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बहुजनों के वैचारिक योद्धा छेदी लाल साथी

डाॅ. छेदी लाल साथी उत्तर प्रदेश के पहले पिछड़ा वर्ग आयोग के अध्यक्ष थे। साथ ही वह बोधानंद और शिवदयाल चौरसिया के बाद के दौर के सबसे जुझारू बहुजन योद्धा थे। बाबा साहेब के परिनिर्वाण के बाद उत्तर प्रदेश में रिपब्लिकन पार्टी को स्थापित करने में उन्होंने अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। उनके बारे में विस्तार से बता रहे हैं कँवल भारती :

अगर एक पंक्ति में परिचय देना हो, तो छेदी लाल साथी (1 फरवरी 1921, – 13 नवंबर 2004) उत्तर प्रदेश के पहले पिछड़ा वर्ग आयोग के अध्यक्ष थे। किन्तु दूसरी पंक्ति में वह बोधानंद और शिवदयाल चौरसिया के बाद के दौर के सबसे जुझारू बहुजन योद्धा थे।

सबसे पहले मैंने उनके बारे में अपने शहर रामपुर में ही सुना और वह भी एक कवि-शायर के मुँह से। सिर्फ सुना ही नहीं, बल्कि उन्होंने अपनी किताब ‘अतीत से बातें’ में बाकायदा उनका जिक्र भी किया है। यह शायर थे रघुवीरशरण दिवाकर राही, जो शायरी में दिवाकर राही के नाम से मशहूर थे। उनका ‘शराबी’ पिक्चर में यह शे’र बहुत मकबूल हुआ था- ‘आज तो उतनी भी मयस्सर नहीं मयखाने में, जितनी हम छोड़ दिया करते थे पैमाने में’ उनके साथ मेरा काफी उठाना-बैठना था। मैं उन दिनों (1994-98) सिविल लाइंस में उनकी कोठी के पीछे रोशन बाग में सरकारी छात्रावास के आवास में रहता था। रविवार को कभी-कभी वह भी मेरे घर पर आ जाते थे और मैं तो उनके पास जाता ही रहता था। एक दिन जब मैं उनके निवास पर गया, तो मैंने देखा कि उनके पास एक सांवले रंग के दुबले-पतले व्यक्ति बैठे हैं, जिनकी आँखों पर काले फ्रेम का मोटे लेंस का चश्मा था। दिवाकर जी शहर के नामीगिरामी वकील भी थे। इसलिए उनके होने से मुझे आश्चर्य नहीं हुआ। उनके घर में मुझे सभी जानते थे, इसलिए मैं बिना समय लिए कभी भी शाम को अचानक ही उनके बैठके में चला जाता था।

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लेखक के बारे में

कंवल भारती

कंवल भारती (जन्म: फरवरी, 1953) प्रगतिशील आंबेडकरवादी चिंतक आज के सर्वाधिक चर्चित व सक्रिय लेखकों में से एक हैं। ‘दलित साहित्य की अवधारणा’, ‘स्वामी अछूतानंद हरिहर संचयिता’ आदि उनकी प्रमुख पुस्तकें हैं। उन्हें 1996 में डॉ. आंबेडकर राष्ट्रीय पुरस्कार तथा 2001 में भीमरत्न पुरस्कार प्राप्त हुआ था।

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