माॅरीशस के जागरण में कबीर का योगदान, गांधी के विचारों से मिली मजबूती

सरकार एक तरफ आरक्षण के खिलाफ समीक्षा याचिका दायर करने की बात कह रही है, तो दूसरी तरफ सुप्रीम कोर्ट में याचिका खारिज होने के बाद कई विश्वविद्यालयों ने एमएचआरडी व यूजीसी के सर्कूलर का इंतजार किए बगैर ही विभागवार आरक्षण के आधार पर नियुक्ति के लिए विज्ञापन जारी कर दिए हैं

मां के साथ घास भी काटी, पिता के साथ कुदाल भी चलाया : रामदेव धुरंधर

पटना : 7 फरवरी को जगजीवन राम शोध संस्थान में माॅरीशस के प्रसिद्ध साहित्यकार रामदेव धुरंधर ने अपने बचपन, जीवन-संघर्ष और भारत के साथ जुड़ाव पर वक्तव्य दिया। उन्होंने इस वक्तव्य में अपने बचपन के अनुभवों को श्रोताओं के साथ साझा करते हुए कहा कि 1854 में उनके परदादा भारत से माॅरीशस पहुंचे थे। गोरों (जिसमें फ्रांसीसी और अंग्रेज दोनों शामिल थे) ने उन पर बहुत जुल्म ढाया था। गरीबी में उन्होंने मां के साथ घास काटी और पिता के साथ कुदाल भी चलाया। इस जुल्म और शोषण में वे ‘होशियार’ लोग भी शामिल थे, जो भारत से गए थे। उन्होंने बताया कि 1901 में महात्मा गांधी माॅरीशस गए थे। उनके बताए विचार से देश मजबूत हुआ। भारत उनके लिए एक संस्कृति की तरह है। धुरंधर ने बताया कि ‘गोदान‘ पढ़ने के बाद साहित्य के तरफ उनका रुझान हुआ और उन्होंने हिंदी में लिखना शुरू किया। उन्होंने कहा कि वे अपने देश में शब्दों के कुछ बीज बोते हैं और भारत में उसकी फसल काटते हैं। विदित हो कि पिछले वर्ष का श्रीलाल शुक्ल पुरस्कार उन्हें प्राप्त हुआ है।

जगजीवन राम शोध संस्थान में अपने अनुभव साझा करते साहित्यकार रामदेव धुरंधर

रामदेव धुरंधर ने बताया कि पहले भारत से मॉरीशस जाने के लिए केवल जलमार्ग ही एक मात्र साधन था और लोग पानी के जहाज तीन-चार महीने में माॅरीशस पहुंचते थे, तब तक रास्ते में ही कई संगी-साथी बिछड़ जाते थे। वहां उतरते ही समूह में बांधकर पिटाई शुरू हो जाती थी। खाना नहीं दिया जाता था, सिर्फ पानी मिलता था। फ्रांसीसी गोरे लोगों की जेल होती थी। वे भारतीय चतुर ‘मेटों’ के माध्यम से शोषण करते थे, जो आज वहां करोड़पति बन गए हैं। इनका काला इतिहास रहा है।

कार्यक्रम में उपस्थित श्रोतागण

धुरंधर ने कहा कि माॅरीशस के जागरण में कबीर का बड़ा योगदान है। लेकिन, अब वहां पुराने लोग ही भोजपुरी बोलते हैं। वहां की नई पीढ़ी फ्रांसीसी भाषा की ओर मुखातिब है।

उन्होंने कहा कि 1834 से 1912 तक भारत से करीब चार-पांच लाख लोग माइग्रेट होकर माॅरीशस गए। आज यहां की आबादी 13 लाख है।

आयोजन में डाॅ. रामवचन राय तथा प्रो. यादवेन्द्र ने भी अपने विचार रखे। अतिथियों का स्वागत संस्थान के निदेशक श्रीकांत ने किया। कार्यक्रम का संचालन नीरज ने किया। कार्यक्रम में लोगों ने साहित्यकारों से अनेक प्रश्न किए। कार्यक्रम में अवधेश प्रीत, अनुपम प्रियदर्शी, शशि, सुकांत नागार्जुन, प्रणव चौधरी, नवेंदु, रेशमा, शेखर, विद्याकर झा, पवन सहित कई साहित्यकार एवं बुद्धिजीवी मौजूद थे।

(कॉपी संपादन : प्रेम)


फारवर्ड प्रेस वेब पोर्टल के अतिरिक्‍त बहुजन मुद्दों की पुस्‍तकों का प्रकाशक भी है। एफपी बुक्‍स के नाम से जारी होने वाली ये किताबें बहुजन (दलित, ओबीसी, आदिवासी, घुमंतु, पसमांदा समुदाय) तबकों के साहित्‍य, सस्‍क‍ृति व सामाजिक-राजनीति की व्‍यापक समस्‍याओं के साथ-साथ इसके सूक्ष्म पहलुओं को भी गहराई से उजागर करती हैं। एफपी बुक्‍स की सूची जानने अथवा किताबें मंगवाने के लिए संपर्क करें। मोबाइल : +917827427311, ईमेल : info@forwardmagazine.in

फारवर्ड प्रेस की किताबें किंडल पर प्रिंट की तुलना में सस्ते दामों पर उपलब्ध हैं। कृपया इन लिंकों पर देखें

मिस कैथरीन मेयो की बहुचर्चित कृति : मदर इंडिया

बहुजन साहित्य की प्रस्तावना 

दलित पैंथर्स : एन ऑथरेटिव हिस्ट्री : लेखक : जेवी पवार 

महिषासुर एक जननायक’

महिषासुर : मिथक व परंपराए

जाति के प्रश्न पर कबी

चिंतन के जन सरोकार

About The Author

Reply