‘पत्रिकाओं की ब्लैकलिस्टिंग को बड़े परिप्रेक्ष्य में देखने की जरूरत है’

समाज में व्याप्त जड़ताओं को दूर करने वाली पत्र-पत्रिकाओं को यूजीसी द्वारा सूची से बाहर निकाले जाने का बुद्धिजीवियों द्वारा विरोध किया जा रहा है। प्राख्यात साहित्यकार गिरिराज किशोर का कहना है कि यूजीसी ने उच्च शिक्षा को भटकाव के दोराहे पर खड़ा कर दिया है। जबकि प्रो. सतीश देशपांडे कहते हैं कि ईपीडब्ल्यू, फारवर्ड प्रेस और हंस जैसी पत्रिकाओं को यूजीसी जैसी संस्था की परवाह नहीं करनी चाहिए

उच्च शिक्षा को पूरी तरह बाजार के गर्त में धकेलने का सरकार का मिशन जब पूरा होगा तब होगा। फिलहाल इसे लेकर आजकल मानव संसाधन मंत्री प्रकाश जावड़ेकर धड़ाधड़ विश्वविद्यालयों को एमओयू साइन करने के लिए लिखा-पढ़ी में व्यस्त भी हैं। लेकिन हम इस समय उन परिस्थितियों को गहराई से देखने की कोशिश कर रहे हैं कि उनके मंत्रालय या यूजीसी में वह कौन सा विचार और प्रणाली है जिससे देश की नामी पत्रिकाओं और जर्नल्स को ब्लैक लिस्टेड कर दिया गया या ऐसी नौबत आन पड़ी है। बेशक, बौद्धिक समाज इस कार्रवाई को शिक्षा की मौजूदा दशा-दिशा की ओर बढ़ा हुआ एक आत्मघाती कदम मानता है लेकिन इसका सबसे बुरा पहलू वे यह देख रहे हैं कि इससे आने वाली पीढियां कितनी बेतरह टूट जाएंगी।

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