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आंबेडकर के लोकतांत्रिक समाजवाद से क्यों असहमत थी संविधान सभा?

डॉ. आंबेडकर ने 15 मार्च 1947 को संविधान में कानून के द्वारा ‘राज्य समाजवाद’ को लागू करने के लिए संविधान सभा को ज्ञापन दिया। उन्होंने मांग की थी कि भारत के संविधान में यह घोषित किया जाए कि उद्योग, कृषि, भूमि और बीमा का राष्ट्रीयकरण होगा तथा खेती का सामूहिकीकरण। लेकिन संविधान सभा ने ऐसा होने नहीं दिया। बता रहे हैं कंवल भारती

संविधान दिवस (26 नवंबर 1949) पर विशेष

डॉ. आंबेडकर (14 अप्रैल 1891 – 6 दिसंबर 1956) दुनिया भर के संविधान के ज्ञाता थे और मानते थे कि किसी भी देश  की प्रगति में उस देश के संविधान की बड़ी भूमिका होती है। संविधान की भूमिका को रेखांकित करते हुए वे एक जगह लिखते हैं- सारी सामाजिकबुराईयां धर्मआधारित होती हैं। एक हिन्दू स्त्री या पुरुषवह जो कुछ भी करता हैअपने धर्म का पालन करने के रूप में करता है। एकहिन्दू का खानापीनानहानावस्त्र पहिननाजन्मविवाह और मरना सब धर्म के अनुसार होता है। उसके सारे कार्य धार्मिक हैं।हालांकि धर्मनिरपेक्ष  दृष्टिकोण से वे बुराइयां हैंपर हिन्दू के लिए वे बुराइयां  नहीं हैंक्योंकि उन्हें उसके धर्म की स्वीकृति मिली हुई है।यदि कोई हिन्दू पर पाप करने का आरोप लगाता हैतो उसका उत्तर होता है, ‘यदि मैं पाप कर रहा हूंतो धर्म के अनुसार कर रहा हूं

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लेखक के बारे में

कंवल भारती

कंवल भारती (जन्म: फरवरी, 1953) प्रगतिशील आंबेडकरवादी चिंतक आज के सर्वाधिक चर्चित व सक्रिय लेखकों में से एक हैं। ‘दलित साहित्य की अवधारणा’, ‘स्वामी अछूतानंद हरिहर संचयिता’ आदि उनकी प्रमुख पुस्तकें हैं। उन्हें 1996 में डॉ. आंबेडकर राष्ट्रीय पुरस्कार तथा 2001 में भीमरत्न पुरस्कार प्राप्त हुआ था।

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