पत्रिकाओं पर प्रतिबंध लोकतांत्रिक संकट का ही आईना है

हमारे शक्तिशाली लोकतांत्रिक विरासत का दमन किया जा रहा है। यह अभी एक समृद्ध विरासत हो सकती थी, लेकिन इसको कमर से तोड़ दिया गया है। सब बर्बाद करने पर आमादा है सरकार। दलितों-पिछ़ड़ों की पत्रिका को बैन करना उनका एक हिस्सा भर है। बड़े पैमाने पर देखें तो कहीं ज्यादा खतरनाक हद तक आगे बढ़ चुकी है

यूजीसी स्वायत्त नहीं, विशुद्ध सरकारी है- अखिलेश

तद्भव के संपादक अखिलेश कहते हैं कि जहां भी प्रतिरोध का स्वर है, वैचारिक प्रखरता है, वहां यह सरकार सारी आवाजें बंद कर देना चाहती है। वो हर ऐसी चीज को कुचलना चाहते हैं। बंद कर देना चाहते हैं। एकमात्र एजेंडा है सरकार का जो यूजीसी के जरिए भी सामने आया है कि विरोध की आवाज को दबाओ। असहमति के हर सुर को खत्म कर दो। वह कहीं नहीं दिखना चाहिए। यानी जो वह राजनीति में कर रहे हैं वही उन्होंने शिक्षा और साहित्य में भी थोप दिया है। उच्च शिक्षा के लिए फिक्रमंद लोगों को मिल-जुलकर योजना बनानी चाहिए। ऐसी शक्तियों को बेदखल करने के लिए उनको जड़ से खत्म करना होगा। उनकी जड़ सियासत से उपजी है- उसे ही ख़त्म करना होगा सभी को साथ मिलकर। यह काम उच्च शिक्षा में कार्यरत हर शख्स का है। जो भी शख्स निजी तौर पर जितना कर सकता है, उसे करना चाहिए। यह यदि नहीं होगा तो मौजूदा समय की दमनकारी शक्तियां हरकतों से बाज नहीं आएंगी। आप देखेंगे कि यूजीसी ही नहीं स्वायत्त और संवैधानिक अन्य संस्थाएं भी इस समय सबसे बुरे दौर और दबाव में हैं। हमारी इन संस्थाओं का गौरवशाली इतिहास रहा है- वो चाहे यूजीसी, यूपीएससी हो साहित्य अकादमी हो या जो भी अन्य…। जितनी भी संस्थाएं हैं, जहां सरकार ना सिर्फ हस्तक्षेप कर रही हैं बल्कि अपना दबदबा भी बना रही है। दमनकारी और तानाशाही सरकार पूर्ण नियंत्रण करना चाहती है।

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