कबीर और रैदास की परंपरा के विचारक गुरू घासी दास

जैसे कबीर और रैदास साहेब को ब्राह्मण साबित करने के लिए कहानियां गढ़ी गईं, उसी प्रकार एक मिथ्या कहानी को आधार बनाकर डा. हीरालाल ने गुरु घासी दास को ब्राह्मण वंशज बनाया है

गुरू घासी दास (18 दिसम्बर 1756 – 1836 [1]) पर विशेष

गुरु घासी दास की वैचारिक परम्परा सतनामी पंथ से आती है, और सतनामी पंथ का उद्गम स्रोत सद्गुरु रैदास साहेब की ‘बेगमपुर’ विचारधारा है, जिसमें उन्होंने एक वर्गविहीन और जातिविहीन समतामूलक समाज की परिकल्पना का निर्माण किया था। यथा—

अब हम खूब वतन घर पाया। ऊँचा खेर सदा मन भाया।

बेगमपूर सहर का नांव, दुःख-अंदोह नहीं तेहि ठांव।

ना तसवीस खिराज न माल, खौफ न कहता न तरस जुबाल।

आवादान रहम औजूद, जहाँ गनी आप बसै माबूद।

काइम-काइम सदा पातिसाही, दोम न सोम एक सा आही।

जोई सैल करै सोई भावै, हरम महल ताको अटकावै।

कह रैदास खलास चमारा, जो हम सहरी सो मीत हमारा.[1]

इस पद का अर्थ चन्द्रिकाप्रसाद जिज्ञासु के शब्दों में इस प्रकार है—

‘अब हमको अपने देश का बहुत अच्छा घर मिल गया है। यह ऊँचा गाँव मेरे मन को बहुत भाया है। इस शहर का नाम बेगमपुर है, अर्थात, शोकहीन नगर है। यहाँ न कोई दुःख है और न कोई शंका। न यहाँ किसी प्रकार की चिंता है, न कोई कर देना पड़ता है। न भय है, न अपराध है, न अभाव है, और न पतन है। यह सदा आबाद रहता है, और यह दया व करुणा का आगार है। यहां सुसम्पन्न उपास्य देव (माबूद) स्वयं रहता है। यहाँ उसकी ‘दायम बादशाही (अविनाशी साम्राज्य) सदा स्थापित रहता है। यहाँ सब एक समान हैं, दूसरे-तीसरे (दोम सोम) दर्जे का कोई भेद नहीं है। जिनको हरम महल (यहाँ संकेत सुलतान के हरम की ओर है) अटकाते हैं, उन्हें इस देश की सैर पसंद आती है। खालिस चमार रैदास कहता है कि जो हमारा हम सहरी है, अर्थात जो इस नगर का वासी और साथी है, वह हमारा मित्र है।’[2]

सदगुरु रैदास साहेब की इस परम्परा को उनके शिष्य ऊधोदास ने जीवित रखा था। वहाँ से यह परम्परा बीरभान (1543-1658) तक पहुंची, जिसने ‘सतनामी पन्थ’ की नींव डाली। इस पन्थ के अनुयायियों को साधु या साध कहा जाता था, जो कबीर और रैदास साहेब द्वारा अपने शिष्यों को दिया गया शब्द है। वे एक निराकार और निर्गुण ईश्वर में विश्वास करते थे, जिसे वे सतपुरुष और सतनाम कहते थे। गुरु रैदास साहेब की वाणी में सतनाम शब्द इस पद में आया है–

‘ज्योति-निरन्जन-सर्व-व्याप्त-र-रंकार-ब्याधि-हरण,

अचल-अबिनासी-सत्यपुरुष-निर्विकार-स्वरूप-सोऽहम्-सत्यनाम।।’[3]

रैदास साहेब के एक अन्य प्रसिद्ध पद में भी ‘सत्तनाम’ शब्द का जाप मिलता है,  जो इस प्रकार है–

अब कैसे छूटे सत्तनाम रट लागी।

प्रभुजी तुम चन्दन हम पानी,

जाकी अंग-अंग बास समानी।[4]

बीरभान दिल्ली के निकट पूर्बी पंजाब में नारनौल के पास बृजसार के रहने वाले थे। उन्होंने एक पोथी भी लिखी थी, जिसका महत्व सिखों के गुरु ग्रन्थ साहेब के समान था और जो सभी  सतनामियों के लिये पूज्य थी।

गुरू घासी दास की एक पेंटिंग

कहा जाता है कि सतनामी-विद्रोह के बाद बचे हुए सतनामी भागकर मध्यप्रदेश के छत्तीसगढ़ इलाके में जाकर बस गए थे। उन्हीं सतनामियों में 18वीं सदी में गुरु घासी दास (1756-1850) हुए, जिन्होंने सतनामी पन्थ को पुनः जीवित कर एक व्यापक आन्दोलन का रूप दिया। रायपुर जिला गजेटियर (1073) के अनुसार, गुरु घासी दास का जन्म सोमवार माघ पूर्णिमा तद्नुसार 18 दिसम्बर 1756 को एक श्रमिक (हरवाहा) परिवार में बलौदा बाज़ार तहसील के गिरौद गाँव में हुआ था।[5]

अगर घासी दास अपनी आत्मकथा लिखते तो वह दलित साहित्य में एक भूदास की पहली आत्मकथा होती। तथापि, सतनामियों के एक पंथी गीत में यह व्यथा काफी हद तक व्यक्त हुई है–

सत्याधारी बनके आए, जग म महान

तैं हलधर किसान, खेती खार नरवा बनाइ के

उपजाए तैं हर धान.

नरवा झोरकी डोगरी पहरी,

जंगल झाड़ी पाए हस

लाघन भुखन खून पसीना

मेहनत पार बनाए हस.

तारे सत्या हे महान, जग देहे अन्नदान.

धरती के सेवा ले बजाइ के—

अहरू बिछरू सांप सेरू, कांटी खुटी गड़ि के.

घाम प्यास पानी झक्कर, हवा धुका सहि के,

तोर मेहनत हे महान, गुन गावते जहान

माटी चिखला म सनाइ के.

अन्न के बैरी कतको हावय, टिड्डी माहो जान.

लोटा बटकी जम्मो धरागे, होवथन हलकान.

आए धान म बाड़ी चढ़गे, वाह रे किसान.

तोर दिल है महान, तैं दानी के दान.[6]

डा. हीरालाल शुक्ल का मत है, ‘घासी दास के अनुयायी पहले अपने आपको रैदास की परम्परा से ही जोड़ते थे. हीवेट के अनुसार, सतनामी अपने को रैदास कहते हैं, किन्तु रैदास के बारे में किसी को कोई जानकारी नहीं है—घासी दास ने संभवत: रैदास के उपदेशों का ही नवीकरण किया था। रैदास कभी छत्तीसगढ़ नहीं आए, इसलिए उनके प्रभाव को स्वीकार करना कठिन है।’[7]

रैदास साहेब छत्तीसगढ़ नहीं आए, इस तर्क से गुरु घासी दास पर उनके प्रभाव को नकारना गलत धारणा है। कबीर भी बहुत से स्थानों पर नहीं गए थे, गौतम बुद्ध बिहार और उत्तर प्रदेश के पूर्वांचल में ही विचरण करते रहे थे, पर उनके विचार सम्पूर्ण भारत में ही नहीं, सम्पूर्ण विश्व में फैले। विचार शिष्यों के द्वारा पहुँचते हैं, और सुगंध की तरह फैलते हैं। जिन धर्मदास का प्रभाव गुरु घासी दास पर पड़ा था, वह कबीर के शिष्य थे, और कबीर तथा रैदास की विचारधारा में कुछ भी बुनियादी अंतर नहीं था। दोनों एक ही निर्गुण धारा के संत थे, जो वेदान्त, वर्णव्यवस्था, अवतारवाद और परलोक की सगुण धारा में विश्वास नहीं करते थे। डा. हीरालाल कहते हैं कि ‘मूलतया सभी संत वेदांती थे, परन्तु परम तत्व को सगुण रूप में मानने के आग्रही नहीं थे।[8] यह कहना सही नहीं है। वेदांत में ईश्वर का स्वरूप निर्गुण है, ऐसा कहने वाले लोग भूल जाते हैं कि वेदांत ने ही कर्मवाद का सिद्धांत विकसित किया है, जिसके अनुसार मनुष्य का पुनर्जन्म होता है। अत: कोई वेदांती भी हो, और वह सगुणवादी न हो, ऐसा हो ही नहीं सकता। वेदांत का अनुयायी भाग्यवाद का अनुयायी होता है, जो संसार व संसार के दुखों को मिथ्या मानता है। इसलिए मूलत: सभी संत वेदांती नहीं थे. केवल ब्राह्मण संत ही वैष्णव धारा में वेदांती थे, जबकि किसी भी शूद्र संत का वेदांत से कुछ भी सम्बन्ध नहीं था। इसका कारण यह था कि शूद्र वेदांत ज्ञान के अधिकारी ही नहीं थे।

1 सितंबर 1987 को गुरू घासी दास की स्मृति में भारत सरकार द्वारा जारी डाक टिकट

डा. हीरालाल पंथी गीतों के अध्ययन से इस निष्कर्ष पर पहुंचे कि ‘घासी दास के विश्वास के आधार वैष्णव भक्ति, कबीर, रैदास, जगजीवनदास, तांत्रिक योग, नाथयोग तथा बैगावाद थे।[9] लेकिन किसी भी संत का गीतों के आधार पर उसके विश्वास का निर्धारण करना सम्यक अध्ययन नहीं है। प्राप्य सारी रचनाएँ गुरु घासी दास की नहीं हो सकतीं। चूँकि उनके शिष्य सभी वर्णों के थे, इसलिए यह असम्भव नहीं कि परवर्ती काल में उनके शिष्यों ने उनके नाम से प्रक्षिप्त पद न लिखे हों। कबीर, रैदास यहाँ तक कि बुद्ध के नाम से भी बहुत सी प्रक्षिप्त बातें लिखी गई हैं। जिस तरह त्रिपिटक में बुद्ध को खोजना कठिन है, उसी तरह पंथी गीतों में गुरु घासी दास को भी खोजना मुश्किल काम है।

गुरु घासी दास ने अपने धर्मशासन के सात नियम तय किये थे, जो ये थे— मदिरा, मांस तथा लाल रंग की सब्जियों का परित्याग; मूर्तिपूजा न करना; खेती में गाय को नहीं जोतना; दोपहर के बाद खेतों पर भोजन ले जाने की मनाही; और एक निराकार ईश्वर की उपासना।[10] इनमें दोपहर में खेतों पर भोजन ले जाने की मनाही गौर करने वाली बात है। खेतों पर भोजन ले जाने का काम औरतें करती थीं, और दलित औरतों के साथ उच्च जातियों की बदसलूकी आम बात थी। डा. हीरालाल भी एक स्थान पर लिखते हैं कि दलित महिलाएं सामंतों की हवस का शिकार होती थीं, जिसे उन्होंने अपनी नियति मान लिया था।[11] संभवत: गुरु घासी दास ने इसी स्थिति से अपनी महिलाओं की सुरक्षा के लिए यह नियम बनाया था। दलित जातियां बेबस और कमजोर थीं, तथा उच्च जातियों के खेतों पर हरवाही करती थीं, जिसके कारण वे आर्थिक रूप से परनिर्भर थीं।

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गुरु घासी दास पर दलित आलोचना की दृष्टि से हिंदी क्या, किसी अन्य भाषा में भी कोई काम नहीं हुआ है. भारतीय इतिहासकारों ने तो सम्पूर्ण सतनामी आन्दोलन की ही उपेक्षा की है। जदुनाथ सरकार से लेकर सतीश चन्द्र तक ने कुछ ही पंक्तियों में उनके बारे में लिखा है। यह भी इसलिए कि सतनामियों ने, जिनमें चमार, भंगी, सुनार, सुतार तथा शिल्पकार जातियां थीं[12], औरंगजेब से सशस्त्र विद्रोह किया था। शायद यही एक कारण है, कि इतिहासकार उनकी पूर्ण उपेक्षा नहीं कर सके हैं। किन्तु घासी दास पर हमें हिंदी में डा. हीरालाल शुक्ल का ही एकमात्र काम मिलता है, जो उन्होंने ‘गुरु घासी दास : संघर्ष, समन्वय और सिद्धांत’ नाम से 1994 में मध्यप्रदेश हिन्दी ग्रन्थ अकादमी, भोपाल के लिए किया था। इस ग्रन्थ की तुलना मैं हजारीप्रसाद द्विवेदी के ‘कबीर’ से करना चाहता हूँ। दोनों ग्रंथों के लेखक ब्राह्मण हैं, जिन्होंने अपने प्रतिपाद्य को स्थापित करने के लिए निश्चित रूप से काफी परिश्रम किया है। दोनों में समानता यह है कि दोनों ने ही वैष्णववाद को अपना प्रतिपाद्य बनाया है। हजारीप्रसाद द्विवेदी ने कबीर साहेब को रामानन्द का शिष्य बनाकर वैष्णव धारा से जोड़ा है, तो हीरालाल शुक्ल ने गुरु घासी दास को वेदांती धारा से जोड़ कर वैष्णवी बनाया है। उन्होंने लिखा है, ‘घासी दास की संत-परम्परा में तीन प्रमुख विरोधी आंदोलनों का समन्वय था—वैष्णव भक्ति, हठयोग तथा बैगात्त्व।’[13] एक और जगह पर वह लिखते हैं, ‘यदि हम ‘अमृतवाणी तथा ‘पंथीगीतों पर ध्यान से विचार करें, तो घासी दास की वाचिक परम्परा की निर्गुण परम्परामूलक अधोलिखित विशेषताओं को हृदयंगम किया जा सकता है—

  1. प्रत्यक्ष अनुभव के आधार पर सत्य का अन्वेषण,
  2. सद्गुरु के महत्व का प्रतिपादन,
  3. परमतत्व के साथ एकात्मभाव,
  4. नाम-स्मरण का आग्रह,
  5. बाह्याडम्बर तथा मूर्तिपूजा की व्यर्थता,
  6. गोवंश की रक्षा, और
  7. सूर्य नमस्कार[14]

इनमें गोवंश की रक्षा, और सूर्य नमस्कार गुरु घासी दास की विचारधारा नहीं है, क्योंकि यह ब्राह्मणों की सगुण भक्ति का प्रपंच है, जिसकी निर्गुण दर्शन में कोई स्वीकृति नहीं है। कबीर और रैदास की परम्परा में प्राणियों के प्रति करुणा का भाव तो है, पर सूर्य नमस्कार का पाखंड नहीं है। ऐसा उपदेश, जिससे ऐकेश्वर का खंडन होता है, और देवतावाद स्थापित होता है, गुरु घासी दास कभी नहीं दे सकते थे। सिर्फ पंथी गीतों के अध्ययन से गुरु घासी दास के विचारों को तय नहीं किया जा सकता। इसके लिए जिस सौन्दर्यशास्त्र की जरूरत होगी, वह दलित वैचारिकी से ही आएगा। और डा. हीरालाल शुक्ल ने जिस सौन्दर्य शास्त्र से गुरु घासी दास के व्यक्तित्व को परखा है, वह वैदिक विचारधारा पर आधारित है।

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डा. हीरालाल प्रश्न उठाते हैं, ‘गुरु घासी दास के पूर्वज कौन थे? क्या वे हीन शिल्पी थे? क्या वे रैदास के वंशज थे? क्या वे पंजाब की नारनौल शाखा के सतनामी थे, जिन्होंने औरंगजेब के खिलाफ जबरदस्त आन्दोलन छेड़ा था? इसकी पुनर्व्याख्या भी यहाँ आवश्यक है।’ किन्तु वह अपनी पुनर्व्याख्या में एक किंवदन्ती के हवाले से गुरु घासी दास को ब्राह्मणों का वंशज स्वीकार करते हैं। वह लिखते हैं—

‘संभवत: घासी दास अधोलिखित अनुश्रुति से परिचित थे और अपनी खोई हुई प्रतिष्ठा को प्राप्त करने के लिए कृतसंकल्प थे— इनके आदि पूर्वज चार ब्राह्मणों में से सबसे छोटे भाई थे। एक बार चारों भाई नदी में नहाने के लिए गए, जहाँ उन्होंने बीच नदी में एक गाय को तड़पते हुए देखा। उन्होंने अपने अनुज को गाय की रक्षा के लिए भेजा, किन्तु अनुज जब तक गाय की रक्षा के लिए नदी में उतरता, गाय डूब चुकी थी। उसने मृत गाय को नदी से बाहर निकाला और उसके तीनों भाइयों ने उसे ब्राह्मणत्व से बाहर निकाल दिया।’ (अर्थात खारिज कर दिया)।[15]

वह आगे लिखते हैं कि ‘वेदों में भी यही संकेतमूलक अनुश्रुति मिलती है,[16] किन्तु अनुज को कभी हीनशिल्पी या आर्यत्व से च्युत करने की कहानी नहीं है। गौतम बुद्ध के समय तक घासी दास के पूर्वज आर्य वंश के ही माने जाते थे। बाद में इन्हें हीनशिल्पी कहा गया तथा स्मृतिकारों ने इन्हें हीनजाति में शामिल कर लिया।’[17]

जैसे कबीर और रैदास साहेब को ब्राह्मण साबित करने के लिए कहानियां गढ़ी गईं, उसी प्रकार एक मिथ्या कहानी को आधार बनाकर डा. हीरालाल ने गुरु घासी दास को ब्राह्मण वंशज बनाया है। डा. हीरालाल ने इस पाखंड का खंडन नहीं किया कि ब्राह्मणों के लिए जो गाय जीवित अवस्था में माँ है, वह मरते ही अछूत कैसे हो गई, और उसको उठाने वाला भी अछूत कैसे हो गया? यही कहानियां ब्राह्मणों ने चमार की उत्पत्ति को लेकर गढ़ी हैं, जिनका तथ्यात्मक विवेचन प्रोफ़ेसर श्याम लाल ने अपनी पुस्तक ‘भारत में अछूत आन्दोलन’ में किया है।[18] यह जनश्रुति मारवाड़ राज्य की 1891 की जनगणना में दर्ज है। इसमें ‘एक ब्राह्मण परिवार में सात भाई थे। एक दिन उनकी एक गाय मर गई और उसकी लाश शाम तक आंगन में पड़ी रही। चूँकि कोई भी उस लाश को उठाना नहीं चाहता था, इसलिए छह भाइयों ने सलाह की कि उनका छोटा भाई इस लाश को उठाकर ले जाए। इसके लिए छोटा भाई तैयार हो गया। वह उस लाश को खींच कर ले जाकर जंगल में छोड़ आया। जब वह जंगल से वापिस लौटा, तो उसके भाइयों ने उसे अपनाने से इनकार कर दिया और उसे उनसे दूरी बनाकर रहने के लिए बाध्य कर दिया। इस पर उसने काफी उपद्रव किया, पर कोई परिणाम नहीं निकला। उन्होंने उससे कहा कि अब से उसे चमार का ही काम करना पड़ेगा।’ डब्लू. क्रुक ने भी इसी से मिलती-जुलती कहानी का उल्लेख किया है, जिसमें सात की जगह पांच ब्राह्मण भाई हैं। शेष कथा वही है।[19] इन कहानियों के आधार पर चमारों के पूर्वज भी ब्राह्मण ठहरते हैं, जिसका निष्कर्ष यही निकलता है कि चमारों में ज्ञान का आधार उनका ब्राह्मण वंशज होना है।

इसका मतलब है कि अछूत मूल का कोई भी व्यक्ति मौलिक विचारक और संत नहीं हो सकता, जब तक कि वह ब्राह्मण का चेला नहीं हो या ब्राह्मण वंशज नहीं हो। चूँकि गुरु घासी दास के पूर्वज ब्राह्मण थे, इसलिए उनमें जो ज्ञान था, वह ब्राह्मण का दिया हुआ ज्ञान था। अंत में डा. हीरालाल ने गुरु घासी दास की चेतना को ब्राह्मण चेतना भी घोषित कर दिया है। वह बहुत चतुराई से विश्लेषण करते हुए लिखते हैं—

‘हिंदुत्व के प्रति गुरु घासी दास के विस्तारित विचारों का प्रत्यक्ष परिणाम यह हुआ कि ऐसे अनेक लोग सतनाम पन्थ में आ गए, जिनकी जातिबद्ध उत्तराधारक्रम में आने की कोई सम्भावना नहीं थी और वे या तो इस्लाम से जुड़ रहे थे या ईसाई हो रहे थे। उन दिनों सवर्ण हिन्दुओं के विरोध के बावजूद गुरु घासी दास ने खुले तौर पर यह प्रतिपादित किया कि कोई स्त्री या पुरुष जन्म से ब्राह्मण नहीं बन सकता। ब्राह्मण माता-पिता से जन्म उस समय तक एक दैवयोग ही माना जायेगा, जब तक कोई अपने विचारों, कार्यों और वाणी से ब्राह्मण-चेतना का परिचय नहीं देता। उनके अनुसार, हिंदू सामाजिक संरचना की सही कसौटी है ब्राह्मण-चेतना, न कि ब्राह्मण माता-पिता से जन्म। इसलिए भले ही किसी व्यक्ति का जन्म शूद्र मातापिता से हुआ हो, यदि उसमें ब्राह्मण-चेतना है, तो वह सवर्ण ब्राह्मण से किसी मायने में कम नहीं है। उनके अनुसार, ब्राह्मण-चेतना पैदा करने का सरल और सही उपाय है – किसी गुरु के निर्देश में निरंतर ध्यान करना तथा – मानसिक जप से जुड़ना। ऐसा व्यक्ति जो सत का ध्यान करता है, वही सतनामी है। और वही सच्चे अर्थों में ब्राह्मण है।’[20]

यही नहीं, डा. हीरालाल शुक्ल ने गुरु घासी दास को हिन्दू कर्मकांडी भी बना दिया है. देखिए, वह आगे क्या लिखते हैं—

‘गुरु घासी दास ने अपने नैतिक नियमों के अंतर्गत अहिंसा को प्रमुख महत्व दिया था। उन्होंने हिंदुत्व के कर्मकांडों को पुन: प्रतिष्ठित किया, जिनमें हिंसा का सर्वथा अभाव था। इन कर्मकांडों में सूर्य नमस्कार, चौका, आरती, रामट निकालना, सतलोक, आदि शामिल थे। इन कर्मकांडों के आ जाने से उपेक्षित जातियाँ वृहत्तर धर्म से जुड़ गईं। ऐसे बहुसंख्यक जन, जो हिन्दू कर्मकांडों से पूरी तरह कट गए थे, उनके लिए गुरु ने महत्वपूर्ण कर्मकांडों का पुन: सूत्रपात किया। यज्ञों में बलि के स्थान पर नारियल का पुन: प्रवेश करवाया। इन सबसे जनता में अहिंसक विचार आए। जीवन के प्रति लोगों में सम्मान बढ़ा और एकेश्वरवाद के परिवेश में सर्वत्र आत्मा का वास माना गया। शंकराचार्य ने भी बहुत पहले इसी ब्रह्मभाव को पोषित किया था।’[21]

इनमें नारियल, आरती, चौका किस तरह एकेश्वरवाद के परिवेश में आता है? डा. हीरालाल की यह स्थापना गुरु घासी दास के व्यक्तित्व को सुंदर नहीं बनाती, बल्कि उसको विकृत करती है। इस विकृतिकरण ने गुरु घासी दास को ब्राह्मणी रंग में रंगकर ठिकाने लगाने का काम किया है, जो एक प्रायोजित प्रयास है।

(कॉपी संपादन : एफपी डेस्क)

[1] संत रैदास : एक विश्लेषण, कँवल भारती, दूसरा संस्करण, 2000, बोधिसत्व प्रकाशन, रामपुर. परिशिष्ट (ख) काव्य संग्रह, पद 33, पृष्ठ 125.

[2] चन्द्रिकाप्रसाद जिज्ञासु ग्रंथावली, खंड 2, सम्पादक : कँवल भारती, दि मार्जिनलाइज्ड पब्लिकेशन, दिल्ली, 2017, पृष्ठ 175-76.

[3] आल इन्डिया आदि धर्म मिशन, दिल्ली के रिसर्च फोरम द्वारा प्रकाशित ‘‘आदि अमृत वाणी श्री गुरु रविदास जी’’ के यह पद हर खंड में मौजूद. ग्रन्थ का आरम्भ भी ‘सोऽहम्-सत्यनाम’ से हुआ है. इस ग्रन्थ पर वर्ष अंकित नहीं है. यह श्री गुरु रविदास धर्मस्थान, सावन पार्क, दिल्ली-52 से प्रकाशित हुआ है.

[4] संत रैदास, उपुर्युक्त, पद 87, पृष्ठ 142.

[5] गुरु घासी दास : संघर्ष, समन्वय और सिद्धांत, डा. हीरालाल शुक्ल, सिद्धार्थ बुक्स, शाहदरा, दिल्ली, 2009, पृष्ठ 72-73.

[6] वही, पृष्ठ 243-244.

[7] वही, पृष्ठ 56.

[8] वही, पृष्ठ 54

[9] वही, पृष्ठ 57.

[10] वही, पृष्ठ 235.

[11] वही, पृष्ठ 76.

[12] A Short History Of Aurangzib,  Jadunath Sarkar, M.C. Sarkar And Sons Ltd Calcutta, 1930, pp. 161-162.

[13] गुरु घासी दास, उपर्युक्त, पृष्ठ 53

[14] वही, पृष्ठ 210.

[15] वही, पृष्ठ 66-67.

[16] वही, पर इसका कोई स्रोत हीरालाल जी ने नहीं दिया है.

[17] वही.

[18] भारत में अछूत आन्दोलन, प्रो. श्याम लाल, अनुवादक : कँवल भारती, स्वराज प्रकाशन, नई दिल्ली,2011, पृष्ठ 20.

[19]डब्लू. क्रुक, ट्राइब्स एंड कास्ट्स ऑफ़ दि नार्थ-वेस्टर्न प्रोवेंसस एंड अवध, वाल्यूम II, 1896, गवर्नमेंट प्रिंटिंग इंडिया, कलकत्ता, पृष्ठ 170

[20] गुरु घासी दास, उपर्युक्त, पृष्ठ 218.

[21] वही, पृष्ठ 219.

[1] गुरू घासी दास के निधन की तारीख अनुपलब्ध है


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