उच्च शिक्षा आयोग अकादमिक विकास और विविधता को कुचल देगा : आनंद कृष्णन

यूजीसी की जगह एचईसीआई की तैयारी है। मसौदा देशभर के विश्वविद्यालयों और अन्य यूजीसी फंडेड संस्थानों में भेजा गया है कि वो करार पर दस्तखत करें। इससे विश्वविद्यालयों की स्वायत्तता छिनेगी और यूजीसी की जगह कर्ज देने वाला बैंक खड़ा हो जाएगा। सरकार की इस पहल का प्राख्यात शिक्षाविद आनंद कृष्णन ने विरोध किया है। फारवर्ड प्रेस की खबर :

[सरकार ने विश्वविद्यालय अनुदान आयोग को खत्म कर ‘हायर एजुकेशन कमीशन ऑफ इंडिया’ के नाम से एक नई संस्था बनाने जा रही है।

नई संस्था के पक्ष और विपक्ष में अनेक तर्क दिए जा रहे हैं। कुछ अकादमिशयनों को इससे उच्च-शिक्षा में व्याप्त अनियमितता के दूर होने व गुणवत्ता में बढ़ोतरी की उम्मीद है, वहीं अनेक इसे शिक्षा का सरकारी-बाजारीकरण बता रहे हैं। दलित-बहुजन पक्षधरता के साथ काम करने वाले कुछ लोगों का मत है कि यूजीसी जैसी संस्थाओं को अधिक अधिकार दिए जाने का अर्थ द्विज वर्चस्व कायम करने की आजादी से अधिक कुछ नहीं रहा है। इससे न तो गुणवत्ता पूर्ण शोध हासिल की जा सकी, न ही विश्व के शिक्षा-पटल पर हम अपना कोई स्थान बना सके। स्वायत्तता के नाम पर उच्च अध्ययन संस्थानों ने अपने परिसरों में सामाजिक-विविधता के लिए प्रवेश निषेध का बोर्ड लगाए रखा। संसद के हस्तक्षेप से उच्च शिक्षा के क्षेत्र में देश की सबसे विशाल आबादी– अन्य पिछड़ा वर्ग –का प्रवेश तो हुआ है, लेकिन आज भी उन्हें इससे बाहर रखने के लिए असंख्य स्तरों की रोक बरकरार है। हालांकि, इस मत के विपरीत दलित-बहुजन धारा के अनेक बुद्धिजीवियों को भय है कि कहीं इससे शिक्षा के भगवाकरण को तो बढ़ावा नहीं मिलेगा।

हम ‘हायर एजुकेशन कमीशन ऑफ इंडिया’ को केंद्र में रखकर इन्हीं मुद्दों पर बहस आमंत्रित कर रहे हैं। अगर आप इस विषय पर कुछ सोच-विचार रहे हैं, तो कृपया हमें अपने सुचिंतित लेख प्रकाशनार्थ इस ईमेल पर भेजें : editor@forwardpress.in  – प्रबंध संपादक ]


पूर्णतया छिन जाएंगी विश्वविद्यालय व अन्य उच्च शिक्षण संस्थानों में गठित अकादमिक बोर्डों की स्वतंत्रता

  • कमल चंद्रवंशी

आईआईटी, कानपुर और मद्रास स्कूल ऑफ डेवलपमेंट स्टडीज (एमआईडीएस) के पूर्व अध्यक्ष और प्रसिद्ध  शिक्षाविद डॉ. एम. आनंद कृष्णन का कहना है कि “प्रस्तावित उच्च शिक्षा आयोग (एचईसीआई) देश के शिक्षाविदों और अकादमिक जगत की शक्तियों को महज प्रशासकों को सौंपने की कवायद के अलावा कुछ नहीं है।”

अन्ना यूनिवर्सिटी के पूर्व वीसी व नागरिक सम्मान पद्मश्री से सम्मानित प्रोफेसर आनंद कृष्णन पिछले दिनों चेन्नई में हायर एजुकेशन कमीशन ऑफ इंडिया को लेकर आयोजित एक कार्यक्रम को संबोधित कर रहे थे। इस मौके पर उन्होंने विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी) और प्रस्तावित उच्च शिक्षा आयोग (एचईसीआई) के अंतर को साफ किया तथा इसके व्यापक संदर्भों और आयामों पर प्रकाश डाला।

डॉक्टर आनंद की चिंता ऐसे समय में सामने आई है, जबकि दिल्ली विश्वविद्यालय में मानव संसाधन मंत्रालय की इस मंशा पर गहरी नाराजगी दर्ज की जा चुकी है।

डॉ. एम. आनंद कृष्णन ने कहा कि एचईसीआई की स्थापना का लक्ष्य पूरी तरह से यूजीसी को प्रतिस्थापित करना है। दावा है कि इसका लक्ष्य शैक्षणिक मानकों को ज्ञान अर्जन से निकले नतीजों पर फोकस करने के अलावा संस्थानों का अकादमिक प्रदर्शन देखने व मूल्यांकन करने और शिक्षकों के प्रशिक्षण पर ध्यान केंद्रित करना है। हालांकि, एचईसीआई की योजना में जैसा सुझाया गया है कि विश्वविद्यालयों को अधिक विनियमित और सूक्ष्म प्रबंधनों में लाने का प्रयास किया जाएगा।

चेन्नई में हायर एजुकेशन कमीशन ऑफ इंडिया को लेकर आयोजित एक कार्यक्रम को संबोधित करते प्रो. आनंद कृष्णन

उन्होंने कहा है कि देश में विश्वविद्यालयों और कॉलेजों की बहुत अधिक संख्या को देखते हुए, उनकी माइक्रो-मैनेजिंग करने जैसी सारी अवधारणाओं को जमीन पर उतारना आसान काम नहीं है।

बताते चलें कि मानव संसाधन विकास मंत्रालय (एमएचआरडी) ने हायर एजुकेशन को उच्च केंद्रीकृत प्रणाली में लाने और शिक्षाविदों और अकादमिक जगत की अधिकांश या सभी शक्तियों को प्रशासकों को स्थानांतरित करने का प्रस्ताव दिया है।

बहुजन विमर्श को विस्तार देतीं फारवर्ड प्रेस की पुस्तकें

डॉ. आनंद कृष्णन के अनुसार, इन सबके चलते शिक्षा प्रणाली को नुकसान पहुंचेगा और छोटी, मध्यम तथा दीर्घकालीन रणनीति के लिहाज से ये पूरी शिक्षा प्रणाली के लिए घातक होगा।

 

 

उन्होंने बताया कि एचईसीआई के जरिए तीन अलग-अलग स्तरों अर्थात सरकार, अकादमिक संस्थानों (विश्वविद्यालयों और कॉलेजों आदि) और छात्रों में बदलाव लाने की उम्मीद जताई गई है। इस तरह के बदलावों से सरकारी स्तर पर पड़ने वाले असर को लेकर डॉ. आनंद ने कहा कि एचईसीआई का उद्देश्य राज्यों की भूमिका को सीमित करके केंद्र के लिए अधिक नियंत्रण शक्तियां प्रदान करना है। विश्वविद्यालयों और अन्य शैक्षणिक संस्थानों के स्तर पर एचईसीआई अधिकाधिक ताैर पर ताकतवर होगा, इससे कैंपस अधिकार कम से कम होते जाएंगे और स्वायत्तता की अवधारणा पूरी तरह से लड़खड़ा जाएगी और उसे स्वायत्त कहना बेमानी हो जाएगा।

केंद्रीय मानव संसाधन विकास मंत्री प्रकाव जावड़ेकर : उच्च शिक्षा पर पूर्णरूपेण कब्जे की तैयारी

उनके मुताबिक, प्रस्तावित योजना के तहत जैसी नीतियां लाई जा रही हैं, उनसे अकादमिक जगत में व्यक्ति और विश्वविद्यालय व अन्य उच्च शिक्षण संस्थानों में गठित अकादमिक बोर्डों की स्वतंत्रता पूर्णतः छिन जाएगी। इन संस्थानों के पास नए पाठ्यक्रमों काे लाने संबंधी शक्ति भी खत्म हो जाएगी। साथ ही शीर्ष विश्वविद्यालयों और संस्थानों में पाठ्यक्रम संबंधी कोई भी फेरबदल बिना एचईसीआई की सहमति के नहीं हो सकेगा। केंद्र सरकार के पास ही एचईसीआई के अध्यक्ष और उपाध्यक्ष को हटाने की शक्ति होगी। हालांकि, प्रस्तावित यह भी है कि बिना मजबूत कारणों को इनको हटाना संभव नहीं होगा। लेकिन, यह कुल मिलाकर शीर्ष संस्थानों के नियामकों की आजादी नष्ट कर देगा और अकादमिक संस्थानों की स्वायत्तता भी जाती रहेगी। प्रस्तावों के मुताबिक, अगर विश्वविद्यालयों और अध्ययन संस्थानों ने किसी भी विषय और पाठ्यक्रमों के लिए एचईसीआई के दिशा-निर्देशों का पालन नहीं किया, तो आयोग उस संस्थान पर पेनाल्टी लगा सकता है। आयोग इस स्थिति में संबंधित संस्थान पर आर्थिक दंड लगाने से लेकर उसकी डिग्री या डिप्लोमा देने संबंधी शक्ति पर पाबंदी लगा सकता है।

विश्वविद्यालय अनुदान आयोग, नई दिल्ली

डॉ. आनंद कृष्णन ने कहा कि वहीं दूसरी तरफ प्रस्तावित दिशा-निर्देश के तहत विश्वविद्यालयों से कॉलेजों की मान्यता या संबद्धता प्रदान करने के मामले में आयोग की भूमिका ‘कमरे में हाथी’ वाली कहावत को चरितार्थ करने वाली है। दावा है कि छात्रों के सीखने के लिहाज से आयोग का पाठ्यक्रम बहुत उपयोगी होगा। लेकिन डॉ. आनंद कृष्णन ने कहा कि मूल्यों, मानदंडों या अनुशासनों की बात करें, तो शिक्षा का प्राथमिक लक्ष्य है कि अंतिम परिणाम ठोस निकलना चाहिए और इसी पर प्रश्नचिह्न लग जाएगा।

एचईसीआई में प्रस्तावित कानून के तहत उसमें हायर एजुकेशन फंडिग एजेंसी नाम की गैर-बैंकिंग संस्था आर्थिक मामलों को देखेगी और यह सिर्फ विकास के लिए धनराशि देगी, यह संचालन या फिर रिसर्च जैसे कामों के लिए पैसा नहीं देगी। इसमें अगर कोई धनराशि ली जाती है, तो वह संस्थान को एडवांस लोन की तरह दी जाएगी, जो उसे ब्याज समेत वापस करनी होगी। डॉ. आनंद कृष्णन ने अकादमिक संस्थानों के मध्यम और दीर्घकालिक विकास के लिए प्रस्ताव में इन-बिल्ड (समाहित) की गई योजनाओं पर सवाल उठाए हैं।

हायर एजुकेशन कमीशन ऑफ इंडिया पर जारी बहस में हिस्सा लें

दरअसल, देश में अन्य आयोगों और समितियों के विपरीत जो सरकार के लिए इस तरह के मुद्दों का अध्ययन करते हैं और परिवर्तन का प्रस्ताव देते हैं, इस मामले में यह नहीं बताया जा रहा है कि देश में उच्च शिक्षा सुधारों के लिए पहले से ही स्थापित यूजीसी की क्या कमियां या उसकी क्या अक्षमताएं हैं, जिनके कारण बदलाव किए जा रहे हैं और न यह बता रहा है कि यूजीसी को क्यों प्रतिस्थापित किया जाना चाहिए।

डॉ. आनंद ने कहा कि जाहिर तौर पर यूजीसी की कमियों को सूचीबद्ध, उनको गिनाए बिना एक और कमीशन प्रस्तावित किया जा रहा है, जो कि शिक्षाविदों की सत्ता खत्म करके उनकी जगह नौकरशाहों को शक्तियां दे रहा है।

देश के इस प्रमुख शिक्षाविद का कहना है कि हैरानी की बात है कि न तो राजनीतिक दलों और न ही अकादमिक समुदाय ने इन ‘शिक्षा सुधारों’ का विरोध किया है और न ही सरकार से सवाल किया है। पूरे देश में सैकड़ों विश्वविद्यालयों और कॉलेजों में इसे लागू करना समस्या पैदा कर सकता है, लेकिन प्रस्तावित नीति के इन मुद्दों और चिंताओं से सभी बेखबर से हैं। उनका मानना है कि एचईसीआई अकादमिक आजादी और अकादमिक संस्थानों की विविधता को नष्ट कर सकता है, जो विश्वविद्यालयों और अन्य शैक्षिक संस्थानों के दशकों की मेहनत के बाद केंद्रीकृत सूक्ष्म प्रबंधन के रहते विकसित किया गया है।

(कॉपी संपादन : प्रेम/एफपी डेस्क)

(इनपुट- एस. श्रीनिवासन, ऑब्जर्वर रिसर्च फाउंडेशन, चेन्नई, साभार )


फारवर्ड प्रेस वेब पोर्टल के अतिरिक्‍त बहुजन मुद्दों की पुस्‍तकों का प्रकाशक भी है। हमारी किताबें बहुजन (दलित, ओबीसी, आदिवासी, घुमंतु, पसमांदा समुदाय) तबकों के साहित्‍य, संस्कृति, सामाज व राजनीति की व्‍यापक समस्‍याओं के सूक्ष्म पहलुओं को गहराई से उजागर करती हैं। पुस्तक-सूची जानने अथवा किताबें मंगवाने के लिए संपर्क करें। मोबाइल : +917827427311, ईमेल : info@forwardmagazine.in

फारवर्ड प्रेस की किताबें किंडल पर प्रिंट की तुलना में सस्ते दामों पर उपलब्ध हैं। कृपया इन लिंकों पर देखें 

दलित पैंथर्स : एन ऑथरेटिव हिस्ट्री : लेखक : जेवी पवार 

महिषासुर एक जननायक

महिषासुर : मिथक व परंपराए

जाति के प्रश्न पर कबी

चिंतन के जन सरोकार

About The Author

Reply