क से करना चाहते हैं। यहाँ तक कि जाति व्यवस्था और अस्पृश्यता के वैज्ञानिक कारण वे बता देते हैं। इसी का उदाहरण है आज तक के ब्लॉग पर 10 फरवरी 2015 को प्रकाशित यह लेख, जिसका शीर्षक है : जनेऊ पहनने के ये हैं सात जबर्दस्त फायदे।  दो फायदे विस्तार से लिखता हूँ और बाकी पाँच सूत्र रूप में – (1) बल व तेज में बढ़ोतरी :  दायें कान के पास से वे नसें भी गुजरती हैं, जिसका संबंध अंडकोष और गुप्तेंद्रियों से होता है। मूत्र त्याग के वक्त दायें कान पर जनेऊ लपेटने से वे नसें दब जाती हैं, जिनसे वीर्य निकलता है। ऐसे में जाने-अनजाने शुक्राणुओं की रक्षा होती है। इससे इंसान के बल और तेज में वृद्धि होती है। (2) स्मरण शक्ति‍ में इजाफा : कान पर हर रोज जनेऊ रखने और कसने से स्मरण शक्त‍ि में भी इजाफा होता है। कान पर दबाव पड़ने से दिमाग की वे नसें एक्ट‍िव हो जाती हैं, जिनका संबंध स्मरण शक्त‍ि से होता है। दरअसल, गलतियाँ करने पर बच्चों के कान ऐंठने के पीछे भी मूल मकसद यही होता था।  बाकी पाँच फायदे हैं : जीवाणुओं और कीटाणुओं से बचाव, तन निर्मल, मन निर्मल, हृदय रोग व ब्लडप्रेशर से बचाव, मानसिक बल में बढ़ोतरी, और आध्यात्म‍िक ऊर्जा की प्राप्त‍ि। बिना वैज्ञानिक परीक्षण और प्रयोग के ये दावे कितने सत्य होंगे, इसका अनुमान तो कोई भी कर सकता है। मेरा प्रश्न है : इतने दिनों से द्विज जातियाँ जनेऊ पहनती आ रही है, क्या उनमें उपर्युक्त सात में से कोई भी गुण या प्रभाव दिखाई देता है? दूसरी, और ज्यादा महत्वपूर्ण, बात यह है कि अगर जनेऊ पहनने से वास्तव में कोई शारीरिक या मानसिक फायदा होता है, तो देश की अस्सी प्रतिशत जनता को क्यों जनेऊ से वंचित रखा गया और आज भी क्यों वंचित रखा जाता है। अगर जनेऊ से सचमुच कोई फायदा है, तो इसे पूरी आबादी के लिए क्यों नहीं खोल दिया जाता?

देश में कभी कोई अच्छी सरकार बनेगी, तो वह ऐसी तमाम पहचानों पर प्रतिबंध लगा देगी जो एक आदमी को दूसरे आदमी से श्रेष्ठ घोषित करती है।


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