दलित साहित्य महोत्सव : पहले दिन कास्ट और जेंडर पर हुई विस्तार से चर्चा

कास्ट और जेंडर दो ऐसे फैक्टर हैं जो समाज की सारी समस्याओं की जड़ हैं। इसके द्वारा श्रेष्ठता के आधार पर स्त्री पर पुरुष और अवर्ण पर सवर्ण को बिठा दिया गया है

यह ऐतिहासिक महोत्सव है। एक सर्वेश्वर दयाल सक्सेना का युग था जिसमें पूरा गाँव जुटकर मशालें जलाकर शोर मचाकर भेड़िया को डराता था। आज दलित युग है। इस युग में भेड़िया शब्द से डरता है। दलित शब्द से। तभी तो दलित शब्द पर पाबंदी लगाई गई। इस मायने में दलित साहित्य महोत्सवों से अलग भी है और महत्वपूर्ण भी। कास्ट और जेंडर दो ऐसे फैक्टर हैं जो समाज की सारी समस्याओं की जड़ हैं। इसके द्वारा श्रेष्ठता के आधार पर स्त्री पर पुरुष और अवर्ण पर सवर्ण को बिठा दिया गया है। तमाम आंदोलनों के बावजूद हम इसे खत्म नहीं कर पाए। ये बातें वरिष्ठ साहित्यकार चौथीराम यादव ने दिल्ली के किरोड़ीमल कॉलेज में दो दिवसीय दलित साहित्य महोत्सव के पहले सत्र को संबोधित करते हुए कही।

उन्होंने नंद किशोर हटवाल की कविता उद्धृत करते हुए कहा कि ‘बोए जाते हैं बेटे उग आती हैं बेटियाँ/ खाद पानी बेटों को/ लहलहाती हैं बेटियां/ हिमालय की ऊँचाई तक ठेले जाते हैं बेटे /चढ़ जाती हैं बेटियां’। उन्होंने कहा कि “स्त्री रचनाओं में आपको इस तरह के स्त्री स्वर मिलेंगे। स्त्रियां थोड़ा सी मिट्टी मिलने पर भी अपना स्थान बना लेती हैं। मेरा कहना यह है कि अगर इन साहित्य महोत्सवों में कलबुर्गी और गौरी लंकेश की हत्याओं के कारणों पर बात नहीं होती है तो आप दूसरे साहित्य उत्सवों से भिन्न नहीं हो सकते। साहित्य वह है जो समाज को दिशा दे। शब्द से सत्ता डरती है। उना आंदोलन के समय अरावल दस्ता पटना का एक गीत वायरल हुआ था- “गैय्या बैरन बवाल किए जाय रे/ राम घर गैय्या रहीम घर गैय्या/ कौन वो मजहब सवाल किए जाय रे/ मनु के सपूतों अपनी माता को सम्हालों/ जिंदा भी सम्हालों, मुर्दा भी सम्हालो/ उना के लालों की आँख हुई लाल रे। यह है दलित प्रतिरोध का स्वर।”

बताते चलें कि दलित साहित्य महोत्सव में दिंवगत लेखिका रजनी तिलक, ओम प्रकाश बाल्मीकि और जय प्रकाश लीलवान के नाम पर तीन सभागार बनाए गए थे।

दिल्ली के किरोड़ीमल कॉलेज में आयोजित दलित साहित्य महोत्सव के अवसर पर अपने विचार रखते वक्ता

ओम प्रकाश बाल्मीकि सभागार में ‘दलित और आदिवासी स्त्री साहित्य’ विषय पर वक्ता के तौर पर प्रोफेसर व साहित्यकार चौथीराम यादव, स्नेहलता, सरोज, भूपिंदर छौधरी,श्यामली, जय श्री और प्रज्ञा रोहिणी बतौर वक्ता शामिल हुई। पूर्व डूटा अध्यक्ष नन्दिता नारायण ने इस सत्र की अध्यक्षता की।

इसी सत्र में किरोड़ी मल कॉलेज की प्रोफेसर और कहानीकार प्रज्ञा रोहिणी ने कहा कि औरत प्रधानमंत्री तो चुन सकती है पर अपना जीवनसाथी नहीं। औरत घर बसाती तो है पर उसका अपना घर कौन सा है। औरत पुरुष की निजी संपत्ति है पर उसकी संपत्ति क्या है। स्त्रियों के लिए देश का संविधान अलग है और समाज का संविधान अलग। पर अब स्त्री लेखन में रूदन नहीं है। तर्क है, प्रतिरोध और नकार है। ये राष्ट्रवाद के उभार का समय है जिसका शिकार सबसे ज्यादा स्त्रियां हो रही हैं। ये विचारधारा पुराने प्रतीकों को ग्लोरीफाई करके हमारी इंडिविजुअल अस्मिता पर हमले कर रही है।

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वहीं जयप्रकाश लीलवान सभागार में ‘दलित साहित्य और मार्क्सवादी साहित्य में अंतःसंबंध-अंतर्विरोध’ विषय पर के.के.वत्स, शी.बी. पीटर और सूरज बहादुर थापा ने अपना विचार रखा।

अपने संबोधन में शी. बी. पीटर ने कहा कि आंबेडकर और मार्क्स ट्विन ब्रदर्स हैं, ट्विन सिस्टर हैं, ट्विन एलजीबीटीक्यूं हैं। इन्हें एक-दूसरे से अलग करके नहीं देखा जाना चाहिए। जबकि सत्र की अध्यक्षता करते हुए सूरजभानु थापा ने कहा कि अवधारणाएं सरलीकरण का शिकार हैं, और हमारे डीएनएन में इस तरह पैबस्त हैं कि हम समझ ही नहीं पाते कि हम इनके शिकार हैं। यह एक खतरनाक प्रक्रिया है। अंबेडकर की बात होती है तो जाति से जोड़ दी जाती है। वहीं जब मार्क्स की बात होती है तो क्लास से जोड़ दी जाती है। लेकिन ये दोनों किसके साथ खड़े होते हैं? सदियों से शोषित रहे लोगों के साथ या कि वर्चस्ववादी अभिजन लोगों के साथ। मार्क्स व अंबेडकर दोनों की लड़ाई उन लोगो से है जो पॉवर और सत्ता के साथ हैं। मराठी समाज और साहित्य में जय भीम लाल सलाम का कांसेप्ट है। दोनों कंधे से कंधा मिलाकर साथ चलते हैं। लेकिन हिंदी साहित्य की बात आते ही मार्क्स और आंबेडकर में टकराहट शुरु हो जाती है। वे एक-दूसरे के सामने आ जाते हैं। भारत के संदर्भ में आपको मार्क्स को समझना है तो भक्ति आंदोलन और भक्ति साहित्य को देखना होगा। कबीर कहते हैं ‘वृक्ष कबहु न फल भखे, नदी न सांचे नीर, परमारथ के कारणे साधू धरा शरीर।’ तो मार्क्स भी अपनी ज़रूरत से ज्यादा संसाधनों के संचय को सोशल क्राइम कहते हैं। ये आपको रहीम और भक्ति आंदोलन के दूसरे कवियों के यहां भी मिलेगा। तुलसी कहते हैं ‘मुखिया मुखु सो चाहिए, खान पान कहुं एक/ पालइ पोषइ सकल अंग, तुलसी सहित विवेक’। यानि मुखिया मुख के सामान होना चाहिए जो विवेकपूर्वक सब अंगों का पालन-पोषण करता है। कोई भी विचार मौलिक नहीं है। कहने का आशय यह है कि भारतीय भक्ति आंदोलन में जो बातें साहित्य में आई हैं वहीं मार्क्सवाद के बीज हैं।”

रजनी तिलक सभागार में ‘दलित साहित्य आंदोलन की चुनौतिया’ विषय के सत्र की अध्यक्षता श्योराज सिंह बेचैन ने की। जबकि अनीता भारती, रजत रानी मीनू, मुसाफिर बैठा, डॉ कालीचरण स्नेही और राजेश मांझी वक्ता के तौर पर शामिल हुए।

सत्र की पहले वक्ता के तौर पर राजेश मांझी ने कहा कि भिखारी ठाकुर और राहुल सांकृत्ययान के बाद महेंद्र प्रसाद सिंह ने अपने भोजपुरी नाटकों के जरिए दलित वर्ग की पीड़ा को उठाया है। उनका नाटक ‘लुटकी बाबा की रामलीला’ एक चर्मकार की पीड़ा को अभिव्यक्ति देता है। जिस समाज में यह कहा जाता है कि राम ऊंची जाति के थे तो राम का किरदार ऊंची जाति का आदमी निभाए। मैथिली की ही तरह भोजपुरी का भी हिंदी से अलग अपना अस्तित्व है।

साहित्यकार अनीता भारती ने कहा कि दलित साहित्य आंदोलन के सामने आज पहली चुनौती यह है कि हम एक कैसे रहें। दूसरी यह कि फासीवादी ताकतों का सामना हम कैसे करें। तीसरी चुनौती यह कि जातिवाद के खिलाफ कैसे लड़ें। सिर्फ उनके जातिवाद के खिलाफ़ ही नहीं बल्कि अपने जातिवाद से भी लड़ना होगा। अगला सवाल है कि स्त्री समाज को दलित साहित्य में कैसे शामिल करें। आज भी साहित्य में स्त्री की भागीदारी निराशाजनक स्थिति में है। अगला सवाल है कि हम अपनी लेखनी का कैसे इस्तेमाल करें। हमें इनके खिलाफ़ अब इकट्ठा होकर लड़ना होगा। यहां ये भी समझना ज़रूरी है कि दलित आंदोलन और दलित साहित्य एक ही सिक्के के दो पहलू हैं।

इसके बाद आखिरी सत्र के तौर पर ‘आदिवासी-साहित्य-समुदाय की चुनौतियाँ’ विषय पर निर्मला पुतुल की अध्यक्षता में रजनीतिलक सभागार में कार्यक्रम हुआ। इसमें बतौर वक्ता लक्ष्मण गायकवाड़, सूरज बहादुर थापा, स्नेहलता नेगी और सूरज बड़त्या आदि ने अपने विचार रखे।

(कॉपी संपादन : एफपी डेस्क)


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