कारीगरों के कल्याण के बिना निश्चित थी कौशल विकास की विफलता

कारीगरों के कल्याण के लिए एक पृथक कारीगर एवं घरेलू उत्पादन मंत्रालय की मांग 2005 में एक अंतर-मंत्रालयी कार्य समूह (आईएमजी) द्वारा की गयी थी। लेकिन इसके बजाय सरकार ने कौशल विकास और उद्यमिता मंत्रालय पर जोर दिया, जो अभी तक नाकाम साबित हुआ है। बता रहे हैं पी. एन. संकरण

घरेलू और कारीगरी कार्यक्षेत्र भारत के सामाजिक-आर्थिक ढाँचे की रीढ़ हैं। कारीगरों में ब़ढ़ई (काष्ठकार), लोहार, मिस्त्री, नक्काश, बुनकर, मोची, चर्मकार, कुम्हार, झाड़ू बनाने वाले, तेली, दर्ज़ी, बाँस और गन्ना श्रमिक तथा नारियल से रस्सी बनाने वाले माने जाते हैं। उनमें से बढ़ई और लोहार गांव की आर्थिक संरचना में सर्वोच्च स्तर पर होते हैं क्योंकि उनकी सेवाएं अत्यावश्यक हैं। एक सुप्रतिष्ठित नृविज्ञानी, जेन ब्रौवर, ने अपनी पुस्तक ‘द मेकर्स ऑफ़ द वर्ल्ड – कास्ट, क्राफ़्ट एण्ड माइंड ऑफ़ साउथ इंडियन आर्टीज़न्स’ (ऑक्सफ़ोर्ड यूनिवर्सिटी प्रेस, दिल्ली, 1995), में कारीगरों की परंपरा और विरासत को बेहद दिलचस्प तरीके से ग्रहण कर प्रस्तुत किया है। परंपरागत रूप से कारीगर और घरेलू उत्पादक, समाज के वंचित तबके से आते हैं – अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति, अन्य पिछड़े वर्ग (ओबीसी) तथा अल्पसंख्यक समुदाय। उनके जीवन स्तर को बेहतर बनाने के लिए, उनकी आजीविका के प्राथमिक स्रोत को एक सतत विकास-मार्ग पर मज़बूती से स्थापित करना ज़रूरी है। हालांकि असल में, बढ़ते विनियमन और भूमंडलीकरण के दौर में कारीगरी तथा घरेलू उत्पादन क्षेत्र स्वतंत्र रूप से फल-फूल नहीं पा रहा है। अतः अपर्याप्त प्रौद्योगिकी, अनुपयुक्त विपणन तथा संस्थागत क्रेडिट जैसे क्षेत्रगत बाधाओं को ध्यान में रखकर उनका समाधान ढूंढा जाना चाहिए। इसलिए, कारीगरी तथा घरेलू उत्पादन क्षेत्रों के सबलीकरण की दिशा में संबंधित संस्थागत संरचना का पुनर्गठन सबसे परिवर्तनकारी तरीका हो सकता है। इसके आलोक में योजना आयोग की रिपोर्ट- कारीगरी तथा घरेलू उत्पादन के लिए प्रौद्योगिकीय, निवेश और विपणन सहायता पर अंतर-मंत्रालयी कार्य समूह की रिपोर्ट, जिसे आईएमजी (2005) कहा जाता है, में एक महत्वपूर्ण प्रस्ताव रखा गया था।

आईएमजी 2005 द्वारा चिन्हित संस्थागत समस्याएं

आईएमजी 2005 के अनुसार, इस क्षेत्र में सक्रिय संस्थाओं के बहुतायत में होने के कारण इसके द्वारा झेले जा रहे संकट के निवारण में सुगठित प्रयास संभव नहीं हो पा रहे हैं। इसलिए, कारीगरों और घरेलू श्रमिकों पर ध्यान केंद्रित करने के लिए यह अत्यंत ज़रूरी है कि नीति-निर्माता संस्थाओं को पुनर्गठित किया जाए तथा सहायता प्रदान करने की प्रणालियों को और कारगर किया जाए। इसके लिए, इस क्षेत्र के बारे में विभिन्न विभागों की सभी गतिविधियों को समेकित करके, एक नया कारीगर एवं घरेलू उत्पादन मंत्रालय गठित किया जा सकता है। विशेष रूप से, हैंडलूम, हस्तशिल्प, रेशम के कीड़ों का पालन और ऊन उत्पादन को मौजूदा कपड़ा उद्योग मंत्रालय से अलग कर इस नए मंत्रालय के तहत रखा जाना चाहिए। इसके साथ ही, कपड़ा उद्योग का नॉन-सेल्यूलोस हिस्सा, जो वर्तमान में रसायन और उर्वरक मंत्रालय (रसायन और पेट्रोकेमिकल्स विभाग) के नियंत्रण में है, को वस्त्र मंत्रालय के तहत लाया जा सकता है। कृषि एवं ग्रामीण उद्योग मंत्रालय का कारीगरों के नए मंत्रालय के साथ विलय किया जाना चाहिए, जिससे ग्रामीण विकास जैसे अन्य विभागों द्वारा चालित, इनकी समान योजनाओं को इसके तहत शामिल किया जा सके। यह मांग की जाती है कि यह नया मंत्रालय प्रत्यक्ष रूप से प्रधानमंत्री के अधीन हो। यदि प्रधानमंत्री नए मंत्रालय का पद-भार नहीं संभालते हैं, तो विकल्प के तौर पर ग्रामीण विकास मंत्रालय में एक विभाग स्थापित किया जा सकता है, या एक स्वतंत्र मंत्रालय के गठन पर भी विचार किया जा सकता है (आईएमजी 2005, कार्यकारी सारांश 12.1)। केंद्रीय तथा राज्य सरकारों के प्रयासों को एकजुट करने के लिए, प्रधानमंत्री के नेतृत्व में कारीगरों के निमित्त एक राष्ट्रीय परिषद् की स्थापना की जा सकती है, जिसमें राज्यों के मुख्यमंत्री तथा सम्बंधित केंद्रीय विभाग सदस्य के रूप में हों। (आईएमजी 2005, कार्यकारी सारांश 12.2)

हस्तकरघे पर काम करता कारीगर

कारीगर सम्बन्धी मामलों के लिए मंत्रालय अभियान

आईएमजी 2005 के प्रस्ताव को कारीगरों की दुनिया की मुख्यधारा में शामिल करने में ‘आर्टीज़न्स’ ऑफ़ इंडिया : टुवर्ड्स इन्क्लूसिव डेवलपमेंट’ (2011) के एक सम्पूर्ण वाङ्ग्मय का प्रकाशन, जिसमें कई अकादमिक पेपरों का संग्रह निहित है, तथा आर्टीज़न्स वेलफेयर आर्गेनाईज़ेशन (एडब्ल्यूओ) नामक गैर-सरकारी संस्था के अथक प्रयास सहायक सिद्ध हुए हैं।

भिलाई, छत्तीसगढ़ के वी. विश्वनाथन आचारी के नेतृत्व में 25 फ़रवरी 2014 को नई दिल्ली के जंतर- मंतर पर पृथक कारीगर मंत्रालय की मांग को लेकर एक धरना प्रदर्शन हुआ था। 22  राज्यों के प्रतिनिधि कारीगरों ने इस प्रदर्शन में भाग लिया था। इसी प्रकार विषय से सम्बद्ध एडब्ल्यूओ के विचारों और विश्वकर्मा कारीगर समुदाय के संगठनों के प्रतिनिधियों (जिन्होंने विश्वकर्मा समुदाय आयोग (सीवीसी), केरल सरकार (2012 -2014 ) द्वारा आयोजित ज़िला-स्तरीय बैठकों में भाग लिया था) द्वारा किये गए निवेदनों से 2014 के लोकसभा चुनावी मुद्दों में केंद्रीय कारीगर मंत्रालय की मांग एक अहम् मुद्दे के तौर पर उभरी। इसी संदर्भ में, 2014 में नेशनल डेमोक्रेटिक अलायन्स (एनडीए) ने केरल में अपने राज्य स्तरीय चुनावी घोषणापत्र तैयार किया था, जिसका शीर्षक था – ‘व्हाट वी वांट इज़ नॉट लेफ़्ट और राइट, बट अ करेक्ट स्टैंड – अ फ़्रेमवर्क फ़ोर केरलाज़ डेवलपमेंट’। अर्थात, ‘हम जो चाहते हैं वह वामपंथ या दक्षिणपंथ नहीं है, बल्कि हम केरल के विकास के लिए उचित तथा ठोस आधार चाहते हैं।’ इसमें पृष्ठ संख्या 16 पर लिखा गया है कि ‘पारंपरिक क्षेत्रों में श्रमिकों का संरक्षण सुनिश्चित किया जाएगा; विश्वकर्मा समुदाय की समस्याओं को गंभीरता से लिया जाएगा। इसके साथ ही, कारीगर सम्बन्धी मामलों के लिए एक पृथक मंत्रालय तथा कारीगर क्षेत्र को वस्त्र मंत्रालय से अलग करने के प्रस्ताव पर भी अमल किया जाएगा। विश्वकर्मा दिवस को राष्ट्रीय श्रमिक दिवस के रूप में घोषित किया जाएगा।’ घोषणापत्र के पृष्ठ संख्या 20 पर मत्स्यपालन मंत्रालय के गठन का भी वादा किया गया था।   

बाँस की टोकरी बुनती एक महिला

मत्स्यपालन मंत्रालय का अभी तक गठन नहीं हुआ है, लेकिन केंद्रीय मंत्रिमंडल ने मत्स्यपालन क्षेत्र के लिए एक नए मेगा प्रोजेक्ट – ‘द फ़िशरीज़ एंड आक्वाकल्चर इंफ्रास्ट्रक्चर डेवलपमेंट फण्ड’ (एफ़आईडीएफ़) की घोषणा की है। इस परियोजना के तहत राज्य सरकारों, सहकारी संगठनों, व्यक्तिगत रूप से मत्स्यपालन करने वालों तथा उद्यमियों को आधारभूत संरचना के विकास के लिए 7522 करोड़ रुपये का रियायती ऋण मुहैया कराया जाएगा, जिसकी अदायगी अगले बारह वर्षों में की जा सकती है। इसके तहत प्रथम दो वर्षो तक वसूली की बाध्यता नहीं होगी। यह चुनाव से पूर्व अपनायी गयी रणनीति हो सकती है, लेकिन कारीगर मंत्रालय के बारे में क्या होगा? क्या 9 नवंबर 2014 को स्थापित कौशल विकास और उद्यमिता मंत्रालय (एमएसडीई) इसका ख्याल रख पाया है? एमएसडीई के माध्यम से भारत को कुशल बनाने पर विशेष ज़ोर देना दरअसल यूनाइटेड प्रोग्रेसिव अलायन्स (यूपीए) द्वारा की गयी पहल को ही आगे बढ़ाना है, जिसकी चर्चा 12वीं पंचवर्षीय योजना (2012 – 17) के दस्तावेज़ में की गयी है। एमएसडीई ने कौशल विकास के लिए मूलभूत आवश्यकताओं के रूप में पांच महत्वपूर्ण स्तम्भों का एक ढांचा तैयार किया है  – कुशल लोगों का समूह तैयार करना, मांग के अनुरूप आपूर्ति, वैश्विक मानकों का प्रमाणीकरण, मांग को आपूर्ति से जोड़ना और उद्यमशीलता को उत्प्रेरित करना। मंत्रालय की ओर से कारीगरों के निमित्त केवल ‘रिकग्निशन ऑफ़ प्रायर लर्निंग सर्टिफ़िकेशन’ (आरपीएल) तथा ‘गुरु-शिष्य परंपरा’ पर आधारित कौशल हस्तांतरण का प्रावधान है जिसके तहत निपुण प्रशिक्षक वरिष्ठ कारीगरों के रूप में युवाओं को प्रशिक्षित करते हैं। मीडिया रिपोर्टों के मुताबिक, कौशल हस्तांतरण की यह योजना सफ़ल नहीं हो पायी है।

जैसा कि पहले बताया गया है, कारीगर सम्बन्धित मामलों के लिए पृथक मंत्रालय के पीछे तर्क यह है कि उनके विकास तथा कल्याण सम्बन्धी योजनाएं अलग-अलग मंत्रालयों तथा विभागों की देख-रेख में होने के कारण, बिखराव की स्थिति में रहती हैं और चूंकि किसी भी मंत्रालय को अंतर-मंत्रालयी समन्वयन का अधिकार-क्षेत्र प्राप्त नहीं है, इसलिए ये सुचारु रूप से क्रियान्वित नहीं हो पाती हैं।

भारतीय कारीगरों, खासकर विश्वकर्मा समुदाय, के अधिकांश वर्गों से जुड़े अमूर्त कौशल की विरासत और पारंपरिक हस्तांतरण प्रणाली को देखते हुए कारीगरों के विकास के मुद्दों को एमएसडीई द्वारा स्थायी रूप से संभाला नहीं जा सकता है। ध्यातव्य है कि एमएसडीई का अधिकार-क्षेत्र न तो आईएमजी 2005 की तर्ज़ पर कारीगरों के लिए एक अलग मंत्रालय की सिफ़ारिश के अनुकूल है और ना ही यह कारीगरों/दस्तकारों और उनकी संस्कृति एवं विरासत के सतत सशक्तीकरण की वैश्विक पद्धतियों से मेल खाता है। कुल मिलाकर कारीगरों के पारंपरिक कौशल की सुरक्षा, संरक्षण और संवर्धन की आवश्यकता है और निस्संदेह अतिरिक्त उद्यमिता प्रशिक्षण तथा स्वरोज़गार और आजीविका के लिए सहायता की भी ज़रूरत है। इस सन्दर्भ में एमएसडीई एक कमज़ोर विकल्प है।

राम वी. सुतार,’स्टेचू ऑफ़ यूनिटी’ के मूर्तिकार

बीते 31 अक्टूबर 2018 को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने नर्मदा के किनारे सरदार वल्लभभाई पटेल की 182 मीटर ऊंची प्रतिमा का अनावरण किया, जिसके निर्माण में 2,989 करोड़ रुपए खर्च किये गए। पद्मभूषण श्री राम वी. सुतार ने ‘स्टैच्यू ऑफ़ यूनिटी’ का शिल्प तैयार किया है। लेकिन ‘विश्व की सबसे ऊंची प्रतिमा’ के यह मूर्तिकार जिस कारीगर समुदाय से आते हैं, उसी के द्वारा की गयी पृथक कारीगर मंत्रालय की वाज़िब मांग को लेकर कोई ठोस कदम नहीं उठाया गया है।

(अनुवाद : डॉ. देविना अक्षयवर, कॉपी-सम्पादन : एफपी डेस्क)


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