‘ठग्स ऑफ हिंदुस्तान’ : करोड़ों गुमनाम बहादुर घुमंतू जातियों के लोगों की दास्तान

आमिर खान और अमिताभ बच्चन द्वारा अभिनित यह फिल्म ‘फिलिप मेडोव टेलर’ द्वारा 1839 में लिखे गए उपन्यास ‘कन्फेशंस ऑफ ए ठग’ पर आधारित है। यह देश के दस करोड़ विमुक्त-धुमंतू जातियों के साहस व शौर्यपूर्ण अतीत का चित्रण करता है, जिन्हें पहले अंग्रेजों ने क्रिमिनल ट्राइब की संज्ञा दी और जो स्वतंत्रता के बाद भी अपनी पहचान और अधिकारों के लिए मारे-मारे फिर रहे हैं। जर्नादन गोंड का लेख :

विमुक्त-धुमंतू जातियों के इतिहास पर बनी है यह फिल्म

बताया जा रहा है कि फिल्म ‘ठग्स ऑफ हिंदुस्तान’ का बजट लगभग 300 करोड़ है। मतलब भारत की मंहगी फिल्म है, जिसे हिंदी, तमिल और तेलुगू में 3डी और आईमेक्स फॉर्मेट में एक साथ पूरी दुनिया में रिलीज किया गया है। निश्चित रूप भारतीय सिनेमा के इतिहास में यह अपने तरह की अनूठी फिल्म है, क्योंकि फिल्म की कहानी ठगों अर्थात ब्रिटिशकाल के ‘एंटी हीरो’ पर आधारित है। एक प्रकार से ‘एंटी हीरो’ में हीरो की तलाश की गई है। जाहिर तौर पर यह आजाद भारत में ही हो सकता है। अंग्रेजों के समय में इस तरह के विषय का चुनाव फिल्म बनाने के लिए नहीं किया जा सकता था। पर यह भी सच है कि जिस समाज को हीरो दिखाया गया है, वह समाज आज भी गुलामों सी जिंदगी जी रहा है।

यशराज की फिल्म है, इसलिए मनोरंजन से कोई समझौता नहीं किया गया है। जांबाज ठगों के जीवन और आचरण को बड़े परदे पर दुनिया ने देखा है। पर विमुक्त-घिमंतू जनजातियों पर इतनी बड़ी फिल्म बनी है, यह कम बड़ी बात नहीं।

रस्सी पर चलकर करतब दिखाती विमुक्त-घुमंतू समुदाय की बच्ची

सबने माना था जांबाजी का लोहा

ऐतिहासिक रूप से प्रमाणित है कि अंग्रेजों की खिलाफत करने वाले आदिवासी, जिन्होंने ब्रिटिश हुकूमत के दांत खट्टे कर दिए थे, को कभी ठग कहा गया, कभी पिंडारी। ये दोनों नाम अंग्रेजों द्वारा दिया गये गये थे (है)। इस आदिवासी समूह को कानून बनाकर अपराधी घोषित कर दिया गया। एक बात यहां स्पष्ट कर दिया जाए कि अपनी सुविधानुसार विमुक्त जनजातियां कहीं हिंदू, कहीं मुसलमान तो कहीं सिख हो गईं। पर सामुदायिकबोध इतना सघन था (है) कि कभी भी सांप्रदायिकता इन पर हावी नहीं हो पाया। इसीलिए पिंडारियों के रूप में ये एक मजबूत इकाई की तरह लंबे समय तक अस्तित्व में रह पाए। एकता और जांबाजी ने विदेशी व्यापारियों का जीना दुश्वार कर दिया था। पिंडारी और ठगों को किंवदंती के रूप में देखा जाने लगा। हजारों खौफनाक कथाएं इनके नाम पर रची गईं। दरअसल भारत के असली गब्बर सिंह यही लोग माने गए। इनका नाम सुनते विदेशी और लूटेरे किस्म के व्यापारियों का खून जम जाया करता था।

‘ठग्स ऑफ हिंदुस्तान’ फिल्म का पोस्टर

1857 के पहले ही पिंडारियों ने कर रखा था अंग्रेजों के नाक में दम

पिंडारियों से गोरी सरकार इतना परेशान हो चुकी थी कि इनके खात्मे के लिए किसी भी हद तक जाने को तैयार हो गई। गोरी गवर्नमेंट ठोस कार्रवाई करना चाहती थी। पिंडारी और ठगों का समूह गोरों की अजेय छवि के सामने चुनौती पेश कर रहा था। बिना उन्हें मिटाए, गोरी श्रेष्ठता स्थापित नहीं हो पा रही थी। लेकिन यह सब इतना आसान नही था। पिंडारियों का देशी रियासतों के साथ राजनीतिक कनेक्शन भी हो चुका था। इन लोगों ने जरूरतमंद राजाओं-महाराजाओं को वीरता की आउटसोर्सिंग करना शुरू कर दिया था। दक्षिण से लेकर मध्य भारत के अलग रियासतों में ये समूह सैन्य सेवायें देने लगे थे। पिंडारी मराठा अजेयता के भी रीढ़ थे। वे मराठा सेना में अवैतनिक सैनिकों के रूप में अपनी सेवा दिया करते थे, जहां विजय प्राप्त होने पर विजय सामग्री से कुछ हिस्सा इनके लिए भी निश्चित कर दिया गया था। अंग्रेजों के अनुसार मराठा सेना के साथ ये लूटमार करने वाले दलों के रूप में हमला करते थे। इनकी वीरता अप्रतिम थी। इसी योग्यता से प्रभावित होकर बाजीराव-प्रथम के समय से इनकी सेवायें मराठा सेना में बाकायदा शुरू हुई। पिंडारियों की सेवा से मराठा सेना अजेय रही। पिंडारियों के दमन और मराठा शक्ति को नष्ट करने के लिए लॉर्ड हेस्टिंग्स ने 1817 में मराठा संघ को नष्ट करने के पूर्व कूटनीति द्वारा पिण्डारी सरदारों में फूट डाल दी तथा संधियों (सहायक संधियों) द्वारा देशी राज्यों से उनके विरुद्ध सहायता ली। गोरी सरकार के सामने घूटना टेकने वाली रियासतें अपने सेना के अभिन्न हिस्से अर्थात पिंडारियों के खिलाफ जासूसी कराने लगीं। हेस्टिंग्स हिसलप के नेतृत्व में बड़ी आसानी से 120,000 सैनिकों तथा 300 तोपों सहित पिंडारियों के इलाक़ो को घेरकर नष्ट कर दिया। हज़ारों पिण्डारी मारे गए, बंदी बने या जंगलों में चले गए। चीतू जैसे वीर और संगठन निर्माता बहादुर पिंडारी को असोरगढ़ के जंगल में चीता ने शिकार बना डाला। वसील मुहम्मद ने कारागार में आत्महत्या कर ली। चीतू की दहशत उस दौर में काफी बढ़ गई थी। गोरे उसके नाम से थर्राते थे। वह जाट परिवार में दिल्ली के निकटवर्ती गाँव में पैदा हुआ था| इसको दोब्बल ख़ाँ ने ग़ुलाम बनाया और बाद में अपना पुत्र बना लिया। इसके बेटे बरुन दुर्राह के सरदार थे। करीम खाँ को गोरखपुर ज़िले में गणेशपुर की जागीर दी गई। इस प्रकार पिंडारियों के संगठन एक-एक कर टूट गए और वे तितर-बितर हो गए। 19वीं सदी के पूर्वार्द्ध में उन्होंने मिर्जापुर, शाहाबाद, निजाम के क्षेत्र आदि पर आक्रमण कर वहां लूटमार मचा दी। लॉर्ड हेसिटंग्स ने पिंडारियों के दमन के लिए सेना भेज दी। यह संघर्ष तृतीय अंग्रेज-मराठा युद्ध में परिवर्तित हो गया।

अंग्रेज सैनिकों द्वारा विमुक्त-घुमंतू जनजाति वर्ग के विद्रोहियों को गिरफ्तार किये जाने को दिखाती एक तस्वीर

विमुक्त-घुमंतू जनजातियों का रिश्ता धर्म से परे का रिश्ता (था) है, जिस तरह वे आज हिंदू, ईसाई और बौद्ध और सिख हैं, उसी तरह से मध्यकाल में भी थे और उसके पश्चात में भी रहे। आज भी इस तरह की स्थिति कहीं-कहीं देखी जाती है। इनमें से अनेक आदिवासी कबीले, कहने के लिए मुसलमान के रूप में जाने जाते थे पर उनका स्वरूप सर्वधर्म समभाव का था।

अंग्रेजों ने कहा – क्रिमिनल ट्राइब

हालांकि यह समूह काफी हद तक अंतरराष्ट्रीय भी था, जिसमें अफगानी नस्ल के लोग भी शामिल थे। लड़ाकू आदिवासी कबीलों को मुगलों और राजपुताना के सेना में हमेशा नौकरी मिलती रहती थी। मुगलों के कमजोर होने पर इनलोगों ने देशी रियासतों का रूख किया। अंग्रेजों के वर्चस्व के कारण धीरे-धीरे रियासतें कमजोर होने लगीं। लिहाजा कई आदिवासी समूहों को जीविकोपार्जन के दूसरे रास्ते देखने पड़े जिसमें खेती, व्यापार, लूटमार से लेकर ठगी तक शामिल रहा। पराजित और रोटी-रोजी में फंसे रहने के कारण इस तबके के समूहों को कभी पीछे मुड़कर देखने का अवसर ही प्राप्त नहीं हुआ। बिगड़ते हालात ने इनके घर की औरतों को देह व्यापार करने तक को मजबूर किया। कंजर, बेंड़नी और सहरिया कुछ ऐसी ही जातियां हैं। इन पर जो कुछ लिखा गया दूसरों के द्वारा लिखा गया। इतिहास का रूख बदलने वाले खुद अपना इतिहास नहीं जानते। अतीत के भारत के लगभग सभी रियासतों के लड़ने वालों के पास आज चूटकी भर जमीन नहीं है। अंग्रेजों को इनसे दिक्कत थी। उन्होंने इनकी पहचान ‘क्रिमिनल ट्राइब’ के रूप में किया। अंग्रेज देश भक्तों को भी फसादी कहा करते थे, परंतु आजादी के बाद देशभक्तों को इनाम-वकराम से नवाजा गया। सरकारी नौकरी में आरक्षण मिली। आदिवासी यहां भी ठगे गए। उनकी पहचान तक न की गई। बात अंग्रेजों की करते हैं, जहां से चले थे, फिर वहीं चलते हैं। ठगों की ओर लौटते हैं। तीन सौ करोड़ी फिल्म की बात करते हुए उस कृति की बात करते हैं, जिस पर यह फिल्म आधारित है।

विमुक्त-घुमंतू जनजातियों के लोगों का रहन-सहन

यह फिल्म ‘फिलिप मेडोव टेलर’ द्वारा 1839 में लिखे गए उपन्यास ‘कन्फेशंस ऑफ ए ठग’ पर आधारित है, जिसने 1970 और 1805 के बीच अंग्रेजों के नाम में दम कर दिया था। उस ठग का नाम अमिर अली था। हालांकि उपन्यास में नाम बदल दिया गया था। यह उपन्यास अपने समय की बेस्ट सेलर रहा और 19वीं सदी के मध्य तक इसका यह सम्मान बना रहा। इसके पाठकों में रानी विक्टोरिया भी शामिल थीं। जिस साल यह उपन्यास छपा उसी साल इसके नायक बेहराम (उपन्यास में अमिर अली कर दिया गया) को फांसी दे दी गयी।

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‘कन्फेशंस ऑफ ए ठग’ की लोकप्रियता से रूडयार्ड किपलिंग भी नहीं बच पाए। उन्होंने कथा स्थल और युद्धरत शक्तियों को बदल दिया। ‘कन्फेशंस ऑफ ए ठग’ में सिर्फ दो शक्तियां थीं- अंग्रेज और ठगों का नेता और उसका गिरोह। परंतु इस उपन्यास में दो बड़ी राजनीतिक शक्तियों को शामिल किया गया – ब्रिटिश शासन और रूस। दो महाशक्तियों के ग्रेट गेम के स्थल के रूप में सेंट्रल एशिया को लिया गया। दो महाशक्तियों की तिजारत में सेंट्रल एशिया के निवासियों के सांस्कृतिक प्रतिरोध को दर्शाते हुए उपन्यास भारत के विविध रंगों को प्रदर्शित करता है, जिसमें यहां के कुछ कबीले इन दोनों महाशक्तियों को सबक सिखाने में कामयाब हो पाते हैं। कहा जाता है कि इस उपन्यास में द्वितीय अफगान युद्ध की छाया है। बीबीसी (2003) के बिग रीड सर्वे में इसे सर्वश्रेष्ठ स्थान प्राप्त हुआ।

गुमनामी का अंधेरा कब छंटेगा?

विमुक्त-घुमंतू आदिवासियों के विषय में मेरी जानकारी का आधार खुद उस तबके के नुमाइंदे रहे। पढाई के दौरान इस तबके के तमाम छात्रों से मुलाकात होती रही। दोस्ती कायम हुईा। उनके यहां आना-जाना शुरू हुआ। उनकी परेशानियों को एकदम नजदीक से देखने और अनुभव करने का अवसर प्राप्त हुआ। इस क्रम में वे मुझे जाने और मैंने उन्हें जानने का प्रयास किया। उनके सपनों में झांकने की कोशिश की, वहां आक्रोश, संघर्ष और उम्मीदों का समंदर लहरा रहा था। तमाम छात्र संविधानिक अधिकारों जैसे, नागरिकता और वोट की मुहिम से जुड़े हुए थे। तमाम संघर्ष के बाद भी बात नहीं बन पा रही थी। ऐसे ही एक दिन भूषण पारधी से मुलाकात हुई। बात-बात में उनकी लड़ाई, जिसे उसके समूह के लोग ‘उम्मीद और रौशनी’ की लड़ाई कहा करते थे, के विषय में पूछ लिया। बहुत मायूसी में आधे से कम जले सिगरेट को घास पर रगड़ते वह बोला, “हम ना समझे थे, बात इतनी सी ,ख्वाब शीशे के, दुनियां पत्थर की” कह कर आसमान को देखने लगा, जहां पानी से भरे नीले बादल तेजी से भागे जा रहे थे। कहीं बरसने की जल्दी थी शायद। बड़े गौर और संजीदगी से उन्हें जाते देखते रहा और बोला, हमारी उम्मीदों के बादल कब बरसेंगे? हम कब तक अपने ही देश में होकर भी नहीं रहेंगे? गुमनामी का अंधेरा कब छंटेगा? इस धरती पर पहचान कब मिलेगी?

शहरों में सड़क किनारे खुले आसमान के नीचे छोटे-मोटे काम करते हैं विमुक्त-घुमंतू जनजातियों के लोग

जैसाकि ऊपर के हिस्से में यह चर्चा की गयी है, यह सवाल भूषण पारधी के अकेले का सवाल नहीं है। देश में लगभग दस करोड़ विमुक्ति-जनजाति समुदाय के लोग यह सवाल कर रहे हैं। सवाल को हल करने में कई पीढ़ियां तबाह हो गईं। स्वाधीनता से लेकर आज तक न जान कितनों को उस सजा के रूप में मौत के घाट उतार दिया गया, जिसे उन्होनें कभी किया ही नहीं, परंतु एक खास समुदाय के होने के नाते उन्हें अपराधी मान लिया गया (जाता है) और सजा मुकर्रर कर दिया गया। आज की पीढ़ियां न खाली सरकार से बल्कि इतिहास से हिसाब मांग रही हैं। आदिवासियों के साथ अन्याय का ऐतिहासिक रिकार्ड है, कहीं – कहीं अन्यास के फोड़ों पर मरहम भी लगाया गया परंतु विमुक्ति-घुमंतू जनजातियों के साथ भूल सुधार संविधान लागू होने के बाद भी न हो सका।

संविधान सन 1950 में लागू हो गया, जिसके साथ ही गणतंत्र की स्थापना का अनुष्ठान भी पूरा हो गया। इस उपलब्धि पर डॉ. आंबेडकर ने कहा, ‘जनतंत्र का सार एक मनुष्य, एक मूल्य के सिद्धांत में निहित है। खेद है कि जनतंत्र के राजनीतिक ढांचे ने ‘एक मनुष्य-एक वोट’ के सिद्धांत को अपनाया है।’[1]

12 साल के बच्चों तक को देनी पड़ती थी थाने में हाजिरी

बाबा साहेब बड़ी बात कह रहे थे। वे ‘एक मनुष्य-एक वोट’ के सिद्धांत से संतुष्ट नहीं थे। वे इसके अधूरेपन को समझ रहे थे। मनुष्य की पहचान एक वोट तक में महदूद हो जाने से वे दुखी थे। पर उस समय और आज भी ऐसे कई करोड़ लोग हैं, जिन्हें वोट देने तक का अधिकार नहीं मिल पाया है। आजादी उनके लिए एक सारहीन संज्ञा से अधिक नहीं है। वे आज भी वैसे ही जी रहे हैं, जैसे ब्रिटिशकाल में जी रहे थे। आज भी उन्हें उतने ही संदेह से देखा जाता है, जितना गुलामी के दौर में। विमुक्त-घुमंतू जनजातियों की यह आबादी, जितना बदहाल पहले थे उतने ही आज भी हैं। आज भी वे जन्मजात अपराधी मान लिए जाते हैं। इस समाज में पैदा होते ही बच्चों की शिनाख्त अपराधी के रूप में की जाती है। इस विडंबना पर रमणिका गुप्ता कहती हैं, “अंग्रेजों के समय में उन्हें जन्मजात अपराधी घोषित करके तार के बाड़ों से घेरकर रहने के लिए मजबूर कर दिया गया था। इनके बच्चों को जन्मते अपराधी का सर्टिफिकेट दे दिया जाता है। 12 साल के बच्चे तक को हर रोज थाने में हाजिरी देनी पड़ती थी।“[2]

बहुजन विमर्श को विस्तार देतीं फारवर्ड प्रेस की पुस्तकें

अंग्रेजों ने इनके रहवास को एक बेड़े से घिरवा दिया था, जिसे टांडा कहा जाता था। बिना पुलिस की अनुमति के ये लोग घेरे के बाहर नहीं जा सकते थे। टांडे तीन प्रकार के होते थे – साधारण अपराधियों के घेरे वाला एक तार वाला टांडा। बड़े चोरों, या अपराधियों वाला दो तार वाला टांडा। संगीन अपराध को अंजाम देने वाले, जिन्हें डकैत कहा जाता के लिए तीन तार वाला टांडा। पहली श्रेणी को दिन में एक बार, दूसरी श्रेणी को दो बार और तीसरी श्रेणी तीन बार थाने में हाजिरी देनी होती थी। इतना सब होने के बाद भी अंग्रेजों ने घेरों में शिक्षा, स्वास्थ्य की सारी व्यवस्था कर दी थी, जो ‘हैबिटाट ऐक्ट ऑफ इंडिया’ के पारित होने के बाद ये सुविधाएं भी 1952 में छीन ली गईं। देश के अन्य आदिवासी समूहों की तरह विमुक्ति-घुमंतू जनजातियों का गौरवपूर्ण योगदान इस देश के इतिहास से अमिट रूप से जुड़ा हुआ है।

सन् 1857 की आजादी की लड़ाई में यही बंजारे थे, जो गधों पर हथियार लादकर क्रांतिकारियों को पहुंचाते थे। ये बंजारे ही हैं जो फ्रांस, यूगोस्लोविया तथा यूरोप के अन्य देशों में माल पहुंचाने के बाद भी गोरबोली भाषा और अपने पहनावे को बरकरार रखे हुए हैं। दिल्ली का राष्ट्रपति भवन और गुरुद्वारा रकाबगंज, लखीशाह बंजारे की जमीन पर स्थित है। आज बंजारों के नाम पर एक कट्ठा जमीन भी दर्ज नहीं।[3]

विडंबनाएं कई हैं। सूरजपाल नांगिया सांसी जाति के होने पर अफसोस जताते कहते हैं, ‘हमारा देश 1947 में आजाद हुआ था और 31 अगस्त 1952 में यानि पांच साल सोलह दिन तक हम अपने ही देश में रहकर गुलामी की जिंदगी जीते रहे और आज हमें आजाद हुए 50 साल हो गए हैं, तब भी हम गुलाम हैं।‘[4] 

2006 में बना बालकृष्ण रेणके आयोग

इसी विडंबना पर बोलते हुए वे आगे कहते हैं, ‘अगर ऐसा ही चलता रहा तो शायद यह गुलामी आगे भी हमें हमेशा झेलनी पड़ेगी।’[5] हालांकि केंद्र की सरकार ने 2006 में इनके कल्याण के लिए बालकृष्ण रेणके आयोग का गठन किया था, जिसे राष्ट्रीय विमुक्त/घूमंतू/अर्धघूमंतू जनजाति आयोग कहा गया था। आयोग ने 2008 में केंद्र सरकार को अपनी रिपोर्ट सौंप दी थी। छह वर्ष तक उस पर कोई कार्रर्वाई नहीं की गयी। बालकृष्ण आयोग ने विमुक्त/घूमंतू/अर्द्ध घूमंतू जनजातियों के लिए 72 अनुशंसाएं की थी, जिनमें से प्रमुख थीं:

  1. शिक्षा और नौकरी में अलग से 10% आरक्षण
  2. अलग बजट प्रावधान
  3. विमुक्त घुमंतू जातियों का पृथक मंत्रालय
  4. विमुक्त घुमंतू जातियों का स्थायी आयोग बनाया जाए
  5. विमुक्त जातियों के लिए आवासीय (बोर्डिंग) स्कूल खोले जाएं
  6. रहने के लिए जमीन तथा मकान बना कर दिए जाएं

आज तक इस आयोग की अनुसंशाएं धूल फांक रही हैं। केंद्र सरकार ने 2015 में इस समुदाय को समाज की मुख्यधारा में लाने के लिए केन्द्र सरकार ने विमुक्त और खानाबदोश जनजातियों के लिए आयोग का गठन किया है। इसकी प्रमुख बातें इस प्रकार हैं –

  1. यह आयोग तीन वर्ष की अवधि के लिए होगा।
  2. इस आयोग की संदर्भ शर्तों में विमुक्त और खानाबदोश जनजातियों से संबद्ध जातियों की राज्यवार सूची तैयार करना तथा विमुक्त और खानाबदोश जनजातियों के लिए केन्द्र सरकार अथवा राज्य सरकार द्वारा किए जाने वाले उचित उपाय सुझाना शामिल है।
  3. इस आयोग में एक अध्यक्ष, एक सदस्य और एक सदस्य सचिव होगा।
  4. सरकार ने विमुक्त और खानाबदोश जनजातियों के राष्ट्रीय आयोग के अध्यक्ष के रूप में भीखू रामजी इदाते और सदस्य सचिव के रूप में श्रवण सिंह राठौर की नियुक्ति की है।

जैसाकि ऊपर की पंक्तियों में दिया गया है कि ब्रिटिश शासन के दौरान बहुत सारी लड़ाकू जनजातियाँ कों क्रिमिनल ट्राइब्स यानी आपराधिक जनजाति के रूप में सूचीबद्ध किया गया था, जिसके माध्यम से उनको मारना, मिटाना और सजा देना आसान हो गया था। अंग्रेज सरकार यहीं नहीं रूकी आगे बढ़कर वह 1871 में एक नया कानून क्रिमिनल ट्राइब्स एक्ट ले आई, जिसके दायरे में उन आदिवासी जातियों को भी ले लिया गया, जो किंचित अर्थ में उनके लिए मुश्किलें पेश कर रही थीं। अब यह संख्या लगभग 500 हो गया। हालांकि 1952 में इन घुमंतू जनजातियों को विमुक्त कर दिया गया; तब से ये आपराधिक जनजातियां नहीं कहलाती और इन्हें विमुक्त-जनजाति के नाम से जाना जाने लगा। पर खाली नाम में बदलाव हुआ। स्थितियां जैसी की तैसी बनी रहीं।

महाराष्ट्र में पाधरी लोगों को तो गांव के लोग तीन दिन से ज्यादा गांव के बगल में पेड़ के नीचे या समतल में, तंबू गाड़कर रहने भी नहीं देते। कोई पारधी मर जाए तो कब्रगाह या श्मशान घाट में उसका मुर्दा गाड़ने व जलाने की इजाजत भी इन्हें नहीं है। गांव के लोगों को भय से अपने मुर्दे को जंगल में फेंक आते हैं।[6]

खुले आसमान के नीचे बंजारा समुदाय के वृद्ध दंपत्ति। बंजारा समुदाय विमुक्त-घुमंतू जनजातियों में शामिल हैं

स्वाधीनता संग्राम के इतिहास को सरसरी निगाह से देख भर लेने से इस समुदाय के कई उज्ज्वल पहलुओं का बोध होता है। इस समूह के कई बलिदानों का पता चलता है। ज्ञात होता है कि यह आदिम समूह मुख्यधारा की सामाजिक संरचना का हिस्सा था। ट्रांसपोर्टेशन से लेकर मनोरंजन और चिकित्सा से लेकर सूचनाओं तक के लिए समाज इन जनजातियों पर निर्भर था। बंजारे, गाड़िया लोहार, बावरिया, नट, कालबेलिया, भोपा, सिकलीगर, सिंगीवाल, कुचबंदा, कलंदर आदि सभी समाज का अभिन्न हिस्सा थे।[7]

घुमंतू जनजाति के लोगों का पेशा

उपलब्ध पुराने दस्तावेजों से पता चलता है कि ये समुदाय बाद मध्यकाल के अंतिम चरणों में मुख्यधार के लिए कई दुरूह कार्य करने लगा था। संपर्क सहजता का रूप लेता जा रहा था। इन तमाम घुमंतू जनजातियों और इनके पारंपरिक व्यवसायों के बारे में जो जानकारी मिलती है, उसके अनुसार ‘बंजारे’ पशुओं पर माल ढोने (मुख्यतः नमक और मुल्तानी मिट्टी) का काम किया करते थे; ‘गाड़िया लोहार’ जगह-जगह जाकर औजार बनाते और बेचते थे; ‘बावारिये’ जानवरों का शिकार और उनके अंगों का व्यापार करते थे; ‘नट’ नृत्य और करतब दिखाते थे; ‘कालबेलिया’ (सपेरा) सांपों का खेल दिखाते थे; ‘भोपा’ स्थानीय देवताओं के आख्यान गाते थे; ‘सिकलीगर’ हथियारों में धार लगाते थे; ‘सिंगीवाल’ हिरन के टूटे हुए सींग से लोगों का इलाज करते थे और इन्हें प्राकृतिक औषधियों का ज्ञाता समझा जाता था; ‘कुचबंदा’ मिट्टी के खिलौने बनाते थे; ‘कलंदर’ भालुओं और बंदरों से करतब दिखाते थे; ‘ओढ’ नहर बनाने और जमीन को समतल करने का काम करते थे; ‘जागा’ लोगों की कई पीढ़ियों का ब्यौरा रखते थे और जजमानी में जगह-जगह जाते थे; ‘बहरूपिये’ और ‘बाज़ीगर’ हाथ की सफाई दिखाकर लोगों का मनोरंजन करते थे।”[8]

लोकतंत्र को अर्थवान और परिपूर्ण होने के लिए जिस सामाजिक जागरूकता को लाना हैं, उसमें पीछे छूटे समुदायों की बेहतरी का प्रयास पहले स्थान पर है। इसे लाए बिना समतामूलक समाज नहीं बनाया जा सकता है। विमुक्त-घूमंतु जातियां ऐसी ही वंचित जातियां हैं। स्वाधीनता संग्राम से लेकर अंग्रेजों के जाने तक यह जाति गोरी सरकार से मोर्चा लेती रही। आजाद के बाद अगर इस समुदाय को आजादी, नागरिकता, मतदान और विकास तक का अहसास तक नहीं हो पाया है, तो इससे बुरी बात क्या हो सकती है?

(कॉपी संपादन : एफपी डेस्क)

[1] विमुक्त – घुमंतू: भारत के नहीं बन सकते हैं, विमुक्त-घुमंतू आदिवासियों का मुक्ति-संघर्ष, पृ.9, संपादक – रमणिका गुप्ता, सामयिक प्रकाशन, सं. 2016

[2] विमुक्त – घुमंतू: भारत के नहीं बन सकते हैं, विमुक्त-घुमंतू आदिवासियों का मुक्ति-संघर्ष, पृ.9, संपादक – रमणिका गुप्ता, सामयिक प्रकाशन, सं. 2016

[3] विमुक्त – घुमंतू: भारत के नहीं बन सकते हैं, विमुक्त-घुमंतू आदिवासियों का मुक्ति-संघर्ष, पृ.10, संपादक – रमणिका गुप्ता, सामयिक प्रकाशन, सं. 2016

[4] सांसी होना जुर्म है, सूरजपाल नांगिया, पृ 82 विमुक्त-घुमंतू आदिवासियों का मुक्ति-संघर्ष, पृ.82, संपादक – रमणिका गुप्ता, सामयिक प्रकाशन, सं. 2016

[5] सांसी होना जुर्म है, सूरजपाल नांगिया, पृ 82, विमुक्त-घुमंतू आदिवासियों का मुक्ति-संघर्ष, संपादक – रमणिका गुप्ता, सामयिक प्रकाशन, सं. 2016

[6] विमुक्त-घुमंतू : भारत के नागरिक नहीं बन सकते हैं, रमणिका गुप्ता,विमुक्त-घुमंतू आदिवासियों का मुक्ति – संघर्ष, संपादक रमणिका गुप्ता, सामयिक प्रकाशन, नई दिल्ली, पृ.12, संस्करण 2016

[7] घुमंतू जनजातियां : अभिन्न रहा हमारे समाज का हिस्सा जिसे अपराधी बनाने के दोषी हम ही हैं, राहुल कोटियाल, सत्याग्रह, 17 अगस्त 2016, सत्याग्रह, राहुल कोटियाल

[8] घुमंतू जनजातियां : अभिन्न रहा हमारे समाज का हिस्सा जिसे अपराधी बनाने के दोषी हम ही हैं, राहुल कोटियाल, सत्याग्रह, 17 अगस्त 2016


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