फुले, पेरियार और आंबेडकर की विवाह पद्धतियों से ही होगा ब्राह्मणवादी पितृसत्ता का खात्मा

फुले, पेरियार और आंबेडकर ने ब्राह्मणवादी पितृसत्ता को तोडने के लिए ब्राह्मणवादी विवाह पद्धति को खारिज किया और नई विवाह पद्धति की शुरूआत की। फुले ने सत्यशोधक विवाह पद्धति, पेरियार ने आत्माभिमान विवाह पद्धति और आंबेडकर ने हिंदू कोड़ बिल में नए तरह की विवाह पद्धति का प्रावधान किया। बता रहे हैं सिद्धार्थ :

ब्राह्मणवादी पितृसत्ता का मजबूत स्तंभ ब्राह्मणवादी विवाह पद्धति है, जिसमें पिता जिसे चाहे अपनी पुत्री को सौंप सकता है, जिसे कन्यादान कहा जाता है। शर्त सिर्फ इतनी है कि वह लड़का उसकी जाति का होना चाहिए। ब्राह्मणवादी ग्रंथ जाति से बाहर शादी की अनुमति नहीं देते हैं। हां, विशेष परिस्थिति में सवर्ण जातियों के पुरूष शूद्रों-अतिशूद्रों की लड़कियों से शादी कर सकते है, लेकिन किसी भी परिस्थिति में सवर्ण जाति की लड़की शूद्र-अतिशूद्र से शादी नहीं कर सकती है। इस शादी में ब्राह्मण पुरोहित का होना आवश्यक है, जो शादी कराता है।

यह शादी जन्म-जन्म का बंधन होती है, जिसमें पति-पत्नी एक-दूसरे से अलग नहीं हो सकते है यानी तलाक नहीं ले सकते हैं।

ब्राह्मणवादी पितृसत्ता की एक बुनियादी शर्त यह भी है कि जन्म से मृत्यु तक स्त्री को किसी न किसी पुरूष के अधीन रहना है-

पिता रक्षति कौमारे भर्ता रक्षति यौवने । रक्षन्ति स्थविरे पुत्रा न स्त्री स्वातन्त्र्यं अर्हति। (मनुस्मृति )

फुले, पेरियार और आंबेडकर ने ब्राह्मणवादी पितृसत्ता को तोडने के लिए ब्राह्मणवादी विवाह पद्धति को खारिज किया और नई विवाह पद्धति की शुरूआत की। फुले ने सत्यशोधक विवाह पद्धति, पेरियार ने आत्मभिमान विवाह पद्धति और आंबेडकर ने हिंदू कोड़ बिल में नए तरह की विवाह पद्धति का प्रावधान किया।

जोतीराव फुले और सावित्री बाई फुले की कर्मस्थली फुलेवाड़ा, पुणे (महाराष्ट्र) परिसर में एक नवविवाहित दंपत्ति

फुले की सत्यशोधक विवाह पद्धति क्या?

24 सितंबर 1873 को जोतीराव फुले ने सत्यशोधक समाज का गठन किया। सत्यशोधक समाज ने सत्यशोधक विवाह पद्धति की शुरूआत की। इस विवाह पद्धति में यह माना जाता था कि स्त्री और पुरूष जीवन के सभी क्षेत्रों में समान हैं, उनके अधिकार एवं कर्तव्य समान हैं। किसी भी मामले में और किसी भी तरह से स्त्री पुरूष से दोयम दर्जे की नहीं और न ही स्त्री जीवन के किसी मामले में पुरूष के अधीन है। स्त्री पुरूष जितना ही स्वतंत्र है। फुलेे ने लिखा कि ‘ स्त्री और पुरूष दोनों सारे मानवी अधिकारों का उपभोग करने के पात्र हैं। फिर पुरूष के लिए अलग नियम और स्त्री के लिए अलग नियम क्यों? इतना ही नहीं उन्होंने यह भी कहा ‘ स्त्री शिक्षा के द्वार पुरूषों ने इसलिए बन्द कर रखे थे, ताकि वे मानवी अधिकारों को समझ न पाएं। जैसी स्वतंत्रता पुरूष लेता है, वैसी ही स्वतंत्रता स्त्री ले तो?

सत्यशोधक विवाह पद्धति का ब्राह्मणवादी विवाह पद्धति के विपरीत यह मानना है कि कन्या पिता की या किसी अन्य की संपत्ति नहीं है, जिसे वह जिसे चाहे दान करे। ब्राह्मणवादी कन्यादान कहते हैं। सत्यशोधक विवाह पद्धति के तहत बिना लड़की की अनुमति के शादी नहीं हो सकती है। जब लड़की-लड़का दोनों सहमत हों तभी शादी होगी। उन्होंने उन सभी ब्राह्मणवादी मंत्रों को खारिज कर दिया, जो विवाह के दौरान पढ़े जाते थे और स्त्री को पुरूषों से दोयम दर्जे का ठहराते थे। उन्होंने ब्राह्मणवादी संस्कृति भाषा के मंत्रों की जगह मराठी में नए मंत्रों की रचना की। जिसे वर-वधू आसानी से समझ सकें और जिममें दोनों के समान अधिकारों और कर्तव्यों की चर्चा की गई थी। इस विवाह पद्धति में से पूरी तरह से ब्राह्मण पुरोहित रूपी बिचौलिए को हटा दिया गया था।

आत्मसम्मान विवाह पद्धति के तहत हो रहे एक शादी समारोह के दौरान पेरियार

पेरियार की आत्मसम्मान विवाह पद्धति

पेरियार इरोड वेंकेट रामासामी ‘पेरियार’ ने ब्राह्मणवाद के विनाश और शू्द्रों-अतिशूद्रों, महिलाओं एवं द्रविड़ समाज के सम्मान के लिए आत्मसम्मान आंदोलन चलाया। इस आत्मसम्मान आंदोलन के तहत ही उन्होंने एक नई विवाह पद्धति का चलन किया, जिसे उन्होंने आत्मभिमान विवाह पद्धति का नाम दिया। इस विवाह पद्धति  की विशेषाताएं बताते हुए ललिताथारा कहती हैं “पेरियार ने 1929 में आत्माभिमान विवाह (सेल्फ-रिस्पेक्ट मैरिज) की जिस अवधारणा का विकास किया, वह एक अनोखा मास्टर स्ट्रोक था। यह अवधारणा विवाह को दो व्यक्तियों के बीच एक ऐसे समझौते के रूप में देखती थी, जिसमें जाति, वर्ग या धर्म के लिए कोई जगह न थी। न ही इसमें किसी पुरोहित की आवश्यकता थी। इस विवाह पद्धति में विवाह के लिए सिर्फ लड़का-लड़की की रजामंदी की जरूरत थी, अभिवावकों की अनुमति की कोई आवश्यकता नहीं थी। इसमें विवाह सदा के लिए पवित्र बंधन न होकर दो समकक्ष व्यक्तियों  के बीच समझौता था, जिसमें दोनों में से कोई पक्ष जब चाहे समाप्त कर सकता था। विवाह स्वर्ग में या ईश्वर द्वारा नहीं, वरन धरती पर दो व्यक्तियों द्वारा परस्पर सहमति और समझौते से निर्धारित किए जाते थे। आत्माभिमान विवाह के मूल में यह बात थी कि स्त्री-पुरूष दोनों पूरी तरह समान हैं।”

आंबेडकर का हिंदू कोड़ बिल और विवाह पद्धति

डॉ. आंबेडकर ने हिंदू कोड़ बिल (5 फरवरी 1951) में ब्राह्मणवादी विवाह पद्धति को पूरी तरह से तोड़ देने का कानूनी प्रावधान प्रस्तुत किया। इसके तहत उन्होंने यह प्रस्ताव किया था कि कोई भी बालिग लड़का-लड़की बिना अभिवावकों की अनुमति के आपसी सहमति से विवाह कर सकता है। इस बिल में लड़का-लड़की दोनों को समान माना गया था। इस बिल का मानना था कि विवाह कोई जन्म भर का बंधन नहीं है, तलाक लेकर पति-पत्नी एक दूसरे से अलग हो सकते हैं। विवाह में जाति की कोई भूमिका नहीं होगी। कोई किसी भी जाति के लड़के या लड़की से शादी कर सकता है। शादी में जाति  या अभिवावकों की अनुमति की कोई भूमिका नहीं होगी। शादी पूरी तरह से दो लोगों के बीच का निजी मामला है। इस बिल में डॉ. आंबेडकर ने लड़कियों को सम्पत्ति में भी अधिकार दिया था।

आंबेडकर के आदर्श के अनुरूप एक शादी समारोह की तस्वीर

हम सभी परिचित हैं कि हिंदू कोड़ बिल को  ब्राह्मणवादियों ने पास नहीं होने दिया। इस बिल के बारे में कहा गया कि

यह बिल हिंदू धर्म, संस्कृति और परिवार व्यवस्था पर हमला है।

इन तीनों बहुजन नायकों द्वारा प्रस्तुत विवाह पद्धति स्त्री-पुरूष को पूर्ण समानता प्रदान करती है और शादी को दो लोगों के बीच सहमति और समझौते पर आधारित चीज मानती है। जिसमें धर्म, जाति और अभिवावकों की कोई भूमिका नहीं है। इन तीनों विवाह पद्धतियों ने ब्राह्मणवादी पितृसत्ता को कड़ी चुनौती दी।  

(कॉपी संपादन : एफपी डेस्क)


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