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अस्मिता एवं आत्मसम्मान के लिए आदिवासी युवा राजनीति में आएं

आदिवासी समाज के आत्मसम्मान, अस्मिता और संवैधानिक अधिकारों की रक्षा के लिए युवाओं को राजनीति में आना पड़ेगा। क्योंकि पिछले 70 वर्षों से आदिवासियों के नाम पर ऐसे प्रतिनिधि चुने जा रहे हैं, जिनका आदिवासी मुद्दों से गहरा सरोकार नहीं है। आदिवासी युवाओं के नाम हीरालाल अलावा का पत्र :

आदिवासी भाइयों और बहनों,

मैं इस खुला पत्र के माध्यम से आप लोगों को बताना चाहता हूं कि आदिवासी युवाओं को राजनीति में आना कितना आवश्यक है। यहां आदिवासी युवाओं का तात्पर्य उन आदिवासी लोगों से है जिनमें अपने समाज के आत्मसम्मान, अस्मिता, पहचान और संवैधानिक अधिकारों के लिए कुछ कर गुजरने का जुनून हो, चाहे वह शख्स 20 वर्ष की उम्र का हो या 80 वर्ष की उम्र का।

भारत एक लोकतांत्रिक देश है और यहां के लोकतांत्रिक प्रणाली का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा है– विधानसभा और लोकसभा चुनाव। इन्हीं चुनावों के माध्यम से तय होता है कि सत्ता किसके हाथों में होगी।लोकतांत्रिक प्रणाली की सबसे महत्वपूर्ण बात यह होती है कि किसी राजा का बेटा राजा नहीं बनेगा, बल्कि देश की आम जनता अपने कीमती वोट से समाज के गरीब वर्ग के बेटे को भी चुनकर राजा बनने का मौका देती है।हम इस लोकतांत्रिक प्रणाली में विश्वास करते हैं, इसके बावजूद इसमें कुछ छेद हैं, जिसके कारण कमजोर वर्गों का विकास नहीं हुआ और सत्ता पर धनबल, बाहुबल और परिवारवाद का वर्चस्व हो गया।

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लेखक के बारे में

हिरालाल अलावा

दिल्ली के प्रसिद्ध ‘अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्‍थान (एम्‍स)’ में असिस्टेंट प्रोफेसर रह चुके डॉ. हिरालाल अलावा आदिवासियों के अधिकारों के लिए काम करने वाले संगठन ‘जय आदिवासी युवा शक्ति’ (जयस) के राष्ट्रीय संरक्षक व मध्य प्रदेश के मनावर विधानसभा क्षेत्र से विधायक हैं

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