बुद्धिजीवियों का आह्वान, अभियानों और अपीलों से यूजीसी के खिलाफ मोर्चा खोलो

विश्वविद्यालय अनुदान आयोग द्वारा 4305 पत्र-पत्रिकाओं को काली सूची में डाल दिया गया है। इनमें अवैज्ञानिक नजरिया और जड़ता को समाप्त करने वाली पत्र-पत्रिकायें भी हैं। यूजीसी के इस कृत्य से देश के अकादमिशियन और साहित्यकार सभी हतप्रभ हैं। वे विरोध का आह्वान कर रहे हैं। फारवर्ड प्रेस की खबर :

विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी) ने  2 मई, 2018 को एक अधिसूचना जारी कर चार हजार से अधिक पत्र-पत्रिकाओं को अपनी मान्यता सूची से बाहर कर दिया। बाहर की जाने वाली पत्रिकाओं में  फारवर्ड प्रेस, इकनाॅमिक एंड पॉलिटिकल वीकली का ऑनलाइन संस्करण, समयांतर, हंस, वागर्थ, जन मीडिया, गांधी-मार्ग आदि शामिल हैं। गौरतलब है कि इन पत्रिकाओं को उ‍द्धृत किए बिना मानविकी विषयों का शायद ही कोई शोध मुक्कमल बनता है।  यूजीसी ने इनके साथ बौद्ध मत, अनुसूचित जातियों व अनुसूचित जनजाति संंबंधी विमर्शों को प्रस्तुत करने वाली सभी पत्रिकाओं को ब्लैकलिस्ट कर दिया है। इसका अर्थ यह है कि इन पत्रिकाओं में प्रकाशित लेखों के लिए शोधार्थियों व प्राध्यापकों को यूजीसी द्वारा निर्धारित प्वाइंट नहीं मिलेंगे।

फारवर्ड प्रेस में हम इस प्रकरण पर निरंतर सामग्री प्रकाशित कर आपको मामले की गंभीरता और इसके फलाफल से परिचित करवा रहे हैं। इस कड़ी में अभय कुमार दुबे, विभूति नारायण राय और प्रो. वीर भारत तलवार की प्रतिक्रिया :


अंग्रेजी में समाज विज्ञान का पूरा विश्लेषण बोगस- अभय कुमार दुबे

सरकार की जरूर कोशिश है कि दलित, पिछड़ा और आदिवासी समाज बदले! लेकिन इसका आधार वह सामाजिक न्याय के सिद्धांत या आंबेडकर के आदर्शों को नहीं बनाना चाहती। अपने एजेंडे के अनुसार, यह काम भी वह हिंदुवादी तरीकों से अंजाम देना चाहती है। सरकार वोटों के लिए ऐसा कर रही है लेकिन उसे ना तो वोट हासिल होंगे और ना उच्च शिक्षा की हालत में सुधार हो सकेगा।

अभय कुमार दुबे का कहना है कि फारवर्ड प्रेस पर प्रतिबंध लगाने से साफ है कि जिस तरह से दलित, पिछड़ों और आदिवासियों की गोलबंदी होती रही है, अब हो रही है, वर्तमान (मोदी) सरकार उस गोलबंदी को भेदने की फिराक में है। यह पूरे देश के आंबेडकरवादियों पर हमला है। सारे देश में तेजी से उभर रही दलितों की ताकत पर हमला है। इस सरकार की कोशिश ही नहीं, बल्कि ये पूरी तरह से साफ दिख रहा है कि जिस तरह से ओबीसी समुदाय एक बड़ी ताकत बनकर सामने आया है, उसे कुचलने की कोशिश की जा रही है। यह इस सरकार की प्रोसेस है कि जो इसमें योजनाबद्ध तरीके से काम कर रही है। यूजीसी के कामकाज का तरीका मत देखिए सिर्फ ये जानिए कि यूजीसी एक मोहरा भर है, एक औजार है।

नवजागरण और जाति संबंधी एक सेमिनार को संबोधित करते अभय कुमार दुबे (फाइल फोटो)

मूल बात है सरकार का सांस्कृतिक-शैक्षणिक इरादा क्या है, उस पर उंगली रखी जानी चाहिए। यूजीसी वही कर रही है जो सरकार कह रही है। वह कहने भर के लिए स्वायत्त संस्था है लेकिन उसकी कोई स्वायत्तता कहीं से रह गई लगती है? वह सरकार को ज्यादा से ज्यादा वफादारी दिखाने की कोशिश करेगी, कर ही रही है। दरअसल गौर से देखने लायक बात ये है कि सरकार यूजीसी के जरिए काम क्या करा रही है। मैं अकादमिक नजरिए भी कह रहा हूं कि सारे देश में आजादी के बाद से आज तक दलित, ओबीसी और ट्राइब्स को हर तरीके से गोलबंद किया जाता रहा। उसका राजनीतिकरण होता रहा। सरकार जाहिर तौर पर उन सबका समर्थन चाहती है, लेकिन आंबेडकर के नजरिए से नहीं, सामाजिक न्याय की दृष्टि से नहीं, वो अपने हिंदुवादी तरीके से उनको साधना चाहती है। उसके लिए जरूरी है कि पहले से ही राजनीतिकरण से जैसे वोटों का गणित है, पहले उनकी इन विधियों को खत्म करना पड़ेगा।

सरकार की कोशिश है कि उसके लिए बाधक जितने भी अभिकर्ता हैं, वह चाहे फारवर्ड प्रेस पत्रिका हो, हंस जैसी पत्रिका हो या दूसरी पत्रिकाएं हों, उनको मान्यता संबंधी जैसे तमाम तरीके अनुमोदन से हटाना और सूचियों से हटाना ताकि कहीं से भी उसको प्रोत्साहन प्राप्त ना हो। इसलिए यह सब किया जा रहा है।

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बहरहाल यह तो एक बात हुई। दूसरी बात उच्च शिक्षा में गुणवत्ता लाने का सवाल हो तो सबसे पहले भारत में अंग्रेजी वाले समाज विज्ञान के नजरिए, उसके दबदबे को खत्म करना होगा जिसकी दुनिया में कोई पूछ नहीं है। हाल में आई एक महत्वपूर्ण रिपोर्ट को पढ़ लीजिए, किस तरह से भारत में सोशल साइंस की स्थिति का खाका खींचा गया है। भारत में सोशल साइंस का कबाड़ा हो चुका है। भारत में अंग्रेजी के सोशल साइंटिस्ट के काम को आधारहीन माना जा रहा है, उनको कोई उल्लेख या उदाहरण या उद्धरण की तरह लेना पसंद नहीं किया जा रहा है। बस, उसमें उंगलियों में गिने जा सकने वाले कुछ नाम अगर छोड़ दें तो दुनियाभर में भारत का समाज विज्ञान बेमानी हो चुका है, उसकी कोई इज्जत नहीं रह गई है जो तमाम अंग्रेजी में लिखा गया। हम लोग केवल अंग्रेजी के गुलाम हैं- हम उसकी ही थ्योरी को पढ़ते रहते हैं… लेकिन भारत में जो ज्ञान फैला हुआ है उसको नहीं पढ़ते, उससे कोई संबंध नहीं रखते। हम केवल वेस्टर्न सोशल थ्योरी के तौर तरीकों से इनका भारत के बारे में लिखा पढ़ते हैं- यह नितांत अविश्वसनीय है। हम आलोचनात्मक तरीके से भी इनको देखते ही नहीं है, बस इनको पढ़ते हैं और भरोसा कर लेते हैं। होना यह चाहिए कि जिसे हम पसंद करते हैं, उसकी आलोचना भी तो करिए भई। लेकिन आलोचना करने के लिए तो पढ़ना पढ़ेगा। इससे मुक्ति मिलेगी तो उच्च शिक्षा का गुणवत्ता का स्तर सुधरेगा। ऐसे कथित अध्ययनों से बाहर आकर ही भला होगा, वरना कुछ होने वाला नहीं है। क्या जब सरकार आई तो तब शोध की गुणवत्ता नहीं थी? या सत्तर के दशक में शोध की गुणवत्ता थी? मैं नही मानता कि शोध की गुणवत्ता उस वक्त खराब थी?  मैं तो नहीं मानता कि तब शोध खराब होते थे।

उन्होंने आगे कहा अब प्रतिरोध के नाम पर होता यह है कि अकादमिक बुद्धिजीवी लोग दुनियाभर में अमूमन सत्ता के पक्ष में ही खड़े दिखते हैं। बस घुमा फिराकर वह कुछ जुबानी जमा खर्च की तरह कोई खानापूर्ति करते हैं, उससे ज्यादा कुछ भी नहीं। आमतौर पर बुद्धिजीवी समुदाय व्यवस्था के पक्ष में रहते हैं। लेकिन कुछ बुद्धिजीवी तो आगे आएंगे, बोलेंगे, कुछ अभियानों से और कुछ अपीलों से जुडेंगे। साथ आएंगे वह भी। लेकिन जरूरत यही है आकर एक साथ खड़ा हुआ जाए, एक आंदोलन खड़ा किया जाए। संभावनाएं कमतर नहीं करनी चाहिए।

बहुजन विमर्श को विस्तार देतीं फारवर्ड प्रेस की पुस्तकें

हिंदी वैचारिकी और समालोचना में सक्रिय अभय कुमार दुबे समाज विज्ञान पत्रिका प्रतिमान के संपादक हैं। अंतरंगता का स्वप्न, राष्ट्रवाद बनाम देशभक्ति, राष्ट्रवाद का अयोध्या कांड, भारत में राजनीति, कल और आज,  भारत के मध्यवर्ग की अजीब दास्तान (द ग्रेट इंडियन मिडिल क्लास : पवन वर्मा), भारतनामा (द आइडिया ऑव इंडिया : सुनील खिलनानी) आदि कृतियों के वह अनुवादक हैं। समय चेतना के कई अंकों का उन्होंने संपादन किया था। साथ ही सांप्रदायिकता के स्रोत, आज के नेता: राजनीति के नए उद्यमी आठ पुस्तकों की श्रृंखला का संपादन भी उन्होंने किया है।

पैसे से मान्यता खरीदने कोशिशें होंगी- वी.एन. राय

विभूति नारायण राय कहते हैं कि पत्रिकाओं को बाहर करना बड़ी बेवकूफी है, यह वाकई में चिंता में डालने वाली और समझने वाली बात है। समुदायों विशेष की आवाजों को बुलंद करने वाली जितनी भी प्रगतिशील और वामपंथी पत्रिकाएं हैं, मैं देख रहा हूं उनको यूजीसी से प्रतिबंधित कर दिया है। सरकार चाहती है जो भी विरोध के सुर हैं, उनमें जो उनके मनमाफिक तरीके से नहीं लिखते, उसे कुचल दो, उसे जला दो- ऐसा मेरा सोचना है। सरकार क्या-क्या सोच कर ऐसा कर रही होगी, यह वही जाने। उसकी मंशा के बारे में मेरे सिर्फ अनुमान ही हैं। लेकिन अब यूजीसी, उच्च शिक्षण संस्थान ना सिर्फ आरएसएस की दिखाई राह पर चल रहे हैं- जैसे लोग सब जगह नियुक्त हो रहे हैं, इसमें समझ ना आने वाली कोई बात नहीं। बल्कि अब सरकार हायर एजुकेशन पर खर्च नहीं कर रही है- उसकी मदद कम होती जा रही है, फंड नहीं दे रही है जबकि सरकार की मुख्य जिम्मेदारी में एक है शिक्षा जहां उसे अपना दायित्व महसूस करना चाहिए और वहां उसे आगे बढ़ाने के लिए दखल देना चाहिए, पैसा देना चाहिए। लेकिन उच्च शिक्षा को उसने भुखमरी के कगार पर खड़ा कर दिया है। वह उच्च शिक्षा को प्राइवेट हाथों में सौंप रही है। जाहिर है, वहां गरीब आदमी पढ़ नहीं सकेगा। यह सरकार की एक खराब नीति है। बताइए यह कोई बात हुई कि आपने पहल को महत्व नहीं दिया, फारवर्ड प्रेस और वागर्थ और हंस जैसी पत्रिका को उच्च शिक्षा अध्ययन से बाहर कर दिया।

एक संगोष्ठी को संबोधित करते विभुति नारायण राय (फाइल फोटो)

राय के शब्दों में अब होगा यह कि पैसा देकर मान्यता लेकर पत्रिकाएं शुरू होंगी, जिनमें पैसा देकर जो चाहो छपवा लो। यही शुरू होने वाला है। और यह जो भी हो लेकिन एक खराब शुरुआत होगी।

1951 में आज़मगढ़ (उत्तर प्रदेश) में जन्मे विभूति नारायण राय 1975 बैच के यूपी कैडर के आईपीएस अधिकारी हैं। वह तब सबसे ज्यादा चर्चा में आए थे जब उनका उपन्यास ‘शहर में कर्फ्यू’ आया था। इस उपन्यास का अंग्रेजी, उर्दू, असमिया, पंजाबी, बांग्ला, मराठी आदि में भी अनुवाद हो चुका है। “किस्सा लोकतंत्र” और तबादला जैसे उपन्यासों में भी उन्होंने देश की सामाजिक, राजनीतिक परिस्थितियों को बरीकी से देखा है। वह सरकारी तंत्र में कई प्रमुख पदों पर रहे और आज कई सामयिक विषयों पर निरंतर लेखन करते हैं।

पत्रिकाएं हमारे समाज के प्रखर मंच हैं- वीर भारत तलवार

वीर भारत तलवार कहते हैं कि मैं इन सब पत्रिकाओं को जानता हूं। यह एक बहुत दुखद बात है कि यूजीसी ने अपनी मान्यता सूची से ऐसी पत्रिकाएं बाहर की हैं। मुझे वाकई में आश्चर्य है क्योंकि जिन पत्रिकाओँ को उन्होंने हटाया है वे तो हिंदी के बौद्धिक समाज में बहुत ही समादृत पत्रिकाएं हैं। इन पत्रिकाओं का बहुत आदर और मान है। हिंदी के तमाम बड़े बुद्धिजीवी और बड़े लेखक इनमें लिखते हैं, लिखते थे, जुड़े हैं और इनमें छपना एक गौरव की बात रही है। सभी ऐतिहासिक पत्रिकाएं हैं, फारवर्ड प्रेस आधुनिक समय में चेतना का वाहक है जो दलित और वंचित समुदाय की प्रतिनिधि आवाज है। और ईपीडब्ल्यू, भारत में कोई भी ऐसी पत्रिका नहीं है। मुझे हैरानी होती है कि कौन लोग हैं यूजीसी में इस तरह की सूची बनाते हैं और संशोधन करते हैं। वागर्थ इतनी अच्छी और निरापद पत्रिका, उसको भी बाहर कर दिया दिया। बताइए यह भी क्या बात हुई। ये सारे नाम बौद्धिक विमर्श के बड़े नाम है, इनको किनारे करना एक मंच को खत्म कर देना है। जबकि इस बौद्धिक विमर्श की विश्वविद्यालयों को जरूरत है। विरोध पक्ष कमजोर पड़ा है, कुमार प्रशांत जी ने सही कहा कि हम कमजोर पड़े, हमारी नागरिक आजादी की आवाज मंदी पड़ी इसलिए ऐसा किया गया। इसलिए इसका मौका उठाकर वह उसे भरने की कोशिश कर रहे हैं।

प्रोफेसर वीर भारत तलवार, जेएनयू, नई दिल्ली

सच बात तो ये है कि जिस तरह से विश्वविद्यालय की पीढ़ी से ये पत्रिकाएं अलग की गई हैं- ये एक उल्टी दिशा में बढ़ने की तरह है जबकि विश्वविद्यालयों को तो विचार-विमर्श का प्रखर मंच बनाना चाहिए। ये कदम उस विमर्श से उस मंच से विमुख करने वाला है। लेकिन अगर सरकार सोचती है कि उसके ऐसे कदम से इन प्रमुख पत्रिकाओं की साख गिरेगी तो ऐसा होने वाला नहीं है।

20 सितंबर 1948 में जमशेदपुर (झारखंड) में जन्मे प्रोफेसर वीर भारत तलवार देश के जानेमाने बुद्दिजीवी हैं। जेएनयू से अपने शिक्षण कार्य व वहां से अवकाश ग्रहण करने के बाद वह बौद्धिक क्षेत्र में लगातार लेखन ही नहीं बल्कि पिछड़े समाज की सतत् विवेचना और आदिवासी चेतना को बचाए रखने के महत्वपूर्ण कार्य में लगे हैं। वह जेएनयू में भारतीय भाषा केंद्र के अध्यक्ष भी रह चुके हैं।

(कॉपी संपादन : एफपी डेस्क)


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