मिथक और इतिहास के अंतर्संबंधों की परत खोलती एक किताब       

अमेरिकी इतिहासकार ‘हार्वर्ड जिन’ ने ‘अमेरिका का जन-इतिहास’ नामक पुस्तक लिखी है। इस पुस्तक को पढ़ते हुए मुझे हमेशा यह महसूस होता रहा कि भारत का जन-इतिहास लिखने की ज़रूरत अभी शेष बची है। ‘महिषासुर मिथक और परंपराएं’ पुस्तक उस दिशा की तरफ एक कदम है। फिलहाल पत्रिका में प्रकाशित स्वदेश कुमार सिन्हा की समीक्षा :

21वीं सदी में महिषासुर आंदोलन द्विज संस्कृति के लिए चुनौती बन कर उभरा।

आदिवासियों, पिछड़ों और दलितों का एक हिस्सा इसके माध्यम से नए सिरे से अपनी सांस्कृतिक दावेदारी पेश कर रहा है। यह आन्दोलन क्या है, इसकी जड़ें कहाँ तक विस्तारित हैं, बहुजनों की सांस्कृतिक परंपरा में इसका क्या स्थान है, लोग जीवन में उनकी उपस्थिति किन-किन रूपों में है। इनके पुरातात्विक साक्ष्य क्या हैं, गीतों, कविताओं और नाटकों में महिषासुर किस रूप में याद किए जा रहे हैं और अकादमिक, बौद्धिक वर्ग को इस आन्दोलन ने किस रूप में प्रभावित किया है। क्या महिषासुर अनार्यों के पूर्वज थे जो बाद में एक मिथकीय चरित्र बनकर बहुजन संस्कृति, जीवन-पद्धति और सभ्यता के प्रतीक पुरुष बन गए? क्या यह बहुत बाद की परिघटना है जब मार्कंडेय पुराण और दुर्गा सप्तशती जैसे ग्रन्थों के माध्यम से एक देवी के हाथों महिषासुर की हत्या की कहानी गढ़ी गई। इन सभी प्रश्नों का जवाब ‘महिषासुर- मिथक और परंपराएं’ किताब देती है। इसका संपादन प्रमोद रंजन ने किया है। प्रमोद रंजन एक्टिविस्ट रचनाकार हैं, वह हिंदी समाज-साहित्य को देखने-समझने के परंपरागत नज़रिए को चुनौती देने वाले लोगों में से एक हैं। “महिषासुर-मिथक व परंपराएं” उनके द्वारा संपादित नवीनतम कृति है। इससे पूर्व उनके सम्पादन में इसी विषय पर प्रकाशित पुस्तक महिषासुर-एक जननायक आई थी।

‘महिषासुर मिथक व परंपराएं’ का कवर पृष्ठ

किताब में संग्रहित विविध लेखों में अभिव्यक्त विचारों से सहमतियां-असहमतियां हो सकती हैं, लेकिन इसमें उठाये गए महत्वपूर्ण मु्द्दों-विमर्शों की अनदेखी नहीं की जा सकती। मिथकों, लोक-गाथाओं, आख्यानों में इतिहास के तत्व होते हैं परन्तु भारतीय इतिहास-लेखन में इनका बहुत कम उपयोग किया गया। पुस्तक की भूमिका में सम्पादक इस तथ्य को रेखांकित करते हैं, कि आखिर आज के आधुनिक समय में एक नए विमर्श की ज़रूरत क्यों पड़ गई? ‘इस किताब से गुजरते हुए आप महसूस करेंगे कि आदिवासी परंपरा ही रूपांतरित होकर अन्य पिछड़ी जातियों, दलित जातियों समेत अद्विज समुदाय के एक वृहत हिस्से तक पसरी है। इसकी मौजूदगी इस बात का भी संकेत है कि इन समुदायों का उद्गम एक रहा है, अब लोकतांत्रिक व्यवस्था में इनके राजनीतिक हित घनिष्ठ रूप से जुड़ गए हैं।

महोबा के चौकीसोरा में भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण द्वारा संरक्षित भैंसासुर का स्मारक (फोटो एफपी ऑन द रोड, 2017)

इसी पुस्तक में एक स्थान पर लेखक लिखता है, ‘अगर असुर परंपरा के मूल-दार्शनिक तत्व, इससे निश्रित विश्व-दृष्टि, कृषि और श्रम पर आधारित है तथा ब्राह्मण द्विज परम्पराओं से सर्वथा भिन्न हैं, लेकिन कहने की आवश्यकता नहीं कि परम्पराओं का मूल सांकेतिक ही होता है। समय के साथ-साथ वह परिपाटी बन जाती हैं और अप्रासंगिक हो जाती हैं. महिषासुर से संबंधित परिपाटियों में कुछ जगहों पर महिलाओं को शामिल नहीं किया जाता। यह उस लोक-स्मृति को सहेजने का एक तरीका रहा है जिसके अनुसार उनकी हत्या एक स्त्री द्वारा छल के कारण हुई थी। आज नए महिषासुर शहादत स्मृति दिवस ने उस परिपाटी को भी पूरी तरह बदल दिया है। आयोजनों में महिलायें प्रथम स्थान पर हैं।

पुस्तक का सबसे रोचक अध्याय इसके सम्पादक का अपने साथियों के साथ देश भर में बिखरी महिषासुर की परम्पराओं को तलाशने की यात्रा है। इस सम्बन्ध में संपादक लिखते हैं, ‘हमारे पास दो तस्वीरें हैं, एक में पत्थर की अनगढ़ सिल्लियों से बनी छोटी से झोपड़ी जैसा कुछ है। दूसरी तस्वीर में किसी सड़क पर लगा एक साइन बोर्ड है जिसपर लिखा है, ‘भारत सरकार केन्द्रीय संरक्षित स्मारक, भैंसासुर स्मारक स्थल, चौका तहसील, कुल पहाड़, भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण, लखनऊ मंडल, उप-मंडल महोबा, उत्तर प्रदेश.मुझे यह तस्वीरें इंडिया टुडे के पीयूष बोबेले ने पिछले साल 16 अक्टूबर 2014 को ई-मेल से भेजी थीं। यह तस्वीरें इसका प्रमाण थीं कि बुंदेलखंड में महिषासुर का एक मंदिर है। उससे भी बड़ी बात है कि उसपर भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण की मुहर लगी है। हमने उन तस्वीरों को फारवर्ड प्रेस की ओर से एक प्रश्न-नोट जारी कर अखबारों को दे दीं। उससे उन लोगों की बोलती तो तत्काल बंद हो गई, जो हमें काल्पनिक कथा गढ़ने वाला बता रहे थे। इस घटना के बाद लेखक ने अपने साथियों के साथ इस स्थल की तलाश में एक लम्बी और कठिन यात्रा उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश के बुंदेलखंड इलाके में की, जिसका रोचक वर्णन पुस्तक में किया गया है। “मध्य प्रदेश सीमा में प्रवेश करने के बाद पहला शहर हरपालपुर आया। अब हम झांसी की ओर बढ़ रहे थे, अचानक हाईवे पर एक साइन बोर्ड दिखा जिसपर लिखा था, ‘भैंसासुर स्मारक मंदिर, चौका तहसील कुल पहाड़, भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण… वहां से दाहिनी ओर लगभग दो किलोमीटर चलने के बाद एक पतली सड़क फिर दाहिनी ओर मुड़ती है, उससे थोड़ा आगे बढ़ने पर चौका सोरा नामक गाँव है। इसी गाँव के आरम्भ में पुरातत्व सर्वेक्षण द्वारा संरक्षित हमारे फोटो वाला भैंसासुर मंदिर था। एक ऊँचे टीले पर स्थित पत्थरों का वह ढाँचा किसी कोण से मंदिर की तरह नहीं दिखता। मुख्य ढाँचा जो छोटे आकार के कमरे जैसा है, काफी प्राचीन प्रतीत होता है। उसमें एक द्वार है जिसपर पुरातत्व विभाग ने लोहे का एक गेट लगवा दिया है। अंदर झाँकने पर एक त्रिकोण सी आकृति दिख रही है, जो शिवलिंग जैसी लगती है। यह वह पिंडी है जो असुर-आदिवासी परंपरा में मिलती है। उनके अनुसार यह स्मारक चंदेलों के शासन काल में लगभग 11वीं सदी में निर्मित प्रतीत होता है। बहरहाल जो कोई भी खजुराहो मंदिरों के उम्दा शिल्प को देखेगा और फिर इस अनगढ़ भैंसासुर स्मारक को देखेगा, तो उसे यह साफ़ तौर पर प्रतीत होगा कि इस स्मारक का निर्माण निश्चित रूप से खजुराहो के मंदिरों से काफी पहले हुआ होगा। खजुराहो के भव्य मंदिरों के साथ-साथ इस सारे इलाके के गाँव में भैंसासुर के स्थान मिलते हैं। विशेष रूप से यह पशुपालक के देवता समझे जाते हैं। जानवरों के बीमार होने पर उन्हें इन स्थानों पर लाते हैं। यादव जाति के लोग साल में एक बार इन जगहों पर आकर यहाँ विशेष पूजा करते हैं। दरअसल भारतीय उपमहाद्वीप का इतिहास लेखन पौराणिक कथाओं से जिस प्रकार पूर्वाग्रह ग्रसित रहा है उसे सामने रखकर इन प्रश्नों से गुज़रना भयावह अँधेरे वाली सुरंग में घुसने की तरह है। देवीप्रसाद चट्टोपाध्याय, डी. डी. कौशाम्बी, मोतीरावण कंगाली जैसे कुछ प्रकाश स्तम्भ ज़रूर हैं, लेकिन यह सुरंग तो लाखों योजन लम्बी-चौड़ी है’।

इस संकलन में नवल किशोर कुमार द्वारा लिखित महत्वपूर्ण आलेख छोटा-नागपुर के असुर हैं। इसमें लेखक लिखता है झारखंड के गुमला जिले के बिशुनपुर प्रखण्ड में आदिम आदिवासी जन-जाति के लोग हैं। लुप्त होती जन-जातियों में से एक असुर-जात की संस्कृति और उनके अस्तित्व को लेकर हमारे मन में सवाल थे। सवाल इसलिए भी कि इस जन-जाति के लोग पूर्व में लोहा निकालकर उसे गलाने का काम करते थे। वह जिन इलाकों में रहते हैं, वहाँ लौह-खनिज व एल्युमीनियम प्रचुर मात्रा में पाया जाता है। इस इलाके की समृद्ध सांस्कृतिक परंपरा रही है। देश के अन्य आदिवासियों की तरह वह एक समय में आर्थिक रूप से आत्म-निर्भर थे, लेकिन वह आज बॉक्साइट निकालने वाली राष्ट्रीय, बहु-राष्ट्रीय कंपनियों के मजदूर बनकर रह गए हैं। इस असुर-समुदाय में महिषासुर पूजन की समृद्ध परंपरा रही है, जिसे वह आज भी निभा रहे हैं। अनिल वर्गीज का लेख राजस्थान से कर्नाटक वाया महाराष्ट्र: तलाश महिषासुर की, में लेखक विशेष रूप से राजस्थान के बिलाड़ में राजा बलि के मंदिर का वर्णन करते हुए लिखते हैं,‘बिलाड़ पहुँचने के साथ ही हमारी नज़र राजा बलि के बोर्ड पर पड़ी। हम इस उम्मीद से आए थे कि शायद हमें बहुजन संस्कृति के कुछ चिन्ह देखने तो मिलें परन्तु यहाँ राजा बलि के गिने-चुने चित्रों के सिवाय कुछ नहीं मिला।

गोड़ी पुनेम दर्शन और महिषासुर संजय जोठे का एक महत्वपूर्ण लेख है। यह लेख भी मिथकों के पुनर्पाठ की वकालत करता है। ज्योतिराव फुले, डॉ. आंबेडकर, देवी प्रसाद चट्टोपाध्याय, डी. डी. कौशाम्बी, गेल आमवेट का अध्ययन यह बहुत ही स्पष्टता से बतलाता है कि भारतीय मिथकों ने कैसे आकार ग्रहण किया, किस प्रकार इतिहास की जगह मिथकीय पुराणों की रचना की गई,‘यह देखकर आश्चर्य व दु:ख होता है कि इस देश में इतिहास कभी नहीं लिखा गया, बल्कि उसकी जगह मिथकों और कल्पनाओं से भरे पुराण लिखे गए हैं। भारत के इतिहास लेखन के सम्बन्ध में अक्सर यह कहा जाता है कि भारत के पास अतीत तो है, पर इतिहास नहीं।’ यही इसकी एेतिहासिक रूप से लम्बी और शर्मनाक गुलामी का भी कारण है। भारत में हज़ारों धर्म-ग्रन्थ और विपुल दार्शनिक साहित्य हैं। सैकड़ों ज्ञात राजवंशों और कबीलों सहित अज्ञात परंपराओं के संकेत और प्रमाण मिलते हैं। साथ ही अन्य देशों के यात्रियों ने यहाँ एक बड़ी ही विस्तृत और प्राचीन सभ्यता की बात कही। यह सब बातें बताती हैं कि इस देश में इतिहास ज़रूर घटित हुआ, लेकिन उसका लेखन नहीं हुआ। एक समृद्ध और गौरवशाली दर्शन जिसमें लोकायत, चर्वाक, बौद्ध आदि भौतिकवादी संस्कृति थी। उनका ब्राह्मणीकरण करके उनको आत्मा-परमात्मा, पाप-पुण्य के दर्शन में बदल दिया गया। समाजशास्त्री डॉ. कंगाली के अध्ययन से इस मान्यता को न केवल बल मिलता है बल्कि एक अर्थ में उनकी महान खोज इस बात को स्थापित भी कर देती है कि गोड़ी, पुनेम दर्शन व संस्कृति पहली अखिल भारतीय संस्कृति रही है। उनका अध्ययन यह स्पष्ट करता है कि किस तरह ब्राह्मण धर्म ने गोंडी धर्म और संस्कृति को बुद्ध के उदय के बहुत पहले ही आत्मसात करके मूल गोंडी समुदायों को षड्यंत्रपूर्वक समाज व राज व्यवस्था के निचले पायदानों में धकेल कर जंगलों में ही सीमित कर दिया था। इस संकलन का यह महत्वपूर्ण लेख अनेक विवादास्पद स्थापनाओं जैसे प्राचीन हड़प्पा सभ्यता की सील जिसे गोड़ी व्याकरण में पढ़ा जा चुका है, के बावजूद महिषासुर मिथक के देश-व्यापी फैलाव तथा उसकी एतेहासिक तथा पुरात्विक व्याख्या भी प्रस्तुत करता है। इसी संकलन में डॉ. आंबेडकर व असुर’, डॉ. सिद्धार्थ का महत्वपूर्ण आलेख है। आंबेडकर अनार्य, असुर, दास और नागों को एक दुसरे का पर्याय मानते थे। नागों के रूप में द्रविड ने न केवल दक्षिण भारत पर बल्कि सारे भारत पर अपना आधिपत्य बनाए रखा था।

झारखंड के गुमला जिले के बिशुनपुर प्रखंड के जोभीपाट गांव में अपने घर को जाती एक आदिवासी युवती (फोटो एफपी ऑन द रोड, 2016)

अगर आप इस पूरी पुस्तक का विस्तृत अध्ययन करेंगे, तो पाएंगे कि अनेक तथ्यों के दोहराव के बावजूद अनेक महत्वपूर्ण एेतिहासिक बातों को उजागर करने का प्रयास किया गया है। भले ही वह मिथक या लोक गाथाएं ही क्यों न हों। इस सम्बन्ध में दुर्गा सप्तशती का असुर पाठ एक महत्वपूर्ण लेख है। ब्राह्मणवाद ने किस तरह आदिवासी देवी-देवताओं को अपने में समाहित करके उनका हिन्दूकरण कर लिया। इस पर एक महत्वपूर्ण आलेख सिंथिया स्टीफन का आदिवासी, देवी चमुंडा और महिषासुर है। निवेदिता मेनन का आलेख, ‘भारत माता और उनकी बगावती बेटियाँ भी मूलत: इस तथ्य को ही आगे बढाता है कि भारत को देवी के रूप में स्थापित करने की परिकल्पना एक ब्राह्मणवादी परंपरा थी। द्रविड तथा आदिवासी समाज की श्याम रंग की देवियाँ किस तरह धीरे-धीरे अपना स्वतन्त्र व्यक्तित्व खोकर हिन्दू देवताओं की पत्नियों के रूप में परिवर्तित होती जाती हैं।

पुस्तक के समग्र अध्ययन से दो-तीन बातें निकल कर सामने आती हैं। प्रथम तो यह है कि दलित, पिछड़ा तथा जनजातीय समाज, सांस्कृतिक, आर्थिक तथा राजनैतिक तीनों दृष्टि से शोषण का शिकार है परन्तु सबसे बड़ा हमला सांस्कृतिक है। द्विज संस्कृति ने एक गौरवशाली सांस्कृतिक विरासत को नष्ट करके उनपर अपनी संस्कृति थोप दी। महिषासुर का सन्दर्भ इन्हीं अर्थों में एक उदाहरण है।

पुस्तक में अस्मितावादी संघर्ष और आर्थिक लड़ाइयों को अलग-अलग करके देखना एक बड़ी कमी की ओर इशारा करता है। बिहार, छोटा-नागपुर, झारखण्ड जैसे इलाके का जन-जातीय समाज भयानक, शोषण, दमन का शिकार है। उन्हें जल, जंगल, ज़मीन से महरूम कर दिया गया। वह मजदूरी करके अपना गुज़ारा कर रहे हैं अथवा दिल्ली जैसे महानगरों में यौन-शोषण सहित हर तरह के शोषण के शिकार हैं। असुर जैसी जन-जातियाँ विलुप्त होने के कगार पर खड़ी हैं। उनकी भाषा, संस्कृति, रीति-रिवाज़ भी उन्हीं के साथ समाप्त हो रहे हैं। आप जब तक इनके आर्थिक संघर्षों में भागीदारी नहीं करेंगे, तब तक इनकी अस्मिता भाषा-संस्कृति रीति-रिवाजों को भी नहीं बचा पाएँगे, प्रतीक चाहे वह महिषासुर का ही क्यों न हो, उसे आर्थिक संघर्षों का भी प्रतीक बना सकते हैं। दलित-पिछड़े तथा जन-जातीय समाज को एक साथ किसी एक प्रतीक के आस-पास संगठित करना फिलहाल एक जटिल कार्य है। इसके लिए लम्बे सांस्कृतिक, सामाजिक तथा आर्थिक नवजागरण की आवश्यकता है।

अमेरिकी इतिहासकार हार्वर्ड जिन ने अमेरिका का जन-इतिहास नामक पुस्तक लिखी है। इस पुस्तक को पढ़ते हुए मुझे हमेशा यह महसूस होता रहा कि भारत का जन-इतिहास लिखने की ज़रूरत अभी शेष बची है। यह पुस्तक उस दिशा की तरफ एक कदम है।

 

किताब :  महिषासुर : मिथक और परंपराएं

संपादक : प्रमोद रंजन

मूल्य : 350 रूपए (पेपर बैक), 850 रुपए (हार्डबाऊंड)

पुस्तक सीरिज : फारवर्ड प्रेस बुक्स, नई दिल्ली

प्रकाशक व डिस्ट्रीब्यूटर : द मार्जिनलाइज्ड, वर्धा/दिल्ली, मो : +919968527911 (वीपीपी की सुविधा उपलब्ध)

ऑनलाइन यहां से खरीदें : https://www.amazon.in/dp/B077XZ863F

पटना से प्रकाशित मासिक पत्रिका ‘फिलहाल’ (संपादक प्रीति सिन्हा) के जनवरी-फरवरी 2018 के अंक में प्रकाशित


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‘महिषासुर एक जननायक’

महिषासुर : मिथक व परंपराए

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