छोटानागपुर के असुर

तेजी से घट रही असुर समुदाय की आबादी एक बड़ा सवाल है। सवाल एकआयामी नहीं बल्कि बहुआयामी हैं जो सीधे तौर पर सबसे प्राचीनतम जनजाति के अस्तित्व के बुनियादी अधिकारों से जुड़ा है। दिलचस्प यह कि सरकारें पुरातत्व अध्ययन, पर्यटन को बढ़ावा देने के क्रम में निर्जीवों का ख्याल तो रखती हैं लेकिन इंसानों का नहीं और न ही उनकी संस्कृति का। एफपी टीम की जमीनी रिपोर्ट :

– नवल किशोर कुमार

उन दिनों, मैं पटना में तरुणमित्र के समन्वय संपादक के रूप में कार्य कर रहा था। पूरे दिन रूटिन की खबरें और  सियासी गलियारे की उठापटक के बीच पत्रकार के बजाय रोबोट बन चुका था। वैसे मैं यह मानता हूं कि पत्रकारिता के हिसाब से यह भी अनिवार्य उपक्रम है। खासकर दैनिक अखबारों की प्रकृति ही ऐसी होती है। हर दिन हमारे लिए अखबारों के पन्ने कोरे होते हैं और आप शून्य से ही शुरू करते हैं। एक दिन फारवर्ड प्रेस के संपादक प्रमोद रंजन जी का फोन आया। उन्होंने पूछा कि असुरों से मिलने चलेंगे? अचानक रोबोट बन चुके नवल के भीतर का इंंसान जाग उठा। मैंने तपाक से कहाँ – कब चलना है। सबसे बड़ा संकट, समय का था। अधिक से अधिक दो दिनों का समय निकाला जा सकता था। तय कार्यक्रम के अनुसार 1 नवंबर 2015 को प्रमोद रंजन दिल्ली से रांची पहुंचे। मैंने योजना बनायी कि ट्रेन से पटना से रांची की दूरी नापी जाय। परंतु देर रात तक काम करने के बाद सुबह-सुबह जगना संभव न हो पाया और पटना से रांची जाने वाली जन शताब्दी हाथ से निकल गयी। जाना तो था ही, सो उसी दिन पटना से रांची के लिए बस में सवार हुआ।

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