मार्क्स के साथ अब आंबेडकर की राह भी चलेगा जलेस, वजाहत बने अध्यक्ष

संघ परिवार की प्रतिक्रियावादी एंव प्रतिगामी संस्कृति का मूल तत्व ब्राह्मणवादी और पूंजीवादी पतनशील संस्कृृति है। इन पतनशील संस्कृतियों के गठजोड़ का घना अंधकार भारतीय समाज पर छा रहा है। इस अंधकार को भेदने और वैकल्पिक प्रगतिशील मानवीय संस्कृति के सृजन हेतु मार्क्सवाद और आंबेडकर की विचारधारा ही हमारी मशाल है, इस आह्वान के साथ जनवादी लेखक संघ का नवां राष्ठ्रीय सम्मेलन संपन्न हुआ। प्र्स्तुत है सम्मेलन की रिपोर्ट

आंबेडकरवाद और मार्क्सवाद के संयुक्त सिद्धांतों के आधार पर अभिव्यक्ति की आजादी को जिंदा रखने तथा लैंगिक और दलित उत्पीड़न के खिलाफ संघर्ष को नया आयाम देने के प्रस्ताव के साथ जनवादी लेखक संघ (जलेस) का दो दिवसीय राष्ट्रीय सम्मेलन खत्म हुआ। यह आायोजन बीते 27-28 जनवरी 2018 को झारखंड के धनबाद  में आयोजित किया गया। हाल ही में दिवंगत हुए साहित्यकार दूधनाथ सिंह की स्मृति में सम्मेलन स्थल का नामकरण दूधनाथ सिंह नगर किया गया। इस मौके पर जलेस के पदाधिकारियों का निर्वाचन भी हुआ और प्रख्यात साहित्यकार   और देश की विविधतापूर्ण संस्कृति के  प्रतिनिधि  असगर वजाहत  को सम्मेलन का अध्यक्ष और मुरली मनोहर प्रसाद सिंह को महासचिव चुना गया।

साथ ही सम्मेलन में उर्दू की हिफ़ाज़त व फ़रोग़ के लिए, अभिव्यक्ति की आज़ादी पर हो रहे हमलों के ख़िलाफ़, महिलाओं पर हो रहे अत्याचारों के ख़िलाफ़, दलित व आदिवासियों पर हो रहे हमलों के ख़िलाफ़ और अल्पसंख्यकों पर किये जा रहे जुल्मों के प्रतिरोध में प्रस्ताव पारित किये गये। अंत में पिछले सम्मेलन से अब तक दिवंगत हुए रचनाकारों व कलाकारों को श्रद्धांजलि अर्पित करते हुए दो मिनट का मौन रखा गया।

 

जलेस के केंद्रीय एजेंडे में शामिल हुआ आंबेडकरवाद

करीब तीन वर्ष बाद हुए राष्ट्रीय सम्मेलन में  आज के सांस्कृतिक संकट के दौर में आंबेडकर की  विचारों पर गंभीर चर्चा हुई।  उद्घाटन के मौके पर  प्रख्यात दलित-मार्क्सवादी चिंतक राव साहब कसबे ने कहा कि बाबा साहब ने 1936 में यह बात कही थी कि जब-जब पूंजीवाद हारने लगता है, वह ब्राह्मणवाद को आगे कर देता है। कसबे साहब ने कहा कि जब एक हाथ में ‘कम्युनिस्ट मैनीफेस्टो’ और दूसरे में बाबा साहब की किताब ‘जाति का विनाश’ लेकर समाज आगे बढ़ेगा, तभी क्रांति होगी। उन्होंने कहा कि राजनीति और समाज की इतनी बदतर स्थिति हमने अपनी जिंदगी में कभी नहीं देखी, लेकिन ये तो होना ही था, बस हमें पता नहीं था। केवल बाबा साहब आंबेडकर को पता था कि यह होने वाला है। उन्होंने ही कहा था कि हिंदुस्तान में ‘पॉलिटिकल डेमोक्रसी’ के बावजूद ‘कास्ट मेजॉरिटी’ ही होगी। हमने संस्कृति या धर्म की ताक़त के बारे में कभी सोचा ही नहीं।

वामपंथियों द्वारा धर्म और संस्कृति की ताक़त की उपेक्षा आदि विषयों पर विस्तार से बात करने के बाद श्री कसबे ने कहा कि मुझे आश्चर्य होता है जब लोग पूछते हैं कि आरएसएस आज़ादी की लड़ाई में क्यों नहीं शामिल था? यह प्रश्न ही नहीं बनता, क्योंकि आरएसएस भारत को सांस्कृतिक रूप से राष्ट्र मानता है जिस पर जो चाहे राज करे, बस चातुर्वर्ण्य को क़ायम रखे। वे राजनैतिक राष्ट्र चाहते ही नहीं। भारत को राष्ट्र बनाने का पहला काम गांधी ने किया। उन्होंने पॉलिटिकल नेशन बनाने की घोषणा की थी। वह इसलिए कामयाब नहीं हुई कि कांग्रेस नेतृत्व के भीतर ही हिंदू महासभा थी। मैं मानता हूं कि राजनैतिक गांधी हमेशा हारता रहा और उसका महात्मा विजयी होता रहा।

सिद्धार्थ ने कहा – एजेंडे पर कायम रहना जरूरी

इससे पहले अपने संबोधन में ‘द वायर’ के संपादक सिद्धार्थ वरदराजन ने अपनी बात सम्मेलन की थीम ‘संस्कृति का रणक्षेत्रः चुनौतियां और संघर्ष’ पर ही केंद्रित रखी। उन्होंने कहा कि संघ परिवार पर आप कम से कम अपना एजेंडा छिपाने का आरोप नहीं लगा सकते। सांस्कृतिक क्षेत्र पर हमला शुरू से ही आरएसएस के एजेंडे पर रहा है। आज स्थिति यह है कि 200 साल के साम्राज्यवाद विरोधी संघर्ष, 70 सालों की आज़ादी और ब्राह्मणवाद-विरोधी संघर्ष से हमने जो कुछ हासिल किया है, उसे बचाने की रक्षात्मक लड़ाई में उतरे हुए हैं। उन्होंने पिछले साढ़े तीन सालों के परिदृश्य को बहुत विस्तार से रखते हुए बताया कि 2014 के संसदीय चुनाव में जीत हासिल करना भर उनका मकसद नहीं था, वे तो इस संवैधानिक रास्ते के इस्तेमाल से संविधान पर ही हमला करके उसे नष्ट कर रहे हैं। देश का न्यायिक ढांचा, चुनाव आयोग, आज़ाद ख़याल के केंद्र, देश के विश्वविद्यालय सहित कुछ भी महफूज़ नहीं रह गया है। मीडिया के खिलाफ़ ‘गोदी मीडिया’ को खड़ा कर दिया गया है। मीडिया को दबाव में लेने के साथ-साथ लेखक-कलाकार सांप्रदायिक ताक़तों के निशाने पर हैं। हर तरफ़ पागलपन का जो नंगा नाच दिख रहा है, वह दरअसल कठपुतली का खेल है जिसकी डोर किसी और के हाथ में है। हिंसा फैलाने वालों, हत्यारों और लंपटों की अनदेखी हो रही है और उत्तर प्रदेश में चंद्रशेखर रावण से राष्ट्रीय सुरक्षा को ख़तरा बताया जा रहा है। इतिहास के विरूपीकरण की चर्चा करते हुए उन्होंने कहा कि कोई परिपक्व देश अपने इतिहास को संभाल कर ही आगे बढ़ सकता है, उसे बदलने की कोशिश करके नहीं। ऐसा करना भविष्य पर हमला है। सिद्धार्थ वरदराजन ने लेखकों का आहवान करते हुए कहा कि सबसे पहले निडर बनें। आप अभिव्यक्ति के नये माध्यम और तरीके तलाशिए और साथ ही सियासी मतभेदों के बावजूद अभिव्यक्ति के अधिकार की रक्षा के लिए व्यापक एकजुटता क़ायम कीजिए।

सभी वक्तओें ने कहा ‘एनीहिलेशन ऑफ कास्ट’ महत्वपूर्ण

उद्घाटन समारोह के बाद ‘संस्कृति का रणक्षेत्रः चुनौतियां और संघर्ष’ विषय पर विचार विमर्श किय गया। इस सत्र का संचालन प्रख्यात कवि राजेश जोशी ने किया। वक्ताओं में महादेव टोप्पो, सुधन्वा देशपांडे, प्रो. सुभद्रा चानना, सुहैल हाशमी और सुभाषिणी अली शामिल थे। महादेव टोप्पो ने राव साहब कसबे के भाषण का हवाला देते हुए कहा कि आज के क्रांतिकारी के एक हाथ में कम्युनिस्ट मैनीफेस्टो और दूसरे में आंबेडकर की एनीहिलेशन ऑफ़ कास्ट  तो होनी ही चाहिए, साथ में प्रकृति को बचाने का संकल्प भी होना चाहिए। उन्होंने कहा कि आज पूंजीवाद के निशाने पर जल, जंगल और ज़मीन है। हमारा दायित्व है कि हम तीनों को बचाने का प्रयास करें। अपनी कविता ‘अच्छी चाय के इंतज़ार में’ के पाठ के साथ उन्होंने अपना वक्तव्य समाप्त किया।

वहीं सुधन्वा देशपांडे ने जननाट्य मंच और जलेस के गहरे संबंधों का हवाला देते हुए अपनी बात शुरू की। उन्होंने कहा कि जनम का पहला नुक्कड़ नाटक जनवादी विचार मंच की कांफ्रेंस में 1978 में हुआ था। उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि आज का दौर अंधेरे का दौर है जिसमें संस्कृतिकर्मियों की एकजुटता ज़रूरी है। अपने लेखन को लोकधर्मी बनाकर ही आज सार्थक भूमिका अदा की जा सकती है। हम उस जनता के लिए कला की रचना करें जो संघर्ष में शामिल हो रही है। जो कलात्मक अभिव्यक्तियों को लेकर हंगामा करते हैं, वे जाहिल हैं। उन्हें इतनी भी समझ नहीं कि कौन-सी कला उनके विचारों के अनुकूल है और कौन खिलाफ़। समझते तो ‘पद्मावत’ को लेकर हंगामा न करते, ‘बजरंगी भाईजान’ जैसी फिल्म को लेकर हंगामा करते जो बड़े हल्के-फुल्के तरीके से पाकिस्तान के बारे में उनकी राय को सबवर्ट करती है। सुधन्वा ने यह भी कहा कि यह ऐसा समय है जब लोग वामपंथ के साथ संवाद करने को तैयार हैं। इसलिए यह हमारे विस्तार का समय भी है।

जलेस के नवें राष्ट्रीय सम्मेलन को संबोधित करते वक्ता

प्रो. सुभद्रा चानना ने आदिवासियों की समृद्ध संस्कृति और उनके भयावह उत्पीड़न पर अपनी बात केंद्रित की। उन्होंने यह भी कहा कि हम ‘कोलोनाइजेशन’ की बात बहुत करते हैं, पर उस ‘इन्टरनल कोलोनाइजेशन’ को भूल जाते हैं जो इसी देश का एक वर्ग, एक तबका दूसरे वर्ग और तबके पर थोपता है। आदिवासी संस्कृति के महत्व को रेखांकित करते हुए उन्होंने उसमें निहित बराबरी की भावना पर जोर दिया। वहीं सुहैल हाशमी ने सत्र के विषय के साथ थोड़ी असहमति दर्ज करते हुए कहा कि संस्कृति के क्षेत्र को रणक्षेत्र कहना ठीक नहीं लगता। यह विचारों के संघर्ष का क्षेत्र अवश्य है, पर लड़ाई की तरह इसे न देखें। उन्होंने कहा कि हमारा राष्ट्रीय विमर्श उत्तर भारतीय द्विज हिंदू पुरुष का विमर्श है। हमारा साहित्य भी पूरे समाज का विमर्श नहीं है। प्रेमचंद के बाद प्रगतिशील-जनवादी परंपरा में दलितों पर किसने कलम उठायी? सांप्रदायिकता के खिलाफ़ इसी परंपरा में 1947 के आसपास कितना साहित्य मिलता है? इन बातों को ध्यान में रखते हुए अपनी परंपरा पर पुनर्विचार करने की ज़रूरत है।

जबकि कॉमरेड सुभाषिणी अली ने कहा कि संस्कृति का क्षेत्र आज ही नहीं, हमेशा से एक रणक्षेत्र रहा है। यह रणक्षेत्र साम्राज्यवाद और पूंजीवाद से भी पहले का है। संविधान लिखे जाने से पहले समानता का सिद्धांत कभी लागू नहीं हुआ। जिस स्वर्णिम अतीत को हम सराहते हैं, उसका विश्लेषण अवश्य करें। क्या वह दलितों के लिए, स्त्रियों के लिए भी स्वर्णिम था? संस्कृति का रणक्षेत्र सबसे पुराना है और खून से लथपथ है। लेखकों ने इसमें जोरदार हस्तक्षेप किया है। उन्होंने अवार्ड वापसी की मुहिम का जिक्र करते हुए लेखकों की भूमिका को रेखांकित किया।

इस सत्र में अध्यक्षीय वक्तव्य देते हुए चंचल चौहान ने कहा कि संघर्ष तब से चल रहा है जबसे वर्ग बने हैं। उन्होंने तमाम प्राचीन संदर्भों का उल्लेख करते हुए असमानता की परंपरा को चिह्नित किया और मिथकों की व्याख्या भी इसी संदर्भ में की। पहले दिन के इन दोनों सत्रों के बाद नये घोषणापत्र के मसौदे पर चर्चा को स्थगित कर छत्तीसगढ़ की एक नाचा मंडली की नाट्य-प्रस्तुति के लिए समय निकाला गया जो हरिशंकर परसाई की कहानी पर आधारित थी। रात के भोजन के बाद कविता और कहानी पाठ के समानांतर सत्र आयोजित हुए।

गैरमाजूदगी में असगर वजाहत चुने गये नये अध्यक्ष
सम्मेलन के दूसरे दिन सांगठनिक सत्र में चुनाव की प्रक्रिया संपन्न हुई। आम सभा ने सर्वसम्मति से केंद्रीय परिषद् की सदस्य-संख्या को 161 से बढाकर 175 करने और उसी के भीतर से चुनी जानेवाली केंद्रीय कार्यकारिणी की सदस्य संख्या को 65 से बढाकर 75 करने का प्रस्ताव पारित किया। इनके लिए राज्यों से आये डेलीगेटों के द्वारा चुने गये परिषद सदस्यों से बनायी गयी सूची सर्वसम्मति से पारित हुई। इस क्रम में असगर वजाहत को अध्यक्ष, चंचल चौहान को कार्यकारी अध्यक्ष, रमेश कुंतल मेघ, शेखर जोशी, इब्बार रब्बी, नमिता सिंह, चंद्रकला पांडेय, रामप्रकाश त्रिपाठी को उपाध्यक्ष के रूप में चुना गया। इस मौके पर असगर वजाहत स्वयं उपस्थित नहीं थे।

वजाहत ने जताया आभार, लिखा पत्र

जनवादी लेखक संघ के मित्रो,

यह खुशी की बात है कि आप लोगों ने मेरे ऊपर इतना विश्वास किया कि मुझे संगठन का अध्यक्ष बना कर सम्मान दिया।आप सब का बहुत आभारी हूं कि आपने मुझे इस योग्य समझा। हालांकि मैं अपने मुंहफट विचारों के लिए और यहाँ तक कि वामपंथ की आलोचनाएं करने के लिए कुख्यात हूं। लेकिन मेरा मानना है कि “जिनको मतलब नहीं होता वो सताते भी नहीं” । मतलब वामपंथ की आलोचना वही करते हैं जिनको वामपंथ से लगाव है । तो मैंने यही किया है और आशा है कि आगे भी करता रहूंगा।

जलेस के नवनिर्वाचित अध्यक्ष असगर वजाहत


यह दुःख की बात है कि कुछ गंभीर कारणों से मैं सम्मेलन में शामिल न हो सका। लेकिन मित्रों के माध्यम से जानकारियां मिलती रहती थीं ।यह खुशी की बात है जलेस ने इस माहौल में भी सक्रियता दिखाई है और संगठन को नया रूप दिया है।

देश किधर जा रहा है और क्यों जा रहा है, आप लोग मुझसे ज्यादा जानते हैं ।उसके बारे में कहकर मैं आपका समय नहीं लेना चाहता हूं। मैं तो केवल यह सोचता हूं कि अब हमें करना क्या है? यह दौर एक तरह से निराशा का दौर है लेकिन निराशा से तो काम नहीं चलता ‘नासिर’ काज़मी का शेर है-

बैठे हो क्यों हार के, साए में दीवार के
शायरों, सूरतगरों कुछ तो किया चाहिए

मैं समझता हूं कि वैसा बहुत कुछ किया जा सकता है जो हमें बहुत कठिन लगता है। सिर्फ काम करने की इच्छा होनी चाहिए। यह केवल मेरा ही मानना नहीं है मेरे कई मित्र ऐसा मानते हैं और हमने इसे करके भी देखा है। इच्छा है तो वह हो सकता है जिसकी इच्छा है और अगर इच्छा नहीं है तो वह काम नहीं हो सकता जो हम करना चाहते हैं, जो हमको करना है, चाहे जितने साधन हों। एक और जरूरी बात यह है कि जो व्यक्ति काम करने के बारे में कह रहा है, काम करने की प्रेरणा दे रहा है अगर उसी को अपने ऊपर विश्वास नहीं होगा तो दूसरे क्यों विश्वास करेंगे? इसलिए सबसे पहले तो हमें अपने ऊपर पक्का विश्वास होना चाहिए कि ‘हां’ जो काम हम चाहते हैं जरूर होगा।

मिलजुल कर लिए गए निर्णयों पर मुझे पक्का विश्वास है और काम करने का यही तरीका है कि हम एक नियम और पद्धति के अनुसार मिलजुल कर काम करें ।लेकिन इसका यह मतलब बिल्कुल नहीं है कि हम कोई नया काम न करें। हम चुनौती भरा काम न करें। हम ऐसा काम न करें जो  अब तक नहीं किया। हम नए प्रस्तावों के लिए अपना दिमाग खुला रखें, सलाह जरूर दें, कुछ नया करने की बात जरूर करें। इसलिए कि गति बनी रहना जरूरी है और नया काम और नई दिशाएं गति देते हैं।

देश के नेताओं ने इतनी बड़ी-बड़ी बातें कर ली हैं कि अब बड़ी बातें करने से डर लगने लगा है। लेकिन आगे के लिए कुछ सोचना जरूरी है ।मैं आपके साथ अपनी व्यक्तिगत और निजी राय साझा कर रहा हूं। यह हो सकता है संगठन की भी राय हो या हो सकता है इससे अलग हो। मेरा यह मानना है की सभी प्रगतिशील जनवादी संगठनों को साथ मिलकर कुछ बड़े कार्यक्रम, जिसमें बड़े स्तर पर लोग शामिल हो सके, विशेष तौर पर युवा शामिल हो सकें, करने चाहिए। युवा लेखकों के संकलन भी निकाले जाने चाहिए । लेखक संगठनों का यह पहला कर्तव्य होना चाहिए कि वे युवा पीढ़ी की भागीदारी को सुनिश्चित करें।

साहित्य को अन्य कलाओं के साथ जोड़ना बहुत आवश्यक है। उदाहरण के लिए नाटक, संगीत, चित्रकला और फिल्म जैसे माध्यमों से साहित्य का जुड़ाव बहुत जरूरी है। बहुत से मित्र हो सकता है ‘उत्सवधर्मिता’ के खिलाफ हों। लेकिन मेरा मानना है के हमारे कार्यक्रमों में कहीं-कहीं उत्सवधर्मिता को भी शामिल किया जाना चाहिए। मतलब यह है कि साहित्य और समाज की गंभीर व्याख्या, आलोचना करने के लिए सेमिनार, संगोष्ठी, वाद विवाद,परिचर्चा और लोकार्पनों के साथ साथ साथ-साथ कुछ ऐसा भी होना चाहिए जिससे बड़े स्तर पर लोगों को जोड़ा जा सके। इस तरह का काम मराठी साहित्य के कुछ संगठन बड़ी सफलता से करते हैं।

मेरा यह भी मानना है की साहित्यिक कार्यक्रमों के स्वरूप पर बातचीत करना बहुत आवश्यक है। क्योंकि आमतौर पर ऐसे कार्यक्रमों का स्वरूप बहुत पुराना, उबाऊ, जड़ और व्यक्ति केंद्रित बन गया है जिसमें जाने वालों, सुनने वालों की भागीदारी लगभग शून्य होती है। इसलिए यह बहुत आवश्यक है कि साहित्यिक कार्यक्रमों के स्वरूप पर बात की जाए और उन्हें रोचक और जीवंत मनाया जाए।

मुख्य बात यह है कि आज के हालात में सांस्कृतिक हस्तक्षेप जितना जरूरी हो गया है उतना शायद पहले कभी नहीं था। इसलिए बड़े स्तर पर जनवादी सांस्कृतिक हस्तक्षेप की आवश्यकता है

आमतौर से साधनों की कमी की चर्चा बहुत की जाती है। आशा की जाती है कि पहले साधन हों उसके बाद कार्यक्रम शुरू किए जाएं। मुझे लगता है कार्यक्रम शुरू किए जाएंगे तो साधन जुटेंगे और यदि कार्यक्रम शुरु ही नहीं होंगे तो साधनों का जुटना बहुत मुश्किल है।अच्छे कार्यक्रमों के लिए बिना शर्त सहयोग भी मिलता है और मिल सकता है। लेकिन निश्चित रूप से ऐसा सहयोग लेते समय पूरी सावधानी बरतने की आवश्यकता होती है। दूसरी समानधर्मा संस्थाओं के साथ भी कार्यक्रम आयोजित किए जाने चाहिए। इस संदर्भ में व्यापक नजरिया है अपनाने के बारे में सोचना चाहिए।

हो सकता है, और जरूर होगा कि बहुत सी जरूरी बातें कहने से रह गयी होंगी।पर जैसा कि मैंने पहले लिखा है यह तो मेरे कुछ विचार हैं। पर पत्र मुख्य रुप से संगठन के सदस्यों और पदाधिकारियों के प्रति आभार और धन्यवाद ज्ञापन है।

असग़र वजाहत

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  1. HARSHVADAN Reply

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