मैला प्रथा उन्मूलन के बिना स्वच्छ भारत अभियान धोखा है

मैला प्रथा भारत के लिए कलंक है। इसे गैर-कानूनी घोषित किये हुए 25 वर्ष हो गये, फिर भी सीवर/सेप्टिक टैंक में हत्याओं का दौर जारी है। मैला प्रथा उन्मूलन के लिए संसाधनों की कमी नहीं है, लेकिन सरकारी उदासीनता के कारण इस कलंक को हम ढो रहे हैं। बता रहे हैं राज वाल्मीकि :

मैला प्रथा जैसे कलंक को दूर करने के लिए संसधानों की कमी कतई नहीं है, लेकिन सरकारी उदासीनता के कारण यह दुरूह बना है। मानव मल की हाथ से सफाई करने वाले भारत को कोई देखना नहीं चाहता। वह अनदेखा रह जाता है। लेकिन सड़ांध मारते मानव मल से बजबजाते भारत को अनदेखा करने से बात नहीं बनेगी। मानव मल की हाथ से सफाई करने वाले उस भारत की गंदगी दूर करने पर ही हमारा दूषित भारत सही अर्थों में स्वच्छ भारत कहलाएगा।

सरकार सीवर/सेप्टिक की सफाई छोटी मशीनों से करवा सकती है। इन छोटी रोबो मशीनों को जर्मनी, जापान जैसे देशों से खरीदा जा सकता है अथवा स्वदेश में ही हिंदुस्तान ऐरोनाटिक्स लिमिटेड या अजंता टेक्नोलॉजी से निर्मित कराया जा सकता है। यह ‘मेक इन इंडिया’ का एक अच्छा उदाहरण भी होगा।

लेकिन सवाल यह है कि इस दूषित भारत को स्वच्छ करने की घोषणा कब की जाएगी? क्या प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी नोटबंदी की तरह इसकी भी घोषणा करेंगे?

दो अक्टूबर यानी गांधी जयंती पर न केवल मोहनदास करमचंद गांधी को याद किया जाता है, बल्कि स्वच्छ भारत अभियान पर गर्व से चर्चा की जाती है। स्वच्छ भारत मिशन के कसीदे पढ़े जाते हैं। ‘स्वच्छता ही सेवा’ सबसे स्वच्छ गांव या शहर इत्यादि पर बढ़ाचढ़ा कर बात की जाती है। अपने मुंह मियां मिट्ठू बना जाता है।

मैला प्रथा उन्मूलन के बिना स्वच्छता मिशन झूठा है

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के समर्थक एवं वे स्वयं अपनी पीठ थपथपाते हुए कहते हैं – वाह मोदी जी वाह। लेकिन इस ‘वाह’ के समानांतर सीवर/सेप्टिक टैंक की सफाई के दौरान जान गंवाते युवकों और उनके परिवार की ‘आह’ क्यों सुनाई नहीं देती? मानव मल ढोती महिलाएं और पुरुष दिखायी क्यों नहीं देते? इस बजबजाते और दुर्गंध मारते यथार्थ से आंखे मूंद ली जाती हैं। ये दुर्गंध उन्हें महसूस नहीं होती या जानबूझ कर महसूस नहीं करना चाहते?

बड़े गर्व से बताया जाता है कि स्वच्छ भारत अभियान के तहत इतने लाख शौचालयों का निर्माण किया गया। लेकिन इस पर चर्चा नहीं की जाती कि इन शौचालयों के भरने पर इनके गड्ढों की सफाई किससे करवायी जाती है? सफाई के दौरान कितने लोगों की जान जाती है?

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हाल ही की एक कड़वी सच्चाई पर प्रधानमंत्री ने चुप्पी साध रखी है। पिछले सात दिनों में जब ग्यारह लोग सीवर सफाई में मारे गये, प्रधानमंत्रीजी मौन रहे। पिछले कुछ ही महीनों में 83 लोग जहरीली गैस से सीवर में घुटन से मरे, प्रधानमंत्रीजी मौन रहे। पिछले वर्ष यानी 2017 में 221 लोग मौत के सीवर में समा गये, प्रधानमंत्रीजी मौन रहे। 1993 से अब तक 1790 लोगों को सीवर की जहरीली गैस ने लील लिया, प्रधानमंत्रीजी मौन ही रहे। जैसे कुछ हुआ ही न हो। आखिर क्यों?

आज इक्कीसवीं सदी के डिजिटल इंडिया में लोगों की सीवर में मर जाना क्या हम सभी के लिए शर्म की बात नहीं होनी चाहिए? क्यों सीवर टैंकों की सफाई में तकनीक का इस्तेमाल नहीं किया जाता? इस तकनीक के युग में जब बड़े-बड़े कार्य तकनीक के माध्यम से किये जा रहे हैं तो सीवर सफाई के लिए भी रोबो मशीने बनायी जा सकती हैं अथवा विदेशों से खरीदी जा सकती हैं।

सीवरों की सफाई के दौरान होने वाली मौतों के खिलाफ दिल्ली के जंतर-मंतर में आयोजित एक विरोध प्रदर्शन

सीवर की सफाई को राजनीतिक दलों द्वारा राष्ट्रीय समस्या का मुद्दा बनाने की जरुरत है। जिस प्रकार सरकार ने स्वच्छ भारत अभियान चलाया, इसी प्रकार सीवर में हो रही मौतों से बचाव के लिए भी देशभर में बड़े पैमाने पर जागरूकता फैलाने और मशीनों से सफाई को अनिवार्य बनाने का अभियान चलाया जाए तो निश्चित रूप से इसमें सफलता मिलेगी। किसी की जान जहरीली गैसों से दम घुटने से नहीं जाएगी। लेकिन विडंबना देखिए कि भारत सरकार के पास मंगल ग्रह पर मंगलयान भेजने की तकनीक है पर सीवर सफाई की नहीं।

गौरतलब है कि सफाई कर्मचारी संगठन देशभर में मैला प्रथा उन्मूलन के लिए आंदोलन कर रहा है। साथ ही सीवर/सेप्टिक टैंकों में हो रही मौतों के खिलाफ भी अभियान चला रहा है। सरकार पर भी रैली/धरना मेमारैंडम आदि देकर दबाव बना रहा है, ताकि सीवर में किसी भी इंसान की जान न जाए। लेकिन सरकार की चुप्पी बहुत अखरने वाली है। इससे संशय होता है कि इसके पीछे सरकार में बैठे लोगों की जातिवादी मानसिकता है, क्योंकि सदियों से इस जघन्य एवं अमानवीय कार्य को दलितों की जाति-विशेष, जिसे सफाई समुदाय कहा जाता है, उन पर थोप दिया गया है।

सवाल है कि देश में मैला प्रथा उन्मूलन के लिए जब वर्ष 1993 और वर्ष 2013 के दो-दो कानून हैं तो फिर उनका पालन क्यों नही हो रहा है। इतना ही नहीं, सुप्रीम कोर्ट ने भी 27 मार्च, 2014 को इस बारे में आदेश पारित किया। इन सब प्रावधानों के तहत न तो किसी व्यक्ति को सीवर में उतरने की जरूरत है और न ही मैला ढोने जैसे अमानवीय कार्य करने की। ये कानून और आदेश न केवल मैनुअल स्केवेंजरों (हाथ से मैला उठाने वाले) की मुक्ति की बात करते हैं बल्कि उनके लिए गैर-सफाई कार्यों में उनके पुनर्वास की भी व्यवस्था करते हैं।

सवाल फिर वही कि इन लोगों का पुनर्वास क्यों नहीं हो पा रहा है? क्या इसके लिए प्रशासन का ढुलमुल रवैया जिम्मेदार नहीं है? ध्यान देने की बात यह भी है कि सफाई कार्य करने वाले शत-प्रतिशत दलित लोग ही क्यों होते हैं? क्या इसके पीछे सरकार की जातिवादी मानसिकता तो नहीं है? जावितादी मानसिकता के लोग यह सोचते हैं कि सफाई का कार्य तो दलितों का जन्म-जात पेशा है। सदियों से ये लोग करते आ रहे हैं।

सीवर में जान गंवाने वाले अधिकतर युवा ही होते हैं और जब उनकी विधवा या उनके बच्चे विलखते हैं और बताते हैं कि अकाल मृत्यु के शिकार हुए उनके पति और पापा इज्जत की जिंदगी जीना चाहते थे। तो वह क्षण न केवल भारत सरकार के लिए बल्कि सभ्य समाज के लिए भी शर्मिंदगी भरा होता है। तब हमें अपने देश पर गर्व नहीं बल्कि शर्म आती है। यह अकारण नहीं है कि सफाई कर्मचारी आंदोलन के लोग नारे लगाते हैं– ‘‘भारत सरकार शर्म करो। सीवर में हत्याएं बंद करो।’’

जब हम किसी बेरोजगार या गरीब व्यक्ति को चंद रुपयों का लालच देकर जहरीली गैसों से भरे सीवर में सफाई के लिए अंदर जाने को विवश करते हैं और वे अंदर जाकर मर जाते हैं तो इसे स्वाभाविक मौत नहीं बल्कि हत्या ही कहा जाएगा।

निष्कर्ष रूप में देखा जाए तो मैला प्रथा जैसे कलंक को दूर करने के लिए संसधानों की कमी नहीं, बल्कि सरकारी मानसिकता की कमी है।

(कॉपी-संपादन : राजन)


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