हूल विद्रोह में शामिल थे संताल आदिवासी, दलित और ओबीसी

हूल विद्रेाह अंग्रेजों के खिलाफ पहला जन विद्रोह था। इसका नेतृत्व संताल के आदिवासियों ने किया और इसमें संताल इलाके के दलित और पिछड़ा वर्ग के लोग भी शामिल थे। लेकिन इतिहासकारों ने कभी भी बहुजन पक्ष को सामने आने ही नहीं दिया। बता रहे हैं अश्विनी कुमार पंकज

1855 का संताल हूल इतिहास प्रसिद्ध है। यह भारत का पहला ‘जन संग्राम’ है जिसने 1857 के ऐतिहासिक जनविद्रोह की पूष्ठभूमि बनाई। पर ब्रिटिश विरोधी संग्राम हूल की व्यापकता को सिर्फ संतालों का विद्रोह कहके इसके प्रभाव और विस्तार की इतिहासकारों ने उपेक्षा की। वास्तव में यह संतालों के नेतृत्व में हुआ भारतीय जनता का पहला संगठित  जनयुद्ध था। इसमें केवल संताल परगना के संताल आदिवासियों की ही भागीदारी नहीं थी बल्कि संताल इलाके में रहने वाले सभी समुदायों और जातियों की बराबर हिस्सेदारी थी। इनमें दलित और ओबीसी भी शामिल थे। संताल युद्ध से जुड़े ब्रिटिश दस्तावेजों में दर्जन भर से ज्यादा लोगों के नाम मिलते हैं, जिन्हें संताल हूल के प्रमुख आरोपी के बतौर सजा मिली। फांसी, देश निकाला और सश्रम आजीवन कारावास तक की सजा।

हूल के ऐसे अनाम रह गए लड़ाकों में कुछ प्रमुख नाम हैं- मंगरा पुजहर (पहाड़िया), गोरेया पुजहर (पहाड़िया), हरदास जमादार (ओबीसी), ठाकुर दास (दलित), बेचु अहीर (ओबीसी), गंदू लोहरा, चुकू डोम (दलित), मान सिङ (ओबीसी) और गुरुचरण दास (दलित)। इनमें से पहाड़िया आदिवासी समुदाय के मंगरा पुजहर और गोरेया पुजहर, ओबीसी वर्ग के हरदास जमादार व बेचु अहीर और दलित वर्ग के ठाकुर दास को हूल में अग्रणी भूमिका निभाने के कारण फांसी दी गई थी। वहीं गंदू लोहरा, दलित वर्ग से आने वाले चुकू डोम और ओबीसी के गुरुचरण दास को सश्रम आजीवन कारावास मिली थी। जबकि ओबीसी के ही मान सिङ को आजीवन देश निकाला दिया गया था। इनके अतिरिक्त और कई नाम हो सकते हैं, जो अंग्रेजी दस्तावेजों में दबे रह गए हैं। पर उपरोक्त शहीदों के नाम की मौजूदगी बताती है कि हूल में संतालों के साथ-साथ उस क्षेत्र में रहने वाले गैर-संताली लोगों की भी बड़ी हिस्सेदारी थी।

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खास करके गैर-आदिवासी समाज के दलित और पिछड़ी जातियों के समूहों का। उच्च जाति के लोग और विशेषकर महाजनी पेशे से जुड़े बनिया, तेली व दूकानदार-साहूकार किस्म की जातियों के लोगों की भागीदारी नहीं के बराबर थी। परंतु खेती-किसानी से जुड़ी गैर-आदिवासी जातियां  जैसे, लुहार, बढ़ई, कर्मकार, शिल्पकार, चर्मकार और अहीर की हूल में संताल आदिवासियों जैसी बराबर की भागीदारी थी।

हूल कोई आकस्मिक ढंग से हुआ विद्रोह नहीं था। यह एक संगठित युद्ध था जो बगैर स्थानीय समुदायों विशेष रूप से कारीगर और अन्य खेतीहर समुदायों के सहयोग के संचालित नहीं किया जा सकता था। क्योंकि 1855 से 1865 तक यह रुक-रुककर चला था। सिर्फ 1855 के कुछ महीनों तक की ही इसकी अवधि नहीं थी। इतने लंबे समय तक कोई भी युद्ध व्यापक तैयारी और सुगठित योजना के नहीं चलायी जा सकती। फिर इस ब्रिटिश विरोधी युद्ध के लिए जितने संसाधनों, मसलन हथियार, रसद की जरूरत थी उसे संताल समुदाय अकेले नहीं जुटा सकता था। अगर पारंपरिक हथियारों की ही हम बात करें तो जितने तीर-धनुष, टांगा, बलुआ आदि हूल में इस्तेमाल किए गए, वह लुहारों के सक्रिय सहयोग के बिना जुटा पाना संभव नहीं था। फिर दूसरी बात ये भी थी कि संतालों की ही तरह खेतीहर और कारीगर जातियां भी समान रूप से ब्रिटिश शासन की नीतियों और सामंतों, महाजनों, साहूकारों व व्यापारियों से पीड़ित थी। इसलिए जब 30 जून को सिदो ने खुद को ‘सूबा ठाकुर’ (क्षेत्र का सर्वोच्च शासक) घोषित करते हुए अंग्रेजों को इलाका छोड़ने का ‘परवाना’ जारी किया तो उनके साथ उत्पीड़ित होने वाले गैर-आदिवासी समूह भी गोलबंद हो गए।

हूल की व्यापकता को और उसमें गैर-आदिवासी खेतीहर व कारीगर जातियों की भागीदारी कितनी बड़ी थी इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि इसका क्षेत्र विस्तार बहुत अधिक था। आज की दृष्टि से कहें तो बिहार, झारखण्ड, पश्चिम बंगाल और उड़ीसा कुल चार राज्यों की संताल और गैर-आदिवासी लोग हूल में सक्रिय रूप से शामिल थे। दुमका से लेकर सुंदरगढ़, उड़ीसा तक हूल की आग थी। हूल की चौहद्दी केवल संताल परगना तक सिमटी नहीं थी। हूल के कई लड़ाके जो संताल हैं और संताल नहीं भी है, इसीलिए आज भी अनाम हैं क्योंकि किसी ने इतने व्यापक क्षेत्र में फैले इस जनयुद्ध के इतिहास को व्यवस्थित ढंग से अध्ययन करने की कोशिश नहीं की है। सभी लोगों ने संताल परगना के भीतर ही हूल के इतिहास को खोजने की है। जरूरत है सिदो, कान्हू, चांद, भैरव, फूलो और झानो के साथ-साथ उन अनेक अनाम रह गए हूल के लड़ाकों को खोजने की जिनकी भागीदारी और शहादतों ने हूल को भारत का पहला जनयुद्ध बना दिया था।

(कॉपी एडिटर : नवल)


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