तालिबानी पितृसत्ता से नफरत और ब्राह्मणवादी पितृसत्ता से प्रेम क्यों?

ट्विटर के सीईओ जैक डोरसे की आलोचना करने वाले वही हैं जो सबरीमाला मंदिर में माहवारी महिलाओं के प्रवेश पर प्रतिबंध के समर्थक हैं। आखिर पुरूष का शुक्राणु पवित्र और महिलाओं का अंडाणु अपवित्र क्यों? एक तरफ तालिबानी पितृसत्ता का विरोध और दूसरी ब्राह्मणवादी पितृसत्ता से प्रेम। कांचा आयलैया शेफर्ड का विश्लेषण :

कुछ भारतीय पत्रकारों और दलित-बहुजन महिला कार्यकर्ताओं के साथ खड़े ट्विटर के सीइओ जैक डोरसे ने अपने हाथ में एक पोस्टर क्या उठा लिया और पोस्टर लिए उनका फोटो जैसे ही सामने आया पूरे देश में ब्राह्मणवादी ताकतों ने हंगामा मचा दिया। यह भाजपा और आरएसएस के मंचों से जोर-शोर से किया जा रहा है। पोस्टर पर लिखा है- ‘ब्राह्मणवादी पितृसत्ता को ध्वस्त करो!’ केंद्रीय मंत्री राजनाथ सिंह और राज्यवर्द्धन सिंह राठौर के अलावा टी. वी. मोहनदास पाई और अन्य लोगों ने इसे भयानक मुद्दा बना दिया और कुछ लोगों ने इस अवसर का इस्तेमाल पत्रकारों और कार्यकर्ताओं को डराने-धमकाने के लिए किया।

इस पोस्टर को, जो कुछ सबरीमाला में हो रहा है, उसकी पृष्ठभूमि में जरूर देखा जाना चाहिए। 10 वर्ष से 50 वर्ष की महिलाओं के इस मंदिर में प्रवेश के मुद्दे ने दुनिया का ध्यान खींचा है। यह वह उम्र है, जिसमें माना जाता है कि महिलाओं को माहवारी होती है। हम सभी जानते हैं कि भाजप-आरएसएस इस मंदिर में इस उम्र की महिलाओं के प्रवेश के विरोध में चल रहे आंदोलन को समर्थन दे रहे हैं। वे यह सबकुछ इसके बाद भी कर रहे हैं, जब सर्वोच्च न्यायालय ने इस उम्र की महिलाओं को भी प्रवेश की इजाजत दे दी है। ये वही लोग हैं, जो तीन तलाक के विरोध में मुस्लिम महिलाओं को गोलबंद कर रहे हैं और उनकी आजादी की बात कर रहे हैं। जबकि सबरीमाला में ब्राह्मणवादी महिलाओं को उनके ही अधिकारों के खिलाफ गोलबंद कर रहे हैं। दुनिया उनके इस दोहरे व्यवहार को नहीं समझेगी?

अमेरिका में रहने वाले दलित मानवाधिकार कार्यकर्ता थेनोमोझी सुंदराराजन द्वारा बनाए गए इसी पोस्टर को लेकर ट्विटर के सीईओ जैक डोरसे की आलोचना कर रहे हैं ब्राह्मणवादी

पश्चिमी दुनिया, जो महिलाओं के अध्यात्मिक अधिकारों के संबंध में ज्यादा उदारवादी छवि रखती है। वह इसे तालिबानी पितृसत्ता के भारतीय संस्करण के रूप में देखती है। तालिबानी पितृसत्ता सार्वजनिक स्थानों पर महिलाओं के शरीर को अन्य पुरूषों से छिपाना चाहती है। यह वही पृष्ठभूमि है, जिसमें मलाला युसुफजई  लड़के और लड़कियों के समान अधिकारों के हिमायती के रूप में पाकिस्तान में उभरी और विश्व भर में महिला एवं पुरूषों के समान अधिकारों के पैरोकार के रूप में सामने आईं।

ब्राह्मणवादी पितृसत्ता भी, माहवारी की आयु वाली महिलाओं को केरल के सबरीमाला मंदिर में प्रवेश करने की अनुमति ने देकर ठीक पाकिस्तान जैसी  भयानक छवि दुनिया के सामने प्रस्तुत कर रही है। पुरूषों के शरीर में पाया जाने वाला वीर्य तो मान्य है, जो एक मानव जीवन के लिए एक बहुत ही अनिवार्य तरल पदार्थ है। इसे धारण करने वाले पुरूष को सभी अधिकार प्राप्त हैं, लेकिन महिला का शरीर जो मासिक धर्म के चलते ही अंडाणु धारण करता है, वह अस्वीकार्य है और उसे पुरूषों के समान अधिकार नहीं प्राप्त है। यह बहुत ही भयानक है। चलिए मान लेते हैं कि डोरसे उस पोस्टर को एक नजरिए से देखता है और पितृसत्ता के इस रूप का विरोध करना चाहता है। तो इसमें गलत क्या है? सबरीमाला में जो कुछ हो रहा है,क्या उसे दुनिया की निगाह से छिपा सकते हैं?

हिदुत्ववादी-ब्राह्मणवादी गिरोह यह सोचता है कि दुनिया को तालिबानी पितृसत्ता से तो घृणा करनी चाहिए, लेकिन ब्राह्मणवादी पितृसत्ता से नहीं। यहां प्रश्न यह है कि क्यों इस तरह की पितृसत्ता को ब्राह्मणवादी पितृसत्ता कहा जाना चाहिए है? क्यों इस पर कभी शूद्र/दलित/आदिवासी पितृसत्ता का ठप्पा नहीं लगा? ऐतिहासिक और अध्यात्मिक तौर पर स्त्री के शरीर के अपवित्रता का सिद्धांत ब्राह्मणों ने गढ़ा है। शूद्रों,दलितों और आदिवासियों की अध्यात्मिक व्यवस्था में स्त्री-पुरूष के बीच इस प्रकार का कोई अध्यात्मिक भेद-भाव नहीं है।  उदाहरण के लिए अयप्पा को लेते हैं। वे आदिवासियों,शूद्रों और दलितों के अराध्य थे और हैं। जो लोग वहां जाते हैं, वे लोग अयप्पा माला और काला वस्त्र पहनते हैं। ब्राह्मण आमतौर पर इसे नहीं पहनते हैं। लेकिन 10 वर्ष से 50 वर्ष की महिलाओं के प्रवेश के विरोध में वे लोग आंदोलन चला रहे हैं, जो भगवा को हिंदू रंग के रूप में स्वीकार करते हैं, लेकिन दलित-बहुजनों के काले रंग को स्वीकार नहीं करते हैं।

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पहले अयप्पा के इस स्थान पर महिलाएं अपने पति, पुत्र और भाईयों के साथ जाती थीं। यह आमतौर पर शूद्रों, दलितों और आदिवासियों में प्रचलन में शामिल था। जब आदिवासी पुजारी को बेदखल करके ब्राह्मणों ने इस मंदिर को अपने हाथ मे ले लिया, उसके बाद माहवारी के उम्र की महिलाओं के प्रवेश रोक की परंपरा शुरू हुई।

प्ले कार्ड के साथ जैक डोरसे व अन्य

जिस तरह सबरीमाला शूद्र, दलित और आदिवासी परंपरा का ब्राह्मणीकरण किया गया, ठीक उसी तरह से तेलंगाना के आदिवासियों के प्रसिद्ध उत्सव सम्मक्का/सरक्का जात्रा की भी करने की कोशिश की गई। विश्व हिंदू परिषद ने उस आदिवासी पुजारी को हटाने की कोशिश की, जो जात्रा के समय शराब पीता था और मांस खाता था। इस आदिवासी पुजारी को हटाकर मंदिर को ब्राह्मण पुजारी को सौंप देने की कोशिश हुई और जात्रा को शाकाहारी स्थल में तब्दील करने का प्रयास किया गया। आरएसएस ने एक ऐसी संरचना तैयार किया है, जिसमें शूद्र, दलित और आदिवासी पूजा स्थलों को हिंदुओं के मंदिर में तब्दील कर दिया जाता है और श्रद्धालुओं पर पिछड़े मूल्यों को थोप देते हैं।

ब्राह्मणवादी पितृसत्ता और शूद्र, दलित और आदिवासी पितृसत्ता में अंतर यह है कि जहां ब्राह्मणवादी पितृसत्ता में सती प्रथा, बाल विवाह और विधवा प्रथा का प्रचलन है, वहीं जिसे मैं  शूद्र, दलित और आदिवासी पितृसत्ता मानता हूं उसमें इन प्रथाओं के लिए कोई स्थान नहीं है।

बहुजन विमर्श को विस्तार देतीं फारवर्ड प्रेस की पुस्तकें

राजा राम मोहन राय, ईश्वरचंद विद्यासागर (बंगाल) गुरुजाडा अप्पाराव और तनगुतुरू प्रकाशम पनटुल्लु (आंध्र प्रदेश) जैसे कुछ लोगों ने ब्राह्मणवादी पितृसत्ता में सुधार करने की कोशिश की। इसके चलते कुछ परिवर्तन भी आया। लेकिन आरएसएस इन सभी सुधारों को खारिज कर रहा है और  हिंदू परंपरा और संस्कृति के सिद्धांतों के नाम पर भारत को इन सुधारों के पहले के युग में ले जा रहा है। आरएसएस भारतीय इस्लाम में सुधार चाहता है। इसके नाम पर तीन तलाक और अन्य इस्लामी परंपराओं का विरोध कर रहा है। जबकि तथाकथित हिंदू समाज को पीछे ले जाना चाहता है। शूद्रों, दलितों और आदिवासियों की संस्कृति और विरासत (उनकी भाषा और पंरपरा) स्त्री-पुरूष के बीच लोकतांत्रिक संबंधों को अभिव्यक्त करती है। ऐसा इसलिए क्योंकि इस समुदाय के स्त्री और पुरूष हजारों वर्षों से खेतों में साथ-साथ काम करते हैं। यह प्रक्रिया हडप्पा की सभ्यता के समय से चल रही है, जो ऋृग्वेद के लिखे जाने या संहिताबद्ध किए जाने से भी 1500 वर्ष पुरानी है। लेकिन जो लोग आरएसएस की विचारधारा के अनुयायी है, वे सिर्फ ब्राह्मणवादी परंपरा और संस्कृति को ही भारतीय परंपरा और संस्कृति मानते हैं। ये लोग उत्पादक कृषि संस्कृति के मूल्य-मान्यताओं को खारिज करते हैं, जो ब्राह्मणवादी परंपरा से ज्यादा पुरानी है।

यद्यपि दोनों संस्कृतियों में पितृसत्ता है, लेकिन ब्राह्मणवादी पितृसत्ता ज्यादा उत्पीड़क और अलोकतांत्रिक है। उदाहरण के लिए शूद्र, दलित और आदिवासी परंपरा में पुनर्विवाह का अधिकार हमेशा महिलाओं को प्राप्त रहा है, लेकिन ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्यों के यहां यह आज भी एक समस्या है। इस पर बहस करने और इसे बदलने की जरूरत है।

सबरीमाला ने दुनिया का ध्यान अपनी ओर खींचा है। भारत और दुनिया के पैमाने पर पितृसत्ता पर बहस हो रही है। जब ये ताकतें दुनिया से तालिबानीकरण का विरोध करने का आह्वान कर रहे हैं, जिसमें प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी भी शामिल हैं, तो कैसे वही लोग विश्व समुदाय को ब्राह्मणवादी पितृसत्ता का विरोध करने से रोक सकते हैं?

(अनुवाद : सिद्धार्थ, कॉपी संपादन : एफपी डेस्क )

(यह लेख अंग्रेजी दैनिक इंडियन एक्सप्रेस के 22 नवंबर 2018 के अंक में प्रकाशित है)


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