महिलाओं के अधिकार : पेरियार के इंकलाबी बोल

प्रत्येक महिला को एक उपयुक्त पेशा अपनाना चाहिए ताकि वह भी कमा सके। अगर वह कम से कम खुद के लिए आजीविका कमाने में सक्षम हो जाए, तो कोई भी पति उसे दासी नहीं मानेगा

[पेरियार ने आजीवन ब्राह्मणवाद का विरोध किया। वह मानते थे कि भारत के विकास में सबसे बड़ा बाधक कोई और नहीं बल्कि विभेद पैदा करने वाली यह व्यवस्था है। उन्होंने इसके समूल नाश करने का आह्वान किया। हिंदी भाषी राज्यों में अब भी लोग उनके उन विचारों और तर्कों से अपरिचित हैं जिनके आधार पर वे यह सिद्ध करते रहे कि हिन्दू धर्म से जुड़ी बातें मूलतः ब्राह्मण-वर्चस्व को कायम करती हैं। उनके प्रतिनिधि उद्धरणों का यह चयनित संकलन हम यहां प्रस्तुत कर रहे हैं ताकि लोग यह जान सकें कि पेरियार धर्म, राजनीति आदि के बारे में क्या सोचते थे, वह किस तरह का समाज बनाना चाहते थे, श्रमिकों के लिए उनके क्या विचार थे, महिलाएं सशक्त और अधिकार संपन्न कैसे बनें, सामाजिक व्यवस्था में सुधार कैसे हो –प्रबंध  संपादक]

पुरुष स्त्री को अपनी संपत्ति मानता है और यह नहीं मानता कि उसके ही समान स्त्री की भी भावनाएँ हो सकती हैं। महिलाओं को शिक्षा प्राप्त करने से क्यों रोका गया? ताकि उन्हें उनकी मुक्ति से वंचित रखा जा सके और इस बहाने उन्हें दासी बनाया जा सके और साबित किया जा सके कि वे सोचने-विचारने या  कोई कार्य करने में सक्षम नहीं हैं।

ज़मींदार अपने नौकरों और ऊंची जाति के लोग नीची जाति के लोगों के साथ जिस प्रकार का व्यवहार करते हैं, पुरुष उससे भी बदतर व्यवहार स्त्री के साथ करता है। जमींदार अपने नौकरों के साथ और उंची जाति के लोग नीची जाति के साथ  तभी ऐसा बुरा बर्ताव करते हैं जब इन्हें उनसे खतरा महसूस होता है, लेकिन पुरुष महिलाओं के प्रति उनके जन्म से लेकर मृत्यु तक क्रूर व्यवहार करते हैं। भारत में महिलाएं हर क्षेत्र में अस्पृश्यों से भी अधिक उत्पीड़न, अपमान और दासता झेलती हैं। चूंकि हम इस बात को समझ नहीं पाते कि स्त्री की पराधीनता सामाजिक विनाश की ओर ले जाती है, इसीलिए अपनी सोचने-विचारने की सामर्थ्य के चलते, जिस समाज को विकास की सीढ़ियां चढ़नी चाहिए, वह दिन-ब-दिन पतन की ओर बढ़ता जाता है।

तामिलनाडु की भूतपूर्व मुख्यमंत्री जयललिता के साथ पेरियार

प्रत्येक महिला को एक उपयुक्त पेशा अपनाना चाहिए ताकि वह भी कमा सके। अगर वह कम से कम खुद के लिए आजीविका कमाने में सक्षम हो जाए, तो कोई भी पति उसे दासी नहीं मानेगा।

पुरुष के लिए एक महिला उसकी रसोइया, उसके घर की नौकरानी, उसके परिवार या वंश को आगे बढ़ाने के लिए प्रजनन का साधन है और उसके सौंदर्यबोध को संतुष्ट करने के लिए एक सुंदर ढंग से सजी गुड़िया है। पता कीजिए, क्या इनके अलावा उनका उपयोग अन्य कार्यों के लिए भी हुआ है?

महिलाओं की दासता केवल पुरुषों के कारण है। पुरुषों की यह धारणा कि ईश्वर ने पुरुष को श्रेष्ठ शक्तियों से युक्त और स्त्री को उसकी गुलामी करने के लिए बनाया है और परंपरागत तौर पर स्त्रियों द्वारा इसे सत्य मानकर इसकी स्वीकार्यता, ये ही स्त्री की दासता को बढ़ावा देने वाले कारक तत्व हैं।

अपनी पत्नी के साथ पेरियार

विवाह से पूर्व, लड़का और लड़की की जोड़ी दोनों के रंग-रूप की संगतता,आपसी स्नेह और सही समझ तथा समान शिक्षा के आधार पर नहीं मिलायी जाती, बल्कि यह देखा जाता है कि क्या लड़की आज्ञाकारी होगी और लड़के के इच्छानुसार आचरण करेगी? लगभग उसी तरह से,  जैसे गाय-बैल आदि खरीदते समय उन्हें देखा-परखा जाता है।

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मंगल सूत्र का निहितार्थ यह है कि जब लड़का इसे लड़की के गले में बांधता है, तभी से वह उसे अपनी दासी मान लेता है और लड़की भी उसकी दासी बनना स्वीकार कर लेती है। इस प्रकार, पति अपनी पत्नी के प्रति चाहे जैसा भी व्यवहार करे, किसी को उसे रोकने-टोकने का अधिकार नहीं है और ना ही उसके दुर्व्यवहारों के लिए दण्ड का प्रावधान है।  

आज की मध्यमवर्गी महिलाएं अपनी शिक्षा, धन, व्यवहार-कुशलता सम्बन्धी ज्ञान, सम्मानित रिश्तेदार और एक आरामदायक जीवन जीने के बावजूद, बहुत ही पारंपरिक ढंग से व्यवहार करती हैं जिससे उनमें देहाती लड़कियों से भी ज़्यादा पिछड़ापन झलकता है। यह दुःख की बात है। ऐसी महिलाओं द्वारा जन्मे और उनके संरक्षण में पलने-बढ़ने वाले बच्चों में मानवीय गरिमा का भाव कैसे आएगा?

हमारे समाज की महिलाओं को स्वयं को जन्म से ही दासी मानने की प्रवृत्ति बदलनी चाहिए।

महिलाओं! साहसी बनिए! यदि आप अपने आचार-विचार में बदलाव लाती हैं, तो आपके पति और अन्य पुरुषों को भी बदलने में आसानी होगी। पुरुष आप पर यह आरोप लगाते हैं कि आप पिछड़ी हैं। अपने आप पर यह आरोप मत लगने दीजिये। अपनी स्थिति को यूँ मज़बूत बनाइये कि भविष्य में, इसकी बजाय कि आपको ‘अमुक व्यक्ति की पत्नी’ के रूप में पहचाना जाए, आपके पति को ‘अमुक महिला के पति’  के तौर पर चिन्हित किया जाए!

पति का लाड़-प्यार पानेवाली महिलाएं, जिनको गहनों और परिधानों का अत्यधिक मोह होता है, जो स्त्रियोचित सौंदर्य और फैशन के आकर्षण से अभिभूत हो जाती हैं तथा जो धनाढ्य और अभिमानी होती हैं, वे अपनी इसी निष्क्रिय अवस्था में  संतुष्ट रहेंगी। वे दुनिया में कोई सुधार लाने में सहायक सिद्ध नहीं होंगी। महिलाओं को उपहास की वस्तु समझने तथा पुरुष के मन-बहलाव की चीज मानने के पीछे मुख्य कारण यह है कि वे खुद ही अभद्र ढंग से व्यवहार करती हैं। जो महिलाएँ खुद को फैशनेबल और आधुनिक समझती हैं, वे मात्र बढ़िया परिधान तथा आभूषण पहनकर आकर्षक दिखने से ही स्वयं को सभ्य मानती हैं। उन्हें इस बात का एहसास नहीं होता कि पुरुषों के साथ समान दर्जे का सम्बन्ध ही वास्तविक सभ्य जीवन का आधार है।

पहली महिला शिक्षक सावित्रीबाई फुले की तस्वीर के साथ सेल्फी लेती महिलाएं

‘प्राथमिक शिक्षक’ शब्द को सर्वप्रथम महिलाओं के लिए प्रयोग में लाया जाना चाहिए, क्योंकि 6  से 7 वर्ष से कम आयु वाले बच्चों के लिए तो असल में वे ही प्राथमिक शिक्षक हैं।

हिंदू धर्म में ज्ञान की और धन की देवियों को पूजा जाता है, फिर ये देवियां महिलाओं को शिक्षा तथा संपत्ति का अधिकार प्रदान क्यों नहीं करतीं? महिलाओं को तर्कसंगत ज्ञान और वैश्विक मामलों से सम्बन्धित पर्याप्त शिक्षा दी जानी चाहिए। उन्हें ऐसे साहित्य, इतिहास या कहानियों से दूर रखा जाना चाहिए जो अंधविश्वास और भय को जन्म देती हैं। महिलाओं की पराधीनता के कई कारणों में से प्रमुख कारण यह है कि उन्हें संपत्ति का अधिकार नहीं है।

समाज में पुरुषों की प्रधानता ने उन्हें निरंकुश बनाया है, यही एकमात्र कारण है कि क्यों हमारी भाषाओं में पुरुष की ‘शुचिता’ का कोई लक्षण निर्धारित नहीं किया गया। शुचिता के नाम पर पति द्वारा पत्नी के प्रति बरती जानेवाली क्रूरता को, जिसे पत्नी को हिंसा  के रूप में भी सहन करना पड़ता है, समाप्त कर देना चाहिए।

अगर किसी महिला को संपत्ति का अधिकार और अपनी पसंद से किसी को चुनने तथा प्रेम करने की स्वतंत्रता नहीं है, तो वह पुरुष की स्वार्थ-सेवा करने वाली एक रबड़ की पुतली से ज़्यादा और क्या है?

‘शुचिता’ को केवल स्त्रियों पर लागू करने और पुरुष को इससे मुक्त रखने का हठ, पूर्वाग्रह – युक्त व्यक्तिगत स्वामित्व पर आधारित धारणा है। स्त्री पुरुष की संपत्ति है, यही विचार पत्नी की वैध स्थिति निर्धारित करता है।

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यदि हमारा सम्पूर्ण साहित्य न्याय और अनुशासन-बद्ध आचरण के निमित्त रचा गया है, तो महिलाओं पर लागू सभी नियम-कानून पुरुषों पर भी समान रूप से लागू नहीं होने चाहिए?

संसार में यही दावा किया जाता रहा है कि स्वतंत्रता तथा साहस केवल ‘पौरुष’ के लक्षण हैं। अतः पुरुष समाज ने यह निश्चय कर लिया कि ये ही गुण ‘पुरुष की श्रेष्ठता’  को परिभाषित करते हैं। जब तक दुनिया में पुरुष की श्रेष्ठता कायम रहेगी, महिलाओं की पराधीनता जारी रहेगी। निश्चित तौर पर, महिलाएँ तब तक स्वतंत्रता हासिल नहीं करेंगी जब तक कि वे पुरुष – वर्चस्व की रीति को समाप्त नहीं कर देतीं। पुरुष को अपनी यौन – साथी चुनने की छूट और उसे जितनी मर्ज़ी उतनी पत्नियाँ वरण करने की अनुमति स्वच्छंद संभोग का कारण बनती है। लोग महिलाओं की स्वास्थ्य – सुरक्षा और पारिवारिक संपत्ति के संरक्षण के उद्देश्य से गर्भ-निरोध का समर्थन करते हैं; लेकिन हम इसकी वकालत महिलाओं की मुक्ति के लिए करते हैं।

यदि किसी पुरुष को किसी महिला पर दावा करने का अधिकार है, तो एक महिला को भी पुरुष पर दावा करने का अधिकार होना चाहिए। अगर महिला पर पुरुष को पूजने के नियम थोपे जाते हैं, तो पुरुष पर भी महिला को पूजने के नियम लागू किये जाएँ।

महिलाओं की मुक्ति के लिए पुरुष का तथाकथित ‘प्रयास’ वास्तव में महिलाओं की दासता को ही जारी रखता है और उसके निवारण के रास्ते में खलल डालता है। पुरुषों द्वारा यह दिखावा कि वे महिलाओं का सम्मान करते हैं और उनकी स्वतंत्रता के लिए संघर्ष करते हैं, उन्हें धोखे में रखने के लिए महज़ एक चाल है। क्या आपने कभी,  कहीं भी, सियार को मुर्गी तथा मेमने को, या बिल्ली को चूहों को बख्शते हुए देखा है, या फिर पूंजीपतियों को श्रमिकों का उद्धार करते देखा है?

महिलाओं को दासों की तरह घरेलू काम-काज –  फ़र्श की सजावट (उत्तर भारत में रंगोली तथा दक्षिण भारत में कोलम), उपले बनाना, बर्तन माँजना, सामूहिक नृत्य (कुम्मी) और कोलाट्टम के साथ नृत्य करने का प्रशिक्षण मत दीजिये।

आज हमारा अंधविश्वास हमारे समाज के दोषों और अधोगति का मुख्य कारण है। यदि हमारे समाज की महिलाओं के बीच इतना अंधविश्वास है, तो उनके बच्चों का क्या होगा? यदि महिलाओं की ओर से किसी सुधार-कार्य की पहल की जाती है, तो उसे ऊर्जा मिलती  है। यदि बाल-विवाह पर रोक लगा दी जाए और तलाक, विधवाओं के पुनर्विवाह, अंतर-जातीय विवाह और अपनी पसंद के अनुसार विवाह करने के अधिकार के लिए प्रावधान बना दिए जाएँ, तो समाज में व्याप्त वेश्यावृत्ति का 90 प्रतिशत समाप्त हो जाएगा।

पुरुष स्त्री के बिना रह सकता है, लेकिन हर स्त्री सोचती है कि वह पुरुष के बिना नहीं रह सकती। यदि हम इसके कारण पर ग़ौर करें, तो पाएँगे कि गर्भधारण से जुड़ीं समस्याओं के चलते, महिलाएँ यह जताने में असमर्थ होती हैं कि वे पुरुषों के बिना रह सकती हैं। चूंकि पुरुषों पर ऐसा कोई भार नहीं होता, इसलिए समाज में उनकी स्थिति इतनी दृढ़ है कि उन्हें यह घोषित करने में कोई आपत्ति नहीं होती  कि वे महिलाओं के बिना रह सकते हैं। इसके साथ ही, मातृत्व से सम्बन्धित समस्याएँ महिलाओं को दूसरों की सहायता लेने के लिए विवश कर देती हैं, जिससे पुरुष वर्चस्व को बढ़ावा मिलता है। इसलिए, महिलाओं की असली मुक्ति के लिए उन्हें संतानोत्पत्ति की कष्टप्राय बाध्यता से पूरी तरह मुक्त कर देना चाहिए।

(उपरोक्त लेख ‘कलेक्टेड वर्क्स ऑफ पेरियार ई. वी. आर’., संयोजन : डॉ. के. वीरामणि, प्रकाशक : दी पेरियार सेल्फ-रेसपेक्ट प्रोपगंडा इन्स्टीच्यूशन, पेरियार थाइडल, 50, ई. वी. के. संपथ सलाय, वेपरी, चेन्नई – 600007 के प्रथम संस्करण, 1981 के पृष्ठ संख्या 567 से लेकर 572 से लिए गए हैं।)

(अनुवाद : देविना अक्षयवर, कॉपी संपादन : एफपी डेस्क)


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