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मैला प्रथा उन्मूलन के बिना स्वच्छ भारत अभियान धोखा है

मैला प्रथा भारत के लिए कलंक है। इसे गैर-कानूनी घोषित किये हुए 25 वर्ष हो गये, फिर भी सीवर/सेप्टिक टैंक में हत्याओं का दौर जारी है। मैला प्रथा उन्मूलन के लिए संसाधनों की कमी नहीं है, लेकिन सरकारी उदासीनता के कारण इस कलंक को हम ढो रहे हैं। बता रहे हैं राज वाल्मीकि :

मैला प्रथा जैसे कलंक को दूर करने के लिए संसधानों की कमी कतई नहीं है, लेकिन सरकारी उदासीनता के कारण यह दुरूह बना है। मानव मल की हाथ से सफाई करने वाले भारत को कोई देखना नहीं चाहता। वह अनदेखा रह जाता है। लेकिन सड़ांध मारते मानव मल से बजबजाते भारत को अनदेखा करने से बात नहीं बनेगी। मानव मल की हाथ से सफाई करने वाले उस भारत की गंदगी दूर करने पर ही हमारा दूषित भारत सही अर्थों में स्वच्छ भारत कहलाएगा।

सरकार सीवर/सेप्टिक की सफाई छोटी मशीनों से करवा सकती है। इन छोटी रोबो मशीनों को जर्मनी, जापान जैसे देशों से खरीदा जा सकता है अथवा स्वदेश में ही हिंदुस्तान ऐरोनाटिक्स लिमिटेड या अजंता टेक्नोलॉजी से निर्मित कराया जा सकता है। यह ‘मेक इन इंडिया’ का एक अच्छा उदाहरण भी होगा।…..

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लेखक के बारे में

राज वाल्मीकि

'सफाई कर्मचारी आंदोलन’ मे दस्तावेज समन्वयक राज वाल्मीकि की रचनाएं विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हो चुकी हैं। इन्होंने कविता, कहानी, व्यग्य, गज़़ल, लेख, पुस्तक समीक्षा, बाल कविताएं आदि विधाओं में लेखन किया है। इनकी अब तक दो पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं कलियों का चमन (कविता-गजल-कहनी संग्रह) और इस समय में (कहानी संग्रह)।

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