जनता के लिए लड़ते रहे हैं नजरबंद किये गये पांचों कार्यकर्ता

बीते 28 अगस्त् 2018 को देश के पांच वामपंथी विचारकों को पुलिस ने भीमा कोरेगांव हिंसा के मामले में गिरफ्तार किया। सुप्रीम कोर्ट ने इसे लेकर केंद्र सरकार को नसीहत दिया है और राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने भी स्वत: संज्ञान लेते हुए इसे मानवाधिकार का उल्लंघन माना है। विस्तार से बता रहे हैं विशद कुमार :

”ऐसे लोगों को गिरफ्तार किया जा रहा है। जो दूसरों के अधिकार को बचाने की कोशिश कर रहे हैं, उनका मुँह बंद करना चाहते हैं। ये लोकतंत्र के लिए बहुत ख़तरनाक है। विरोध की आवाज़ लोकतंत्र के लिए सेफ़्टी वॉल्व है और अगर आप सेफ्टी वाल्व को अनुमति नहीं देंगे तो प्रेशर कुकर फट जाएगा। “

यह कोई राजनीतिक बयान नहीं है, बल्कि 29 अगस्त 2018 को जस्टिस वाई.एस. चंद्रचूड़ ने 28 अगस्त 2018 को गिरफ़्तार किए गए पाँच मानवाधिकार कार्यकर्ताओं के मामले को लेकर इतिहासकार रोमिला थापर, प्रभात पटनायक, सतीश देशपांडे, देवकी जैन और माया दारुवाला की सुप्रीम कोर्ट में दायर याचिका पर सुनवाई करते हुए कहा है, जो इस बात का सबूत है आज देश कितने खतरनाक दौर से गुजर रहा है। या यूं कहें कि लोकतंत्र खतरनाक दौर से नहीं गुजर रहा है, बल्कि खतरनाक लोकतंत्र का दौर शुरू हो गया है।

सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में भारत सरकार और महाराष्ट्र सरकार को नोटिस जारी किया है। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि इस मामले की अगली सुनवाई छह सितंबर को होगी, तथा गिरफ़्तार किए गए पाँच मानवाधिकार कार्यकर्ताओं को फ़िलहाल रिमांड पर नहीं भेजा जाएगा। कोर्ट ने कहा है कि अगली सुनवाई होने तक इन सभी लोगों को घर में नज़रबंद रखा जाए।

हालांकि राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने भी इस मामले में स्वत: संज्ञान लेते हुए कहा है कि ”आयोग को ऐसा लगता है कि इस मामले में प्रक्रिया का पालन नहीं किया गया है। इस कारण ये मानवाधिकार उल्लंघन का मामला हो सकता है।” आयोग ने महाराष्ट्र के मुख्य सचिव और पुलिस महानिदेशक को नोटिस जारी करके चार सप्ताह के अंदर रिपोर्ट देने को कहा है।

जनता के लिए लड़ते रहे हैं नजरबंद किये गये पांचों कार्यकर्ता

उल्लेखनीय है कि बीते 28 अगस्त 2018 को देश के लगभग एक दर्जन कवियों, लेखकों, वकीलों, बुद्धिजीवियों, मानवाधिकार और दलित कार्यकर्ताओं के घरों पर छापे पड़े और उनमें से पांच को गिरफ्तार कर लिया गया। गिरफ्तार किये गये लोगों में वामपंथी विचारक और जनकवि वरवरा राव, वकील एवं आदिवासियों के बीच काम करने वाली सामाजिक कार्यकर्ता सुधा भारद्वाज, मानवाधिकार कार्यकर्ता अरुण फ़रेरा, लेखक—पत्रकार गौतम नवलखा और वरनॉन गोंज़ाल्विस शामिल हैं।

आदिवासियों और दलितों का मुकदमा मुफ्त में लड़ती हैं सुधा भारद्वाज

ये वे लोग हैं जो मानवाधिकार व गरीब लोगों के हक-हुकूक की आवाज उठाते रहे हैं। मसलन 56 साल की सुधा भारद्वाज एक वकील और सामाजिक कार्यकर्ता हैं। वह दिल्ली के नेशनल लॉ यूनिवर्सिटी में गेस्ट फ़ैकल्टी के तौर पर पढ़ाने के साथ—साथ ट्रेड यूनियन में भी शामिल हैं और मज़दूरों के मुद्दों पर काम करती हैं। वे समाज के वंचित वर्ग आदिवासियों व दलितों के मुकदमों को मुफ्त में लड़ती हैं और उनके बीच जाकर काम भी करती हैं।

सुधा भारद्वाज का जन्म अमेरिका के मैसाच्युसेट्स में हुआ था। उनके माता-पिता के भारत वापस लौटने के बाद उन्होंने अपना अमेरिकी पासपोर्ट छोड़ दिया था। अमेरिका से मिली अपनी नागरिकता का त्याग कर यहां आकर मजदूरों, आदिवासियों के बीच उनके हक अधिकार की लड़ाई लड़ना उनकी मानवीय संवेदना को एक वृहत आकार देता है। वह दिल्ली न्यायिक अकादमी की भी सदस्य हैं। उनकी मां जवाहरलाल नेहरु विश्वविद्यालय में इकनोमिक्स की लेक्चरर रही हैं। छत्तीसगढ़ में तीस सालों से समाज के वंचित वर्ग आदिवासियों व दलितों के लिए काम करने वाली सुधा, न्याय के लिए लड़ रहे कई लोगों की उम्मीद बन गईं।

सुधा भारद्वाज : अमेरिकी नागरिकता को छोड़ने से भी नहीं किया परहेज

ऐसा नहीं है कि उन्हें इस बात का भान नहीं था कि वह जो कर रही हैं, उससे राज्य सत्ता की आंखों में चुभन जरूर होगी। उन्होंने 2015 में एक पत्रकार से कहा था, “मैं जानती हूं कि कई लोग मेरे दुश्मन बन जाएंगे, इसके बावजूद मैं अपना संघर्ष जारी रखूंगी।”

कभी सरकार ने ही बनाया था वरवरा राव को माओवादियों से शांति वार्ता के लिए मध्यस्थ

78 वर्षीय वरवरा राव का जन्म 1940 में आंध्र-प्रदेश के वारंगल में हुआ था। उन्होंने  लगभग 40 सालों तक कॉलेजों में तेलुगू साहित्य पढ़ाया है और लगभग इतने ही सालों से वे भारत के वामपंथी  आंदोलन से भी जुड़े हुए हैं। वैसे वरवरा राव को भारतीय माओवादियों के संघर्ष का प्रवक्ता माना जाता है, सरकारी दावे के अनुसार वे सशस्त्र माओवादियों के नीतिकार भी हैं, परंतु वरवर राव अपने को क्रांतिकारी कवि कहलाना ज्यादा पसंद करते हैं। सत्ता के खिलाफ लिखने-पढ़ने, संगठन बनाने और पत्र-पत्रिकायें प्रकाशित करने वाले वरवरा राव टाडा समेत देशद्रोह के आरोप में लगभग 10 वर्षों तक जेल में रहे हैं और अभी लगभग 50 मामलों पर विभिन्न कोर्टों में सुनवाई चल रही है तो कुछ मामलों पर जमानत पर हैं।

जन कवि वरवरा राव

वरवरा राव उस समय सुर्खियों में आये जब 2001-02 में तेलुगू देशम और 2004 में कांग्रेस पार्टी ने जब माओवादियों से शांति वार्ता की पेशकश की तो उन्हें मध्यस्थ बनाया गया था। वे ‘रेवोल्यूशनरी राइटर्स एसोसिएशन’ के संस्थापक भी हैं। वरवरा वारंगल ज़िले के चिन्ना पेंड्याला गांव से ताल्लुक रखते हैं। उन्हें आपातकाल के दौरान भी साज़िश के कई आरोपों में गिरफ़्तार किया गया था, बाद में उन्हें आरोपमुक्त करके रिहा कर दिया था। अंग्रेजी और तेलुगू फर्राटे से बोलने वाले वरवरा राव उच्चारण-दोष की बाधाओं के बाद भी हिन्दी भी सरलता से बोल लेते हैं।

वरवरा राव की पहचान कवि के रूप में भी हैं और वे वामपंथी विचारक हैं। वे 1957 से कविताएं लिख रहे हैं। वे वीरासम (क्रांतिकारी लेखक संगठन) के संस्थापक सदस्य भी रहे हैं। उनकी जेल यात्रा तब शुरु हुई जब राव को अक्तूबर 1973 में आंतरिक सुरक्षा रखरखाव कानून (मीसा) के तहत गिरफ्तार किया गया था। साल 1986 के रामनगर साजिश कांड सहित कई अलग-अलग मामलों में 1975 और 1986 के बीच उन्हें एक से ज्यादा बार गिरफ्तार और फिर रिहा किया गया। करीब 17 साल बाद 2003 में राव को रामनगर साजिश कांड में बरी कर दिया गया। राव को एक बार फिर आंध्र प्रदेश लोक सुरक्षा कानून के तहत 19 अगस्त 2005 को गिरफ्तार कर हैदराबाद के चंचलगुडा केंद्रीय जेल में भेज दिया गया। 31 मार्च 2006 को लोक सुरक्षा कानून के तहत चला मुकदमा निरस्त कर दिया गया और राव को अन्य सभी मामलों में जमानत मिल गई।

बताते चलें कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की हत्या की कथित साज़िश से जुड़े एक पत्र में राव का नाम आया था। हालांकि इस संबंध में भारत सरकार की सुरक्षा एजेंसियों द्वारा कोई जानकारी अधिकारिक रूप से नहीं दी गयी है।

पत्थलगड़ी आंदोलन को लेकर पहले से देशद्रोह का मुकदमा झेल रहे स्टेन स्वामी

वरवरा राव की तरह ही रांची, झारखंड के फादर स्टेन स्वामी आदिवासियों के पक्ष में खड़े होते रहे हैं, उनके हक-अधिकार की लड़ाई में बढ़-चढ़ कर हिस्सा लिया है। नतीजतन वे इस कारपोरेट सत्ता के निशाने पर रहे हैं। अभी हाल ही में स्टेन स्वामी सहित 20 लोगों पर देशद्रोह का मुकदमा केवल फेसबुक पर आदिवासियों के पक्ष में पोस्ट करने के कारण लाद दिया गया।

झारखंड के आदिवासियों के लिए आवाज उठाते रहे हैं फादर स्टेन स्वामी

कभी चर्च के फादर रहे, दक्षिण भारत में जन्में, 72 वर्षीय स्टेन स्वामी, झारखंड की धरती पर लगातार तीन दशक से रह रहे हैं। ‘बगईचा’ नामक एक सामाजिक संस्था के माध्यम से राज्य के आदिवासियों एवं मूलवासियों के हक में लगातार आवाज उठाते आये हैं। उन्होंने विस्थापन, कारपोरेट द्वारा संसाधनों की लूट और विचाराधीन कैदियों की स्थिति पर शोधपरक काम किया है। उन्होंने झारखंड की भाजपा सरकार द्वारा सीएनटी-एसपीटी कानून एवं भूमि अधिग्रहण कानून, 2013 में हुए जन विरोधी संशोधनों का मुखर होकर लगातार विरोध किया है। उन्होंने सरकार द्वारा गांवों की जमीन को लैंड बैंक में डालकर कारपोरेट के हवाले करने का भी जमकर विरोध किया है। वे संविधान की पांचवीं अनुसूची एवं पेसा कानून के क्रियान्वयन के लिए भी लगातार अभियान चलाते आये हैं। जिसमें आदिवासियों की परंपरागत ग्रामसभा एवं रूढ़ि प्रथा पत्थलगड़ी की इजाजत है।

पत्रकार और मानवाधिकार कार्यकर्ता रहे हैं गौतम नवलखा

पीयूडीआर यानी पीपुल्स यूनियन फॉर डेमोक्रेटिक राइट्स से जुड़े गौतम नवलखा की पहचान भी जुझारू सामाजिक कार्यकर्ता के रूप में रही है। वे अंग्रेज़ी पत्रिका इकोनॉमिक ऐंड पॉलिटिकल वीकली (ईपीडब्ल्यू) में बतौर सलाहकार संपादक भी काम करते हैं। उन्होंने पीयूडीआर के सचिव के तौर पर भी काम किया है और इंटरनेशनल ”पीपुल्स ट्राइब्यूनल ऑन ह्यूमन राइट्स ऐंड जस्टिस इन कश्मीर” के संयोजक के तौर पर भी काम किया है।

ईपीडब्ल्यू के सलाहकार संपादक गौतम नवलखा भी हैं नजरबंद

जन अधिकारों को लेकर पूर्व में भी जेल जा चुके हैं फरेरा और गोंज़ाल्विस

जबकि अरुण फ़रेरा का जन्म मुंबई के बांद्रा में हुआ है। मुंबई के गोरेगांव और जोगेश्वरी में 1993 में हुए दंगों के पीड़ितों के बीच काम करने के बाद, अरुण फ़रेरा का रुझान मार्क्सवाद की ओर बढ़ा था। इन दंगों के बाद उन्होंने ”देशभक्ति युवा मंच” नाम की संस्था के साथ काम करना शुरू कर दिया। इस संस्था को सरकार माओवादियों का फ़्रंटल संस्था बताती थी। अरुण फ़रेरा ”इंडियन एसोसिएशन ऑफ़ पीपुल्स लॉयर्स” के कोषाध्यक्ष हैं। वे मुंबई सेशंस कोर्ट और मुंबई हाई कोर्ट में प्रैक्टिस करते हैं। वे अनलॉफ़ुल एक्टिविटीज़ प्रिवेंशन एक्ट और देशद्रोह के अभियोग में चार साल जेल में रह चुके हैं। फ़रेरा भीमा-कोरेगांव हिंसा के सिलसिले में गिरफ़्तार हुए दलित कार्यकर्ता सुधीर धावले के पक्ष में भी अपनी आवाज़ उठाते रहे हैं। फरेरा को 2007 में प्रतिबंधित भाकपा (माओवादी) की प्रचार एवं संचार शाखा का नेता बताया गया था। तकरीबन 5 साल जेल में रहने के बाद उनके ख़िलाफ़ कोई ठोस सबूत न पाते हुए कोर्ट ने उन्हें 2014 में सभी आरोपों से बरी कर दिया। अपनी किताब ‘कलर्स ऑफ द केज: ए प्रिजन मेमॉयर’ में फरेरा ने जेल में बिताए करीब पांच सालों का ब्योरा लिखा है।

जन अधिकारों के लिए सजग अधिवक्ता अरूण फरेरा

वरनॉन गोंज़ाल्विस मुंबई विश्वविद्यालय से गोल्ड मेडलिस्ट हैं और मुंबई के कई कॉलेजों में कॉमर्स पढ़ाते रहे हैं। मुंबई में रहने वाले वरनॉन गोंज़ाल्विस लेखक एवं सामाजिक कार्यकर्ता हैं। उनकी पत्नी सुज़न अब्राहम भी मानवाधिकार मामलों की एक वकील हैं। वरनॉन गोंज़ाल्विस को 2007 में अनलॉफ़ुल एक्टिविटीज़ प्रिवेंशन एक्ट के तहत गिरफ़्तार किया गया था। वे छह साल तक जेल में रहे थे। गोंज़ाल्विस को नागपुर के ज़िला और सत्र न्यायालय ने यूएपीए की अलग-अलग धाराओं के तहत दोषी पाया था।  वरनान गोंज़ाल्विस के बेटे सागर अब्राहम गोंज़ांलविस के अनुसार पुलिस लैपटाप वगैरह के साथ बहुत सारे साहित्य भी साथ गई है। मुंबई विश्वविद्यालय के गोल्ड मेडलिस्ट रूपारेल कॉलेज के पूर्व लेक्चरर वेरनॉन के बारे में सुरक्षा एजेंसियों का आरोप है कि वह नक्सलियों की महाराष्ट्र राज्य समिति के पूर्व सचिव और केंद्रीय कमेटी के पूर्व सदस्य हैं।

पुत्र सागर अब्राहम और पत्नी सुजैन के साथ वरनॉन गोंज़ाल्विस

बहरहाल नरेंद्र मोदी की सत्ता के शुरूआती दौर का गौरक्षा दल का माॅब लिंचिंग मुसलमानों और दलितों से शुरू होकर अब देश के मानवाधिकार कार्यकर्ताओं, जनवादियों-प्रगतिशीलों व समाज का वंचित वर्ग दलित, पीड़ित, आदिवासी, मजदूर, किसानों की आवाज बनने वालों के खिलाफ हो गया है। इसे हम पिछले दिनों मानवाधिकार कार्यकर्ता स्वामी अग्निवेश और बिहार के मोतिहारी के महात्मा गांधी केन्द्रीय विश्वविद्यालय के प्रो. संजय यादव पर हुए माब लिंचिंग से समझ सकते हैं। जाहिर है इस तरह के हमलों का गणित भी सत्ता से असहमति की चेतावनी है। वैसे इस तरह के सत्ता सह सांगठनिक हमलों का मकसद मात्र विरोध के स्वर को केवल दबाने भर का नहीं हैं, इसका वास्तविक मकसद राजग सरकार के चार साल से देश के साथ की जा रही बेईमानी की ओर से ध्यान बंटाना है।

(कॉपी संपादन : एफपी डेस्क)


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