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गुजरात ओबीसी आयोग की वैधता पर सवाल, फिर गरमायेगा पीएम की जाति का मुद्दा

गुजरात हाईकोर्ट में पाटीदार आंदोलन से जुड़े दो लाेगों ने राज्य पिछड़ा वर्ग आयोग की वैधानिकता को चुनौती दी है। हाईकोर्ट ने इनकी याचिका स्वीकार कर ली है। याचिकाकर्ताओं के मुताबिक इस आयोग को राज्य के क़ानून के तहत अभी तक स्थापित नहीं किया गया है। यही वह आयोग है जिसने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की जाति मोध घांची को ओबीसी में शामिल किया था। एक रिपोर्ट :

 गुजरात : बिना कानून के गठित हुआ ओबीसी आयोग, हाईकोर्ट में मिली चुनौती

गुजरात का ओबीसी आयोग कार्यपालक आदेश से गठित हुआ है न कि किसी अधिनियम के तहत। सो अब उमिया परिवार और सरदार पटेल ग्रुप (एसपीजी) ने गुजरात में चल रहे इस अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) आयोग की वैधानिकता को गुजरात हाईकोर्ट में चुनौती दी है। वर्ष 1994 में इसी आयोग ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की जाति मोध घांची को ओबीसी में शामिल किया था जिसे 27 अक्टूबर 1999 को गुजरात पिछड़ा वर्ग आयोग की अनुशंसा पर राष्ट्रीय पिछड़ा वर्ग आयोग ने ओबीसी की केंद्रीय सूची में शामिल कर लिया। ऐसे में अब जबकि आयोग की वैधानिकता पर सवाल उठाया जा रहा है तब जाहिर तौर पर उसके फैसले पर सवाल उठना लाजमी है।

बहरहाल उमिया परिवार के इश्वरलाल पटेल और एसपीजी के परवीन पटेल ने यह जनहित याचिका दायर की है। उन्होंने इस याचिका के माध्यम से राज्य में एक क़ानून बनाकर इस तरह के आयोग के गठन की मांग की है।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी

गुजरात हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश आर सुभाष रेड्डी और न्यायमूर्ति वीएम पंचोली की खंडपीठ ने इस याचिका को स्वीकार कर लिया है और इसके आधार पर राज्य और ओबीसी आयोग को नोटिस जारी कर इस बारे में जवाब माँगा है। सामाजिक न्याय और अधिकारिता विभाग के साथ-साथ गुजरात अन्य पिछड़ा वर्ग आयोग से भी इस बारे में 29 सितंबर तक जवाब देने को कहा है।

याचिकाकर्ता पाटीदार समुदाय के हैं और ये पाटीदारों को आरक्षण सूची में शामिल किये जाने की मांग कर रहे हैं।  उनका कहना है कि उन्हें आरटीआई से यह पता चला है कि गुजरात विधानसभा ने अभी तक ओबीसी आयोग के गठन के लिए कोई क़ानून नहीं बनाया है और न ही इस तरह के आयोग के लिए किसी तरह के नियमों व विनियमों का निर्धारण किया है।

इंदिरा साहनी मामले में सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद इस कोर्ट के निर्देशानुसार मार्च 1993 में ओबीसी आयोग का गठन किया गया। पर गुजरात में यह आयोग राज्य में कार्यपालिका के आदेश के तहत गठित हुआ था न कि किसी अधिनियम के तहत।

यह भी पढ़ें : ओबीसी की छंटाई-गुड़ाई, कौन उगाएगा नई फसल

याचिकाकर्ताओं के वकील विशाल दवे ने अपने मुवक्किलों की पैरवी में कहा कि राज्य एक स्थाई आयोग गठित करने में विफल रहा है जबकि इसके लिए सुप्रीम कोर्ट ने 1993 में ही आदेश दे चुका है।

याचिकाकर्ताओं ने एक प्रेस विज्ञप्ति में कहा कि राजस्थान में भी इसी तरह से आयोग का गठन किया गया था जिसे अब विघटित किया जा रहा है।

गुजरात हाईकोर्ट

विज्ञप्ति में यह आरोप भी लगाया गया है कि राज्य का ओबीसी आयोग राजनेताओं के इशारे पर काम कर रहा है और यहाँ ओबीसी आरक्षण नेताओं के कहने पर ही दिया जाता है। ओबीसी की सूची में किसी वर्ग को शामिल करने के लिए उस वर्ग की 100 फीसदी जनसंख्या का सर्वेक्षण होना चाहिए पर आयोग नमूना सर्वेक्षण के आधार पर ही किसी समूह को आरक्षण सूची में शामिल करने पर गौर करता रहा है।

याचिकाकर्ताओं ने कहा कि राज्य सरकार ने 1994 में 39 जातियों को ओबीसी श्रेणी में शामिल कर लिया और ऐसा सिर्फ एक सर्कुलर के आधार पर किया गया था। इसके लिए ओबीसी आयोग ने किसी भी तरह का सर्वेक्षण कार्य नहीं किया था।

(कॉपी एडिटर : एफपी डेस्क)


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लेखक अशोक झा पिछले 25 वर्षों से दिल्ली में पत्रकारिता कर रहे हैं। उन्होंने अपने कैरियर की शुरूआत हिंदी दैनिक राष्ट्रीय सहारा से की थी तथा वे सेंटर फॉर सोशल डेवलपमेंट, नई दिल्ली सहित कई सामाजिक संगठनों से भी जुड़े रहे हैं

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