ओबीसी साहित्य की खूबियों को रेखांकित करती बनाफर चंद्र की रचनाएं

अपने ‘जमीन’ और ‘धारा’ उपन्यासों के जरिए बनाफर चंद्र हिन्दी साहित्य में 1970-80 से लेकर 21वीं सदी के दूसरे दशक का दक्षिणी बिहार के समाज व संघर्ष को छाती ठोंककर सामने रखते हैं। उनके साहित्य में गांव-जवार सजीव होता है और सवाल भी खड़े करता है। हरेराम सिंह का विश्लेषण :

ओबीसी साहित्य को एक विचार के रूप में आखिर क्यों नहीं देखा जा सकता? एक ऐसा विचार, जो श्रमिक वर्ग, श्रम व किसानी को महत्वपूर्ण दृष्टि से न सिर्फ देखता है, बल्कि समाज और साहित्य में उसे स्थापित भी करता है। यह काम द्विज साहित्य नहीं करता, वह तो उसे हेय दृष्टि से देखता है। इतना ही नहीं, वह श्रम व किसानी करने वाले को उच्च सम्मान देने से कतराता है।  सामंत व राजा के खून से संबंध रखने वाले लोग ही उसके नायक बनते है तथा बनने के योग्य होते हैं, लेकिन ओबीसी साहित्य में श्रम व किसानी से जुड़े लोग व वर्ग ही महत्वपूर्ण व सम्मनित पद पाते हैं। श्रम का प्रकार भले कोई हो किन्तु विचारधारा के स्तर पर श्रम व किसानी ही उसका मूल लक्ष्य है। जिसकी बदौलत दुनिया खूबसूरत बनती हैं। इसलिए अगर ध्यान से देखें तो ओबीसी साहित्य अपने आप में जनवादी तेवर से लबरेज हैं। बनाफर चंद्र एक ऐसे जनवादी साहित्यकार हैं जिनका जन्म एक ओबीसी परिवार में हुआ। उनकी कहानियां व उपन्यास साहित्य के क्षेत्र में मील के पत्थर हैं। उनके उपन्यासों के विषय, वातावरण व पात्र ओबीसी के हैं। ’धारा’ व ’जमीन’ उपन्यास विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं। उन्हें ओबीसी साहित्य का नार्गाजुन कहना अधिक समीचीन होगा । उनके उपन्यासों में गांव जितना सजीव हुआ है, उतना शायद ही किसी अन्य लेखक के उपन्यासों में हुआ हो। नागार्जुन के उपन्यास ‘वरूण के बेटे’, ‘रतिनाथ की चाची’, ‘बाबा बटेसर नाथ’, ‘उग्रतारा’ व ‘बलचनमा’ की गांव से भी विश्वसनीय चित्रण बनाफर चंद्र के उपन्यासों में हुआ है।

अोबीसी साहित्यकार बनाफर चंद्र

हां, यह अलग बात है कि नागार्जुन के उपन्यासों में उत्तरी बिहार का दृश्य मुख्य रूप से चित्रित हुआ हैं, वही बनाफर चंद्र के उपन्यासों में दक्षिणी बिहार। कुल मिलाकर हम इतना तो कह ही सकते हैं कि पूरे बिहार के गांवों का दर्शन करना हो तो हिन्दी के दो महत्वपूर्ण उपन्यासकारों को पढ़ना अधिक श्रेयस्कर होगा- पहले नागार्जुन और दूसरे बनाफर चंद्र।

बनाफर चंद्र का उपन्यास ’काला पंछी’ एक ऐसे ओबीसी नवयुवक की कथा है जो बड़ी मुश्किल से मैट्रिक तक की पढ़ाई पूरी करता है। उस नवयुवक का नाम रामचंद्र है। उसका मित्र इंद्रजीत है। रामचंद्र अपनी बड़ी भाभी से बड़ा प्यार करता है। रामचंद्र की शिक्षा-दीक्षा गोड़ारी हाई स्कूल से होती है। वहां ब्राह्मणों का वर्चस्व है। बगल में बुढ़वल हाई स्कूल है, जिसमें राजपूतों का वर्चस्व है। शिक्षक भी ओबीसी के बच्चों पर विशेष ध्यान नहीं देते। ओबीसी के बच्चे खेलते-कूदते बाग-बगीचे नहर होते स्कूल जाते हैं और छुट्टी के बाद गपियाते घर आते हैं। ऐसे तो रामचन्द्र पढ़ने में साधारण हैं, किन्तु दूसरी समस्या यह है कि उसके पास पढ़ने के लिए किताबे भी नहीं हैं। ऐसे में कई मित्र मिलकर एक-एक किताब खरीदते हैं तब जाकर उनकी पढ़ाई पूरी होती है। ’काला पंछी’ उपन्यास गांव की दयनीय स्थिति से इस तरह बखूबी परिचय कराता है, जहां ओबीसी के बच्चों का बचपन स्पष्ट रूप से दिखता है कि उनका बचपना अभाव में बीतता है। ऐसे बनाफर चंद्र का बचपन बहुत कम दिन गांव में बीता किन्तु वे पूरी तरह गांव से कभी नहीं कट पाए। गांव उन्हें हमेशा खींचता रहा, जबकि उन्होंने 1966 से ही भोपाल में जीवन व्यतीत किया। उनके उपन्यास ’जमीन’ जिसका तृतीय संस्करण 2010 में छपा, यात्री प्राकशन सादतपुर दिल्ली से, काफी धारदार व ओज वाला उपन्यास हैं। यह उपन्यास जगदीश महतो, रामेश्वर अहीर व नरेश दुसाध के बचपन व किशोरावस्था की कहानी को लेकर है। भोजपुर में किसानों के संघर्ष का बीजारोपण कैसे हुआ और किन परिस्थितियों में ओबीसी व दलित के महान क्रांतिकारी पैदा हुए, उसकी पृष्टभूमि पर आंधारित यह उपन्यास सवर्णां के सीने पर कील ठोंकने के समान है। इस उपन्यास के चरित्र नारायण चाचा दृष्टि संपन्न ओबीसी पात्र हैं। वे कविता भी लिखते हैं। उनके मित्र हैं- मदन। मदन के पुत्र हैं- जगदीश। जिसका ध्यान पढ़ाई पर ज्यादा हैं। जगदीश का मित्र रामेश्वर बचपन से ही अखाड़िया(लड़ने-भिड़ने वाला) है। जब वह बाबू साहबों की गली में सीना ताने चलता है तो कितने सवर्णों के सीने पर सांप लोट जाता है। उसकी यही खूबसूरती पाठक को अपनी तरफ खींचती है। ‘जमीन’ उपन्यास में रमन बाबू एक घाघ व चालाक सवर्ण पात्र हैं, वही जमुना बाबू मूर्ख व आपराधिक छवि वाले। इन दोनों पात्रों का सृजन बनाफर चंद्र ने बड़ी सोच समझकर की है। इस उपन्यास को पढ़ने के बाद किसान मजदूरों के बीच इस बात का भ्रम नहीं रह जाता है कि बहुजनों के दुश्मन कौन हैं? और उनका चरित्र क्या हैं? इस उपन्यास की स्त्री पात्र कजरी जो दलित है, सवर्ण प्रेमी के करतूतों की वजह से जान से हाथ धो देती है। जिस तरह अरूंधती राय का दलित पात्र वेलुथा ‘मामूली चीजों के देवता’ में सवर्ण लड़की के प्रेम में मृत्यु को प्राप्त करता है। ‘बेलुथा’ के संबंध में डाॅ. ललन प्रसाद सिंह ने लिखा हैं- “युवा बेलुथा को क्या पता था कि उसे एक सवर्ण ईसाई नारी से संबंध बनाने की कीमत चुकानी पडे़गी। जैसे क्रौंच पंछी मारा गया था, वैसे ही बेलुथा भी मारा जाता हैं।” (आलोचना संदर्भ मार्क्सवाद, पृ-13)

जनवादी कवि व रचनाकार नागार्जुन (30 जून 1911-5 नवंबर 1998)

बनाफर चंद्र ने अपने इस उपन्यास में दूसरी स्त्री पात्र जगदीश की मां को बहुत ही मजबूत व समझदार पात्र के रूप में गढ़ा है। बनाफर चंद्र के पात्रों की विशेषता है कि उनके प्रत्येक पात्र अपनी सम्पूर्णता में जीते हैं। भोजपुर के किसानों के खूनी संघर्ष को समझने-बुझनें के लिए तीन उपन्यास ही काफी हैं- ‘जमीन’ (बनाफर चंद्र), ‘मास्टर साब’ (महाश्वेता देवी) और ‘अशेष’ (सगीर रहमानी)। बनाफर चंद्र ने छोटे-बड़े आठ उपन्यासों की रचना की है। ‘बस्ती और अंधेरा’, ’अधूरा सफर’, ‘बीता हुआ कल’ और ’सवालाें के बीच’ उनके शेष उपन्यास हैं। उपन्यास के अलावा बनाफर चंद्र ने कई कहानियां भी लिखे हैं। उनके कहानी संग्रहों में ‘पापा। तुम पागल नही हों’, ‘अपना देश’ और ‘मटमैला आकाश ’ हैं। मटमैला आकाश(2010) में कुल सोलह कहानियां हैं। इसमें  ‘मौसी की कथाओं के महानायक’, ‘बासमती चावल’ और ‘अधूरे सपने’ ओबीसी चरित्रों को साफ तौर पर उभारने वाली रचनाएं हैं।

जमीन : बनाफर चंद्र की रचना

बनाफर चंद्र वर्गीय दृष्टिकोण से निम्न व मध्य वर्ग के रचनाकार हैं। इनके उपन्यास और कहानियों में किसानों के दुःख दर्द और संघर्ष इतने स्पष्ट तौर पर सामने आए हैं कि उन्हें किसानों व गांवों का लेखक कहने में किसी तरह से हिचकिचाहट नहीं होनी चाहिए। इनके किसान पात्रों की समस्याएं व संघर्ष विश्व के किसानों की समस्याएं  व संघर्ष हैं। बनाफर चंद्र की रचना शैली इतनी सधी व साफ है कि कोई भी इतनी कहानी कला का मुरीद बन जाय। मसलन  ‘बसमती चावल’ कहानी में रामसुभग के बारे में लेखक ने लिखा है- “जिस छाती और जांगर के बल पर वह बंशीधर बाबू के लिए बासमती चावल पैदा करता था, आज वही छाती खोखली हो गई थी और जांगर में घुन लग गए थे।” (मटमैला आकाष, पृ.-107)

पेंटिंग : जियाउर रहमान, 2016

इस कहानी की यह पंक्तियां किसानों के शोषण व उसकी त्रासदी भरी जिंदगी को बखूबी उभारकर सामने ला देती है। ओबीसी (कुशवाहा) की उपजाति बनाफर में जन्में इस महान लेखक का जन्म 2 जुलाई 1950 को काराकाट अंचल के श्रीरामपुर गांव में हुआ था। इनकें पूर्वज महोबा से औरंगाबाद जिले आए थे और औरंगाबाद से रोहतास जिले में आकर बस गए थे। आल्हा-ऊदल की वीरता आज भी इनके घरों में बड़े ही चाव से सुनाए जाते हैं। लेखक के दादा, पिता, स्वयं लेखक और लेखक के नाती खुद अखाड़िया रहे हैं। इसकी छाप इनकी कई रचनाओं में देखी जा सकती हैं। ‘अपने-अपने दायरे ’ (2013) और ‘कविता का वसंत’ (2017) इनके दो कविता संग्रह हैं। इनकी कविताओं से मिट्टी की महक आती है। गांव-घर तो इनके पोर-पोर में बसे हैं-

“आंगन में आकाश छूता

एक पेड़  था  नीम का

अक्सर  मेरी  खटोली

पड़ी   रहती  थी वही

जहां से दिखाई देता था

सारा ब्राह्मांड”

ओबीसी की जनवादी धारा के सशक्त साहित्य समालोचक आलोक चंद्रबली सिंह ने किसी लेखक की विश्वसनीयता के बारे में लिखा है – “किसी भी लेखक या कलाकार के आत्म-संघर्ष की कसौटी उसके द्वारा की गई अपनी ईमानदारी की मुनादी नहीं हो सकती, जीवन की गहरी होती हुई उसकी पकड़, समझदारी ही उसकी वस्तुगत, अतः एकमात्र विश्वसनीय, कसौटी है।” (जनपक्ष, अंक-3 जनवरी 2006 पृ 06)

बनाफर चंद्र  इस कसौटी पर खरे भी उतरते हैं। वे ‘दायरा’ कविता में लिखते हैं –

“दु:ख के पाव लम्बे हैं

घर की चादर छोटी

कहां-कहां ढाकें, कहां-कहां तोपें”

बनाफर चंद्र का जीवन भी रोमांस और रोमांच से परिपूर्ण रहा है। ‘गजल’ पर भी उनकी अच्छी पकड़ है। ‘सहर के लिए’ और ‘चांद सूरज’ उनकी गजल- संग्रह हैं। प्रेम तो उनकी नसों में बसा है। लेकिन उनकी गजलें धान व फसलों से अलग भी नहीं हैं। तीन भागों में छपा उनका आत्मकथात्मक उपन्यास ‘सच के आगे’ उनके जीवन के दस्तावेज हैं। उन्होंने अपने जीवन के सच को बड़ी ईमानदारी से, खतरे उठाकर लिखा है। इनके लेखन में कहीं बचाव-छुपाव नहीं है। सोलह औरतों का सान्निध्य उनके अनुभव संसार को विश्वसनीय व विकसित बनाने में विशेष योगदान दिया। इसीलिए बनाफर चंद्र की स्त्री पात्र काफी गहरे तक प्रभावित करने में सक्षम हैं। लेखक का सच ‘उसकी डायरी’ है। ओबीसी के यह महान कलाकार 19 अक्टूबर 2017 दीवाली के दिन मेरे घर मेरे साथ रहे। उनकी अंगुलियां उनके लेखन में अब साथ नहीं दे पा रही थीं- थरथराती थीं। लेखक को अफसोस है कि वह ‘जमीन’ उपन्यास का दूसरा भाग लिख नहीं पाए। जगदीश मास्टर के संघर्ष का पूरा परिदृश्य उनकी आंखों के सामने था, जो उपन्यास का शक्ल न ले सका !

 


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