प्रोफेसर मकरंद सरकार के संघी एजेंडा लागू करने पर उतारू

शिमला का उच्च अध्ययन संस्थान निरर्थक प्रयोजनों में लगा है। टैगोर मेमोरियल व्याख्यान के तौर पर ऐसा विषय रखा गया है जिसका ना तो उच्च शिक्षा के बौद्धिक समाज से ताल्लुक है और ना ही समाज के यथार्थ से। ये व्याख्यान 14 नवंबर को दिल्ली में है। फारवर्ड प्रेस की रिपोर्ट :

‘पावन का पुनर्वास’ पर व्याख्यान देंगे रमेश चंद्र शाह

भारतीय उच्‍च अध्‍ययन संस्‍थान शिमला (आईआईएएस) ने गहन सामाजिक, शैक्षणिक और ज्वलंत सामयिक विषयों पर मौलिक सोच देने और बनाने जैसे अपने मकसद को तिलांजलि दे दी है। वह दिन-ब-दिन ऐसे विषयों और पद्धतियों की ओर जा रहा है जो शैक्षणिक शोध के लिए ना तो उपयुक्‍त माहौल प्रदान करने की प्रेरणा बन सकते हैं और ना ही संस्थान की परंपरा के अनुरूप सामाजिक प्रासंगिकता के कोई विश्‍लेषण तैयार करने में सक्षम हैं। इसका एक ताजा उदाहरण है रवींद्रनाथ टैगोर की 150 वीं जयंती पर टैगोर मेमोरियल व्याख्यान का विषय।

संस्थान की एक विज्ञप्ति के अनुसार, इस साल टैगोर मेमोरियल लेक्चर में प्रसिद्ध कवि और लेखक रमेश चंद्र शाह “पावन का पुनर्वास: स्वधर्म और कालगति” विषय पर व्याख्यान देंगे। यह कार्यक्रम 14 नवंबर 2018 की शाम को नयी दिल्ली के इंडिया इंटरनेशनल सेंटर में कमला देवी परिसर, मैक्स मूलर मार्ग में आयोजित किया गया है। रमेश चंद्र शाह हिंदी के प्रसिद्ध लेखक और चिंतक हैं और 2014 में पद्मश्री पुरस्कार से सम्मानित हैं।

उच्च अध्ययन संस्थान शिमला

लेकिन सवाल विषय के चयन को लेकर है। यानी ऐसा विषय जिसकी मौजूदा सामाजिक संदर्भों में किसी तरह की प्रासंगिकता नहीं है और ना ही यह उम्मीद की जाती है कि कोई साहित्यकार धार्मिक और आध्यात्मिक किस्म के विषय को लेकर उच्च विचारों का संवाहक बने जबकि रचनाकार का मूल अपनी साहित्यिक दृष्टि से समाज में गायब होती संवेदना और संघर्ष की अनुपस्थिति, लगातार खत्म होते जीवन मूल्यों जैसी चीजों के लिए दृष्टि देने का है। पावन यानी पूजनीय या पवित्र चीजों का विस्थापन कुछ वैसा ही विषय है जैसा कि हाल में ही संस्थान के विंटर स्कूल ने देशभर के स्कालर्स को ‘राष्ट्रधर्म’ और धर्म संबंधी दीन दयाल उपाध्याय की अवधारणा के इर्दगिर्द 15 दिवसीय एक विशेष आयोजन रखने की घोषणा की। इसमें दीनदयाल की धर्म संबंधी व्याख्या को महात्मा गांधी और भीमराम आंबेडकर के साथ हेडगेवार और अन्य संघ विचारकों के अक्स में परखने के लिए की-नोट्स में ‘आग्रह’ किया गया है। इस संबंध में शिमला उच्च अध्ययन संस्थान को जरूर अपने रुख को बताना होगा।

‘पावन का पुनर्वास’, कौन क्या समझता है

बात करते हैं ‘पावन का पुनर्वास’ की, इसे संस्थान ने ‘रिहैबिलेशन ऑफ सेक्रिड’ नाम दिया है। क्या हम जानते हैं कि समाज और लेखक, अध्ययन के संसार से क्या-क्या अच्छा और पावन है जो विस्थापित हो गया जिसका विस्थापन हो रहा है और वह सबसे दूर हो गया। हाल में हरिद्वार में ज्ञानकुंभ नाम से कार्यक्रम हुआ जिसमें देश के 131 विश्वविद्लायलयों के कुलपति और सैंकड़ों विश्वविद्यालयी प्राध्यापकों और शोधार्थियों ने पतंजलि परिसर में बाबा रामदेव और उनके सहयोगी आचार्य बालकृष्ण नाम के मुख्य वक्ताओं के जरिए बताया गया कि उच्च शिक्षा कैसी होनी चाहिए। यह कोई प्राइवेट कंपनी के लोग नहीं थे, बल्कि यहां यूजीसी के चेयरमैन के भी पहुंचे थे और मंच पर केंद्रीय मानव संसाधन विकास मंत्री प्रकाश जावड़ेकर और वहां के मुख्यमंत्री का होना स्वाभाविक था। वह राजनीति से आया नया ज्ञानकुंभ है। राजनीति का जितना कुछ बुरा है, वह शिक्षा के पावन में घुस गया, यह इसका बड़ा उदाहरण दिखा। क्या उच्च अध्ययन संस्थान शिमला इस पावन के नष्ट होने की बात कर रहा है? पावन तो नष्ट और विस्थापित नहीं हुआ बल्कि उसमें घुसपैठ बढ़ गई, यह जानने की जरूरत है।

प्रो. मकरंद परांजपे

दरअसल ‘पावन का पुनर्वास’ एक शुद्ध धार्मिक और आत्मिक अभिव्यक्ति है जो स्वधर्म से खुद ही जुड़ जाती है क्योंकि इसका दायरा सीमित है भले ही इसे धार्मिक या वैचारिक स्तर पर अपने दौर यानी कालखंड से जोड़ दिया जाता है। धर्म उसमें खुद एक टैग की तरह लग जाए तो मौजूदा सत्ता को उसमें अपना आईना और अपनी पैठ दिख जाती है।

अवधारणाएं ध्वस्त की जा रही हैं- प्रोफेसर सतीश देशपांडे

दिल्ली विश्वविद्यालय के प्राध्यापक प्रो. सतीश देशपांडे का कहना है, “उच्च शिक्षा सबसे कठिन दौर में है, वह अपनी पावन राह से भटक गई है। यूनिवर्सिटी खंडहर बनते जा रहे हैं। पूरी उच्च शिक्षा बदहाल है। सारी धारणाएं, अवधारणाएं एक-एक कर ध्वस्त की जा रही हैं। विश्वविद्यालय पतन की राह पर है। देश में उच्च शिक्षा को आम जनों से दूर किया जा रहा है। विश्वविद्यालय को बेकार की चीजें सिखाने में लगाया जा रहा है। पश्चिमी देशों में आधुनिक विश्वविद्यालयों को विवेक और ज्ञान के निर्माण के लिए स्थापित किया गया था। यहां विश्वविद्यालय स्वायत्त संस्थान की भूमिका में रहे क्योंकि वहां विवेक का निर्माण किया जाता था। यहां सैद्धांतिक स्वायत्तता तो थी लेकिन सांस्थानिक स्वायत्तता राज्य सत्ता में केंद्रित थी। दूसरी धारणा वी.एफ. हुम्बोल्ट और अन्य के द्वारा संस्कृतिनिष्ठ विश्वविद्यालय पर केंद्रित थी। यहां विश्वविद्यालय धर्मसत्ता से राज्य सत्ता तक पहुंचने में माध्यम बने। अध्यापन और शोध का मिश्रण हुआ और कई संकायों की रचना हुई लेकिन वर्तमान परिदृश्य पूरी तरह बदल गया है। वह दिन दूर नहीं जब देश का साधारण से साधारण व्यक्ति अपने बच्चे को सरकारी विश्वविद्यालय में पढ़ाना नहीं चाहेगा। इससे बचने के लिए हमें विश्वविद्यालय के नए प्रतिमान गढ़ने होंगे।”

क्या प्रोफेसर मकरंद बदल रहे हैं संस्थान का चरित्र?

दरअसल इस साल अगस्त में अध्ययन संस्थान में मानव संसाधन मंत्रालय ने जेएनयू के अंग्रेजी के प्रोफेसर मकरंद आर. परांजपे को निदेशक के रूप में नियुक्ति की थी। उनके आते ही संस्थान कुछ ऐसी ‘गतिविधियों’ को अंजाम देने लग लग गया जो इस अध्ययन संस्थान के प्रतिष्ठा के विपरीत हैं। आरोप हैं कि उन्होंने इस संस्थान को सरकार के बौद्धिक एजेंट के तौर पर खड़ा करने में कोई कोर कसर नहीं छोड़ी है। वरना इस संस्थान का इतिहास बताता है कि यहां भीष्म साहनी से लेकर देश के अपने क्षेत्रों के शीर्ष बौद्धिक और प्रगतिशील लोग संस्थान से जुड़े रहे हैं। कहते हैं प्रोफेसर मकरंद सेंट स्टीफन कॉलेज नई दिल्ली से पढ़े हैं। इन्होंने इलिनोइस विश्वविद्यालय से अंग्रेजी में पीएचडी की डिग्री हासिल की। वे कार्लेटन विश्वविद्यालय, आयोवा, टेक्सास-ऑस्टिन विश्वविद्यालय, बॉल स्टेट यूनिवर्सिटी, साओ पाओलो यूनिवर्सिटी, फेडरल यूनिवर्सिटी ऑफ मिनस गेरियस, मर्डोक यूनिवर्सिटी, स्वायत्त समेत कई संस्थानों में विजिटिंग फेलो रहे हैं। इसके अलावा वे खुद एक आलोचक, कवि, उपन्यासकार, लघु कथा लेखक, साहित्यिक स्तंभकार और समीक्षक भी हैं। उन्होंने 25 किताबें लिखी हैं। लेकिन जेएनयू में उनकी पहचान आरएसएस के नजदीकी लोगों में होती रही है।

‘व्याख्यान’ एक अहम सालाना कार्यक्रम

टैगोर मेमोरियल व्याख्यान संस्थान का सालाना प्रोग्राम है। यह एक राष्ट्रीय महत्व का कार्यक्रम माना जाता है। उच्च अध्ययन संस्थान शिमला जीवन तथा विचार संबंधी मौलिक विषयों एवं समस्‍याओं के बारे में विद्धानों के लिए नि:शुल्‍क एवं सृजनात्‍मक अन्‍वेषण के लिए बना एक आवासीय केन्‍द्र है। अध्‍ययन संस्‍थान की स्‍थापना वर्ष 1965 में सोसाइटी पंजीकरण अधिनियम, 1860 के तहत की गई थी और यह राष्‍ट्रपति निवास नाम से भी विख्यात है। अध्ययन के अलावा यह राष्‍ट्रीय सेमिनार, लेक्‍चर, संगोष्ठियां, सम्‍मेलन आदि का भी आयोजन करता है। साथ ही व्याख्‍यान देने अथवा शोध संचालित करने के लिए भारत तथा विदेश से अतिथि प्रोफेसरों तथा अतिथि अध्‍येताओं को आमंत्रित करता है। संस्थान की हर दो साल में ‘समरहिल’ नाम से एक अकादमिक समीक्षा पत्रिका निकलती है। इसी तरह ‘स्ट्डीज इन ह्यूमेनिटीज़ एंड सोशल साइन्सेज़’ पत्रिका साल में दो बार प्रकाशित होती है।

रमेश चंद्र शाह

कौन हैं रमेश चंद्र शाह?

1937 में उत्तराखंड के अल्मोड़ा में एक नितांत ब्राह्मण परिवार में जन्मे रमेश चंद्र शाह भोपाल के सरकारी कॉलेज से अंग्रेजी के विभागाध्यक्ष पद से रिटायर होने के बाद आजकल इसी शहर में रहते हैं। उनको पद्मश्री के अलावा केके बिड़ला फाउंडेशन का व्यास सम्मान भी मिल चुका है। ‘गोबरगणेश’, ‘किस्सा गुलाम’, ‘पूर्वापर’, ‘आखिरी दिन’, ‘पुनर्वास’ तथा ‘आप कहीं नहीं रहते विभूति बाबू’ उनके उपन्यास हैं। ‘जंगल में आग’, ‘मुहल्ले का रावण’, ‘मानपत्र’, ‘थिएटर’, उनके कहानी संग्रह हैं। इसके अलावा वह कविता, निबंध और यात्रा-संस्मरणों के साथ-साथ ‘छायावाद की प्रासंगिकता’, ‘समानांतर’, ‘सबद निरंतर’, ‘जयशंकर प्रसाद’, ‘आलोचना का पक्ष’, ‘समय संवादी’ जैसी समालोचना पुस्तकों के लेखक हैं। स्वधर्म और कालखंड पर भी वह काफी लिख चुके हैं लेकिन वह छायावाद से लेकर भारत में पिछली सदी के अंतिम दशक के आर्थिक उदारवाद से बाहर नहीं आए, आज के समय की उस दृष्टि में कोई कल्पना भी नहीं है। यह विषय महज उनकी वरिष्ठता को देखकर दिया गया लगता है नहीं तो मौजूदा समय में इस विषय की महत्ता सिर्फ सरकार के स्तर पर उसके चरित्र से मेल करने की हद में है, इसके अलावा यह पूरा प्रयोजन निरर्थक है। बौद्धिक स्तर पर भी और समाज की मौजूदा दशा-दिशा और यथार्थ के परखने तक भी।    

(कॉपी संपादन : एफपी डेस्क)


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