अर्बन नक्सल की थोथी बहस छोड़ नक्सलवाद के असली कारणों पर बहस हो

हमारे देश की सोच इस कदर मध्यम वर्ग पर केन्द्रित हो गई है, कि नक्सलवाद और सरकारी दमन भी तब चर्चा में आता है, जब उच्च शिक्षित मध्यमवर्गीय शहरी कार्यकर्त्ता “अर्बन नक्सल” के नाम से गिरफ्तार होते हैं। हालांकि, कोई यह चर्चा नहीं करता है कि नक्सलवाद क्या है। अनुराग मोदी का मत :

नक्सलवाद पर असली बहस कोई नहीं कर रहा; मीडिया के एक वर्ग और सरकार ने इसे ‘अर्बन नक्सल’ के झूठे खेल में फंसा दिया है। अगर ऐसा नहीं होता तो इस बात पर सवाल उठता कि सुधा भारद्वाज सहित दस एक्टिविस्टों की गिरफ्तारी के आगे-पीछे दो अलग-अलग घटनाओं में कुल 55 आदिवासी गोलियों से क्यों भून दिये गये जिनमें युवा और बच्चे शामिल थे। एक घटना महाराष्ट्र के गढ़चिरौली में घटित हुई जिसमें 40 और दूसरी बस्तर के सुकमा में घटित हुई थी जिसमें 15 आदिवासियों की जान गयी। आमतौर पर, इतनी हत्याओं पर तो देश का जनमानस उद्वेलित हो जाना चाहिए था, लेकिन इस घटना का जैसे इस देश के जनमानस पर कुछ असर ही नहीं हुआ: ना किसी ने कहा- ‘#मी टू रुरल नक्सल’; ना ही मुख्य-धारा के मीडिया में कोई खास डिबेट; और ना ही मानवाधिकार आयोग ने इन एनकाउंटरों पर सवाल उठाए। बस, कुछ मानवाधिकारवादी समूहों ने एक रिपोर्ट निकाली और गैर-परम्परागत मीडिया ने कुछ सवाल उठाए।

वैसे, अगर मृत आदिवासी वाकई नक्सली है, तो हमें उद्वेलित होने की और ज्यादा जरुरत है। इस देश के जनमानस को यह सोचने की जरुरत है: कि ऐसा क्या कारण है, कि जब आज एक आम शहरी तरुण अपने हाथ में एंड्राइड मोबाइल पाने के लिए बैचेन रहता है, और माँ-बाप उसकी आगे शिक्षा और रोजगार के लिए चिंतित तब यह आदिवासी किशोर अवस्था से ही अपनी जान न्योछावर कर एक ‘देशद्रोही’ की मौत मरने को तैयार है?

छत्तीसगढ़ में पुलिस एनकाउंटर में मारे गये लोगों के शव

स्थापित मीडिया के एक बड़े समूह और सरकार के सारे आरोपों के बीच भी शहर में रहने वाले प्रगतिशील कार्यकर्त्ता और समूह जब साथी सुधा भारद्वाज सहित अन्य गिरफ्तार एक्टिविस्टों के समर्थन में कम से कम यह कह पाए: # मी टू अर्बन नक्सल। सुप्रीम कोर्ट ने भी मामले को पूरी गंभीरता से सुना और राष्ट्रीय मानव अधिकार आयोग ने भी सवाल उठाए। तब, इन सबसे एक सुखद आनंद हुआ। लेकिन, साथ ही, यह सवाल भी मन में उठा, कि क्या नक्सली इलाके में नक्सली होने का आरोप झेलते हुए किसी दिन भी मार दिया जाना आदिवासी की नियति है? क्योंकि, वो मध्यमवर्गीय और उच्च शिक्षित नहीं है और इसलिए उसके लिए हम दावे से नहीं कह सकते कि वे नक्सल नहीं हैं?

बहुजन विमर्श को विस्तार देतीं फारवर्ड प्रेस की पुस्तकें

असल में, हमारे देश की सोच इस कदर मध्यम वर्ग पर केन्द्रित हो गई है, कि नक्सलवाद और सरकारी दमन भी तब चर्चा में आता है, जब उच्च शिक्षित मध्यमवर्गीय शहरी कार्यकर्त्ता “अर्बन नक्सल” के नाम से गिरफ्तार होते हैं। हालांकि, कोई यह चर्चा नहीं करता है कि नक्सलवाद क्या है? क्यों है? क्या यह सिर्फ हिंसा करने के लिए बना है? इसका हल क्या है? मानवाधिकारवादी कार्यकर्त्ता चाहे जितना गला फाड़ें, रिपोर्ट निकालें, लेकिन सरकारी और नक्सली हिंसा के बीच पिसते आदिवासी की जिन्दगी की कोई कीमत इस व्यवस्था की मीडिया, अदालत, और काफी हद तक बुद्धीजीवी भी नहीं आंकते। नक्सलवाद के नाम पर सुरक्षा बलों की गोलियों से आदिवासियों के मारे जाने की खबर और कभी नक्सली हमले में सुरक्षा बलों के मारे जाने की खबर पिछले तीस सालों में हमारे लिए सामान्य खबरों का रूप ले चुकी है; हम इसके आदि से हो गए है, यह घटनाएं होती रहती हैं और देश में सब-कुछ सामान्य सा चलता रहता है।

हाल ही में गिरफ्तार किये गये पांच सामाजिक कार्यकर्ता। सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर इन्हें इनके घरों में नजरबंद रखा गया है

मानव अधिकारवादी समूहों की दोनों घटनाओं पर दो अलग-अलग निकाली गई रिपोर्ट के अनुसार  मारे गए नक्सली नहीं थे और यह मुठभेड थी ही नहीं। इसमें एकतरफा ही लोग मारे गए थे, सुरक्षा बलों को तो कोई खास चोट तक नहीं आई थी, जो किसी भी दो सशस्त्र दलों की आपसी मुठभेड में असंभव है। इस रिपोर्ट में लिखा है कि सुरक्षा बलों ने अंडर बैर्रल राकेट लांचर का उपयोग किया था और मरने वालों में कई नाबालिग थे और अधिकांश युवा।

इन दोनों घटनाओं की चर्चा इसलिए भी जरुरी है, क्योंकि पहली घटना के बाद पहली गिरफ्तारी हुई और दूसरी घटना के बाद दूसरी। पहली घटना 22 अप्रैल 2018 को महाराष्ट्र के गढ़चिरौली जिले के भामरागढ़ तहसील के बोरिया-कानासौर के जंगल में हुई। इसके बाद, 6 जून 2018 को पुणे पुलिस ने “अर्बन नक्सल” के नाम से पहली गिरफ्तारी की; इन गिरफ्तार में से एक महेश राउत तो गढ़चिरौली, और सोमा सेन नागपुर में प्रोफेसर भी थीं। ये वे कार्यकर्त्ता हैं, जो इस इलाके में लोकतान्त्रिक तरीकों से आदिवासियों के मुद्दे उठाते रहे है; इसमें सुरक्षा दलों द्वारा आदिवासियों की जाने वाली ज्यादतियों के मुद्दे भी होते हैं।

इसके बाद 6 अगस्त 2018 को छत्तीसगढ़ के सुकमा के जिले के कोन्टा क्षेत्र के मेहता पंचायत के नुलकतोग गाँव में एक खेत में 15 आदिवासी जिला पुलिस बल के एनकाउंटर में मारे गए। कमाल की बात यह है, इस हमले में भी पुलिस दल में से कोई गंभीर रूप से हताहत नहीं हुआ। वैसे  इस मामले मे ; वहां मानवाधिकार पर काम कर रहे स्थानीय स्वतंत्र पत्रकार, सोनी सोरी के भतीजे, आदिवासी लिंगाराम कोड़ोपी, ने इस बारे में अपनी फेसबुक वाॅल पर जो रिपोर्ट डाली है; उसके अनुसार: मरने वालों में 14 से 17 साल के 7 बच्चे हैं। इस बात की पुष्टि मानवाधिकारवादी संगठन वीमेन अगेंस्ट सेक्सुअल वायलेंस एंड स्टेट रीपरेशन की रिपोर्ट से भी होती है। हमें ध्यान रखना होगा कि इसके बाद 29 अगस्त 2018 को अन्य चार लोगों की गिरफ्तारी होती है जिनमें एक आदिवासियों के मुद्दों को लोकतान्त्रिक तरीकों से उठाने वाली सुधा भारद्वाज की गिरफ्तारी शामिल है।

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ऐसा नहीं कि यह सब अभी हो रहा है। सिर्फ एक उदाहरण से नक्सली इलाके में रहने वाले आदिवासी महिलाओं के प्रति हमारा दोहरापन उजागर होगा। सारा देश दिल्ली में निर्भया कांड को लेकर उद्वेलित था, लेकिन एक साल पहले उसी तरह की एक घटना नक्सली समर्थक होने के झूठे आरोप में गिरफ्तार आदिवासी कार्यकर्त्ता सोनी सोरी के साथ छत्तीसगढ पुलिस द्वारा अभिरक्षा में किए जाने की घटना सामने आई थी।  पर मानवाधिकारवादी समूहों को छोड़कर देश का सामान्य जनमानस चुप था। एक समूह ‘यौन शोषण और राज्य की हिंसा के खिलाफ महिलाएं’ की ओर से 27 दिसम्बर 2012 को जारी एक रिपोर्ट के अनुसार सुप्रीम कोर्ट के निर्देश पर पहले सोनी सोरी का मेडिकल परीक्षण एन.आर.एस मेडिकल कॉलेज, कोलकाता में हुआ, जिसकी रिपोर्ट 25 नवंबर 2011 को सुप्रीम कोर्ट में पेश की गई। इस रिपोर्ट में यह साफ़ था, कि सोनी सोरी के गुप्तांग में गहरे तीन  पत्थर मिले, जिसके कारण उसे पेट दर्द के शिकायत हो रही थी, और उसकी रीढ़ की हड्डी के बाहरी हिस्से से रिसाव होने लगा। जो रिपोर्ट सामने आयी उसमें यह बात सामने आ गई थी, कि सोनी के गुप्तांग में पत्थर डाले गए है।

पुलिसिया जुल्म की शिकार सोनी सोरी (फाइल फोटो, 2011)

सत्ता का आदिवासियों के प्रति जो रवैया है और नक्सलियों के प्रभाव से जो उन्हें राहत मिलती है वह भी कहीं ना कहीं आदिवासियों के मन में नक्सलियों के प्रति एक सद्भावना पैदा कर ही देता है। इसलिए, मीडिया, अदालतें , बुद्धीजीवियों, जागरूक नागरिक सबको यह सोचना होगा कि क्या आदिवासी को नक्सली होने के आरोप में गोली से भून देने से या, इस मुद्दे को उठाने वाले मध्यमवर्गीय शहरी मानवाधिकारवादी कार्यकर्ताओं को ‘अर्बन नक्सल’ के नाम में जेल में ठूंस देने से नक्सली समस्या का हल हो पाएगा?  हमें यह समझना होगा कि बस्तर में नक्सलवाद 1980 से है, लेकिन कैसे निजीकरण और वैश्वीकरण की नीति के चरम तक आते-आते वो 21वीं सदी में देश की आन्तरिक सुरक्षा के लिए सबसे बड़ा खतरा बन गया? क्यों विकास औए सुरक्षा बलों पर हजारों करोड़ रुपए के खर्चे के बावजूद नक्सलवाद खत्म नहीं हो रहा?

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नक्सलवाद के नाम पर राज्य सरकारों को क्षमता निर्माण आदि के नाम पर 2018-19 में 1222 करोड़ मिला, जो पिछले वित्तीय वर्ष से 380 करोड़ ज्यादा है। हलात यह है कि आज इन इलाकों में लोगों से ज्यादा संख्या में सुरक्षा बल है:अकेले सेंट्रल रिजर्व्ड पुलिस फ़ोर्स, जो मुख्य तौर पर नक्सल प्रभावित इलाकों में पोस्टेड होती है, उसका 2017-18 का बजट 16228.18 करोड़ रुपए था जो 1635.35 रुपए बढाकर 2018-19 में 17,868.53 कर दिया गया।  

हमें यह भी देखना होगा: क्या वाकई नक्सलवाद के कारण आदिवासी पिछड़े रह गए; उनका विकास नहीं हुआ? और क्यों देश के 90% आदिवासी इलाके, जो नक्सल मुक्त है, वहां आजतक कितना विकास पहुंचा? और असल बात यह कि विकास के नाम पर जो सबकुछ हो रहा है, वह क्या वाकई विकास है?  जब यह सब बहस होगी तब नक्सलवाद खत्म होगा वर्ना अर्बन नक्सल की इस थोथी बहस से कुछ नहीं होगा। और अंतिम और सबसे महत्वपूर्ण बात यह कि सुधा भारद्वाज को मैं पिछले 20 सालों से जानता हूं: पहले अविभाजित मध्य प्रदेश में और फिर उसके बाद भी मध्य प्रदेश और छतीसगढ़ के जनसंगठन के समूह जन संघर्ष मोर्चा में हम साथ थे;  फिर भी, मुझे उनकी गिरफ्तारी होने तक उनकी डिग्री का पता नहीं था। इतना ही नहीं, जब हमारे साथ 23 साल से जुड़े आलोग सागर को बैतूल पुलिस ने शक के आधार पर पूछताछ के लिए बुलाया तब उनकी सारी डिग्रियां मालूम हुईं; और वह भी उन्होंने मीडिया के आग्रह पर उन्हें बताई, पुलिस को नहीं। हम साथी हमेशा यह कोशिश करते है, कि हमारी डिग्रियां गाँव स्तर के कार्यकर्त्ता और हम शहरी मध्यमवर्गीय कार्यकर्त्ता के बीच दीवार या भेदभाव का कारण ना बने। और कोई कार्यकर्त्ता नहीं चाहता कि आदिवासी इलाकों में नक्सलवाद के असली कारण से निकलकर यह बहस अर्बन नक्सल या एक्टिविस्ट की अकादमिक उपलब्धि पर केन्द्रित हो।

(कॉपी संपादन : एफपी डेस्क)


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